Thursday, March 15, 2012

एक दोपहर सपनों के गाँव में: तिलोनिया

अजमेर जिले में किशनगढ़ के रास्ते मार्बल और ग्रेनाइट के धनकुबेरों के शो रुमों को छूती ऑटो रिक्शा जैसे ही तिलोनिया जाने को नीचे उतरती है, लगता है कि हम गाँव जा रहे हैं.

हवाओं में फगुनाहट है और सूर्य की किरणों में गर्मी.

तिलोनिया जाने की सड़क आम भारतीय गाँवों की सड़कों की तरह ही खास्ताहाल है. नाम मात्र को पक्की. कंक्रीट और कोलतार यहाँ-वहाँ बिखरी हुई. ड्राइवर का कहना है कि मार्बल-ग्रेनाइट ढोने वाली भारवाहक गाड़ियों की वजह से सड़कों का यह हाल है!

बहरहाल, खेचड़ी के पेड़ों और कंटीले झाड़ों के बीच 10-12 किलोमीटर की वीरान सड़कों पर यात्रा के बाद जैसे ही हम तिलोनिया रेलवे स्टेशन के क़रीब पहुँचते हैं लोगों की चहल-पहल दिखाई पड़ती है.

सामने बेयरफुट कॉलेज कैंपस का एक बोर्ड दिखता है. बोर्ड पर लिखी इबारत एक दौर के सामूहिक सपने की अभिव्यक्ति है. यह सपना आज़ादी के बाद 60 के दशक में जवान होती पीढ़ी ने देखा था. वे सौभाग्यशाली थे, उनके कुछ सपने थे.

60 के दशक में देश के प्रतिष्ठित कॉलेज के छात्र अपने संभ्रांत, अभिजात्य जीवन शैली को छोड़ खेत-खलिहानों में काम करने गए. वह देश में नक्सलबाड़ी आंदोलन का दौर था.

उनमें से कुछ खेत रहे, कुछ ने रास्ता बदल लिया और कुछ सतत उस राह पर चलते रहे जो उन्हें देश के उन हिस्सों तक लेकर गया जहाँ लोग अपनी छोटी दुनिया में छोटे सपनों के साथ जीते और मर जाते हैं.

तिलोनिया ऐसी ही सपनों की गाथा है. एक गैर सरकारी संस्था सोशल वर्क एंड रिसर्च सेंटर ने बेयरफुट कॉलेज के माध्यम से गाँव वालों के साथ मिल कर पिछले 40 वर्षों से इस सपने को जिया है. और अब यह सपना सरहदों के पार जाकर देश-विदेश के गाँवों में भी फल-फूल रहा है, सच हो रहा है.

दून स्कूल और दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफेंस कॉलेज से पढ़े अंग्रेजीदां संजीत उर्फ बंकर रॉय के लिए लीक पर चलते हुए सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ने में कोई कठिनाई नहीं थी.

सब कुछ उनके कदमों पे था. वे आराम से एक नौकरशाह, पत्रकार या प्रोफेसर बन सकते थे.

पर आजाद भारत में ग्रामीण जीवन के एक अनुभव ने उनके जीवन की धारा बदल दी.

वे कहते हैं, जब में कॉलेज में था तो मेरे मन में गाँव देखने की इच्छा जगी. और मैं वर्ष 1965 में बिहार में पड़े भीषण अकाल के दौरान वहाँ के गाँवों में गया. पहली बार मैंने भूख से मरते लोगों को देखा.

वापस लौट कर मैंने जब अपनी माँ से कहा कि मैं गाँव जा कर रहना चाहता हूँ तो वह कोमा में चली गई!’

कई वर्षों तक तो उन्होंने मुझसे बात नहीं की. उन्हें लगता रहा है मैंने परिवार का नाम डुबो दिया.

बंकर रॉय ने चीन के बेयरफुट कॉलेज से प्रेरणा लेते हुए अपने कुछ मित्रों के साथ गॉव के हाशिए पर रहने वालों के अनुभवों से ही उनके जीवन में कुछ बदलाव लाने की ठानी.

माओ के दौर में ग्रामीण इलाकों में काम करने वाले चीनी बेयरफुट डॉक्टरों की कार्यशैली को गॉधी के आदर्शों और उसूलों के साथ मिला कर इन्होंने एक ऐसा प्रयोग किया जो देश-विदेश में एक मिसाल बन गया है.

तिलोनिया कैंपस में सबसे पहले नज़र उसके अदभुत वास्तुशिल्प पर पड़ती है जिसे गाँव वालों ने बिना किसी औपचारिक शिक्षा-दीक्षा के तैयार किया है.

छतों पर सौर उर्जा की प्लेटों, जलसंग्रहण के हौदे, हैंडी क्राफ्ट और सेनेटरी नैपकिन के उत्पादन में लगी महिलाएँ, अस्पताल में लोक अनुभवों से पके डॉक्टर और नाइट स्कूल में बच्चों की पढ़ाई की तैयारी की पहल में जुटे लोग आपका स्वागत करते हैं.

एक कमरे में कठपुतलियों के माध्यम से राम निवास और बजरंग पास के केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुछ बच्चों को बेयरफुट कॉलेज के इतिहास और कार्यशैली से रू-ब-रू करवा रहे हैं. पास ही कुछ अफ्रीकी महिलाएँ सौर ऊर्जा की बारीकियों को सीख रही है.

अपनी पीएचडी की डिग्री को नेहरू जैकेट में छिपाए, कमरे के बाहर जूते उतार मैं भी जोखिम चाचाके अनुभवों को नीचे फर्श पर बैठ सुनने लगा.

बेयरफुट कॉलेज में दाखिले की पहली शर्त निरक्षर या अपढ़ होना जो है! अरे हां, जोखिम चाचा अपनी उम्र 365 वर्ष बताते हैं. उनके अनुभवों के सामने आप को सहसा विश्वास होता है, पंडिताई भी एक बोझ है.

(तस्वीरों में, बेयरफुट कॉलेज कैंपस की एक तस्वीर और नीचे जोखिम चाचा)

Thursday, March 01, 2012

It's election time again at JNU































Jawaharlal Nehru University (JNU) in Delhi is known for its democratic values and left inclination. After the gap of four years JNU students' Union election is taking place again on Thursday, the 1st of March. On Tuesday night student leaders put forward their agenda before hundreds of students in the 'Presidential Debate'.

Friday, February 17, 2012

मैं तुम्हारा कवि हूँ


‘वे एक उदास गिरगिट से बात कर सकते हैं.’ ऐसा उदय प्रकाश ने केदारनाथ सिह की कविताओं पर टिप्पणी करते हुए लिखा है.

केदारनाथ सिंह एक बड़े कवि हैं. उदय प्रकाश भी.

