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Sunday, August 25, 2024

अवाम से गुफ्तगू करते गुलजार


गुलजार ने एक बार कहा था कि ‘साहित्य वाले मुझे सिनेमा का आदमी समझते हैं और सिनेमा वाले साहित्य का.’ हो सकता है कि इस कथन में सच्चाई हो पर, हम जैसे साहित्य और सिनेमा प्रेमियों के लिए दोनों में कोई अंतर्विरोध नहीं है.
हाल ही में 90 साल पूरे करने वाले गुलजार 60 साल के अपने रचनात्मक जीवन में विभिन्न रूपों मसलन, कवि-लेखक, गीतकार, फिल्म निर्देशक, बच्चों के रचनाकार के रूप में अपनी सतत मौजूदगी के कारण नाम से आगे बढ़ कर एक विशेषण बन चुके हैं. गुलजार के ये ‘अपरूप रूप’ विभिन्न जबानों में छंद और अलंकार बन कर हमारे सामने आते रहे, जिनमें हम अपने जीवन का अर्थ ढूंढ़ते रहे.
जीवन भी तो एक वाक्य ही है-- कभी अधूरा तो कभी पूरा. उन्हीं के शब्दों में-‘दो नैना एक कहानी, थोड़ा सा बादल, थोड़ा सा पानी’. उनके नज्मों की खूबसूरती उनके अल्फाज में हैं. कभी हमें वे हंसाते हैं, तो कभी रुलाते हैं और कभी बस एक फरियाद बन कर हमसे गुफ्तगू करते हैं.
प्रसंगवश, यह उसी मासूम (1983) फिल्म का गाना है, जिसके किरदारों के लिए गुलजार ने ‘लकड़ी की काठी, काठी का घोड़ा’ अमर गीत लिखा है. उत्तर भारत के घरों में पिछले चालीस सालों में यह गीत बड़े-बूढ़ों की तरह मौजूद रहता आया है.
आजाद भारत में सामाजिक-सांस्कृतिक बदलावों के बीच गुलजार की मौजूदगी एक बुर्जुग की तरह हमारे लिए आश्विस्तिपरक है. यदि हम गुलजार के गीतों को ध्यान से सुनें तो उनमें सामाजिक-राजनीतिक बदलावों की अनुगूंज सुनाई देगी. उनकी फिल्मों आँधी, माचिस, हू तू तू आदि में यह और भी मुखर होकर सामने आया है. उनकी राजनीतिक चेतना नेहरू युग के आदर्शों से बनी है. यहाँ सांप्रदायिकता का विरोध है और सामासिकता का आग्रह.
बहरहाल, हम यहाँ उनके गीतकार रूप की ही बात करते हैं क्योंकि विभिन्न पीढ़ी के युवाओं के लिए उनके गीतों का रोमांस सबसे ज्यादा है. प्रेम उनके गीतों का स्थायी भाव है.
हम जानते हैं कि गुलजार ने ‘बंदिनी (1963)’ फिल्म में एसडी बर्मन के संगीत निर्देशन में ‘मोरा गोरा अंग लइ ले/मोहे शाम रंग दइ दे/छुप जाऊँगी रात ही में/ मोहे पी का संग दइ दे’ गीत रच कर अपनी सिनेमाई यात्रा शुरू की, लेकिन पिछली सदी के सत्तर-अस्सी के दशक में आरडी बर्मन के संग मिलकर उन्होंने जो रचा है वह देश-काल की सीमा के पार जा कर आज भी कानों में मिसरी घोलता रहता है और आंखों में ख्वाब के दिए जलाता रहता है.
