Sunday, September 20, 2026

मिथिला की चित्रकला

 

पिछले कुछ वर्षों से अशोक कुमार सिन्हा मिथिला चित्रकला को लेकर लगातार लेखन कर रहे हैं. हाल ही में उनकी लिखी किताब मिथिला चित्रकला: रंगो और रेखाओं का सफरप्रकाशित हुई है जिसमें वे इस कला की शैलियों, जैसे कोबहर, अरिपन, गोदना आदि का विस्तार से वर्णन करते हैं. साथ ही इस कला के इतिहास और विशेषताएँ को सहज भाषा में प्रस्तुत करते हैं.

मिथिला चित्रकला पिछले कुछ वर्षों में मधुबनी आर्ट के रूप में देश-विदेश में चर्चा में बनी रही है. मिथिला या मधुबनी चित्रकला?’ शीर्षक लेख में वे लिखते हैं कि मधुबनी सिर्फ एक जिला है, जबकि यह कला ऐतिहासिक मिथिला की सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ी हुई है. सदियों से मिथिला की महिलाएँ  अरिपन, कोहबर, मछली, साँप, सूर्य, चंद्र आदि दीवारों पर उकेरती रही हैं. पर 1960 के दशक में (1964-65) आए अकाल ने इस कला को मिथिला से बाहर  पहुँचाया. औपचारिक शिक्षा से वंचित और बिना किसी नेटवर्क के जगदंबा देवी, गंगा देवी, सीता देवी, महासुंदरी देवी, गोदावरी दत्त, बौआ देवी जैसी कलाकार इसे देश-विदेश लेकर गईं. गंगा देवी, जगदंबा देवी और महासुंदरी देवी जहाँ कचनी (लाइन) शैली में सिद्धहस्त थीं, वहीं सीता देवी, बौआ देवी भरनी शैली में. हालांकि बाद के दशकों में दलित कलाकारों के दख़ल से इस शैली में विस्तार आया और गोदना शैली भी इससे जुड़ गई.

एक परंपरा के रूप में लोक में कोहबर और अरिपन लिखने की कला सदियों पुरानी है. पिछले दशकों में समकालीन विषय-वस्तु भी इस कला का आधार बने हैं. साथ ही पहले जहाँ लोक में उपलब्ध प्राकृतिक रंगों का प्रयोग होता था वहीं अब एक्रेलिक रंगों का प्रयोग होने लगा है. दीवार से उतर कर ये चित्र कागज, कपड़ा और विभिन्न वस्तुओं पर अपना रूप ग्रहण करने लगे हैं. देश और विदेश के विभिन्न भागों में आज अनेक मिथिला कलाकार अपनी कूची में रंग भर रहे हैं.

इस किताब में विस्तार से कचनी, भरनी, तांत्रिक, गोदना शैली का जिक्र है. विभिन्न शैलियों को निरूपित करते हुए किताब में शामिल चित्र पाठकों को इस चित्र शैली के कला पक्ष को अच्छे से स्पष्ट करते हैं. कलाकारों के साथ-साथ जिन विभूतियों ने मिथिला कला को देश-दुनिया में प्रतिष्ठा दिलाने में योगदान दिया, मसलन, विलियम आर्चर, ललित नारायण मिश्र, भास्कर कुलकर्णी, टोकियो हासेगावा आदि पर भी लेखक ने टिप्पणी दी है.

सामान्य पाठकों के लिए लिखी गई यह किताब परिचयात्मक है. चित्रों का इस्तेमाल इसे पठनीय बनाता है, हालांकि चित्रकारों का नाम नहीं होना खटकता है.