मैं जिनकी बात कर रहा हूँ वह केदारनाथ सिंह के छात्र और उदय प्रकाश के समकालीन एक अलक्षित कवि है. आपने शायद ही रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ की कविताओं को सुना हो यदि आप जेएनयू के बाहर रहते हैं. पर जेएनयू के परिसर में विद्रोही आपको जब तब गोपालन की कैंटिन में, टेफ्ला के बाहर और शाम को गंगा ढाबा पर एक अंधेरे कोने में मिल जाएँगे.

पिछले दस सालों से लगभग हर शाम इस अंधेरे कोने में अपनी मंत्र कविताओं को बुदबुदाते विद्रोही जी मुझे एक उदास गिरगिट से बात करते दिखे हैं.

चेथड़ी लपेटे, रसहीन चाय के प्याले को हाथ में थामे वे कहेंगे ‘ मैं तुम्हारा कवि हूँ’

वे अपनी लय और ताल में कहेंगे-मैं किसान हूँ/ आसमान में धान बो रहा हूँ/ कुछ लोग कह रहे हैं/ कि पगले! आसमान में धान नहीं जमा करता/ मैं कहता हूँ पगले!/ अगर ज़मीन पर भगवान जम सकता है/ तो आसमान में धान भी जम सकता है/ और अब तो दोनों में से कोई एक होकर रहेगा/ या तो ज़मीन से भगवान उखड़ेगा/ या आसमान में धान जमेगा.

विद्रोही जी केदारनाथ सिंह की कविता 'नूर मियां' से आपको आगे ले जाएँगे और बार बार पूछेंगे- क्यों चले गए नूर मियां पाकिस्तान/ क्या हम कोई नहीं होते थे नूर मियां के

अडर्नो ने पूछा था कि ' ऑस्वित्ज़ (Auschwitz) के बाद कैसे कोई कविता लिख सकता है.' इस सवाल में ध्वनी यह थी कि कैसे ऑस्वित्ज़ यातना शिविर की भयावहता को हमारे सामने रखा जा सकेगा. इस कविताहीन, बिकाऊ समय में सवाल मौजू है कि कैसे कोई कवि नूर मियां की पीड़ा को शब्द दे सकेगा.

पर विद्रोही जैसे कवियों को सुनते हुए आशा बची रहती है.

युवा फिल्मकार नितिन पमनानी ने हाल ही में एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई है- मैं तुम्हारा कवि हूँ’. इस डॉक्यूमेंट्री के केंद्र में विद्रोही हैं. कवि विद्रोही और उनकी कविताओं के ताने-बाने से हमारे समकालीन समाज और व्यवस्था पर यह डॉक्यूमेंट्री एक सार्थक टिप्पणी है.


लगभग तीस सालों से विद्रोही जी ने जेएनयू को अपना बसेरा बना रखा है. अगस्त 2010 में जब उन्हें जेएनयू प्रशासन ने अभद्र भाषा के इस्तेमाल के आरोप में परिसर से निकाल दिया था तब मैं उनसे जेएनयू के नजदीक मुनीरका में मिलने गया था. एक आशियाने की तलाश में वे भटक रहे थे.
जेएनयू के एक पुराने छात्र के अंधेरे बंद कमरे में वे एक कुर्सी पर उकडू बैठे थे. परिचय देते हुए जैसे ही मैंने कहा कि मैं बीबीसी के लिए लिखूंगा...तो छूटते ही उन्होंने कहा, 'तुम्हें देख मुझे प्रसाद की पंक्ति याद हो आई है...कौन हो तुम बसंत के दूत, नीरस पतझड़ में अति सुकुमार....'

मुझे लगा कि यदि एक कवि विक्षिप्त भी हो तो वह गाली नहीं देता...कविता की पंक्ति दुहराता है.

उन्होंने कहा था 'जेएनयू मेरी कर्मस्थली है. मैंने यहाँ के हॉस्टलों में, पहाड़ियों और जंगलों में अपने दिन गुज़ारे हैं. हर यूनिवर्सिटी में दो-चार पागल और सनकी लोग रहते हैं पर उन पर कानूनी कार्रवाई नहीं की जाती. मुझे इस तरह निकाला गया जैसे मैं जेएनयू का एक छात्र हूँ.'

खैर, कुछ दिनों के बाद जेएनयू ने अपने निर्णय को वापस ले लिया और विद्रोही जी कैंपस वापस लौट आए.

कल शाम गंगा ढाबा पर विद्रोही जी मिले. मैंने उनसे कहा, 'बधाई हो. नितिन की फिल्म को मुंबई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में बेस्ट डॉक्यूमेंट्री अवार्ड मिला है और पाँच लाख रुपए नकद.'

चाय के प्याले को थामे, जैसे उन्होंने मेरी बात को अनसुना कर दिया और उसी अंधेरे कोने में वे पहले की तरह एक उदास गिरगिट से बात करने लगे....

(चित्र: विद्रोही, और जेएनयू में एक वॉल पोस्टर, जनसत्ता समांतर स्तंभ में 21 फरवरी 2012 को प्रकाशित)

Sunday, February 12, 2012

गर्दिश में एक चित्र शैली: मिथिला पेंटिंग


मिथिला चित्र शैली अपने अनोखेपन और बारीकी के लिए कलाजगत में खास महत्व रखती है. विषयवस्तु के लिहाज से इसमें क्रांतिकारी बदलाव हुए हैं. इस शैली को अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर ख्याति मिली है. लेकिन नए दौर में यह उपेक्षा का शिकार हो रही है. इसके तमाम पहलूओं की पड़ताल कर रहे हैं अरविंद दास.

