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Thursday, April 13, 2023

कुमार गंधर्व के कबीर: सुनो भई साधो


नाद के सौंदर्य को शब्द में कोई कैसे लिखे?  कोई पत्ता डाल से गिरा और उससे जो ध्वनि उत्पन्न हुई, उस अनुभूति को बयान करने के लिए क्या कवि होना जरूरी है? संभवत: हां. पर कवि के लिखे शब्द का अर्थ कई बार पढ़ कर नहीं, सुन कर ही स्पष्ट हो पाता है. पर यदि यह नाद अनहद हो तब? यह ख्याल कुमार गंधर्व (1924-1992) के कबीर को सुन कर बार-बार मन में आता है. कबीर की कविता में व्यक्त ‘अनाहत नाद (अनहद नाद)’ कुमार के ‘आहत नाद’ में आकर स्वर पाता है.

जब मैं कुमार गंधर्व को गाते सुनता हूँ- ‘ उड़ जायेगा हंस अकेला, जग दर्शन का मेला/ जैसे पात गिरे तरुवर के, मिलना बहुत दुहेला’, तब लगता है कि शायद कबीर को कुमार गंधर्व का इंतजार था. कबीर को कुमार करीब चार सौ साल के बाद स्वर दे रहे थे. संभव है कि हमारे चारो ओर यह नाद पहले से व्याप्त था, आधुनिक तकनीक ने कुमार गंधर्व के माध्यम से हम तक पहुँचाने में सहायता की. कहा गया है-‘नाद को न भेद पायो, जो पायो सकल जगत में वही गुणी कहायो’. कुमार गुणी गायक थे.

कर्नाटक के धारवाड़ इलाके में आठ अप्रैल 1924 को जन्मे कुमार गंधर्व का नाम शिवपुत्र सिद्धारमैया कोमकली था. उनमें नैसर्गिक प्रतिभा थी और दस-ग्यारह वर्ष की उम्र में ही उनकी प्रसिद्धि फैल गई, वे कुमार गंधर्व कहलाए. प्रोफेसर बी आर देवधर उनके गुरु थे, जो अपने शिष्यों को एक अलग रास्ता अख्तियार करने को प्रेरित करते थे. कुमार गंधर्व की क्रांतिकारी चेतना का उत्स यहाँ ढूंढा जा सकता है.

कुमार गंधर्व का जन्मशती वर्ष चल रहा है. हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के इस गुणी गायक को एक बार फिर से याद किया जा रहा है. सच तो यह है कि वे संगीत प्रेमियों के मन से कभी गए ही नहीं. पिछले दशकों में यूट्यूब के माध्यम से उनकी ख्याल गायकी और भजन जन सुलभ हुए हैं.

भक्तिकालीन कवि कबीर अपनी विद्रोही, लोक-चेतना की वजह से पाँच सदी के बाद भी विभिन्न रूपों में लोक मन में व्याप्त हैं. यही कारण है युवाओं में भी उनके निर्गुण पदों की पैठ बढ़ी है. मधुप मुद्गल (कुमार गंधर्व के शिष्य) से लेकर प्रहलाद टिपाणिया और शबनम विरमानी के यहाँ कबीर कई रूप और स्वर में मौजूद हैं. अनायास नहीं कि युवा संगीतकारों के एक म्यूजिक बैंड का नाम ‘कबीर कैफे’ है!

बहरहाल, कुमार शास्त्रीय संगीत के मूर्धन्य साधक थे, पर थे लोक के करीब. कई जगह यह लिखा जा चुका है कि जब वर्ष 1948 में वे टीबी से पीड़ित होकर मालवा के देवास में स्वास्थ्य लाभ करने गए, तब वहाँ गाए जाने वाले लोक गायन से उन्होंने प्रेरणा ग्रहण की थी. वहाँ नाथपंथी जोगी कबीर के निर्गुण पदों को गाते थे. करीब छह वर्ष के बाद ‘कबीर के चदरिया’ को उन्होंने अपने राग से एक बार फिर बुना. उनके रचे बंदिशों में शास्त्रीय और लोक रंग एक साथ मिलते हैं.

कुमार गंधर्व के गायन में जो स्वर का उठान है और शब्दों के बीच जो शून्यता है उसे सुनने का सुख अनिर्वचनीय है. कबीर के लेखन में रहस्यात्मकता है, वहीं शास्त्रीय संगीत में अमूर्तता है. कुमार गंधर्व का गायन इस रहस्यात्मकता और अमूर्तता को भेद कर आम लोगों के करीब लेकर आया.

