Saturday, June 11, 2016

सफर में समांतर सिनेमा

पिछले दिनों जब मैंने अपने गुरु प्रोफेसर वीर भारत तलवार से पूछा कि इस बीच आपने कौन-सी फिल्म देखी, तो मुस्कराते हुए उन्होंने कहा कि इन दिनों काफी अच्छी फिल्में बन रही हैं. फिर उन्होंने अलीगढ़का जिक्र किया था. हिंदी सिनेमा जहां अस्सी के दशक के बॉलीवुड को काफी पीछे छोड़ चुका है, वहीं पिछले दशक में अन्य भारतीय भाषाओं में भी लगातार कई अच्छी फिल्में आई हैं. ऐसा नहीं कि बॉलीवुड में फार्मूलाबद्ध, मसाला फिल्में नहीं बन रही हैं. एक दर्शक वर्ग के लिए इन फिल्मों का अपना सांस्कृतिक-सामाजिक महत्त्व है. लेकिन पिछले दशक में कई नए निर्देशकों ने परंपरागत तौर पर फिल्मी कहानियों से इतर अपनी फिल्मों में भारतीय समाज के यथार्थ को नए सिरे से पकड़ने की कोशिश की है. एक तरह से इसे सत्तर के दशक में विकसित समांतर सिनेमा का विस्तार कहा जा सकता है. यह अनायास नहीं है कि समांतर सिनेमा के पुरोधा मणि कौल आज के निर्देशक अनुराग कश्यप, इम्तियाज अली, गुरविंदर सिंह की प्रशंसा करते थे.

पच्चीस साल पहले जब आर्थिक उदारीकरण और निजीकरण के साथ भूमंडलीकरण भारत में अपने पांव पसार रहा था, तब लोगों को इस बात की चिंता सता रही थी कि कहीं हॉलीवुड और बॉलीवुड का बाजार क्षेत्रीय फिल्मों के विकास को रोक न दे. लेकिन भूमंडलीकरण के साथ आई नई तकनीक की उपलब्धता और सुगमता ने क्षेत्रीय फिल्मों को भी अखिल भारतीय स्तर पर स्थापित होने का मौका दिया हैक्षेत्रीय सिनेमा ने स्थानीयता की धुरी पर मजबूती से खड़े होकर राष्ट्रीय-भूमंडलीय दर्शकों तक अपनी पहुंच बनाई है. इस बाबत विभिन्न शहरों में बने मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों की भूमिका को भी रेखांकित किया जाना चाहिए. साथ ही कुछ युवा निर्देशकों-कलाकारों की सृजनशीलता और जज्बा भी सराहनीय है. इन दिनों मराठी, पंजाबी, मलयालम, कन्नड़ आदि भाषाओं में बनी फिल्में राष्ट्रीय स्तर पर सराही जा रही हैं. पिछले वर्ष युवा निर्देशक चैतन्य ताम्हाणे की फिल्म कोर्टको भारत की ओर से आधिकारिक रूप से ऑस्कर पुरस्कारों के लिए नामांकित किया गया था. इसी तरह, 2011 में सलीम अहमद निर्देशित एक मलयाली फिल्म एडामिंते माकन अबू’ (अबू, आदम का बच्चा) को भी ऑस्कर के लिए भेजा गया था. चर्चित लेखक गुरुदयाल सिंह की कहानी पर आधारित और गुरविंदर सिंह निर्देशित अन्हे घोड़े दा दानको 2011 में बेहतरीन निर्देशन और सिनेमेटोग्राफी के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. 1980 के दशक में खालिस्तान आंदोलन और उसके दमन के इर्द-गिर्द रची गई गुरविंदर की फिल्म चौथी कूटको इस बार भी पंजाबी भाषा में राष्ट्रीय पुररस्कार से सम्मानित किया गया

