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Sunday, February 02, 2025

विभाजन का चितेरा: ऋत्विक घटक

 


महान फिल्मकार ऋत्विक घटक (1925-76) का यह जन्मशती वर्ष है, पर जिस रूप में भारतीय सिनेमा में उनके योगदान की चर्चा होनी चाहिए वह नहीं दिखती. अजांत्रिकमेघे ढाका ताराकोमल गांधारसुवर्ण रेखातिताश एकटी नदीर नाम जैसी उनकी फिल्में भारतीय सिनेमा की थाती है. 

घटक ढाका में जन्मे थे और विभाजन की त्रासदी को झेला था. बंगाल विभाजन ने उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को काफी प्रभावित किया था. आत्मानुभूति पर उनका काफी जोर था.


कुमार शहानी ने एक जगह लिखा है, ऋत्विक दा का काम हमारी पहचान की हिंसक अभिव्यक्ति है. यह मेघे ढाका तारा में मरणासन्न लड़की का रुदन  है जो पहाड़ियों से गूंजता है, हमारे जीने का अधिकार है. वर्षों पहले मणि कौल ने मुझे कहा था कि ‘ऋत्विक दा की फिल्मों से आज भी में बहुत कुछ सीखता हूँ. उन्होंने मुझे नव-यथार्थवादी धारा से बाहर निकाला.’ उन्होंने कहा था ‘उनकी फिल्मों की आलोचना मेलोड्रामा कह कर की जाती है. वे मेलोड्रामा का इस्तेमाल कर उससे आगे जा रहे थे. उस वक्त उन्हें लोग समझ नहीं पाए.’

 

घटक ने भारतीय फिल्मकारों की एक पूरी पीढ़ी को प्रभावित कियाजब वे वर्ष 1963-65 में भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (फटीआइआइ)पुणे से उप-प्राचार्य के रूप में जुड़े. पिछली सदी के 70-80 के दशक में व्यावसायिक फिल्मों से अलग समांतर सिनेमा की धारा को पुष्ट करने वाले फिल्मकार मणि कौलकुमार शहानीसईद मिर्जाजैसे फिल्मकार खुद को ‘घटक की संतान’ कहलाने में फख्र महसूस करते रहे हैं. मणि कौल और कुमार शहानी दोनों उनके एपिक फॉर्म से काफी प्रभावित थे.

 

कुमार शहानी ने मुझे कहा था कि ‘जब आप मेरी फिल्म चार अध्याय देखेंगेतो ऋत्विक दा आपको भरपूर नजर आएंगे’. शहानी ने बताया था कि एपिक फॉर्म से घटक ने ही फिल्म संस्थान में उनका परिचय करवाया था. इसी तरह पुणे फिल्म संस्थान के छात्र रहे फिल्मकार अनूप सिंह की फिल्मों में भी एपिक फॉर्म दिखाई देता है. सिंह की बेहतरीन फिल्म ‘एकटी नदीर नाम’ (2002) ऋत्विक घटक को ही समर्पित है.

 

असमिया फिल्मों के चर्चित निर्देशक जानू बरुआ बताते हैं, “मैं जिंदगी में पहली बार ऐसे आदमी (ऋत्विक घटक) से मिला जिसके लिए खाना-पीनासोनाउठना-बैठना सब कुछ सिनेमा था.” ऋत्विक घटक के बिना आज भी फिल्म संस्थान के बारे में कोई भी बात अधूरी रहती है.


