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Thursday, March 04, 2010

यात्रा में निर्मल वर्मा…






















धुंधलकी शाम में
बारिश की हल्की फुहाड़ों के बीच
बर्फ़ीली पगडंडी से गुज़रते हुए
उस उदास गिरजे के पास
निर्मल वर्मा साथ हो लेते हैं मेरे
मुस्कुराते हुए
हौले से कहते हैं
'यह चमत्कार नहीं, सच है!'

सच जैसे
वह दिसंबर की शाम थी
दिल्ली की सर्द हवाओं में
उसकी चंपई नाक की नोंक पर
चमकती पसीने की बूँद
हरी घास पर टिके ओस की तरह...

फ़रवरी-मार्च की इन सफ़ेद रातों में
अक्सर वे मेरी नींद में आ जाते हैं
चुपके से
मेरे कानों में आवाज़ आती है
'बुरूस के लाल फूल लाए हो झूठे!'
और उसकी खिलखिलाती हुई हँसी
झिलमिलाती आँखों की कोर
सच जैसे
फ़रीदा ख़ानम की 'न जाने की ज़िद...'

पिक्चर पोस्टकार्ड उलटते-पुलटते
ज्योंही मेरी नज़र एक सुर्ख़ गुलाब पर टिक जाती है
इशारों से वे टोकते हैं
ये गर्मियों के दिन नहीं…
और मेरी ऑखें उन शब्दों के अर्थ ढूँढ़ने लगती है
जो समय के चहबच्चे में कहीं गुम गए
जैसे चेकोस्लोवाकिया...

Wednesday, March 03, 2010

राम भरोसे अपने राम के

रात के साढ़े आठ बजे हैं...अभी नहाया और अब खाना खाऊँगा...बासमती चावल (मैंने बड़े चाव से उसमें इलायची मिलाया है) का भात बनाया है..आलू उबाला और फूल गोभी के साथ बारीक टमाटर के टुकड़ों सहित रसदार बनाया है.
असल में सबेरे साढ़े चार बजे उठकर, जल्दी-जल्दी तैयार होकर ट्रेन पकड़ने के लिए घर से निकल पड़ा था डूसलडॉफ़ के लिए. दोपहर जब लौटा इतनी तेज़ नींद आ रही थी कि सो गया...उठा जब शाम को एक केला और सेब खाया..कॉफ़ी पी. सोचा रात का खाना ठीक से खाना है..
यात्रा में निर्मल वर्मा की याद आती रही थी..
चावल तैयार हो गया अब रसदार सब्जी कम आँच पर गाढ़ा बना रहा हूँ...
लंबे अरसे के बाद कविता लिखने का मन कर रहा है...हां कविता लिख रहा हूँ कल ब्लॉग पर डालूँगा..'यात्रा में निर्मल वर्मा...'
कविता का मीटर ठीक है. बस, थोड़ी बहुत कॉट-छाँट करनी है, लेकिन पहले खाना खा लूँ..कब से खाना तैयार है, नहीं तो स्टोव पर रखे हुए ठंडा हो जाएगा.
आज सुबह काफ़ी ठंड थी. रेलवे स्टेशन पर ट्रेन का इंतज़ार करते हुए मैं ठिठुर रहा था.क़रीब हफ़्ते भर बाद आज फिर यहाँ बर्फ़ गिरी है.
ये गंध किस चीज़ की आ रही है..गोभी की है..जलने की बदबू...
मैंने अपने कमरे और ड्राइंग रूम का दरवाज़ा खोल दिया है ताकि ताज़ी हवा अंदर आ सके...
गोभी चल के राख हो चुकी है...और मैं बेतहाशा हँस रहा हूँ....शुभा मुदगल गा रही है...सूतल निंदिया जगाए...भोरे-भोरे...