यानी कि सिनेमा के परदे पर क्षेत्रीयता की ऐसी धमक मौजूद है, लेकिन लगता है कि दिल्ली की जनता को इन फिल्मों से कोई खास लेना-देना नहीं है. पिछले दिनों मैंने अनु मेनन निर्देशित और नसीरुद्दीन शाह-कल्कि कोचलिन अभिनीत वेटिंगफिल्म देखी. प्रेम, बिछोह, दर्द और इंतजार को लेकर दो पीढ़ियों की अपनी समझ-नासमझ को फिल्म में जीवंत बना दिया गया है. लेकिन एक मशहूर सिनेमा हॉल में पहले दिन इस फिल्म के एक शो में बमुश्किल पंद्रह लोग थे. इसी तरह राम रेड्डी की राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित चर्चित कन्नड़ फिल्म तिथिको देखने के लिए एक शो में पच्चीस-तीस से ज्यादा दर्शक सिनेमा हॉल में मौजूद नहीं थे. जबकि कर्नाटक के एक गांव में केंद्रित कड़वे यथार्थ और हास्य बोध से भरी इस फिल्म की अंतरराष्ट्रीय जगत में भी खूब सराहना हुई है. बिना किसी स्टार के गैर पेशेवर कलाकारों ने जिस तरह से इस फिल्म में अभिनय किया है, वह किसी भी फिल्म के कला पक्ष पर विचार करने वाले समीक्षक को चौंकाता है. इसमें तो सेट, कैमरा, ध्वनि संयोजन वगैरह भी इस फिल्म को लीक से अलग ले जाकर खड़ा करता है. इसी तरह, अभी तक आर्थिक रूप से सबसे सफल मराठी फिल्म सैराटकी भी खूब चर्चा हुई. लेकिन दिल्ली में दर्शकों की पहुंच सीमित रही.

असल में पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली में सिनेमा के प्रदर्शन, विवेचन-विश्लेषण की परंपरा में कमी आई है. युवाओं के बीच लीक से हट कर बन रही फिल्मों का प्रचार-प्रसार ज्यादा नहीं हो पाता है. गौरतलब है कि पिछले दशक में दिल्ली में ओसियान फिल्मोत्सव ने दर्शकों को देश-विदेश, क्षेत्रीय सिनेमा की अच्छी फिल्मों को देखने का एक मंच दिया था. मगर 2008 में आई आर्थिक मंदी का असर इस समारोह पर भी पड़ा और इसे बंद करना पड़ा. मैंने 2005 में पहली मराठी फिल्म श्वासदेखी थी, जिसे राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था. ‘श्वासको 2004 में ऑस्कर के लिए भी भारत की ओर से नामांकित किया गया था. इस तमाम क्षेत्रीय सिनेमा की सिनेमाई भाषा काफी अलहदा है. ये फिल्में अपने कथ्य और कहन में साफगोई और सहजता के लिए जानी जाती है. चिंता की बात यह है कि अगर इन फिल्मों की पहुंच एक बड़े दर्शक वर्ग तक नहीं हुई, तो कहीं वे अपने उद्देश्य में समांतर सिनेमा की तरह ही पिछड़ न जाएं! 
(जनसत्ता, दुनिया मेरे आगे में प्रकाशित, 11 जून 2016)

Thursday, June 02, 2016

लोक मन के क़रीब शेख पीर (शेक्सपीयर)

क़रीब 25 वर्ष पहले जेएनयू के खुले रंगमंच पर हबीब तनवीर के निर्देशन में नया थिएटर ने शेक्सपीयर के नाटक मिड समर नाइट्स ड्रीमका मंचन किया था. ज़ाहिर है, यह नाटक उन्होंने अंग्रेजी में नहीं, हिंदुस्तानी और छत्तीसगढ़ की रंगभाषा में किया था. 

मेरे बड़े भाई उस वक्त जेएनयू में पढ़ते थे और उन्होंने काफी तारीफ़ के साथ इस नाटक के बारे में बताया था. और उन्होंने यह भी बताया था कि बकौल हबीब तनवीर जेएनयू के पार्थसारथी रॉक्स पर बना ओपन एयर थिएटरजैसा खुला मंच भारत में कहीं नहीं है!

बहरहाल, पिछले बीस वर्षों में दिल्ली में मैंने कई नाटक देखे. हबीब तनवीर निर्देशित आगरा बाज़ार, चरण दास चोर, सड़क, पोंगा पंडित आदि भी देखे, पर कहीं ना कहीं कामदेव का अपना वसंत ऋतु का सपनादेखने की चाह बची रही थी. 

इस साल जनवरी में संगीत नाटक अकादमी दिल्ली में नया थिएटर के इस नाटक का मंचन देखने का मौका मिला. हबीब तनवीर के ग़ुजर जाने के बाद नया थिएटर में वो तासीर नहीं बची है, फिर भी लोक कलाकारों के अभिनय देख कर, शेक्सपीयर के पात्रों का देसी संवाद सुन कर गुदगुदी सी होती रही. देश-काल की सीमा से परे शेख पीर शेक्सपीयर की आत्मा लोक भाषा में हमारे सामने थी. मनोरंजन के लिए इतना काफ़ी था.

लेकिन मैं अभी शेक्सपीयर को क्यों याद कर रहा हूँ? असल में, एवन के बार्ड (चारण, भाट) को इस दुनिया से गए 400 साल पूरे हुए हैं और दुनिया भर उनकी पुण्यतिथि मनाई जा रही है.  इंग्लैंड के एवन नदी के तट पर एक छोटे से गाँव स्ट्रैटफोर्ड में 26 अप्रैल 1564 को शेक्सपीयर का जन्म हुआ था और 23 अप्रैल 1616 को देहांत. 