उनकी फिल्में बंगाल विभाजनविस्थापन और शरणार्थी की समस्या का दस्तावेज है. ‘सुवर्णरेखा’ की कथा विभाजन की त्रासदी से शुरू होती है. फिल्म के आरंभ में ही एक पात्र कहता है ‘यहाँ कौन नही है रिफ्यूजी?’ ऋत्विक घटक निर्वासन और विस्थापन की समस्या को एक नया आयाम देते हैं. आज भूमंडलीय ग्राम में जब समय और स्थान के फासले कम से कमतर होते चले जा रहे हैं हमारी अस्मिता की तलाश बढ़ती ही जा रही है. ऋत्विक की फिल्में हमारे समय और समाज के ज्यादा करीब है. घटक अपनी कला यात्रा की शुरुआत में ‘इप्टा’ (इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन) से जुड़े थे. चर्चित निर्देशक अदूर गोपालकृष्णन घटक के इप्टा की पृष्ठभूमि और संगीत के कलात्मक इस्तेमाल की ओर बातचीत में इशारा करते हैं.

Monday, January 14, 2019

सत्ता से सवाल करती फिल्में

प्रभात खबर

फिल्मकार मृणाल सेन (1923-2018) के अवसान के साथ ही करीब पचास साल की उनकी फिल्मी यात्रा थम गयी. मृणाल सेन बांग्ला सिनेमा के अद्वितीय चितेरे ऋत्विक घटक और सत्यजीत रे के समकालीन थे. 

ऋत्विक घटक की नागरिक’ (1952) और सत्यजीत रे की पाथेर पंचाली’ (1955) फिल्म के आस-पास मृणाल सेन अपनी फिल्म रात भोर’ (1956) लेकर आते हैं. पर जहां सत्यजीत रे को दुनियाभर में पहली फिल्म के साथ ही एक पहचान मिल गयी, वहीं मृणाल सेन को लंबा इंतजार करना पड़ा था.

मृणाल सेन की तरह ही भारतीय सिनेमा में पचास वर्षों से ज्यादा से सक्रिय मलयालम फिल्मों के निर्देशक और दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित अदूर गोपालकृष्णन कहते हैं कि मृणाल सेन को सफलता काफी संघर्ष के बाद मिली. वर्ष 1969 में आयी हिंदी फिल्म भुवन सोमने उन्हें भारतीय सिनेमा में स्थापित कर दिया.

मृणाल सेन के अवसान के बाद एक बार फिर से उनकी फिल्मों और सिनेमाई संसार में उनकी गुरुता की तुलना सत्यजीत रे से की जाने लगी है. गोपालकृष्णन कहते हैं कि घटक और रे दोनों से मृणाल सेन स्टाइल और अप्रोच में अलग थे. वे अपनी फिल्मों में प्रयोग करने से कभी नहीं डरे. वे अपनी विचारधारा के प्रति आबद्ध रहे.

खुद मृणाल सेन कहा करते थे: मैं सिनेमा में काम करता हूं, सिर से पांव तक सिनेमा में डूबा हूं. मैं सिनेमा में निबद्ध हूं, पूरी तरह आसक्त.नक्सलबाड़ी आंदोलन की पृष्ठभूमि में कोलकता को केंद्र में रखकर सेन ने इंटरव्यू’ (1971), ‘कलकत्ता 1971’ (1972) और पदातिक’ (1973) नाम से फिल्म त्रयी बनायी, जो उस दौर की राजनीति, युवाओं के सपने और आम लोगों की हताशा को हमारे सामने रखती हैं. 

हाल में बॉलीवुड में बनी राजनीतिक फिल्मों के साथ इन फिल्मों को देखें, तो उत्कृष्ट कला और प्रोपगैंडा के फर्क को हम आसानी से समझ सकते हैं. सेन कभी मार्क्सवादी पार्टी के सदस्य नहीं रहे. हां, इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) और मार्क्सवादी आंदोलनों के साथ उनका जुड़ाव था.

मृणाल सेन की फिल्में गरीबी, सामाजिक न्याय, सत्ता के दमन और भूख के सवालों को कलात्मक रूप से हमारे सामने रखती हैं. उन्होंने प्रेमचंद की चर्चित कहानी कफन को आधार बना कर तेलगू में ओका ऊरी कथा’ (1977) बनायी. यह कहानी जितना मर्म को बेधती है, फिल्म हमें उतना ही झकझोरती है. 