मैथिली और हिंदी के कवि बाबा नागार्जुन ने अपनी एक कविता में मिथिला की स्त्रियों के लिए तालाब की मछली का रुपक बांधा है. इस मछली की नियति बस लोगों की झुधा शांत करने की है! मिथिला पेंटिंग में भी मछली का चित्रण बारंबार आता है. लेकिन यहाँ मछली उर्वरता का प्रतीक है!.
सदियों से मिथिला की औरतें पारंपरिक रूप से अपने घरों-दरवाजों पर चित्रों को उकरेती रही है. इन चित्रों में एक पूरा संसार रचा जाता रहा है. लेकिन इस चित्रशैली ने पिछले कुछ दशकों में समाज के हाशिए पर रहने वाली महिलाओं को एक नई पहचान दी है और घर से बाहर कदम रखने की आजादी भी. उत्तरी बिहार के मधुबनी जिले के रांटी के मछुआरा जाति में जन्मी दुलारी देवी की ज़िंदगी किसी लोक कथा से मिलती-जुलती है. बिना किसी शिक्षा-दीक्षा के उनकी शादी बचपन में एक निठल्ले से कर दी गई. कम उम्र में एक लड़की को जन्म दिया जो ज़िंदा नहीं रही. फिर पति के ताने. पंद्रह साल की होते होते उन्होंने अपने पति को छोड़ दिया. खेतों में मजदूरी और संपन्न लोगों के घर झाड़ू-बुहारी करते उनका समय बीतता रहा. इसी क्रम में जब वो मिथिला चित्र शैली की राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कलाकार कर्पूरी देवी के घर काम करती थी तो उनकी उत्सुकता इन चित्रों के प्रति बढ़ी. 50 साल की दुलारी देवी कहती हैं, मैं जब महासुंदरी देवी, कर्पूरी देवी को चित्र बनाती हुई देखती थी तो मेरी भी इच्छा होती थी मैं भी इन्हें बनाऊँ. मैंने महासुंदरी देवी के साथ छह महीने की ट्रेनिंग ली और फिर चित्र बनाने लगी. अब दुलारी देवी को लोग एक मिथिला पेंटर के तौर पर जानते हैं. वे कहती हैं, मेरे लिए आमदनी का स्रोत अब मिथिला पेंटिंग ही है. मुझे किसी के घर में काम करने की जरुरत नहीं पड़ती.
हज़ारों कलाकारों को प्रशिक्षित कर चुकी मिथिला पेंटिंग की प्रतिष्ठित कलाकार महासुंदरी देवी की कर्ची कलम (बांस से बना कूची) अब रंग नहीं भरती है. उनके आंगन में प्रवेश करते ही ऐसा लगता है जैसे कि आप किसी कला दीर्घा में आ गए हों. राँटी स्थित उनके घर की दीवारों, दरवाजों पर मधुबनी चित्रशैली में राम-सीता, राधा-कृष्ण, पशु-पक्षियों, फूल-पत्तियों का मोहक संसार और कमरों में कोहबर की चिर-परिचित सधी हुई रेखाएँ और गहरे चटक रंगों की छटा छाई है. पूस की इस हल्की धूप में आस-पड़ोस के गाँव की स्त्रियाँ आंगन के बीचों-बीच मड़वे पर महासुंदरी देवी और कर्पूरी देवी की देख-रेख में सुजनी बना रही है (कपड़े पर मधुबनी चित्रशैली का रेखांकन). दुलारी देवी कहती हैं, शुरु शुरु में मैं पेंटिंग बीच में ही छोड़ कर भाग जाती थी, लेकिन महासुंदरी देवी हाथ पकड़ कर मुझे सिखाती रही.महासुंदरी देवी की आँखें चुपचाप उन्हें निहारती रहती है. 90 साल की वजह उनके हाथ कांपने लगे हैं लेकिन दृष्टि स्थिर और आवाज़ अनुभव और विश्वास से पूर्ण है.
मिथिलांचल में महिलाएँ शादी-विवाह, और पर्व-त्योहारों पर लंबे समय से दीवारों, कपड़ों और कागजों पर अनुष्ठानिक चित्र बनाती रही है. कोहबर, दशावतार, अरिपन, बांसपर्री और अष्टदल कमल शादी के अवसर पर घरों में बनाए जाते रहे हैं. इन चित्रों का लौकिक और आध्यात्मिक महत्व है. कायस्थ-ब्राह्मण घरों में लड़कियों की शादी के समय जहाँ इन पारंपरिक देवी-देवताओ के चित्रों को घर की दीवारों पर बनाया जाता रहा है, वहीं लड़कों की शादी के अवसर पर लड़की वालों के घर कागज़ पर उकेरी गई इन्हीं चित्रों में सिंदूर भर कर भेजने का रिवाज आज भी कायम है. पुराने समय में लड़कियाँ जब शादी के बाद पहली बार नैहर से ससुराल जाती थी तो द्विरागमन के समय पीले रंग की साड़ी पहना कर भेजा जाता था जिसमें लाल रंग से कोहबर लिखा रहता था.
किसी भी लोक कला की तरह मिथिला पेंटिंग पीढ़ी दर पीढ़ी एक परंपरा के रूप में प्रवाहमान रही. महासुंदरी देवी बताती हैं कि उनका जन्म एक गरीब कायस्थ परिवार में हुआ. जब वह छोटी थी तभी उनके माता-पिता का देहांत हो गया था और उन्हें उनकी चाची ने पाला-पोसा. उन्होंने अपनी चाची देव सुन्दर देवी से इस कला को आत्मसात किया. मधुबनी जिले के जितवारपुर गाँव की जगदंबा देवी, सीता देवी और रसीदपुर गाँव की गंगा देवी के साथ मिथिला पेंटिग को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलवाने में महासुंदरी देवी की खास भूमिका रही है. अनेक पुरस्कारों से सम्मानित महासुंदरी देवी को वर्ष 2011 में भारत सरकार ने कला के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए पद्म श्री देकर सम्मानित किया.

मिथिला पेंटिंग आज भले ही मधुबनी पेंटिग के नाम से जानी जाती हो, लेकिन मिथिलांचल के दरंभगा और मधुबनी जिलों के लगभग हर गाँवों में पारंपरिक रूप से ये चित्र बनाई जाती है. सही मायनों में इसे मिथिला पेंटिग नाम देने से ही विस्तार मिलता है. 70 और 80 के दशक में इस पेटिंग की धूम जर्मनी, फ्रांस, स्वीटजरलैंड, अमेरिका, जापान आदि देशों की कलादीर्घाओं में रही. भारत की इस पारंपरिक कला ने पश्चिमी कलाप्रेमियों को अपनी ओर आकृष्ट किया उन्हें इन चित्रों में परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत मेल दिखा. सीता देवी, गंगा देवी की चित्र शैली और विषय वस्तु ने इस कला को नई जुबान दी. लोग इसे एक क्षेत्र विशेष की लोक कला से इतर समकालीन भारतीय मुख्यधारा की
महासुंदरी देवी