खुसरो, गालिब और मीर की बातें करते-करते न जाने चुपके से कब वे कह देते हैं कि ‘तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नहीं, तेरे बिना जिंदगी भी लेकिन जिंदगी तो नहीं’. इस गाने में जो रोमांस है वह गुलजार आगे बयां करते हैं यह कह कर कि ‘रात को रोक लो, रात की बात है और जिंदगी बाकी तो नहीं.’ याद कीजिए कि कवि घनानंद ने कविता के बारे में कहा था-- ‘लोग है लागि कवित्त बनावत, मोहि तो मेरे कवित्त बनावत’. बाकी लोगों के लिए कविता बनाने की चीज है, पर घनानंद की तरह ही गुलजार के लिए कविता (गीत) ही जीवन है.
इस गीतमय जीवन में बच्चों की निश्छलता है. तभी उम्र के इस पड़ाव पर भी बच्चों के लिए किताब में वे लिख सकते हैं: ‘थोड़े से तो पुराने हैं, लगते क़दीम हैं/ कहते हैं पर अण्टा ग़फ़ील अच्छे हकीम हैं.’ बच्चों के लिए ही नहीं, जब वे युवाओं के लिए भी लिखते हैं तब उसी सहजता से जिसके लिए कबीर ने कहा है- ‘सहज सहज सब कोई कहै, सहज न चीन्हैं कोय.’ ‘मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है/ सावन के कुछ भीगे-भीगे दिन रखे हैं/ और मेरे इक खत में लिपटी रात पड़ी है/ वो रात बुझा दो, मेरा वो सामान लौटा दो’, वे ही लिख सकते हैं. मनोभावों की सहज अभिव्यक्ति है यहाँ.
इस गाने को जब उन्होंने अपने मित्र आरडी बर्मन को संगीतबद्ध करने कहा तब उन्होंने झुंझला कर कहा था कि क्या वे अखबार की सुर्खियों पर अब उनको गीत कंपोज करने कहेंगे! यह असल में दो प्रगाढ़ मित्रों की आपसी नोंक-झोंक थी, जो वर्षों से चली आ रही थी. इसे आप गीत कहें, कविता या सुर्खियाँ पर इसे गाने के लिए आशा भोंसले को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला.
गीत-संगीत और उनका परदे पर फिल्मांकन हिंदी सिनेमा को विशिष्ट बनाता है. जाहिर है गीत सिनेमा की कहानी को आगे बढ़ाने में सहायक होते हैं और किरदारों की पहचान बन कर आते हैं. हिंदी सिनेमा का सौभाग्य है कि उसे शैलेंद्र के बाद गुलजार जैसे बहुमुखी प्रतिभा के धनी सर्जक ने अपने शब्दों से ‘गुलजार’ किया है. उनके लिखे गीतों का अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व है.
बात आजाद भारत में जवान होने वाली पीढ़ी की ही नही है, बल्कि ‘मिलेनियल’ की भी है जो कभी ‘छैंया, छैंया’ गाने पर तो कभी ‘कजरा रे कजरा रे’ गाने पर झूमती मिलती है. और हां, जब बात ‘जय हो’ की हो तो फिर ‘कहना ही क्या!’ कभी-कभी वे ‘पर्सनल से सवाल भी करती है’, लेकिन सवालों के जवाब भी हमें गुलजार ही देते हैं यह कहते हुए कि ‘पीली धूप पहन के तुम देखो बाग में मत जाना’.
गुलजार के गीत विभिन्न पीढ़ियों के बीच संवाद करती है. संवादधर्मिता गुलजार की सबसे बड़ी विशेषता है.