फिल्म का पात्र वेंकैया कहता है कि यदि हम काम नहीं करें, तो भूखे रहेंगे, वैसे ही जैसे बेहद कम पगार पर काम करनेवाला मजदूर भूखा रहता है. तो फिर काम क्यों करना?’ इसमें उन्होंने बंटे हुए समाज में श्रम के सवाल को केंद्र में रखा है, भूख और मानवीयता के लोप को निर्ममता के साथ दर्शाया है. 

मृणाल सेन की फिल्मों पर काम करनेवाले जॉन डब्ल्यू वुड ने लिखा है: ओका ऊरी कथा एक एंटी-होरी फिल्म है. इसमें उस दुनिया का चित्रण है, जहां निर्दोष व्यक्ति दुख सहता है और अनैतिक फलता है और जहां आवाज उठाने, विरोध करने का कोई अर्थ नहीं.क्षेत्रीयता की भूमि पर विकसित उनकी फिल्में अखिल भारतीय हैं.

आपातकाल के बाद सेन की फिल्मों का स्वर बदलता है. फिल्म एक दिन प्रतिदिनऔर एक दिन अचानकमें स्त्रियों की आजादी का सवाल है. वे मध्यवर्ग की चिंताओं, पाखंडों को फिल्मों के केंद्र में रखते हैं.

वे चाहते थे कि उनकी फिल्में देखकर दर्शक उद्वेलित हों. पॉपुलर सिनेमा की तरह उनकी फिल्में हमारा मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि संवेदनाओं को संवृद्ध करती हैं, ‘अंत:करण के आयतनका विस्तार करती हैं. 

(प्रभात खबर, 13 जनवरी 2019 को प्रकाशित)

Tuesday, May 31, 2011

विश्व कवि आस-पास

पुराने घर में एक टीन का बक्सा था जिसमें कुछ किताबें भरी थी. उन किताबों को टटोलना, बक्से से बाहर-भीतर करना बचपन में हम भाई-बहनों के खेल का हिस्सा था. उनमें एक पतली सी किताब गीतांजलि भी थी. हिंद पॉकेट बुक्स की हिंदी में. बक्से में विद्यापति, प्रेमचंद, नागार्जुन, हरिमोहन झा और शरतचंद्र की किताबें भी रखी थी.

मिथिला के एक अनाम गाँव में यह हमें बचपन में ही बता दिया गया था कि रवींद्रनाथ ठाकुर हिंदी के नहीं, बांग्ला के लेखक-कवि हैं. जबकि हमें यह बात बहुत बाद में समझ आई कि शरतचंद्र हिंदी के नहीं, बांग्ला के लेखक हैं!

बहरहाल, कुछ वर्ष पहले एक बातचीत के दौरान समाजशास्त्री आशीष नंदी ने यह जानने के बाद कि मैं दरभंगा-मधुबनी जिले से ताल्लुक रखता हूँ, कहा कि कभी बंगाल की संस्कृति दरभंगा के रास्ते ही फली-फूली. उन्होंने बताया था कि दरभंगा असल में 'द्वार बंग' का ही परिष्कृत रूप है और मध्यकाल में मध्य एशिया से आने वाले व्यापारी दरभंगा के रास्ते ही बंगाल जाते थे.

एक जमाने मे इस बात पर खूब बहस हुई थी कि विद्यापति मैथिली के नहीं बांग्ला के रचनाकार हैं. खुद रवींद्रनाथ की आरंभिक कविताओं में विद्यापति के कोमलकांत पदावली की छाप है. उनकी कविताओं में मनुष्य प्रेम और भक्ति की अनुगूँज जो एक साथ है उसका उत्प्रेरक कहीं ना कहीं विद्यापति की कविताएँ हैं. लेकिन इस बात की चर्चा शायद ही कहीं मिलती है कि मैथिली साहित्य या समाज पर रवींद्रनाथ का क्या प्रभाव रहा है.

नागार्जुन जैसे रचनाकार अपवाद हैं जिन्होंने रविबाबूजैसी कविता ही नहीं लिखी बल्कि बांग्ला में भी कविताएँ रची.