किताब: मिथिला चित्रकला (रंगों और रेखाओं का सफर)

लेखक: अशोक कुमार सिन्हा

प्रकाशक: क्राफ्ट चौपाल, पटना

मूल्य: 500



Sunday, September 13, 2026

दोहरी जिंदगी: लोक कथा में मुक्ति चेतना

 


राजस्थान के चर्चित लेखक विजय दान देथा (बिज्जी) की जन्मशती मनाई जा रही है. उन्होंने राजस्थान की मिट्टी में रची-बसी लोक कथाओं और मौखिक परंपरा को जतन से ढूंढा और पुनर्नवा किया. उनकी रचनाओं की पहुँच अनुवाद के माध्यम से देश-दुनिया तक फैली जिसने नाटक, सिनेमा, दास्तानगोई से जुड़े कलाकारों को रूपांतरित करने, आधुनिक रंग में रंगने का मौका दिया. बात हबीब तनवीर-श्याम बेनेगल की हो (चरण दास चोर), मणि कौल-अमोल पालकेर (दुविधा) की हो, पुष्पेंद्र सिंह (लजवंती, केंचुली) या महमूद फारुकी (चौबोली) की.

सवाल है कि ऐसा क्या है इन लोक कथाओं में जो युवा कलाकारों से लेकर शहरों में रहने वाले, अभिजात्य दर्शकों को भी जोड़ता रहा है?
पिछले दिनों पुणे में बिज्जी की चर्चित कहानी ‘दोहरी जिंदगी’ के मंचन और दर्शकों की प्रतिक्रिया में इस सवाल का जवाब दिखा. मारवाड़ी और हिंदी में कही गई इस कहानी में दो कंजूस और लालची सेठ अपने अजन्मे बच्चों की शादी कोख में ही तय कर देते हैं. पर दोनों के घर बेटी ही जन्म लेती है. एक सेठ अपनी बेटी को बेटे की तरह पालता है और दहेज के लालच में दोनों की शादी कर दी जाती है. सुहागरात के दिन इसका भेद खुलता है. फिर धीरे-धीरे दोनों स्त्रियों के बीच प्रेम पनपता है. समाज में मिले तिरस्कार के बीच वे दोनों खुद को नई पहचान देती है- बीजां और तीजां.
गुरलीन जज और नेहा सिंह द्वारा निर्देशित यह नाटक में लोभ-लालच के आगे बढ़ कर, सामंती समाज में समगैंलिक संबंधों और आधुनिक समाज में दुचित्तापन को हमारे सामने लाता है. यह कहानी अपनी कथ्य और समकालीन भाव बोध की वजह से दर्शकों के करीब लगती है. मंच पर कुछ ‘बोल्ड सीन’ की वजह कुछ दर्शक असहज भी दिखे, निर्देशक की मंशा भी यही थी!
देथा की कहानी चाहे वह ‘दुविधा’ हो ‘लजवंती’ हो या ‘दोहरी जिंदगी’, इनमें एक स्त्री की पितृसत्तात्मक बंधन में जकड़न, प्रेम की उत्कट चाह और मुक्ति की चेतना दिखाई देती है. यहां भूत भी प्रेमी या सहयोगी हो सकता है! दुविधा की तरह दोहरी जिंदगी में भूत की मौजूदगी है.
कुछ साल पहले मैंने युवा फिल्मकार पुष्पेंद्र सिंह से देथा की कहानियों के रूपांतरण को लेकर जब सवाल किया, तब उन्होंने कहा था: “एक कलाकार के रूप में आप लगातार इस सवाल से जूझते रहते हैं कि किसी [लोक] कथा को किस तरह पर्दे पर उतारा जाए या किसी साहित्यिक रचना का रूपांतरण कैसे किया जाए… एक कहानीकार के रूप में आप यह भी चाहते हैं कि आपकी कहानियाँ समकालीन दिखाई दें.” यही वजह है कि आधुनिक कलाकार इन पारंपरिक कहानियों के माध्यम से समकालीन सामाजिक-राजनीतिक अराजक व्यवस्था को भी सामने लाते रहे है.
देथा कि कहानियों में लोक का रंग अपनी पूरी शिद्दत के साथ भाषा, मुहावरे और संवाद में दिखाई देता है. करीब चालीस साल पहले देथा ने ‘दोहरी जिंदगी’ लिखी तब समाज में समलैंगिक संबंधो को लेकर खुल कर बात नहीं होती थी. आज जब इसे मंच पर रूपांतरित किया गया जाहिर समकालीन स्वर खुद-ब-खुद इसमें जुड़ते गए. अकारण नहीं कि दोहरी जिंदगी में अदाकार वर्तमान राजनीति पर भी टिप्पणी करने से नहीं चूके.