लंदन के टेम्स नदी के तट पर उन्होंने ग्लोब थिएटर की स्थापना 1599 में की. इन चार सौ सालों में ग्लोब ने वक्त के कई थपेड़े झेले हैं. पिछले बीस बरस से इसे शेक्सपीयर ग्लोब के नाम से जाना जाता है.  शेक्सपीयर कभी इस जगह सशरीर टहलते-घूमते रहे होंगे. ईर्ष्या, द्वेष, प्रेम, ग्लानि, करुणा, हास्य से भरे हैमलेट, रोमियो एंड जूलिएट, किंग लियर, एज यू लाइक इट, मच अडो एबाउट नथिंग आदि के पात्र दर्शकों से मुखातिब होते होंगे और मंच पर आकर शेक्सपीयर अभिवादन स्वीकार करते होंगे! कैसी दुनिया रही होगी तब. इन सवालों को मन में लिए कुछ वर्ष पहले जब मैं लंदन घूमने गया था तब शेक्सपीयर ग्लोब में एक नाटक का मंचन देखा था. खुले आंगन में बने मंच, जिसके दोनों ओर दर्शकों के बैठने के झरोखे हैं और सामने खड़े दर्शकों के लिए जगह. शेक्सपीयर ग्लोब अपनी वास्तुकला शिल्प में भी अदभुत है.

शेक्सपीयर ग्लोब ने दुनिया भर में घूम, शेक्सपीयर के नाटकों का मंचन कर इस महान नाटककार को श्रद्धांजलि दी है. साथ ही पूरे साल विभिन्न सांस्कृतिक, साहित्यिक कार्यक्रमों के माध्यम से लंदन में इस महान साहित्यकार को याद किया जा रहा है.  प्रसंगवश, अतुल कुमार के निर्देशन में टवेल्थ नाइटका अनुदित नाटकपिया बहरूपियाका ग्लोब थिएटर में मंचन किया जा चुका है. सोचिए लंदन में बैठी जनता नाटक में कबीर के पद-थारा रंगमहल में, अजब शहर में/ आजा रे हंसा भाई/ निर्गुण राजा पे सिरगुन सेज बिछाई…,’ सुन कर कैसा महसूस करती होगी.  यकीन मानिए यदि आप पिया बहरूपियाके इस देसी रूप को देखेंगे-सुनेंगे तो एक ऐसे रंग अनुभव से भर उठेंगे जो समय-काल से परे अदभुत और अलौकिक है.
शेक्सपीयर ग्लोब थिएटर में नाटक का मंचन

इसी तरह पुराने लोग प्रसिद्ध नाटय निर्देशक बी वी कारंत के यक्षगान शैली में किए गए मैकबेथ’ (बरनम वन) को याद करते हैं.

सच तो यह है कि साहित्य यदि उत्कृष्ट हो तो वह किसी भाषा की मोहताज नहीं होती. वह सहृदय में रस का संचार करने के लिए पर्याप्त होती है.

भरत मुनि ने नाटक को सभी कलाओं का उत्स कहा है. साथ ही नाटक भिन्न कलाओं का संगम भी है. आधुनिक समय में नाटक का स्थान सिनेमा ने ले लिया. भारत और ख़ास तौर से हिंदी के प्रसंग में तो यह बात कहीं ही जा सकती है. पर ऐसा नहीं कि हिंदी सिनेमा शेक्सपीयर के प्रभाव से अछूता हो. शेक्सपीयर का मैकबेथ कभी बंबई के माफिया संसार में मकबूलबन कर, तो कभी ओथेलो  मेरठ के जाति से बंटे समाज में ओंकाराके रूप में, तो कभी हैमलेट हैदरके रूप में रक्त रंजित कश्मीर की वादियों में भटकता है. 

हालांकि, मुक्तिबोध की एक काव्य पंक्ति का सहारा लेकर कहूँ तो बंबइया सिनेमा ने हिंदी थिएटर से लिया बहुत ही ज्यादा, दिया बहुत ही कम है. 