पेंटिंग के समांतर देखने लगे. कहते हैं कि पाब्लो पिकासो भी मिथिला पेंटिंग को देख प्रभावित हुए थे.
इन कलाकारों की विदेश यात्राओं और सम्मानों ने आस-पड़ोस के गाँव की महिलाओं को इस कला की ओर तेजी से आकृष्ट किया. इस बीच सरकार ने भी कलाकारों को कला का इस्तेमाल आमदनी के एक जरिए के रुप में करने को प्रोत्साहित किया. पुराने कलाकारों ने नए कलाकारों को मिथिला के सामंती समाज की घेरेबंदियों को तोड़ने के लिए उकसाया. दुलारी देवी बताती हैं कि वे पेंटिंग करने के लिए कोलकाता, मुंबई, बैंगलौर, मद्रास और केरल तक की यात्रा कर चुकी हैं. पर पिछले दो दशकों में इस कला में कमी आई है. दिल्ली जैसे शहर में मिथिला पेंटिंग थोक के भाव खरीदी और बेची जाती है. इस पर किसी सिद्ध कलाकार की छाप नहीं मिलती. शिल्प बाजारों और दिल्ली हाट जैसी जगहों पर यह देशी-विदेशी सैलानियों के लिए महज एक गिफ्ट आइटमया सोविनेयर रह गई है. गंगा देवी, सीता देवी, जगदंबा देवी जैसे कलाकार का वर्षों पहले देहांत हो चुका है. महासुंदरी देवी, कर्पूरी देवी ने पेंटिंग करना छोड़ दिया. पुरानी पीढ़ी में बउआ देवी, गोदावरी दत्ता जैसे कलाकार बचे हैं और नयी पीढ़ी के कलाकार बेगाने हो रहे हैं. किसी को न उनकी सुध है और न ही चिंता.
एक सरकारी आंकड़े के मुताबिक वैसे तो वर्तमान में उत्तरी बिहार में इस चित्र शैली के क़रीब 15-20 हज़ार कलाकार पंजीकृत हैं. जगदंबा देवी के परिवार से ताल्लुक रखने वाले कलाकार कमल नारायण बताते हैं कि इनमें से अधिकांश कलाकार कम और कारीगर ज्यादा है. वे कहते हैं, भीड़ बढ़ने से अच्छे और बुरे का फर्क मिटने लगा है. गंगा देवी और सीता देवी जैसी सिद्ध कलाकारों ने मिथिला पेंटिग को एक कला के रुप में देश-विदेश के कलाप्रेमियों और कलादीर्घाओं के बीच प्रतिष्ठित किया लेकिन वर्तमान में इस पेंटिंग पर पहचान का संकट आ गया है. कमल नारायण इसके लिए सरकारी नीतियों, गैर सरकारी संगठनों के काम-काज के तरीकों और बिचौलिओं को दोष देते हैं. उनका कहना है कि सरकार महज खानापूर्ति करती है वह कलाकारों को अपनी कला बेचने का रास्ता नहीं देती. इसी तरह दुसाध समुदाय से ताल्लुक रखने वाली त्रिवेणी देवी बताती हैं कि सरकार बाहर जाने के लिए यात्रा भत्ता-दैनिक भत्ता नहीं देती हैं. अपनी पेंटिंग बेचने का हमारे पास कोई साधन नहीं हैं. अपनी कला औने-पौने दामों पर बिचौलिए को सौंपने के लिए हम मजबूर हैं. उल्लेखनीय है कि मधुबनी में कोई आर्ट गैलरी नहीं है. ना ही राजधानी पटना तक पेंटिंग पहुँचाने का कोई जरिया.
इस कला में शुरु से ही कायस्थों और ब्राह्मणों की उपस्थिति रही. इससे कचनी’ (लाइन ड्राइंग) और भरनी शैली विकसित हुई. ब्राह्मण कलाकारों के लिए जितवारपुरगाँव और कायस्थ कलाकारों के लिए रांटी खास रुप से उल्लेखनीय है. मिथिला पेंटिंग को पहली बार बाहर की दुनिया के सामने लेकर आने वाले ब्रिटिश कलाप्रेमी डब्ल्यू जी आर्चर ने मिथिला चित्र शैली के बारे में लिखा था, ब्राह्मणों की पेंटिंग में प्रयुक्त रंग मिरो की पेंटिंग के समांतर हैं, जबकि कायस्थों की पेंटिंग काले टेराकोटा रंगों के ग्रीक गुलदानों से मिलते-जुलते हैं…ब्राह्मणों की पेंटिंग में पतली, अस्थिर और कमजोर रेखाएँ होती हैं जबकि कायस्थों की पेंटिंग की रेखाएँ सधी हुई, मजबूत और स्पष्ट होती है. हालांकि वर्तमान में इस तरह का ठोस विभाजन नहीं मिलता है और दोनों शैलियों के बीच आवाजाही होती है, फिर भी विशिष्टता कायम है.
70 के दशक से इस कला में मैथिल समाज के हाशिए पर रहने वाले दुसाध और मल्लाह समुदाय के लोगों की दखल बढ़ी जिसने इस कला को एक नई भंगिमा और तेवर दी है. ब्राह्मणों और कायस्थों से इतर इन समुदायों के निजी-जीवन, आस-पड़ोस की ज़िंदगी की झलक इन चित्रों में देखी जा सकती है. दुसाध कलाकारों ने खास तौर से गोदना शैली अपनाया है जिसमें समांतर रेखाओं, वृत्तों और आयातों में गोदना को ज्यामितीय ढंग से सजाया जाता है. इनमें उनके लोक देवता वीर योद्धा राजा सहलेस का जीवन वृत्त मिलता है साथ ही काम-काज और पेशे का चित्रण भी है. पर ऐसा नहीं है कि इन चित्रों में सधी रेखाएँ और चटक रंग गायब हों. राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त शांति देवी के चित्र भरनी शैली से मिलते-जुलते है.
मिथिला के समाज पर तंत्र-मंत्र का काफी प्रभाव रहा है और शक्ति पीठ के रुप में इसकी चर्चा रही है. लोक में पूजा-पाठ, विधि विधान का काफा महत्व रहा है और स्वाभाविक रूप से इसकी झलक मिथिला चित्र शैली में देखी जाती है. इस चित्र शैली की एक विशेषता उत्सवधर्मी होना है. नव विवाहित जोड़े के लिए बने कोहबर घर में प्रतीक रुप में प्रजनन के अवयवों, मिथकों और लोक कथाओं का चित्रण जीवन दर्शन को ही निरुपित करता है. साथ ही नदी-नाले, पेड-पौधे, सूर्य, चंद्र, मछली और अन्य पशुओं की एक साथ उपस्थिति जीवन को संपूर्णता में देखने को प्रेरित करती हैं. कोहबर का रुपक कवि विद्यापति की कविताओं में भी प्रमुखता से मिलता है. हालांकि समय के साथ इस चित्र शैली के विषय-वस्तुओं में भी विस्तार हुआ है.
पिछले तीन दशकों से मिथिला चित्र-शैली के प्रचार-प्रसार में जुटी अमेरिका स्थित एथनिक आर्टस फाउण्डेशन ने वर्ष 2007 में दिल्ली स्थित इंडिया हैबिटेट सेंटर में मिथिला पेंटिंग: एक कला रुप का विकासनाम से एक प्रदर्शनी का आयोजन किया था. इस प्रदर्शनी में पुराने कलाकारों मसलन गंगा देवी, सीता देवी की चित्रों के अलावे युवा कलाकरों उर्मिला देवी, लीला देवी, कृष्णकांत झा, संतोष कुमार दास आदि के चित्रों का प्रदर्शन किया गया जिसे लोगों ने काफी सराहा था और उच्चे दामों पर इनकी ब्रिकी हुई. इन पेंटिग में अपने समय और समाज की चिंता थी. वर्ष 2002 में गुजरात में हुए दंगों के बाद संतोष कुमार दास ने सांप्रदायिकता को लेकर गुजरात सीरिज बनाई थी जो काफी चर्चित रही. संतोष कुमार दास ने बड़ौदा के महाराजा सैयाजीराव विश्वविद्यालय से फाइन आर्टस में विधिवत प्रशिक्षण लिया. बताते हैं कि गुजरात में हुए दंगों के बाद वे काफी दिनों तक अवसाद में रहे थे, जिसके बाद उन्होंने अपनी भावनाओं को कागज पर उतारा.