Friday, September 11, 2026

In a Changing World, Detha's Stories Remind Us How Folklore Can Question Power

 

The centenary year celebration of renowned Rajasthani writer and Padma Shri awardee Vijaydan Detha (1926-2013) is an opportunity to revisit his work that has travelled far beyond the landscape in which it was born. Detha, also known as Bijji, painstakingly explored, collected and revived the folk tales and oral traditions deeply rooted in the soil of Rajasthan. Through translations, his stories reached readers across India and the world, while theatre practitioners, filmmakers and Dastangoi performers found in them rich material for reinterpretation and contemporary expression.

The list of artists drawn to Detha’s work is remarkable. Habib Tanvir and Shyam Benegal adapted Charandas Chor, Mani Kaul and Amol Palekar brought Duvidha to the screen, Prakash Jha adapted Parineeti, Pushpendra Singh made Lajwanti, and Mahmood Farooqui adapted Chouboli for Dastangoi, among many others.

What is it about Detha’s folk tales that continues to connect them with everyone, from young artists to urban audiences? I have had an answer recently in Pune, during a performance of Detha’s well-known story Dohri Zindagi.

Told in Marwari and Hindi, Dohri Zindagi revolves around two miserly and greedy merchants who arrange the marriage of their unborn children while they are still in the womb. Both households are blessed with daughters but one of the merchants decides to raise his daughter as a boy. Driven by the lure of dowry, the two are eventually married off. The truth about this same-sex marriage is revealed on their wedding night. Gradually, however, love begins to blossom between the two women. Rejected and despised by society, they create new identities for themselves – Beejan and Teejan.

Directed by Gurleen Judge and Neha Singh, the play moves beyond a story of greed and avarice to confront questions of same-sex relationships in a feudal society and the duplicity of modern social structures. The story feels strikingly contemporary because its emotional core remains immediately recognisable. Some members of the Pune audience appeared uncomfortable with a few of the play’s “bold” scenes on stage. That discomfort, however, was precisely what the directors intended to provoke.

Detha was born on September 1, 1926, in Borunda, near Jodhpur, into a family associated with the bardic tradition of Rajasthan. His monumental 14-volume Baatan Ri Phulwari (Garden of Tales) brought together a vast collection of Rajasthani folk tales and has subsequently been translated into Hindi and other languages, earning wide appreciation.

Yet Detha’s importance lies not merely in preserving folklore. His stories repeatedly transform folk narratives into sites of questioning and resistance. Whether in Duvidha, Lajwanti or Dohri Zindagi, women find themselves trapped within patriarchal structures while experiencing an intense yearning for love, dignity and freedom. In Detha’s stories, a ghost can be a lover, a companion or an ally. A ghost appears in both Duvidha and Dohri Zindagi, blurring the boundaries between the real and the imagined.

Duvidha, in particular, can be read as a feminist tale about agency, desire and the limited choices available to women within patriarchal society beautifully depicted on screen by Mani Kaul. Through its unique non-linear narrative style, the film treads between the real and the imaginary.

Detha’s folk imagination createsspaces in which women can challenge identities imposed upon them even if those challenges come at a considerable cost.

A few years ago, when I asked filmmaker Pushpendra Singh about adapting Detha’s stories, he spoke about the fundamental challenge facing any artist working with folklore:

“As an artiste, you constantly grapple with how to translate a [folk] tale or adapt a literary piece. As a storyteller, you also want your stories to look contemporary. Old feudalism has given way to something new, not so widely seen in today’s Rajasthan.”

This perhaps explains the enduring appeal of Detha. His stories are rooted in the geography of Rajasthan and its cultural memory, yet they are not confined by them. The folk element in Detha’s writing comes through its language, idiom, humour and dialogue. But beneath the texture of folklore lies a persistent engagement with power, desire, social hierarchy and freedom.

When Detha wrote Dohri Zindagi around four decades ago, there was little open discussion in Indian society about same-sex relationships. When the story is adapted for the stage today, contemporary voices and concerns inevitably become part of it. It is therefore hardly surprising that the performers in Dohri Zindagi also felt free to comment on contemporary Indian politics.