कुछ वर्ष पहले मैंने मनोज बाजपेयी से पूछा था कि नेटुआ (मनोज बाजपेयी का प्रसिद्ध नाटक) की मंच पर वापसी कब होगी? उन्होंने भरी भीड़ में जवाब दिया था, जल्दी. इस बात को पाँच साल हो रहे हैं. और हम इंतज़ार ही कर रहे हैं

ख़ैर, शेक्सपीयर के बहाने यदि हम अपने अमर नाटककारों को भी याद करें, नाटक की स्थिति-परिस्थिति की चर्चा करें, नाटककारों, अभिनेताओं की बदहाली और हिंदी समाज की उपेक्षा की विवेचना करें तो हमारी संवृद्ध नाटक परंपरा को गति मिल सकती है. एक बार फिर दुहाराना उचित होगा कि भरत मुनि ने नाटक को सर्वशिल्प-प्रवर्तकमकहा है.


                                                             ( द लल्लन टॉप पर प्रकाशित)

Friday, May 20, 2016

इस चुनाव के बाद ‘संतों के घर में झगड़ा भारी’ देखेने को मिलेगा

Courtesy: The Hindu
केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के दो साल पूरे हो रहे हैं. इस मौके पर एक नारा सरकार की तरफ से आया है- जरा मुस्कुरा दो! देश की आम रियाया के लिए मोदी शासन के दौर में अच्छे दिनआए या नहीं इस पर बहस जारी है.

फिलहाल, दिल्ली और बिहार चुनाव में मिली करारी हार के बाद असम में बीजेपी की प्रत्याशित पहली जीत ने केंद्र सरकार को मुस्कुराने की एक वजह ज़रूर दी है. एक बड़ी वजह. उत्तर-पूर्व में बीजेपी पहली बार चुनाव जीतने में कामयाब रही है.

केरल में राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ और भारतीय मार्क्सवादी पार्टी (सीपीएम) के नेतृत्व वाली एलडीएफ के बीच yo-yo ट्रेंड (सत्ता की अदला-बदली) एक बार फिर से जारी है. हालांकि पिछले चुनाव की तुलना में एलडीएफ के सीटों में बढ़ोतरी हुई है. पिछले विधानसभा चुनाव में दोनों दलों के बीच जीत का अंतर महज चार सीटों का था, इस बार यह फ़ासला 44 सीटों का है. इस लिहाज से एलडीएफ की जीत के साथ ही यह कांग्रेस की बड़ी हार भी है. वहीं, बीजेपी भी अपना खाता खोलेने में सफल रही है.

दूसरी ओर एआइडीएमके की जयललिता और तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी की तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में फिर से वापसी बीजेपी के लिए इस मायने में सुकून देने वाली है कि यह कांग्रेस मुक्त भारतकी दिशा में बढ़ा एक और क़दम है! और 2019 तक आते आते ऐसा लग रहा है कि राहुल गाँधी की मिट्टी और पलीद होने वाली है. कांग्रेस कुल मिला कर छह राज्यों में सिमट गई है, इसमें मणिपुर, मेघालय और मिजोरम जैसे छोटे राज्य भी शामिल हैं.

राहुल गाँधी के लिए तिनके का सहारा पुडुच्चेरी है, जहाँ कांग्रेस गठबंधन सरकार बना सकती है.

सवाल यह है कि इन चुनाव के नतीजों का केंद्र सरकार पर क्या असर पड़ेगा?

ख़बरों के मुताबिक जून में तमिलनाडु से छह सदस्यों को राज्यसभा में भेजा जाना है. डीएमके-कांग्रेस गठबंधन की हार से आने वाले मानसून सेशन में एनडीए को जयललिता का समर्थन मिल सकता है. चुनाव जीत के बात प्रेस कांफ्रेंस में ममता बनर्जी ने भी अधर में लटके जीएसटी बिल पर अपने समर्थन की बात की है.

इस मायने में ममता बनर्जी और जयललिता की जीत नरेंद्र मोदी के लिए सुखदायी है, उन्हें राज्यसभा में विपक्ष का विरोध कम झेलना पड़ेगा. संभव है विधानसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस की विरोध की धार भी कुंद हो और कई अहम बिल जो राज्यसभा में लटके पड़े हैं उस पर आम सहमति बन पाए. फिलहाल राज्यसभा में जहाँ कांग्रेस के 64 सदस्य हैं, वहीं बीजेपी के 49.

राजनीति अंतर्विरोधों का पुंज है और हमारे नेताओं को इसे साधना बखूबी आता हैं. ममता बनर्जी ने ये भी कहा है कि भविष्य देश की जनता तय करेगी.

जाहिर है, भविष्य की बात कर ममता बनर्जी ने आगे की राजनीति और 2019 के आम चुनावों की ओर भी इशारा किया है. यदि आने वाले समय में विपक्ष फेडरल फ्रंट की ओर आगे बढ़ता है तो नेता पद के लिए ममता की दावेदरी निश्चित है. वहीं पंजाब में यदि अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी जीतती है तो वे भी अपनी दावेदारी पेश करेंगें. बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार अपना घोड़ा पहले ही छोड़ चुके हैं. यानी आने वाले समय में संतों के घर में झगड़ा भारीदेखेने को मिल सकता है. वैसे बहुत कुछ अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड चुनाव से भी तय होना है.