इसी तरह से मिथिला चित्र शैली में, भ्रूण हत्या, दहेज, अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद जैसे समसामयिक विषय पारंपरिक विषयों के साथ साथ चित्रित किए जा रहे हैं. वर्ष 2003 में एथनिक आर्टस फाउण्डेशन ने मधुबनी में मिथिला कला संस्थानकी स्थापना की जो हर वर्ष समाज के विभिन्न तबकों से 20 छात्रों को चुन कर उन्हें मिथिला चित्र शैली में प्रशिक्षित करता है और छात्रवृत्ति देता है. हालांकि यह संस्थान इस समय कोष की समस्या से जूझ रहा है. संस्थान के अध्यक्ष डेविड जेंटन का कहना है, दिनों-दिन मिथिला चित्र शैली में लोगों की रुचि बढ़ती जा रही है पर अपने कला संस्थान को जारी रखने के लिए हम फंड नहीं जुटा पा रहे हैं. हर साल इसे चलाने के लिए हमें छह लाख रुपए चाहिए. अमेरिकी कोष का हम इस्तेमाल कर चुके हैं. हम विभिन्न शहरों में प्रदर्शनियों के जरिए पैसा उगाहने की कोशिश कर रहे हैं.

ताज्जुब है कि मिथिला पेंटिंग को लेकर स्थानीय लोग और राज्य शुरु से उदासीन रहे हैं. बस परंपरा के रुप में वे इसका निर्वहन पीढ़ी दर पीढ़ी करते चले आ रहे हैं. वर्ष 1934 में बिहार में भारी भूकंप आया था जिसमें जान-माल की काफी क्षति हुई थी. भूकंप पीड़ितों को सहायता पहुँचाने के दौरान तत्कालीन ब्रितानी अफसर और कला प्रेमी डब्ल्यू जी. आर्चर की निगाहें क्षतिग्रस्त मकानों की भीतों पर बनी रेल, कोहबर वगैरह पर पड़ी. मंत्रमुग्ध उन्होंने इन चित्रों को अपने कैमरे में कैद कर लिया. बाद में वे इस कला के संग्रहण और अध्ययन में जुट गए. वर्ष 1949 में मार्ग जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में उन्होंने मैथिली पेंटिग नाम से एक लेख लिखा जिसमें इस कला में प्रयुक्त बिंबों और प्रतीकों का विवेचन है. चित्रों के आध्यात्मिक अर्थ और विभिन्न शैली की पड़ताल की गई है. इस लेख के बाद देश-विदेश के कलाप्रेमियों की नज़र इस चित्रशैली पर गई. 60 के दशक में ऑल इंडिया हैंडिक्राफ्ट बोर्ड के तबकी निदेशक श्रीमती पुपुल जयकर ने मुंबई के कलाकार भाष्कर कुलकर्णी को मिथिला क्षेत्र में इस कला को परखने के लिए भेजा.
महासुंदरी देवी ने बताया 1961-62 में भास्कर कुलकर्णी ने मुझसे कोहबर, दशावतार, बांस और पूरइन के चित्रों को कागज पर बना देने के लिए कहा. कागज वे खुद लेकर आए थे. करीब एक वर्ष बाद वे इसे लेकर गए और मुझे 40 रुपए प्रोत्साहन के रूप में दे गए. बाद में महासुंदरी देवी ने भास्कर कुलकर्णी के लिए आठ चित्र और बनाए थे. उनका कहना है कि शुरुआत में घर वाले इन चित्रों के बदले मिलने वाले पैसे को अच्छी निगाह से नहीं देखते थे पर धीरे-धीरे स्थिति बदलती गई. पर 50 वर्षों के बाद भी यह बात हर गाँव और परिवार पर लागू नहीं होती है. आज भी कई प्रतिभावान कलाकार महज घरों में इसके आर्थिक पहलूओं से बेखबर हो कर पेंटिंग कर रहे हैं. वर्ष 1965-66 में बिहार में पड़े भीषण अकाल के दौरान भास्कर कुलकर्णी ने इस क्षेत्र की महिलाओं को कागज पर चित्र बनाने के लिए प्रेरित किया ताकि आमदनी के स्रोत के रूप में यह कला विकसित हो सके. धीरे-धीरे इस कला की प्रदर्शनी और ख्याति फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका और जापान में बढ़ती चली गई. फ्रांस के वैक्स वैकुआद, जर्मनी की एरेका स्मिथ मोसर, अमेरिका के रेमेंड ओएंस, जापान के हासेगावा और भारत के उपेंद्र महारथी और ज्योतिंद्र जैन आदि ने इस चित्र शैली को व्यवस्थित रूप से सहेजा और इसका प्रचार-प्रसार किया. वर्ष 1988 में जापान में मिथिला लोकचित्र कला म्यूजियम की शुरुआत की गई. महासुंदरी देवी बताती हैं कि पहली बार उनके चित्रों की ही वहाँ प्रदर्शनी लगाई गई थी. एक पुराने कलाकार ने बताया कि जापान में भले ही आपको मिथिला पेंटिंग की बहुमूल्य तस्वीरें मिल जाए अब वह हमारे पास नहीं बची है. बिहार सरकार वर्षों से मधुबनी में एक संग्रहालय बनाने की बात करती रही है लेकिन अभी तक उसे अमलीजामा नहीं पहनाया गया है.
बहरहाल, इन वर्षों में मिथिला चित्र शैली की विषय वस्तु और भाव ही नहीं बदले हैं बल्कि रंग भी बदले हैं. पहले लोक में आसानी से मिलने वाली रंगों का ही इस पेंटिंग में इस्तेमाल होता था. मसलन, हरी पत्तियों से हरा, गेरु से लाल, काजल और कालिख से काला, सरसों और हल्दी से पीला, सिंदूर से सिंदूरी, पिसे हुए चावल, दूध और गोबर से बने रंगों से ही कलाकार चित्रों को उकेरते थे. लेकिन वर्तमान में ज्यादातर कलाकार देशज और प्राकृतिक रंगों के बदले एक्रिलिक रंगों का इस्तेमाल करने लगे हैं जिससे इनके बिखरने का खतरा नहीं रहता. यह सच है कि मिथिला पेंटिग ने अपने बदलते रंगों के साथ पिछले चार दशकों में विदेशों में अपनी गहरी छाप छोड़ी है, लेकिन अपने देश में अभी भी उसे ठीक ठिकाना नहीं मिला है. जहाँ बाजार में भारतीय कला को मुँह-मांगी कीमतों पर खरीदा-बेचा जा रहा है वहीं मिथिला शैली पर पहचान का संकट है. उसे एक बार फिर से लोक कला के खांचे में फिट करने उसकी परवाज रोकने की साजिश की जा रही है. गैर सरकारी संस्थानों और सरकार दोनों इसके लिए जिम्मेदार हैं. कलाकारों के पास न कोई संगठनशक्ति है, न दबाव बनाने के कोई और तरीके. उनकी चिंता तो बस इतनी है कि किसी तरह गुजारा हो जाए!