Along with his close friend and noted folklorist and musicologist Komal Kothari, Detha founded the Rupayan Sansthan, an institution devoted to documenting and promoting the folklore, art, music and cultural traditions of Rajasthan. Detha’s birth centenary is an opportunity to ask why folk narratives continue to matter in a rapidly changing world. His stories remind us that folklore is not a frozen tradition. It is capable of questioning power.

As performed during Mahindra Excellence in Theatre Awards (META) last year in Delhi, the award-winning play Swang: Jas Ki Tas (in Bundelkhandi dialect), which is based on his story Thakur Ka Roothana, uses elements of the traditional folk performance style of Swang to expose the contemporary social and political disorder around us.

Detha’s stories continue to find new readers, filmmakers, theatre practitioners and audiences. They speak in the language of folklore, but they ask questions about contemporary realities which confront us.

(The Wire) 

Sunday, August 23, 2026

अपनी मृत्यु को रचता एक अभिनेता

 पिछले दिनों पुणे में बहुचर्चित नाटककार महेश एलकुंचवार का लिखा मराठी नाटक-एका नाटाचा मृत्यू (एक नाटककार की मृत्यु) का मंचन हुआ. गौरतलब है कि यह नाटक उन्होंने करीब बीस साल पहले लिखा, पर अभी तक इसे मंच पर रूपायित नहीं किया गया था. असल में नाट्यकर्मियों के बीच इस नाटक की ख्यातिएक ऐसे नाटक की बन चुकी थी जिसका मंचन मुश्किल था.  

इस मराठी नाटक के केंद्र में एक अभिनेता है जो अपने जीवन, अस्तित्व, संबंधों और मृत्यु को मंच पर प्रस्तुत करता है. अभिनेता विभिन्न मुखौटों में दर्शकों के सामने आता है, पर उनका असली रूप खुद से छिपा रह जाता है. इस नाटक में अभिनेता जीवन के आखिरी क्षणों में अपने जीवन को टटोलता है और दर्शकों के सामने पेश करता है.

चर्चित निर्देशक अतुल पेठे के निर्देशन में अभय महाजन ने इस एकल नाटक को खूबसूरती से प्रस्तुत किया. अपने भाव, भंगिमाओं और संवाद के सहारे अभिनेता और निर्देशक के आपसी संबंधों, टकरावों और रचनात्मक यात्रा से महाजन हमें रू-ब-रू करवाते हैं. नाटक के मंचन के बाद उन्होंने मुझसे कहा, यह एक मुश्किल नाटक है. बीस साल पहले लिखा गया है और इस बीच हमारी आंगिक और वाचिक भाषा दोनों ही बदल गई है....हमारे लिए य़ह नाटक करना एक चुनौती की तरह रहा. एलकुंचवार के नाटकों की विशेषता उनके प्रयोगात्मक शैली में है. सामाजिक-राजनीतिक विषयों  को उठाते हुए इन नाटकों में भाषा की मितव्ययिता अलग से रेखांकित की जाती रही है. अल्पविराम, मौन भी यहाँ मुखर होकर बोलता है. इनके किरदार किसी ओढ़ी हुई भाषा में संवाद नहीं करते हैं! 

इस नाटक में नाटककार ने बहुत सारे रचनाओं (नाटकों, कविताओं) के उद्धरण को समाहित किया है.  इस नाटक का रूप उनके अन्य नाटकों से साफ अलग है. पिछले साल एक बातचीत में एलकुंचवार ने मुझसे कहा था: ‘मेरे सभी नाटक एक-दूसरे से अलग हैं.. हर नाटक के कंटेंट ने ही उसका रूप तय किया है.’

नाटक के शुरूआती दृश्य को बेहद कुशलता से बुना गया है जिसमें नंगे बंदन अभिनेता मृत्यु के क्षणों को रचता है. खुद महाजन का प्रशिक्षण शारीरिक संचालन में है, इस लिहाज से इस नाटक में आंगिक भाषा पर जोर रहा है. मंच पर कोई साज-सज्जा नहीं थी, बेहद कम प्रॉप्स थे. छोटे से सभागार में कहीं-कहीं भाषा मेरे भावबोध में बाधा बनी, पर महाजन का अभियन इतना सधा था कि 70 मिनट का यह नाटक मेरे लिए बोझिल नहीं बना.    