कहते हैं कि राजा में सात-सात हाथी का बल होता है. केंद्र में बैठा राजापहले से ही बलशाली है, उसे इन चुनाव नतीजों से और बल मिला है. विपक्ष में बैठा राजकुमारपहले से कमजोर है, वह और भी कमजोर हुआ है. पर सच यह भी है कि सत्ता में बैठा राजा सवालों से डरता है. पिछले दो सालों में हमने प्रधानमंत्री का एक भी प्रेस कांफ्रेंस नहीं देखा-सुना है, जहाँ वे सवालों से सीधे टकराए हों. मीडिया को भी अभी तक बमुश्किल दो-चार इंटरव्यू प्रधानमंत्री ने दिए हैं, जिनमें विदेशी मीडिया भी शामिल है. ऐसे में सत्ता एजेंडा सेट कर रही है और मीडिया बस उसका अनुसरण करती है. राजनीति के केंद्र में कभी बीफ बैन तो कभी राष्ट्रवाद आ जाता है, तो कभी फर्जी डिग्री और सड़कों का नामकरण! विकास, रोजगार और गर्वनेंस का मुद्दा ग़ायब है.

बहरहाल, इन चुनाव नतीजों के बाद लोकतंत्र में विपक्ष की मजबूती के मद्देनज़र उम्मीद ममता-जयललिता पर आ टिकी है. 

                                                                ( द लल्लन टॉप पर प्रकाशित)

Monday, May 02, 2016

क्रांतिकारी आतंकवाद की आखिरी कड़ी: भगत सिंह

आंतकवाद संपूर्ण क्रांति नहीं है और क्रांति आंतकवाद के बिना पूर्ण नहीं होती: भगत सिंह (बम का दर्शन, 1930)

वर्ष 2001-02 में हम भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी), दिल्ली में पत्रकारिता का प्रशिक्षण ले रहे थे. यह दौर हमारे लिए खबरों के लिहाज से काफ़ी महत्वपूर्ण था. अमेरिका में हुए 9/11, भारतीय संसद पर हमला और गोधरा-गुजरात दंगों की घटना हमारे शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए चुनौती लेकर आया था. उसी दौर में इस्लामिक आतंकवादजैसे शब्द भारतीय मीडिया में प्रचलन में आए थे. ज़ाहिर है, हम इसका विरोध कर रहे थे. पर सत्ता और मीडिया की भाषा में ज्यादा फर्क नहीं होता और यह पद आतंकवाद का पर्यायवाची बन कर चलन में बना रहा.

इसी दौरान, 9/11 के बाद स्टूडेंटस इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) को एनडीए की सरकार ने बैन कर दिया था. मेरे एक सहपाठी मित्र शहबाज अहमद सिमी से जुड़े थे. वह रातो-रात ग़ायब हो गए. हमें फिर उनकी ख़बर नहीं लगी. यह कहानी फिर कभी. अभी हम बात भगत सिंह और क्रांतिकारी आतंकवादकी कर रहे हैं.

लंबे समय तक नक्सलबाड़ी आंदोलन से जुड़े रहे प्रो वीर भारत तलवार ने 80 के दशक के मध्य में हंस पत्रिका में एक लेख लिखा थाक्रांतिकारी आतंकवाद की आख़िरी कड़ी. यह लेख शहीद भगत सिंह के इर्द-गिर्द था. बजरिए प्रो बिपिन चंद्र 'क्रांतिकारी आतंकवाद' पद उस दौर में अकादमिक बहस के दायरे में था.

प्रो तलवार का कहना है कि भगत सिंह मानसिक रूप से भले हीं आतंकवाद से मुक्त हो गए थे, पर वह व्यावहारिक रूप से मुक्त नहीं हुए थे. उनके संघर्ष की पद्धति क्रांतिकारी आंतकवाद से प्रेरित थी. अपने अंतिम दिनों में भगत सिंह मार्क्स-लेनिन की विचारधारा की ओर मुड़ गए थे, पर वह किसी किसान-मजदूर या जन-आंदोलन से जुड़े हुए नहीं थे.