Wednesday, September 06, 2023

रेडियो, फिल्म संगीत और इतिहास का एक पन्ना


हिंदी सिनेमा के चर्चित गीतकार शैलेंद्र की जन्मशती के अवसर पर मुख्यधारा और सोशल मीडिया में उनके योगदान की खूब चर्चा हो रही है. इसी सिलसिले में पिछले दिनों आकाशवाणी दिल्ली के रंग भवन सभागार में एक आयोजन किया गया था, जहाँ शैलेंद्र को याद करने जावेद अख्तर, इरशाद कामिल जैसे गीतकार मौजूद थे.

30 अगस्त 1923 को रावलपिंडी में जन्मे शैलेंद्र की मुख्तसर सी जिंदगी रही. महज 43 साल. लेकिन इस ‘छोटी सी जिंदगानी’ में उन्होंने करीब आठ सौ गीत लिखे, जो आज भी लोगों की जुबान पर चढ़े हैं.

 ‘मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंग्लिशतानी, सर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी या ‘दिल का हाल सुने दिलवाला, सीधी सी बात न मिर्च मसाला’ (श्री 420, 1955) वही लिख सकता है जो जीवन और जन से गहरे जुड़ा रहा हो. लोक मन में रचे-बसे ये गाने आजादी के बाद देश की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों को बखूबी व्यक्त करते हैं. बोलचाल की भाषा में लिखे और गहरे मानी से सजे न जाने कितने ही गाने मुहावरे की शक्ल ले चुके हैं.

बहरहाल, आजादी के बाद देश-दुनिया में हिंदी फिल्मी गीतों के प्रसार में रेडियो की प्रमुख भूमिका रही. उस दौर में अखबार का प्रसार बेहद कम था. यहाँ तक कि सिनेमाघरों की पहुँच भी देश के कोने-कोने तक नहीं थी. आज टीवी और इंटरनेट के दौर में भले दृश्य माध्यम जनसंचार के केंद्र में हो, लेकिन पिछली सदी के 80 के दशक तक रेडियो ही देश-दुनिया से जुड़ने और मनोरंजन का प्रमुख साधन था. सच तो यह है कि पचास-साठ के दशक में हिंदी सिनेमा में गीत-संगीत ने एक अलग विधा का रूप ग्रहण किया. फिल्म संगीत के इस ‘स्वर्णकाल’ में आकाशवाणी (ऑल इंडिया रेडियो) के एक अध्याय पर नज़र डालना जरूरी है, जो आम लोगों की नजर से ओझल ही रहता आया है.

यूँ तो वर्ष 1936 में ही ऑल इंडिया रेडियो अस्तित्व में आ गया था. पर उस दौर में (विश्व युद्ध के दौरान) अंग्रेज शासक इसका इस्तेमाल प्रोपगेंडा के रूप में करते थे. 40 के दशक में महज दो लाख लोगों के पास ही रेडियो रिसीवर थे. हाल ही में प्रकाशित इसाबेल अलोंसो की किताब-‘रेडियो फॉर द मिलियंस’ में रेडियो समाचार और द्वितीय विश्व युद्ध के प्रसंग की विस्तार से चर्चा है. जब देश आजाद हुआ तब मात्र छह रेडियो स्टेशन थे जो वर्ष 1954 में 22 हो गए. जाहिर है, रेडियो सुनने की संस्कृति का विकास 40 और 50 के दशक में होने लगा था.

बहरहाल, आजाद भारत में सरकार की एक नीति ने रेडियो पर फिल्मी गानों के प्रसार पर ग्रहण लगा दिया था. यह ग्रहण 1952 से 1957 तक लगा रहा. अक्टूबर 1952 में जब बी वी केसकर देश के नए सूचना और प्रसारण मंत्री बने तब उन्होंने ऐलान किया कि ‘ये गाने दिनों दिनों अश्लील होते जा रहे हैं और पाश्चात्य देशों की धुनों का कॉकटेल हैं.’  उस समय हर दिन कुछ घंटे विभिन्न रेडियो स्टेशन से फिल्मी गानों का प्रसार होता था. केसकर ने निर्देश जारी किया कि रेडियो स्टेशन से हिंदी गानों का प्रसार नहीं होगा. हिंदी फिल्मी गानों की लोकप्रियता को देखते हुए सिनेमा उद्योग के लिए यह आघात से कम नहीं था. असल में, रेडियो के माध्यम से केसकर शास्त्रीय और सुगम संगीत का प्रसार करना चाहते थे. वे कहते थे कि फिल्म संगीत भारतीय संगीत परंपरा से दूर चला गया है. वे खुद शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित थे.