मराठी में जहाँ कमर्शियल थिएटर का अपना एक दर्शक वर्ग है, वहीं प्रायोगिक नाटकों के लिए, सीमित ही सही, पुणे में स्पेस दिखता है. उसके अपने समर्पित दर्शक वर्ग भी है. छियासी वर्षीय महेश एलकुंचवार ने विजय तेंदुलकर (1928-2008) और सतीश आलेकर के साथ मिलकर मराठी रंगकर्म को नई रंगभाषा और मुहावरे दिए हैं. यदि इन तीनों नाटककारों की तुलना पारसी रंगमंच के राधेश्याम कथावाचक, नारायण प्रसाद बेताब और आगा हश्र कश्मीरी से की जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. इन नाटककारों ने पारंपरिक, महाकाव्य को आधार बना कर किए जाने वाले म्यूजिकल नाटकों से अलग सामाजिक-राजनीतिक सरोकारों से मराठी रंगकर्म को जोड़ा. जिसका असर भारतीय रंगमंच पर गहरा पड़ा.

Sunday, August 02, 2026

दुख की दुनिया के भीतर सपनों का संगीत


पिछले दिनों चर्चित अदाकार नसीरुद्दीन शाह ने कहा कि उन्होंने जीवन में बेहतरीन नाटक पुणे में देखे. वे श्रीराम लागू राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव के शुभारंभ के अवसर पर परेश रावल के साथ बातचीत कर रहे थे. पुणे में शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ मराठी थिएटर की समृद्ध परंपरा रही है, पर यहाँ भारतीय भाषाओं के नाटकों का प्रदर्शन गाहे-बगाहे ही होता रहा है. इस मायने में भारतीय थिएटर के महान कलाकार श्रीराम लागू की याद में इस महोत्सव की शुरुआत बेहद सुखद है.


महोत्सव के दौरान मल्लिका तनेजा का बहुचर्चित सोलो नाटक- ‘डू यू नो दिस सांग’ का मंचन हुआ. यह म्यूजिकल नाटक बेहद भावपूर्ण और सधा हुआ है. इस नाटक में वे दर्शकों को अपनी सांगीतिक यात्रा का सहयात्री बनाती हैं.

‘सो जा रे गुड़िया रे, सपनों की दुनिया में खो जा रे...’, गीत पूरे नाटक का टेक है. मंच पर गुड्डे-गुड़ियों, माइक्रोफोन और हारमोनियम के साथ, अपने गीतों के माध्यम से तनेजा दर्शकों को एक ऐसी दुनिया मे ले जाती है जहाँ विगत स्मृतियाँ हैं, दुख हैं, सपने हैं और उनके खोने की कहानी है. इस नाटक को उन्होंने एक वर्ष तक बहुत सारे स्त्रियों के साथ बातचीत के बाद बुना है. मंच पर वे उस शख्स को तलाशती है, जो खो गई. उसकी आवाज खो गई. गीत गुम हो गए. पर क्यों? कैसे?

इन सवालों के जवाब खोजने की कोशिश में वह अपने ही अलग-अलग रूपों में ढल जाती है और कभी स्वयं उसी स्त्री का रूप धारण कर लेती है. मल्लिका कहती है: "यह आवाज मंच की आवाज थी, इस दुनिया की आवाज थी. यह मेरे बहुत क़रीब थी, एक ऐसी आवाज जिसे मैंने बेहद प्यार किया और शायद आज भी करती हूँ."

कहानी माँ और बेटी के संवाद के माध्यम से यह मंच पर घटित होता है. यहाँ प्रीत का गीत है, सतरंगी सपने है. बालों में जगुनू सजाने की ख्वाहिश है. रातों को रास्तों पर जाने की ख्वाहिश है. पर यहाँ सदियों से घर की चौखट बड़ी दिखती है, जहाँ से टकराकर स्त्री की आवाज फिर-फिर लौट आती रही है.