ब्रिटिश हूकमतों के लिए आजादी के ये क्रांतिकारी सेनानी आतंकवादीथे. हालांकि उस वक्त स्वाधीनता आंदोलन से जुड़े क्रांतिकारी गर्व से इस अवधारणा को अपनाए हुए थे. खुद प्रो चंद्र ने अपनी पुस्तक India’s Struggle for Independence में स्वाधीनता आंदोलन के क्रांतिकारियों के लिए ‘Revolutionary Terrorist (क्रांतिकारी आतंकवादी)शब्द का इस्तेमाल कोई ख़राब या गल्त अर्थ में नहीं किया था.

1920 के दशक में क्रांतिकारी सचिंद्र नाथ सान्याल की किताब बंदी जीवनक्रांतिकारियों के लिए एक मूल टेक्सट बुककी तरह था. उस दौर की पत्रिकाओं में भारतीय आतंकवाद का इतिहास' जैसे इश्तेहार भी खूब दिखाई देते हैं. चर्चित इतिहासकार प्रो सुमित सरकार ने भी अपनी किताब आधुनिक भारत (1885-1947)’ में लिखा है: 1922 के पश्चात कांग्रेसी नेतृत्व के प्रति मोहभंग की जो मन:स्थिति बनी उसके परिणामस्वरूप बंगाल, संयुक्त प्रांत और पंजाब में शिक्षित युवक पुन: क्रांतिकारी आतंकवादी तरीकों की ओर आकृष्ट होने लगे.इसकी अंतिम परिणति युवा भगत सिंह के नेतृत्व में 1928 में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मीकी स्थापना में हुई.

स्वाधीनता आंदोलन के उस दौर में भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, सूर्य सेन आदि क्रांतिकारियों के लिए प्रयुक्त पद आतंकवादऔर आज उत्तर औपनिवेशिक राज्य-सत्ता, मीडिया जिसे आतंकवादके रूप में परिभाषित करती हैं उसमें काफ़ी फर्क है. ठीक उसी तरह, साम्राज्यवाद के दौर में पनपी और उत्तर-औपनिवेशिक दौर में विकसित हुई भारतीय राजनीति और मीडिया में भी फर्क है.

इन्हीं सबको ध्यान में रख कर खुद प्रो चंद्र ने 2006 में नेशनल बुक ट्र्स्ट (एनबीटी) के लिए जब मैं नास्तिक क्यों हूँकी भूमिका लिखी, तो क्रांतिकारी आतंकवादी जैसे विशेषणों से परहेज किया था. उन्होंने अपनी भूमिका के शुरुआत में ही लिखा है, ‘भगत सिंह न सिर्फ भारत के महान स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारी समाजवादियों में से एक थे, बल्कि वह एक आरंभिक मार्क्सवादी विचारक और आइडियोलॉग भी थे.टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक भगत सिंह की जन्मशती के अवसर पर (2007) एक समारोह में खुद प्रो चंद्र ने कहा था, “इस पद का प्रयोग भगत सिंह को आजादी के संघर्ष की अन्य धाराओं से अलगाने के लिए और प्रशंसा के तौर पर तब किया जाता था. लेकिन आतंकवाद शब्द अब एक अलग अर्थ लिए हुए है. मैं इस पद का इस्तेमाल करना अब पसंद नहीं करुँगा.

करीब दस साल बाद अचानक संसद से सड़क तक भगत सिंह के प्रति उमड़े इस प्रेम और आंतकवादको लेकर इस बहस के पीछे राज क्या है? कहीं पंजाब में होने वाले चुनाव और भाजपा के भगत सिंह की छवि के प्रति उभरे नव-प्रेम तो नहीं?

हाल के वर्षों में पापुलर मीडिया में  भगत सिंह के स्वाभिमानी सिर पर रहने वाली जानी-पहचानी तिरछी टोपी के बदले नीली-पीली पगड़ी नज़र आने लगी है. क्या आने वाले समय में भगत सिंह एक परिवार, एक पार्टी, एक समुदाय के नेता बन कर रह जाएँगे? भगत सिंह के परिवार वालों ने शिक्षामंत्री को चिट्ठी लिख कर और एबीवीपी के कार्यकर्ताओं के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय के वीसी से मिल कर जिस तरह अपनी नाराजगी जताई उससे तो ऐसा ही लगता है. संसद ने भी निर्णय लेने में कोई देर नहीं की और फ़रमान जारी कर दिया कि क्रांतिकारी आतंकवाद पद को किताब से हटा दिया जाए!

राजनीतिक दलों में गाँधी-पटेल-आंबेडकर-भगत सिंह के विचारों को अपनाने से ज्यादा उनकी मूर्तियों पर माला पहनाने की होड़ मची है.  आने वाले दिनों में भारत में राजनीतिक लड़ाई, जाति-अस्मिता के साथ-साथ इतिहास के किरदारों, इन्हीं बूतों के बूते लड़ी जाएगी.