ठहराव आ गया है

मिथिला कला संस्थान के पूर्व निदेशक संतोष कुमार दास से बातचीत
मिथिला पेंटिग के युवा कलाकारों के बार में आपका क्या कहना है?
70-80 के दशक में गंगा देवी, सीता देवी इस कला के क्षेत्र में सक्रिय थी और इस कला के प्रति समर्पित थीं. लेकिन पिछले दशकों में ज्यादातर साधारण कलाकारों का बोल बाला बढ़ा है. एक भीड़ बढ़ी है. उनकी कला हाइब्रिड है. वर्तमान में जो कलाकार सक्रिय हैं उनमें ज्यादातरों को सही पद्धति का अता-पता नहीं है. ये कारीगर ज्यादा, कलाकार कम हैं. ये प्रयोग करने को तैयार नहीं है. ज्यादातर पेंटिंग आज बाजार को ध्यान में रख कर बनाई जा रही है. जैसे संगीत में जब तक सुर पक्का नहीं होता तो राग नहीं सध सकता, उसी तरह जब तक रेखाओं पर पूर्ण अधिकार ना हो तब तक आप पक्के कलाकार नहीं बन सकते. फिर भी नीलकांत चौधरी, रौदी पासवान, पुष्पा कुमारी, रामभरोस जैसे कलाकार अच्छा काम कर रहे हैं.
सम-सामयिक विषयों को लेकर अन्य कलाकार प्रयोग कर रहे हैं, आपने खुद गुजरात सीरिज बना कर मिथिला पेंटिंग को एक नई भंगिमा दी?
यह सच है कि कुछ कलाकारों ने प्रयोग किए हैं. इनमें से कुछ को मैंने प्रशिक्षित किया है. यहाँ के पारंपरिक कलाकारों का मानना है कि मैंने इस कला के शिल्प की अवहेलना की है, लेकिन ऐसा नहीं है. मैं एक अलग परिप्रेक्ष्य में चीजों को देखता हूँ और जब मैं मिथिला कला संस्थान में था तो छात्रों को प्रयोग करने, नए विषयों को तलाशने के लिए प्रेरित करता रहा. पर यहाँ लोगों को यह पसंद नहीं है. मैं पैसे के लिए पेंटिग नहीं बनाता. मेरे लिए विचार और कला ज्यादा महत्वपूर्ण है.
इस कला की संभावनाएँ और उसे लेकर परेशानियाँ क्या हैं?
संभावनाएँ अपार है लेकिन परेशानियाँ भी काफी है. मैंने बुद्ध श्रृंखला को लेकर 50 पेंटिग बनाई है. मैं इसे बाहर ले जाना चाहता हूँ पर मुझे प्रदर्शनी को लेकर परेशानी हो रही है. यहाँ कोई कलादीर्घा नहीं हैं. सरकार और गैर सरकारी संस्थानों ने बिचौलियों को बढ़ावा दिया है जिसका असर दिल्ली में दिखता है. दिल्ली हाट जैसी जगहों पर सिर्फ टूरिस्टों को ध्यान में रख कर पेंटिग बेची जाती है. इसका परिणाम यह हुआ है कि कलाप्रेमियों, कलादीर्घा के पास अच्छी पेंटिग नहीं पहुँच पा रही हैं.
(चित्र: सियाराम विवाह, अपने प्रशिक्षणशाला में महासुंदरी देवी और आख़िर में चित्र बनाते संतोष कुमार दास)

E Book Link: http://pothi.com/pothi/book/ebook-arvind-das-gardish-mein-ek-chitra-shaili 
 
(जनसत्ता रविवारी में 12 फरवरी 2012 को प्रकाशित)

Monday, January 30, 2012

बड़े परदे की खबर


पिछले दिनों युवा फिल्म निर्देशक गुरविंदर सिंह की पंजाबी फिल्म अन्हे घोड़े दा दान (अंधे घोड़े का दान)की एक अखबार में की गई समीक्षा को लेकर चर्चित संगीतकार और फिल्म अध्येता मदन गोपाल सिंह बेहद खिन्न थे. उनकी नज़र में इस फिल्म की समीक्षा में वो सब था जो फिल्म में नहीं है!
गौरतलब है कि चर्चित लेखक गुरुदयाल सिंह की कहानी पर आधारित अन्हे घोड़े दा दानको हाल ही में बेहतरीन निर्देशन और सिनेमाटोग्राफी के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गई.
पंजाब के एक गाँव में दलित किसानों की दुखद स्थिति के इर्द-गिर्द घूमती यह ऐसी पहली पंजाबी फिल्म है, जिसे पिछले वर्ष वेनिस फिल्म समारोह में शामिल किया गया और विदेशों में इस फिल्म की काफी सराहना की जा रही है.
पिछले वर्ष मराठी फिल्म के चर्चित युवा फिल्म निर्देशक उमेश कुलकर्णी को जब एक निजी समाचार चैनल ने यंग इंडियन लीडरपुरस्कार से नवाजा तो सुखद आश्चर्य हुआ. बॉलीवुड के स्टैपल डाइटपर पलने वाले हमारे समाचार चैनलों को क्षेत्रीय सिनेमा की सुध कहाँ! गौरतलब है कि उमेश कुलकर्णी की फिल्म देऊलको राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में इसी वर्ष बेस्ट फीचर फिल्म सहित कई पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गई है. पहले भी उनकी फिल्मों को काफी प्रशंसा और राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं.
इन फिल्मों के साथ दिक्कत यह है कि ये किसी बड़े मीडिया सहयोगी को नहीं ढूंढ पातीं और हमारी मीडिया के सरोकार और वर्ग चरित्र सबके सामने स्पष्ट है.
जब सलीम अहमद निर्देशित एक मलयाली फिल्म एडामिंते माकन अबू (अबू, आदम का बच्चा)को भारत की ओर से आधिकारिक तौर पर ऑस्कर पुरस्कार के लिए भेजा जाता है तब दिल्ली में बैठे राष्ट्रीय पत्रकारोंको लगता है, ‘आह! अदूर गोपालकृष्णन और शाजी करुण के बाद नई पौध भी है जो अच्छी फिल्में बना रही हैं.
बीते कुछ सालों में बॉलीवुड की फिल्मों के प्रचार में भारतीय मीडिया की सहभागिता अचंभित करती है. हर बड़े बैनर की फिल्म रिलीज होने से पहले स्टारइस टीवी स्टूडियो से उस स्टूडियो कूदते-फांदते रहते हैं. पत्रकारों के साथ हँसते-बतियाते हैं, फोटो खिंचवाते हैं और फिर उस फिल्म को भव्य’, ‘दिव्यरूह को छूने वाली' आदि-आदि विशेषणों से विभूषित किया जाता है.
हर शुक्रवार को बॉलीवुड के इन कलाकारों के लिए समाचार कक्ष में रेड कारपेटबिछाया जाता है. क्या यह अनायास है कि वर्तमान में हर बड़ी फिल्म प्रोडक्शन कंपनी का मीडिया पार्टनर कोई ना कोई अखबार या खबरिया चैनल होता है?
भूमंडलीकरण के बाद पूरी दुनिया में खबरों की परिभाषा बदली है. अब संपादकों और मालिकों का सारा जोर खुश खबरीपर रहता है. दूसरे शब्दों में, समाचार उद्योग यथास्थिति के बरकरार रखने में राज्य, बाजार और सत्ता के सहयोगी हैं. ऐसे में, आज बॉलीवुड की फिल्मों, क्रिकेट और सेंसेक्स के उछाल की खबरें सुर्खियाँ बटोर रही है और किसानों की आत्महत्या, दलितों के उत्पीड़न और आदिवासियों के जंगल और जमीन से बेदखली बमुश्किल जगह बना पाती है. ये डाउन मार्केटकी खबरें हैं!
वर्तमान में मीडिया के सरोकर जन से नहीं अभिजनसे जुड़े हैं. अब खबरें तेजी से मनोरंजन उद्योग का हिस्सा बनती जा रही है और इससे बाजार, अखबार और खबरिया चैनलों सबका हित सधता है. पिछले दिनों भारतीय पत्रकारिता में राजनीतिक खबरों को लेकर पेड न्यूज की खूब चर्चा हुई. इसके तहत अखबार चुनावों के दौरान एक तयशुदा पैकेजलेकर राजनीतिक पार्टियों के मनोनुकूल खबरें, फोटो, इंटरव्यू आदि छापते हैं. वर्ष 2009 में हुए लोकसभा चुनावों और हाल ही में संपन्न हुए पंजाब विधानसभा चुनावों में एक बार फिर यह देखने में आया. लेकिन पेड न्यूज को महज राजनीतिक खबरों तक सीमित करके देखना बीते दो दशकों में समाचार उद्योग की दशा और दिशा को संपूर्णता में देखने से