गीत-संगीत इस नाटक का सशक्त पक्ष है. कुछ मौलिक रचनाओं के साथ पारंपरिक लोक गीतों का भी इस्तेमाल हुआ है. नाटक के दौरान मल्लिका दर्शकों से ‘वली तू है जमाली, तेरी ही रोशनी में दुनिया होती जमाली/वली तेरे मन में भी कोई न कोई अरमान है क्या/ बोल तू मन की गांठे खोल तू’ पढ़ने कहती है. नाटक शुरु होने से पहले दर्शकों के हाथ में एक पर्चा थमा दिया जाता है और दर्शक अदाकार के साथ-साथ इसे गाते हैं.

यह सहभागिता, सामूहिकता सोशल मीडिया के इस दौर में आभासी नहीं रह जाती है. यहाँ हमें रंगमंच की शक्ति और सौंदर्य का दर्शन एकसाथ होता है. भरे सभागार में मल्लिका अपनी सधी आवाज के सम्मोहन और संवाद अदायगी तथा अनौपचारिक अभिनय से दर्शकों को बांधे रखती है. इसके साथ ही, उनके संग संवाद भी कायम रहता है. जो समकालीन नाटकों में इसे विशिष्ट बनाता है. महोत्सव में असमिया नाटक ‘रघुनाथ’ और हिंदी नाटक ‘होम इन ए सूटकेस’ की भी काफी चर्चा हुई.

Sunday, July 05, 2026

आत्म का शोक गीत ‘पर्सेपोलिस’

मशहूर लेखिका और फिल्मकार मार्जान सतरापी (1969-2026) को उनकी आत्मकथात्मक-चित्रात्मक-संस्मरणात्मक कृति पर्सेपोलिससे दुनिया भर में जो मकबूलियत हासिल हुई वह विरले को नसीब होता है. ईरान में जन्मी और फ्रांस को कर्मभूमि बनाने वाली सतरापी की यह कृति वर्ष 2000 में फ्रांस में प्रकाशित हुई और फिर बाद के वर्षों में अंग्रेजी सहित अनेक भाषाओं में अनुदित हुई.

संपूर्ण कृति के अंग्रेजी अनुवाद के बीसवें संस्करण की भूमिका (2023) में उन्होंने लिखा था कि किताब के प्रकाशन के समय ऐसा लग रहा था कि मानवता ने किसी तरह अपनी गलतियों से सबक ले ली है. इक्कीसवीं सदी में हम आखिरकार इस बात को समझ गए हैं कि पृथ्वी पर सबका समान अधिकार है और हम सब एक ही जाति के हैं—मानव जातिऔर यह किताब पुरानी पड़ जाएगी.’  पर ऐसा हुआ नहीं.

असल में यह किताब जितना स्मृति लेख है उतना ही हमारे समय का दस्तावेज भी. राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आलोचना का जो स्वर इस कृति में दिखाई देता है वह इसे समय-काल और देश की सीमा से परे ले जाता है. मूल स्वर में यह किताब युद्ध विरोधी है. इन अर्थों में जितना यह सतरापी की निजी डायरी प्रतीत होता है उतना ही ईरान की इस्लामी क्रांति की पृष्ठभूमि में उम्र की वय संधि पर खड़ी मार्जी के छीजते बचपन का शोकगीत भी है.

चूंकि मैंने इसे अंग्रेजी अनुवाद में पढ़ा है इसलिए मूल फ्रेंच में इसका आस्वाद कैसा है कह नहीं सकता, पर अंग्रेजी में विट के मार्फत, सफेद-स्याह रेखाचित्रों से सजाई गई यह कृति समकालीन ईरान के राजनीतिक इतिहास को पाठकों के सामने खोल कर रख देती है. इस कृति के समकक्ष हम पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित आर्ट स्पीगलमैन की होलोकॉस्ट के वृत्तांत को रचती चित्रात्मक कृति माउस को रख सकते हैं जिससे सतरापी प्रभावित रही.