बकौल अमित शाह, प्रधानमंत्री मोदी ओबीसी हैं. बकौल मायावती जेएनयू के मार्क्सवादी छात्र नेता कन्हैया कुमार भूमिहार’.  बिहार के राष्ट्रवादी कुशवाहा परिषद के मुताबिक सम्राट अशोक कुशवाहाथे.

बिहार सरकार ने करीब 2300 वर्षों के बाद सम्राट अशोक की जन्मतिथि 14 अप्रैल ढूँढ़ निकाली और उस दिन सरकारी छुट्टी घोषित कर दी है. इतिहासकारों का कहना है कि ये सारी राजनीतिक कवायद अनैतिहासिक है, अनर्गल है. विवेक सम्मत नहीं है.


अकादमिक लेखन और शोध की दुनिया में अंतिम सत्य कुछ नहीं होता. नए तथ्य, विश्लेषण के परिप्रेक्ष्य में पहले की स्थापनाओं पर पुनर्विचार किया जाता रहा है.  भाषा सामाजिक-सांस्कृतिक निर्मिति है. समय के साथ उसे बरतने-व्यवहार करने में बदलाव आता है. निस्संदेह भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी, देशभक्त शहीदों के लिए क्रांतिकारी आतंकवादपद का इस्तेमाल बंद होना चाहिए. पर क्या इन्हें’'इस्लामिक आतंकवाद' ‘हिंदू आतंकवादजैसे पदों में भी कोई दिक्कत नज़र आती है? और सवाल ये भी है कि अकादमिक निर्णय क्या राजनीतिक गलियारों में लिए जाएँगे?

                                                                   ( द लल्लन टॉप पर प्रकाशित)

Saturday, April 16, 2016

ऑड या इवन: या इलाही ये माजरा क्या है

कुछ वर्ष पहले आस्ट्रिया की राजधानी वियना की यात्रा के दौरान मैंने अपने एक मित्र विवियन से पूछा- तुम्हें अपने शहर के बारे में सबसे अच्छी बात क्या लगती है. तपाक से उसने कहा था-पब्लिक ट्रांसपोर्ट. वियना और अमूमन पश्चिमी यूरोप के सभी देशों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सुगम उपलब्धता को देखते हुए मैं उसके जवाब से चकित नहीं हुआ था. हां, मुझे अपने शहर दिल्ली और बदहाल पब्लिक ट्रांसपोर्ट की याद ज़रूर आ गई थी!

दिल्ली में एक बार फिर से एक पखवाडे के लिए ऑड-इवन फार्मूला के तहत कारों की आवाजाही पर बंदिश लगी है. सरकार का कहना है कि दिल्ली में इससे प्रदूषण पर रोक लगेगी.

ऐसा प्रयोग अरविंद केजरीवाल की सरकार ने जनवरी में भी एक पखवाडे के लिए था. ऑड-इवन की पहल से दिल्ली में वायु प्रदूषण में कितनी कमी आई, आई भी या नहीं, इस पर पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों में खासा मतभेद है. आईआईटी दिल्ली, आईआईटी रूड़की के अध्ययन जहाँ मानते हैं कि वायु प्रदूषण या वायु की गुणवत्ता (एयर क्वालिटी) में कोई खास फर्क नहीं पड़ा. या जो बदलाव आए वे इतमे नगण्य थे कि उसकी गणना मुश्किल है. वहीं सीएसइ (CSE) की सुनीता नारायण का मानना है कि प्रदूषण में कमी आई थी. हालांकि उनका कहना है कि ऐसा जनवरी में वायु की गति और आद्रता की वजह से हुआ था. आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता अलग संस्थानों के आंकड़े दिखा कर कहते हैं कि निस्संदेह प्रदूषण में कमी आई थी.

ऐसे में दिल्ली की गलियों में रहने वाले चाचा ग़ालिब याद आते हैं: या इलाही ये माजरा क्या है?’

हालांकि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल खुद मान रहे हैं कि जितनी अपेक्षा थी उतनी प्रदूषण में कमी नहीं आई, इससे ट्रैफिक में सुधार जरूर आया था.तो क्या माना जाए कि इस बार सरकार ट्रैफिक में सुधार के लिए ऑड-इवन फार्मूला लागू कर रही है?

पिछले दो दशक में पर्यावरण की देख रेख, उसके प्रति चिंता और चिंतन वैश्विक स्तर पर काफी मौजू है. इसे जन समर्थन भी मिला है. ऐसे में कोई भी राजनीतिक पार्टी पर्यावरण मामले पर यह संदेश नहीं देना चाहती है कि वे फेंस के दूसरी तरफहै. यहाँ तक वामपंथी पार्टियाँ भी आज वर्ग संघर्ष की बात कम, पर्यावरण की ज्यादा करती दिखती है.