पिछले कुछ दिनों से मेरे मन में यह बात बार बार उठ रही है कि रवींद्रनाथ ठाकुर मैथिली समाज के लिए क्यों बाहरी रहे. जबकि मैथिली और बांग्ला समाज के भद्रलोक और मध्य वर्ग के खान-पान, पहनावे, चित्रकारी, भाषा में काफी समानता है. बात मछली-भात खाने की हो, भाषा की मधुरता की, धोती-कुर्ता पहनावे की हो या मिथिला पेंटिंग या पट चित्रकारी की!

कुछ वर्ष पहले हिंदी के एक वरिष्ठ आलोचक ने भारतीय उपन्यासों को लेकर हो रही चर्चा के दौरान टैगोर रचित ''गोरा' को 20वीं सदी का सबसे बेहतरीन उपन्यास कहा तो मुझे आश्चर्य हुआ. संभव है कि इसमें अतिशोयक्ति हो लेकिन रवींद्रनाथ के साहित्य को लेकर हमारा हिंदी समाज एक तरह से उदासीन रहा है. बल्कि यों कहें कि उन्हें लेकर लेकर हिंदी के साहित्यक हलकों में एक तरह का दुचित्तापन रहा है. प्रश्न है कि क्या रवींद्रनाथ ठाकुर के साहित्य के बारे में विचार-विमर्श करने के लिए बांग्ला भाषा-भाषी होना जरूरी है?

रवींद्रनाथ विश्व कवि है. उन्हें इस बात का गौरव प्राप्त है कि भारत और बांग्लादेश का राष्ट्रगान उनके नाम है. उनके जन्म के डेढ़ सौ वर्ष पूरे होने पर दोनों देशों में रवींद्रनाथ के सम्मान में कई आयोजन एक साथ किए जा रहे हैं.

दक्षिण एशिया में राजनीतिक कटुता और द्वेष के माहौल के बीच रवींद्रनाथ के साहित्य, संगीत और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान को याद करने के लिए दो पड़ोसी देशों का एक मंच पर साथ आना सुखद और स्वागत योग्य है.

पर सवाल है कि बांग्ला समाज के बाहर रवींद्रनाथ के प्रति बेरुखी क्यो दिखाई देती है? क्यों रवींद्रनाथ अभी भी हिंदी प्रदेश के पाठकों के लिए एक बाहरी रचनाकार बने हुए हैं?

इस वर्ष जहाँ रवींद्रनाथ की डेढ़ सौंवीं जयंती मनाई जा रही है, वहीं हिंदी-मैथिली के कवि नागार्जुन की भी भी सौंवीं वर्षगांठ इसी साल चल रही है. साथ ही अज्ञेय, शमशेर, केदारनाथ अग्रवाल की भी जन्मशती हिंदी प्रदेश में मनाई जा रही है. इसका विश्लेषण करने की जरुरत है कि हिंदी के कवियों पर क्या रवींद्रनाथ का कोई प्रभाव रहा है.

दुर्भाग्यवश भारत के विश्वविद्यालयों में भाषा और साहित्य के केंद्रों में तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन और शोध पर कोई जोर नहीं है.

अगर विश्वविद्यालयों में तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन, अध्यापन, शोध को बढ़ावा दिया जाए तो विश्व कवि के साहित्य के दायरे का काफी विस्तार हो सकेगा. हम उनके कृतित्व और व्यक्तित्व के पहलूओं पर खुल कर विचार कर सकेंगे.

हाल ही में देश में दक्षिण एशिया विश्वविद्यालय समेत कई नए केंद्रीय विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई है. तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन-अध्यापन की दिशा में ये विश्वविद्यालय अगर कदम बढाएँ तो सही मायनों में रवींद्रनाथ के प्रति यह सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

(जनसत्ता, 'दुनिया मेरे आगे' कॉलम में 31 मई 2011 को प्रकाशित)