चूकना होगा. यह सही है कि मीडिया किसी भी लोकतांत्रिक समाज में सूचना, शिक्षा और मनोरंजन का एक प्रमुख जरिया है. लेकिन गहरे अर्थ में वह सामाजिक विकास और परिवर्तन का माध्यम है. समाज की आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक एजेंडों को तय करने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका है.
यह जानने के बाद कि वर्तमान में फिल्म पत्रकारिता मेनस्ट्रीम पत्रकारिता का हिस्सा है और मनोरंजन (खास कर बॉलीवुड) की खबरों को सबसे ज्यादा तरजीह दी जा रही है, इस बात पर बहस जरुरी है इनके सबके बीच किस तरह की सांठ-गांठ है. मीडिया संगठनों और बॉलीवुड की कंपनियों के बीच दुरभि-संधि की खुल कर चर्चा होनी चाहिए. साथ ही बहस इस बात पर भी की जानी चाहिए हिंदी की सार्वजनिक दुनिया (पब्लिक स्फीयर) को पिछले दो दशकों में बॉलीवुड की फिल्मों ने और उनसे जुड़े प्रचार ने किस रूप में प्रभावित या संकीर्ण किया है और इसमें हिंदी क्षेत्र के बुद्धिजीवियों की क्या भूमिका रही है.
अकीरा कुरोसावा की चर्चित फिल्म रोशोमनका एक पात्र कहता है-झूठ है तो भी क्या फर्क पड़ता है, जब तक वह हमारा मनोरंजन करता रहे. बॉलीवुड की अमूमन हर फिल्म के बारे में आम दर्शकों की राय रोशोमन के इस पात्र से भिन्न नहीं होती है. वह अब सत्य, शिव और सुंदर की तलाश में सिनेमा हॉल में नहीं जाता!
फिर भी जब कोई दर्शक सिनेमा हॉल में दाखिल होता है तब उसके साथ सौ सालों की परंपरा भी होती है. इन वर्षों में हिंदी सिनेमा ने कई मानक गढ़े हैं और इन्हीं मानकों के आधार पर वह अपने तईं फिल्म को कसता-परखता है. लेकिन आश्चर्य तब होता है जब ना सिर्फ मुख्यधारा के मीडिया, बल्कि नए मीडिया- ब्लॉग, फेसबुक, टिवटर- पर भी मीडिया से जुड़े लोग, फिल्म अध्येता जानबूझ कर या अनजाने बिना किसी सोच-विचार के इन फिल्मों के प्रचार में जुट जाते हैं.
हाल ही में रिलीज हुई एक फिल्म की समीक्षा लिखते हुए एक टीवी पत्रकार ने अपने ब्लॉग पर लिखा था- हम हिंदी सिनेमा देख रहे हैं, कुरोसावा की फिल्म नहीं, जिनकी एक भी फिल्म मैंने नहीं देखी है. उन्होंने आगे लिखा- मैं कागज के फूल का रिव्यू नहीं लिख रहा, उस फिल्म का लिख रहा हूं जो चलती भी है और बनती भी है!
यह उस फिल्म की समीक्षा कम प्रचार ज्यादा है, जिसे लोग एक महीने के बाद भूल जाते हैं. पर कागज के फूल और कुरोसावा की फिल्मों की चर्चा आज भी की जाती है.
गौरतलब है कि उस फिल्म का मीडिया पार्टनर देश का एक बड़ा मीडिया समूह था जिसके कई समाचार चैनल हैं. हम टीवी चैनल से यह अपेक्षा नहीं करते कि वह फिल्म के बारे में हमें सम्यक रूप से बताएगा, पर यह अपेक्षा स्वतंत्र ब्लॉगरों और सोशल साइट के कर्ता-धर्ताओं से है, जो किसी सेंशरशिप या बाध्यताओं के शिकार नहीं.
वर्ष 2005 में जब एक निजी समाचार चैनल पर बंटी और बबलीफिल्म के रिलीज होने से ठीक पहले स्टूडियो में फिल्म के कलाकार प्राइम टाइम की खबर पढ़ते देखे गए, तब कुछ बहस जरुर हुई, फिर सब शांत हो गया.
हाल ही में चर्चित फिल्म कलाकार इरफान खान ने फिल्म प्रोमोशन को लेकर कलाकारों की उछल-कूद पर नाखुशी जाहिर की, लेकिन उन्होंने स्वीकार किया कि वे इस तमाशे से मुक्त नहीं हो सकते. फिल्म का प्रचार फिल्म निर्माण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है.
इरफान ने एक इंटरव्यू में स्वीकार किया है कि जिनके पास पैसा है वे बड़े स्तर पर फिल्म का प्रोमोशन करते हैं. मैं नाम नहीं लूँगा लेकिन मैं उन फिल्मों के बारे में जानता हूँ कि जिसकी अखबारों में समीक्षाएँ लाखों रुपए देकर छापी गई लेकिन फिर भी फिल्म फ्लॉप रही.
हमारे समय के एक बेहतरीन अभिनेता जब ऐसा कह रहे हों तो इसे भूमंडलीकरण के दौर में फिल्म प्रमोशन और मीडिया के बीच एक सांठ-गाठ की ओर इशारे की तरह देखना चाहिए. सवाल है कि अगर ऐसा है तो इससे भारतीय समाज, सिनेमा और मीडिया का कितना हित होगा.
(अन्हे घोड़े दा दान के सेट पर गुरविंदर सिंह, जनसत्ता , 25 मार्च 2012 (रविवार) को मीडिया कॉलम में प्रकाशित)

Tuesday, January 17, 2012

अजब शहर में एक योगी: किरण सेठ

तो तुम्हें शुभा मुद्गल पसंद है.’