निस्संदेह दिल्ली सरकार की इस पहल से उसे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर काफी वाहवाही मिली, जिसकी हकदार वो है भी. पर सवाल है कि टू व्हीलर (दूपहिया वाहनों) पर पर रोक क्यों नहीं है? क्या प्रदूषण सिर्फ और सिर्फ कार की वजह से दिल्ली में है? जाहिर है पब्लिक ट्रांसपोर्ट की बदहाली को देखते हुए टू व्हीलर पर रोक लगा कर सरकार कोई खतरा मोल नहीं ले सकती है. साथ ही मेट्रो की यात्रा के बाद अपने घर तक पहुँचने के लिए वाहनों की पर्याप्त सुविधा नहीं मिलती है. पब्लिक ट्रांसपोर्ट की बदहाली के अलावा बात आम आदमी पार्टी के वोट बैंक की भी है! ऐसा लगता है कि दिल्ली सरकार कारवाले से ज्यादा बे-कारों की चिंता करती है.

इस बात से किसी को इंकार नहीं पिछले दस वर्षों में दिल्ली में मेट्रो के आने से यातायात में काफी आसानी हुई है. पर हाल के वर्षों में मेट्रो पर दवाब भी बढ़ा है. यह जुमला चल पड़ा है कि हमने मेट्रो में धक्के खाए हैं!

जहाँ यूरोप की सड़कों पर कार दिल्ली से ज्यादा दिखाई देती है वहीं साइकिल की सवारी करते बड़े नेता, प्रोफेसर, सीइओ, छात्र-छात्राएँ भी काफी मिल जाते हैं. दिल्ली जैसे शहर में साइकिल की सवारी मजबूरी में ज्यादातर प्रवासी मजदूर करते दिखते हैं या कुछ शौकिया लोग. ऐसा लगता है कि सड़क निर्माण की परिकल्पना करते समय साहब-बाबूओं को आम लोग दिखते ही नहीं. ऐसा क्यों है कि उनके जेहन में फुटपाथ या साइकिल लेन बनाने की योजना नहीं आती?

दिल्ली में दो-तीन किलोमीटर की यात्रा आप यदि पैदल करना चाहें तो भी नहीं कर सकते. लुटियंस दिल्ली को छोड़ दे तो पूरी दिल्ली में फुटपाथ का सख्त अभाव है. अलग से साइकिल लेन बनाने की बात फिलहाल तो दूर की कौड़ी लगती है. क्या केजरीवाल सरकार ने पिछले साल भर में इस तरफ कोई कदम उठाया है? क्यों नहीं सरकार दिल्ली में ऐसे रूट की पहचान करे जहाँ साइकिल लेन बनाना आसान हो, जहाँ फुटपाथ को दुरुस्त कर पैदल चलने वालों के लिए रास्ता बनाया जा सके. इस तरह की पहल से दिल्ली की आबोहवा पर दूरगामी असर पड़ेगा.


अरविंद केजरीवाल का कहना है कि यदि इस बार का ऑड-इवन सफल रहा (वैसे सफलता से उनका क्या मानना है यह स्पष्ट नहीं है) तो वो इसे हर महीने दिल्ली में लागू करने की सोच रहे हैं. आईआईटी दिल्ली के एमेरिटस प्रोफेसर दिनेश मोहन का कहना है कि वायु प्रदूषण के स्रोत सिर्फ कार या बस ही नहीं हैं. शहर में अंधाधुध निर्माण कार्य, उद्योग-धंघे और पावर प्लांट वायु को दूषित करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं. उनका जोर तकनीक में सुधार, स्वच्छ ईंधन के इस्तेमाल को लेकर कड़े नियम और पर्यावरण को लेकर एक मजबूत मानक बनाने पर हैं. साथ ही वे कहते हैं कि अफरा-तफरी में लिए गए इस तरह के निर्णय से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला जब तक कि इरादा दूरगामी बदलाव पर ना हो.

अरविंद केजरीवाल खुद आईआईटी से पढ़े हुए हैं ऐसा नहीं कि वे प्रोफेसर दिनेश मोहन की बात नहीं समझते, फिर इस तरह के वक्तव्यों के क्या मानी हैं?


क्या देश के अन्य राजनेताओं की तरह वो भी आम आदमी की परेशानियों से सीधे संवाद के बरक्स जुमले में बात करने की आदत डाल रहे हैं. या उनकी निगाह दिल्ली की सड़कों पर कम, लाल किले पर ज्यादा है

                                                          ( द लल्लन टॉप पर प्रकाशित)