वे एक तरफ मानते थे कि संगीत लोगों की भावनाओं को अभिव्यक्त करता है, वहीं दूसरी तरफ सिनेमा गीत-संगीत जैसे जनमाध्यम से लोगों को दूर कर रहे थे. संचार के साधनों के समुचित विकास के बाद भी आज देश में शास्त्रीय संगीत का प्रसार एक खास तबके तक ही सीमित रहा है, जबकि फिल्म संगीत की पहुँच एक विशाल वर्ग तक हो चुकी है.

इस रोक के बाद फिल्मी गीत-संगीत की तलाश में श्रोताओं ने अन्य रेडियो स्टेशन की खोज शुरू की. यही दौर था जब रेडियो सिलोन (श्रीलंका ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन) क्षितिज पर उभरा, जहाँ से मुख्यतया फिल्मों गानों का ही प्रसार होता था. सरहद के पार, सिलोन भारत में फिल्मी गानों के लिए परिचित नाम हो गया. उद्घोषक अमीन सयानी और 'बिनाका गीतमाला' को लोग आज भी याद करते हैं. आकाशवाणी के श्रोताओं की संख्या घटती चली गई, मजबूरन सरकार ने अपने फरमान वापस लिए. साथ ही उसी साल संगीत को समर्पित ‘विविध भारती (बंबई)’ की स्थापना भी की गई.

एक तरह से फिल्म गीत-संगीत पर रोक केसरकर और भारत सरकार का शुद्धतावादी रवैया था जो ‘राष्ट्र’ और ‘नागरिक निर्माण को लेकर तत्पर दिखाई देता था. ऐसा नहीं कि इस फरमान का विरोध नहीं हुआ, पर जैसा कि अलोंसो ने लिखा है देश के प्रधानमंत्री नेहरू ने भी इस मुद्दे पर ध्यान नहीं दिया और केसकर की ही चली थी. 

अंत मे, कहते हैं कि नेहरू शैलेंद्र के लिखे गीत, ‘हम उस देश के वासी हैं जिस देश मे गंगा बहती है' (1960) को खूब पसंद करते थे. नेहरू के साथ शैलेंद्र की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर भी खूब शेयर की जा रही है.


(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)

 

Monday, October 25, 2021

कल और आज के शायर साहिर

 

वर्षों पहले गुलजार ने कहा था कि ‘सिनेमा वाले मुझे साहित्य का आदमी समझते हैं और साहित्य वाले सिनेमा का’. साहिर लुधियानवी (1921-1980) के साथ ऐसा नहीं है. वे सिनेमा और साहित्य दोनों दुनिया में एक साथ समादृत रहे हैं. वे जितने अच्छे शायर थे उतने ही चर्चित गीतकार. पिछले दिनों अर्जुमंद आरा और रविकांत के संपादन में जनवादी लेखक संघ की पत्रिका ‘नया पथ’ ने  साहिर लुधियानवी जन्मशती विशेषांक प्रकाशित किया है जो यह इस बात की ताकीद करता है. खुद साहिर इस बात से वाकिफ थे कि साहित्य क्षेत्र में फिल्मी साहित्य को लेकर अच्छी राय नहीं है. इसलिए उन्होंने फिल्मी गीतों के संकलन ‘गाता जाये बंजारा’ की भूमिका में लिखा है: “मेरा सदैव प्रयास रहा है कि यथासंभव फिल्मी गीतों को सृजनात्मक काव्य के निकट ला सकूँ और इस प्रकार नये सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण को जन-साधरण तक पहुँचा सकूं.”  साहिर मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित थे और प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े थे. उनके कृतित्व और व्यक्तित्व पर नजर डालने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि वे मजलूमों, मखलूकों के साथ थे अपने काव्य और जीवन में.