पर्सेपोलिस इस्लामी क्रांति के बाद ईरान में व्याप्त अधिनायकवादी सत्ता की निर्मम आलोचना करती है. किताब की शुरुआती में हिजाब पहने एक लड़की है और शुरुआती पंक्ति है: ‘यह मैं हूँ 10 वर्ष की, साल 1980.’  फिर ईरान-इराक युद्ध (1980-88) शुरु होता है. चौदह वर्ष की मार्जी घर-परिवार छोड़ कर आगे की पढ़ाई करने वियना चली जाती है जहाँ पहचान का संकट उस पर हावी है. अठारह वर्ष की मार्जी वापस अपने वतन लौटती है, लेकिन यूरोप जाने के लिए वह अभिशप्त है. इन कहानियों को चार खंडों में लिखा गया.

आज विश्व युद्ध की विभीषिका से जूझ रहा है. घर और स्वतंत्रता की तलाश भूमंडलीकरण और सूचना क्रांति के इस दौर में बढ़ गई है. यही वजह है कि यह कृति आज भी प्रासंगिक बनी हुई है.  पश्चिमी देशों में नजर में ईरान की पहचान एक धार्मिक-कट्टरपंथी राजनीतिक सत्ता तक सीमित है जबकि ईरानी सभ्यता-संस्कृति की विरासत पर्सेपोलिस में है. किताब के दूसरे भाग में वियना प्रवास के दौरान मार्जी एक जगह आहत होकर, गुस्से में कहती है: मैं ईरानी हूँ और मुझे इस बात का गर्व है.

एक स्त्री के लिए स्वतंत्रता के क्या मायने हैं इसे सतरापी ने ईरान और यूरोप के अपने निजी भोगे हुए अनुभवों के सहारे बिना किसी लाग-लपेट के उकेरा है जो इसे मुखर और मार्मिक बनाता है.  

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Friday, June 26, 2026

समांतर की रोशनी में नया सिनेमा

 


दो तरह का सिनेमा है. एक जो पैररल स्ट्रीम है, वह सवाल खड़े करता है. वह फार्मूला नहीं है, वह धारा से अलग होता है. उसे कभी-कभी पता नहीं होता है कि कहां जा रहा है. कोई तयशुदा अंत नहीं होता उसका. फार्मूला सिनेमा में सब कुछ तय होता है. जैसे कि ‘लगान’ में अंत में छक्का लगेगा. हीरो जीत जाएगा...आसान है जिंदगी यहाँ, समांतर सिनेमा में कठिन है.

(सुधीर मिश्रा, लेखक के साथ बातचीत में)

 

पायल कपाड़िया की फिल्मऑल वी इमैजिन एज लाइट’  देखते हुए मैं जिस चीज से प्रभावित हुआ वह थी, फिल्म की भाषा. पिछले साल कान समारोह में इसे प्रतिष्ठितग्रां प्रीपुरस्कार से नवाजा गया. यह फिल्म मलयालम, मराठी और हिंदी  में जिस सहजता से आवाजाही करती है वह इसे अखिल भारतीय बनाता है. भारत जैसे बहुभाषी देश में पचास से ज्यादा भाषाओं में फिल्में बनती है, पर अधिकांश का फार्मूला एक जैसा है. ये फिल्में बॉलीवुड, टॉलीवुड, कॉलीवुड की फैक्ट्री से निकलती हैं.  मनोरंजन और स्टार तत्व इनके मूल में रहा है. आजाद भारत में हालांकि विभिन्न भाषाओं में ऐसी फिल्में भी गाहे-बगाहे बनती रही जो इसका अतिक्रमण कर सिनेमा के माध्यम की संभावनाओं का विस्तार करती है. साहित्य की तरह सिनेमा सामाजिक-सांस्कृतिक आलोचना का माध्यम है, इसे साबित करती है.