शास्त्रीय संगीत के कई मर्मज्ञ गायन में शब्द के महत्व को नकारते रहे हैं. मुकुंद लाठ ने एक जगह लिखा है: “संगीत में शब्द का प्रयोग आवश्यक नहीं, अवान्तर है. शब्द वहाँ आगंतुक है, न भी आए तो संगीत संगीत रह जाता है.” इसके उलट कुमार गंधर्व के लिए गायन में शब्द की महत्ता हमेशा रही. यह सिर्फ कबीर के प्रसंग में ही नहीं बल्कि जब वे सूरदास (ऊधो अँखियाँ अति अनुरागी) या मीरां (पिया जी म्हारे नैना आगे रहियो जी जी जी) को गाते हैं उससे स्पष्ट है. निर्गुण गायन से अलग उनको सुनना भी उतना ही प्रीतकर है.

कुमार गंधर्व के गायन का आनंद लेने के लिए शास्त्रीय संगीत का मर्मज्ञ होना जरूरी नहीं है. मै संगीत का जानकार नहीं हूँ, पर एक श्रोता के रूप में ऐसा लगता है कि यदि आप रसिक हैं, यही काफी है. और यही कुमार गंधर्व का भारतीय संगीत में असाधारण योगदान है, वे शास्त्रीय संगीत को लोक तक लेकर गए.

लेख की शुरुआत मैंने नाद सौंदर्य से की थी, आखिर में फिर उसी नाद की बात, जिसकी सार्थकता कुमार गंधर्व के यहाँ साफ सुनाई देती है:  

‘सुनता है गुरु ज्ञानी ज्ञानी, ज्ञानी ज्ञानी

गगन में आवाज़ हो रही है झीनी झीनी, झीनी झीनी’.

 

Sunday, August 08, 2010

Remembering People's Poet Nagarjun



























Hindi and Maithili poet Baba Nagarjun was born on 25 June 1911. His birth centenary is being celebrated in 2010-2011. These pictures depict his parental home, a library (in his name) in his village Tarauni and nearby railway station Sakri in Darbhanga district of Bihar. In the last picture Blogger is sitting with Baba Nagarjun's youngest son Shyamakant Mishra.

Saturday, August 07, 2010

नागार्जुन: सच का साहस

दरभंगा जिले में सकरी के ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होते हुए जैसे ही हम नागार्जुन के गाँव तरौनी की ओर बढ़ते हैं, मिट्टी और कंक्रीट की पगडंडियों के दोनों ओर आषाढ़ के इस महीने में खेतिहर किसान धान की रोपनी करने में जुटे मिलते हैं. आम के बगीचे में ‘बंबई’ आम तो नहीं दिखता पर ‘कलकतिया’ और ‘सरही’ की भीनी सुगंध नथुनों में भर जाती है. कीचड़ में गाय-भैंस और सूअर एक साथ लोटते दिख जाते हैं. तालाब के महार पर कनेल और मौलसिरी के फूल खिले हैं...हालांकि यायावर नागार्जुन तरौनी में कभी जतन से टिके नहीं, पर तरौनी उनसे छूटा भी नहीं. तरह-तरह से वे तरौनी को अपनी कविताओं में लाते हैं और याद करते हैं. लोक नागार्जुन के मन के हमेशा करीब रहा. लोक जीवन, लोक संस्कृति उनकी कविता की प्राण वायु है. लोक की छोटी-छोटी घटनाएँ उनके काव्य के लिए बड़ी वस्तु है. नागार्जुन की प्रसिद्ध कविता, ‘अकाल और उसके बाद’ में प्रयुक्तत बिंबों, प्रतीकों पर यदि हम गौर करें तो आठ पंक्तियों की इस कविता पर हमें अलग से टिप्पणी करने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

बाबा नागार्जुन के व्यक्तित्व और कृतित्व में कोई फांक नहीं है. उनका कृतित्व उनके जीवन के घोल से बना है. यह घलुए में मिली हुई वस्तु नहीं है. नागार्जुन की रचना जीवन रस से सिक्त है जिसका उत्स है वह जीवन जिसे उन्होंने जिया. सहजता उनके जीवन और साहित्य का स्वाभाविक गुण है. इसमें कहीं कोई दुचित्तापन नहीं. लेकिन यह सहजता ‘सरल सूत्र उलझाऊ’ है.

नागार्जुन कबीर के समान धर्मा हैं. नामवर सिंह ने उन्हें आधुनिक कबीर कहा है. सच कहने और गहने का साहस उन्हें दूसरों से अलगाता है. युवा कवि देवी प्रसाद मिश्र की एक पंक्ति का सहारा लेकर कहूँ तो उनमें ‘सच को सच की तरह कहने और सच को सच की तरह सुनने का साहस था’. नागार्जुन दूसरों की जितनी निर्मम आलोचना करते हैं, खुद की कम नहीं. जो इतनी निर्ममता से लिख सकता है- ‘कर्मक फल भोगथु बूढ़ बाप (कर्म का फल भोगे बूढ़े पिता)...’ तब आश्चर्य नहीं कि ...बेटे को तार दिया बोर दिया बाप को...’सरीखी पंक्तियाँ उन्होंने कैसे लिखी होगी!