खुद वे अपने ऊपर फैज, मजाज, इकबाल आदि की शायरी के असर की बात स्वीकार करते थे. इस विशेषांक में अतहर फारुकी ने नोट किया है कि ‘उर्दू शायरी के अवामी प्रसार में, यानी अवाम के साहित्यक आस्वादन को बेहतरीन शायरी से परिचित कराने में साहिर लुधियानवी फैज से भी आगे निकल जाते हैं.’ हो सकता है कि इसमें अतिशयोक्ति लगे पर यह स्वीकार करने में किसी को कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि उनकी रोमांटिक शायरी फिल्मी गीतों का अंग बन कर, रेडियो, कैसेट और अब यू-टयूब जैसे माध्यमों से होकर देश और दुनिया के बड़े हिस्से तक पहुँची.

आजाद हिंदुस्तान के दस साल बाद प्यासा (1957) फिल्म के लिए लिखा उनका गाना समाज में व्याप्त विघटन और मूल्यहीनता को दर्शाता है, जो आज भी मौजू है.

ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया

ये इंसान के दुश्मन समाजों की दुनिया

ये दौलत के भूखे रिवाजों की दुनिया

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है

इसी फिल्म वे पूछते हैं, ‘जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहां हैं’. साहिर ने 1948 में पहला फिल्मी गीत (बदल रही है जिंदगी, फिल्म-आजादी की राह पर) लिखा और सौ से ज्यादा फिल्मों में करीब 800 गाने लिखे. उनके इस सफर पर एक नजर डालने पर स्पष्ट है कि सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियाँ उनके गानों में बखूबी व्यक्त हुई. 

हिंदी सिनेमा में गीत-संगीत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. गानों के माध्यम से कहानियाँ आगे बढ़ती है जिसमें किरदारों के मनोभाव व्यक्त होते हैं पर साहिर, शैलैंद्र जैसे शायर रूपकों, बिंबों के माध्यम से आजाद भारत के आस-पड़ोस की घटनाओं, देश-विदेश की हलचलों को भी बयान करते हैं. सच तो यह है कि फिल्मी गानों को आधार बना कर आधुनिक भारत की राजनीति और इतिहास का अध्ययन किया जा सकता है.

पिछले सदी के साठ का दशक देश के लिए काफी उथल-पुथल भरा रहा था. इसी दशक में चीन और पाकिस्तान के साथ भारत ने युद्ध लड़ा था. देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की मौत हुई थी. हरित क्रांति के बीज इसी दशक में बोये गए थे. निराशा और उम्मीद के बीच साहिर ने आदमी और इंसान (1969) फिल्म में लिखा:

फूटेगा मोती बनके अपना पसीना

दुनिया की कौमें हमसे सीखेंगी जीना

चमकेगा देश हमारा मेरे साथी रे

आंखों में कल का नजारा मेरे साथी रे

कल का हिदुंस्तान जमाना देखेगा

जागेगा इंसान जमाना देखेगा

समाजवादी व्यवस्था का स्वप्न और सामाजिक न्याय साहिर के मूल सरोकार रहे हैं जिसे संपादक अर्जुमंद आरा ने ‘साहिर के सरोकार’ लेख में रेखांकित किया है. अब्दुल हई साहिर लुधियानवी की प्रसिद्धि फिल्मी गानों से पहले उनके काव्य संग्रह तल्खियाँ (1944) से फैल चुकी थी. साहिर की मौत से पहले रिलीज हुई कभी-कभी (1976) फिल्म के गानों ने उनकी शोहरत में और भी तारे टांके. पैतालिस साल के बाद भी उनका लिखा युवाओं के लब पर है. --

कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है

कि जैसे तू मुझे चाहेगी उम्र भर यूँ ही

उठेगी मेरी तरफ प्यार की नजर यूँ ही

मैं जानता हूँ कि तू गैर है मगर यूँ ही...