आधुनिक भारत में सिनेमा संस्कृति का विशिष्ट पहलू है. वर्ष 1946 में जब कान फिल्म समारोह की शुरुआत हुई, उसी वर्ष भारतीय फिल्मों की कान यात्राशुरु हो गई थी. कान में उस साल चेतन आनंद के निर्देशन में बनी फिल्म नीचा नगरको प्रतिष्ठित पाम डी ओरपुरस्कार दिया गया था. वर्तमान में इस फिल्म को कोई याद नहीं करता. सिनेमा के इतिहासकारों की नजर से भी यह वर्षों ओझल ही रहा है. जबकि वर्ष 1946 में ही रिलीज हुई ख्वाजा अहमद अब्बास की बंगाल के अकाल पर बनी फिल्म धरती के लालऔरनीचा नगरने भारतीय सिनेमा में एक ऐसी नव-यथार्थवादी धारा की शुरुआत की जिसकी धमक देश-दुनिया में सुनी गई. बाद में जाकर विमल राय नेदो बीघा जमीन’ (1953) में और सत्यजीत रे ने पाथेर पांचाली’ (1955) में सामाजिक यथार्थ को संवेदनशीलता के साथ चित्रित किया. उल्लेखनीय है कि इन दोनों फिल्मों ने भी कान समारोह में सुर्खियाँ बटोरी थी.

नीचा नगरके निर्माण के प्रसंग का जिक्र बलराज साहनी ने मेरी फिल्मी आत्मकथामें विस्तार से किया है. उन्होंने चेतन आनंद को उद्धृत करते हुए लिखा है कि चेतन ने उनसे कहा था-इस समय आजाद प्रोड्यूसर अस्तित्व में आया है. इस अस्थिर सी परिस्थिति की आशावादी संभावनाएँ भी हैं. इस समय अच्छे सुशिक्षित और प्रगतिशील लोग अगर हिम्मत करें तो फिल्म-इंडस्ट्री को पहले से अधिक यथार्थवादी मोड़ दे सकते हैं.नीचा नगरऔरधरती के लालइंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) की विचारधारा से प्रभावित थी. धरती के लाल का निर्माण इप्टा ने ही किया था, जिसमें बलराज साहनी की भी भूमिका थी. धरती के लाल की तरह ही नीचा नगर फिल्म में भी संगीत सितार वादक रवि शंकर ने दिया था, जो इप्टा से जुड़े थे.

बकौल बलराज साहनी, चेतन आनंद नीचा नगर के माध्यम से आर्थिक वर्गों की मुठभेड़ की कहानी कहना चाहते थे'.  आजादी के बाद हिंदी सिनेमा उद्योग में सामाजिक यथार्थ की इस धारा पर बड़ी पूंजी हावी रही. साथ ही व्यावसायिक सिनेमा में बलराज साहनी जैसे अदाकारों परस्टारभारी पड़े, चेतन आनंद जैसे निर्देशक हाशिए पर चले गए.नीचा नगरऔरधरती के लाल जैसी फिल्मों की धारासमांतर सिनेमाके रूप में हालांकि आज भी जारी है. उल्लेखनीय है कि कान फिल्म समारोह में भले हीनीचा नगरपुरस्कृत हुई, भारत में व्यावसायिक रूप से यह रिलीज नहीं हो पाई थी. फिल्म को कोई वितरक नहीं मिला था.

पिछली सदी के साठ के दशक के बाद देश की बदलती सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों, युवाओं में मोहभंग, आक्रोश और विश्व सिनेमा आंदोलन के असर से हिंद सिनेमा के युवा स्वरों ने ‘पापुलर’ से एक अलग रास्ता अख्तियार किया, जिसे आज हम ‘समांतर’ सिनेमा के नाम से जानते हैं. फिल्मकार और समीक्षक चिदानंद दास गुप्ता इस धारा की फिल्मों को  ‘पापुलर के बरक्सअनपापुलर फिल्मकहते थे.

इनमें से ज्यादातर फिल्मकार, सिनेमैटोग्राफर फिल्म संस्थान, पुणे से प्रशिक्षित थे, जिन्हें सरकारी संस्था फिल्म वित्त निगम का सहयोग मिला. यहीं से फ्रेंच फिल्मकारों की तरह ही ‘ओतर’ यानी लेखक-निर्देशक की अवधारणा हिंदी और अन्य क्षेत्रीय सिनेमा में दिखाई दी. इनकी फिल्में कुछ नया रचने से प्रेरित रही. वर्ष 1969 में मणि कौल की फिल्मउसकी रोटी’, बासु चटर्जी कीसारा आकाशऔर मृणाल सेन कीभुवन सोमको समांतर सिनेमा की धारा शुरू करने का श्रेय दिया जाता है....


(ISSN: 2231-6329, July-Sep 2025, Page 64-71)