उनकी यथार्थदृष्टि उन्हें आधुनिक मन के करीब लाती है. यही यथार्थ दृष्टि उन्हें कबीर के करीब लाती है. यथार्थ कबीर के शब्दों का इस्तेमाल करें तो और कुछ नहीं-आँखिन देखी’ है. नागार्जुन को भी इसी आँखिन देखी पर विश्वास है, भरोसा है. मैथिली में उनकी एक कविता है ‘परम सत्य’ जिसमें वे पूछते हैं-सत्य क्या है? जवाब है-जो प्रत्यक्ष है वही सत्य है. जीवन सत्य है. संघर्ष सत्य है. (हम, अहाँ, ओ, ई, थिकहुँ सब गोट बड़का सत्य/ सत्य जीवन, सत्य थिक संघर्ष.)

नागार्जुन की एक आरंभिक कविता है- बादल को घिरते देखा है.’ देखा है, यह सुनी सुनाई बात नहीं है. अनुभव है मेरा. इस तरह का अनुभव उसे ही होता है जिसने अपने समय और समाज से साक्षात्कार किया हो. कबीर ने किया था और सैकड़ों वर्ष बाद आज भी वे लोक मन में जीवित हैं. कबीर ने इसे ‘अनभै सांचा’ कहा. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के मुताबिक यह अनुभव से उपजा और अनभय सत्य है.

कवि नागार्जुन में साहस है. सत्य का अनुभव है. सत्य के लिए वे न तो शास्त्र से डरते हैं, न लोक से. जिस प्रकार कबीर की रचना में भक्ति के तानेबाने से लोक का सच मुखरित हुआ है, उसी प्रकार नागार्जुन ने आधुनिक राजनीति के माध्यम से लोक की वेदना, लोक के संघर्ष, लोक-चेतना को स्वर दिया है. बात 1948 के तेलंगाना आंदोलन की हो, 70 के दशक के नक्सलबाड़ी जनान्दोलन की या 77 के बेलछी हत्याकांड की, नागार्जुन हर जगह मौजूद हैं. सच तो यह है कि नागार्जुन इस राजनीति के द्रष्टा ही नहीं बल्कि भोक्ता भी रहे हैं. स्वातंत्र्योत्तर भारत के राजनैतिक उतार-चढ़ाव, उठा-पठक, जोड़-तोड़ और जनचेतना का जीवंत दस्तावेज है उनका साहित्य. नागार्जुन के काव्य को आधार बना कर आजाद भारत में राजनीतिक चेतना का इतिहास लिखा जा सकता है.

असल में साधारणता नागार्जुन के काव्य की बड़ी विशेषता है. ‘सिके हुए दो भुट्टे’ सामने आते ही उनकी तबीयत खिल उठती है. सात साल की बच्ची की ‘गुलाबी चूड़ियाँ’ उन्हें मोह जाती है. ‘काले काले घन कुरंग’ उन्हें उल्लसित कर जाता है. उनके अंदर बैठा किसान मेघ के बजते ही नाच उठता है. नागार्जुन ही लिख सकते थे: पंक बना हरिचंदन मेघ बजे.

नागार्जुन जनकवि हैं. वे एक कविता में लिखते हैं: जनता मुझसे पूछ रही है/ क्या बतलाऊँ/ जनकवि हूँ मैं साफ कहूँगा/ क्यों हकलाऊँ. नागार्जुन में जनता का आत्मविश्वास बोलता है. नागार्जुन की प्रतिबद्धता है जन के प्रति और इसलिए विचारधारा उन्हें बांध नहीं सकी. न हीं उन्होनें कभी इसे बोझ बनने दिया. नागार्जुन प्रतिबद्ध लेखक हैं. प्रतिहिंसा उनका स्थायी भाव है. पर प्रतिबद्धता किसके लिए? प्रतिहिंसा किसके प्रति? उन्हीं के शब्दों में: बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त’, उनकी प्रतिबद्धता है. प्रतिहिंसा है उनके प्रति-‘लहू दूसरों का जो पिए जा रहे हैं.’

नागार्जुन जीवन पर्यंत सत्ता और व्यवस्था के आलोचक रहे. जन्मशती वर्ष में यदि सत्ता प्रतिष्ठान उन्हें याद नहीं करें तो बात समझ में आती है, पर जिस ‘जन’ को उन्होंने अपना पूरा जीवन दिया उसने उन्हें कैसे भूला दिया?

(दुनिया मेरे आगे, जनसत्ता, 7 अगस्त 2010 को प्रकाशित, चित्र : नागार्जुन के गाँव तरौनी में उनकी प्रतिमा)