शायद जून-जुलाई की कोई दोपहर थी और मैं अपने शोध निर्देशक प्रोफेसर वीर भारत तलवार के कमरे पर किसी काम से गया था.
तलवार जी संगीत के बेहद शौकिन हैं. उनके साधारण लेकिन सुरुचिपूर्ण ड्राइंग रुम में एक तरफ लगे दीवान पर कुछ सीडी बेतरतीब सी बिखरी पड़ी दिखती थी. शुरु-शुरु में मुझे लगता रहा कि शायद जल्दीबाजी की वजह से हो ऐसा, लेकिन धीरे-धीरे देखा कि बिखराव में भी एक अलग अंदाज है.

तलवार जी के पास पापुलर और शास्त्रीय संगीत की सीडी और कैसेट का बेहद ख़ूबसूरत संग्रह है. उस दिन कमरे में आशा भोंसले का गाया कोई फिल्मी कैसेट बज रहा था....मैंने देखा कि बिस्तर पर एक कैसेट शुभा मुद्गल का भी है तो मैंने वही सुनने की फ़रमाइश की थी.

तलवार जी के स्वर में उत्सुकता और थोड़ी खुशी थी...मेरे जेनरेशन से शायद उन्हें यह अपेक्षा ना हो कि शास्त्रीय संगीत में हमारी कोई दिलचस्पी होगी. यह बात क़रीब दस साल पुरानी है.
बहरहाल, उस दिन दिल्ली के एनएसडी में भारत रंग महोत्सव में नाटक देखने गया था. भीड़ के बीच अभिमंच की ओर बढ़ते हुए मेरी नज़र एक जाने-पहचाने चेहरे की तरफ पड़ी.

उस कड़ाके की ठंड में साधारण कठ-काठी का, चश्मा पहने वह सौम्य व्यक्ति नोटिस बोर्ड पर एक पर्चा चिपका रहे थे. मैंने कैमरा निकाल लिया. कैमरे की ओर देख उन्होंने मुस्करा दिया और कहा- आइएगा, आईआईटी में 18 जनवरी को उस्ताद अमजद अली खान का कंसर्ट है!’ 
किरण सेठ पिछले करीब 35 वर्षों से बिना किसी सुर्ख़ियों में रहे युवाओं के संग मिल कर स्पीक मैके को नेतृत्व दे रहे हैं

90 के दशक के मध्य में जब दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ रहा था तब हमारे सालाना जलसे में नृत्यांगना उमा शर्मा आईं थीं. ‘स्पिक मैके (SPIC MACAY) के तहत उनका यह कार्यक्रम था.
पहली बार मैंने तभी स्पिक मैके (सोसाइटी फॉर द प्रमोशन ऑफ इंडियन क्लैसिकल म्यूजिक एंड कल्चर अमंगस्ट यूथ) के बारे में सुना था.

बचपन में जब ऑल इंडिया रेडियो पर दोपहर में बिस्मिल्लाह खान या सिद्धेश्वरी देवी अपना राग अलापती थीं तब हम रेडियो बंद कर देते थे. तब ना तो संगीत की सुध थी ना समझ. सही मायनों में हमारे लिए शास्त्रीय संगीत का द्वार स्पिक मैके ही ने खोला. साहित्य में अनुराग होने की वजह से संभवत: शास्त्रीय संगीत को जब सुनना शुरु किया तो दिलचस्पी और बढ़ती गई. तब से अब तक दिवंगत बिस्मिलाह खान साहब से लेकर रवि शंकर, गिरिजा देवी और बिरजू महराज आदि को स्पिक मैके के ही कार्यक्रम में लाइव देखा-सुना है. और लगभग दिल्ली में होने वाले हर कार्यक्रम में कभी भीड़ में पीछे दरी को ठीक करते तो कभी तन्मय हो कर संगीत का आनंद लेते किरण सेठ मिले हैं.
उस दिन मैंने कहा कि, 'सर, असल में आपके बारे में कुछ लिखना चाहता हूँ...' हल्के से मुस्कुराते हुए उन्होनें मुझे स्पिक मैके का एक विजिटिंग कार्डदिया और उस पर अपना फोन नंबर हाथ से लिखते हुए कहा स्पिक मैके के बारे में लिखिए...

पिछले दिनों मैं मिथिला पेंटिंग को लेकर एक शोध के सिलसिले में मधुबनी गया था. वहाँ जब मिथिला पेंटिंग की एक चर्चित कलाकार महासुंदरी देवी से मुलाकात हुई तो उन्होंने बताया कि पिछले साल से स्पिक मैके के तहत देश के विभिन्न भागों से कुछ बच्चे एक महीने मेरे पास रहने आ रहे हैं. वे मिथिला पेंटिंग की बारीकियों को सीखते-समझते हैं.
आईआईटी दिल्ली में वर्ष 1979 में स्पिक मैके की एक बेहद छोटे स्तर पर विधिवत शुरुआत की गई. इन वर्षों में इसका विस्तार देश-विदेश के विभिन्न महानगरों, छोटे शहरों, कॉलेजों और स्कूलों में बढ़ता चला गया. 
स्पिक मैके यह एक ऐसा आंदोलन बन गया है जो अब किसी परिचय का मोहताज नहीं है. पर स्पिक मैके की वेब साइट पर जब आप नजर डालेंगे तो आज भी वहाँ किरण सेठ की चर्चा या उनका परिचय शायद ही कहीं मिले!

पेशे से शिक्षक किरण सेठ इस अजब शहर में एक निष्काम योगी की तरह हैं जो भारतीय संगीत और संस्कृति का अलख युवाओं के बीच जगाए हुए अपने काम में मस्त हैं. कबीर ने ठीक ही लिखा है… मन मस्त हुआ फिर क्या बोले?’
(जनसत्ता, 20 जनवरी 2012 को समांतर स्तंभ में फिर क्या बोले शीर्षक से प्रकाशित, तस्वीर:किरण सेठ)