यहाँ पर यह नोट करना जरूरी है कि असल में यह गाना उनके पहले काव्य संग्रह ‘तल्खियाँ’ में संकलित है जिसका सरल रूप गाने में इस्तेमाल किया गया. इस गीत के लिए उन्हें दूसरा फिल्म फेयर पुरस्कार मिला (पहला फिल्म फेयर पुरस्कार ‘ताजमहल’ फिल्म के गाने ‘जो वाद किया’ के लिए). इस गाने में नॉस्टेलजिया है और बीते जमाने की तस्वीर  है. इसे देश में लगे आपातकाल (1975) की पृष्ठभूमि में भी सुना समझा जा सकता है.

पत्रिका के संपादकों ने बिलकुल ठीक लिखा है कि : साहिर साहब सिर्फ किताबी अदब के नहीं थे, सिनेमा, ग्रामोफोन, कैसेट और रेडियो के भी उतने ही थे, जितने मुशायरों और महफिलों के, जितने हिंदी के उतने ही उर्दू के, जितने हिंदुस्तान के उतने ही पाकिस्तान के, और जितने कल के उतने ही आज के.”  

(न्यूज 18 हिंदी के लिए)

Sunday, May 31, 2020

बेआवाज़ महफिल से गए गीतकार योगेश

हिंदी फिल्मों में  गीतों को एक अहम मुकाम हासिल है. पर क्या यही बात गीतकारों के बारे में कही जा सकती है? 70 के दशक के चर्चित गीतकार योगेश (1943-2020) भरी महफिल से चुपचाप उठ कर चले गए, बिना किसी आवाज के. सच तो यह है कि भले ही उनके गीत लोगों की जुबान पर रहे, पर वे वर्षों पहले ही विस्मृति में धकेल दिए गए थे. उन्हें फिल्मी दुनिया में वह जगह हासिल नहीं हो सकी, जिसके वे हकदार थे. 

'जिंदगी कैसे है पहेली' या 'कहीं दूर जब दिन ढल जाए' जैसे गाने सुनते ही हमें सुपरहिट फिल्म 'आनंद' और सुपरस्टार राजेश खन्ना-अमिताभ बच्चन की याद आती है. जिंदगी के फलसफे को इन सीधे-सादे शब्दों में ढालने वाले योगेश ही थे, जिनका पूरा नाम योगेश गौर था. सलिल चौधरी के संगीत निर्देशन में  तैयार हुए इन गीतों ने उन्हें संगीत प्रेमियों के बीच मकबूलियत दी थी. असल में गीतकार शैलेंद्र के गुजरने के बाद एक जो खालीपन था उसे योगेश के भावपूर्ण गीतों से  भरने की एक उम्मीद जगी थी. उनके गीतों में शैलेंद्र की तरह ही आस-पास के जीवन के अनुभव व्यक्त हुए.  इसी दौर में निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी और बासु चटर्जी की फिल्में  शहरी मध्यवर्गीय जिंदगी के इर्द-गिर्द बुनी गई, जिसे योगेश के गीतों का भरपूर सहयोग मिला था. बात ‘मिली’ फिल्म की हो ‘रजनीगंधा’ की या ‘छोटी सी बात’ की. योगेश के शब्दों ने उसमें जादू भर दिया था, जो सुनने वालों के दिलों को बेधता रहा. 'आए तुम याद मुझे' जैसे गाने में रोमांस और नॉस्टेलजिया एक साथ मिलता है. इसी तरह 'रजनीगंधा फूल तुम्हारे महके यूँ ही जीवन में' या 'कई बार यूँ ही देखा है’ जैसे गाने उस दौर के युवा प्रेमियों के जीवन दर्शन, कश्मकश को बिना किसी बनावट के हमारे सामने लेकर आया. ये गाने वही लिख सकता है जिसने जीवन और उसकी पेचीदगियों को देखा और जिया हो. 

उल्लेखनीय है कि कि 'कई बार यूँ ही देखा है' गाने के लिए मुकेश को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था. लता मंगेशकर ने भी योगेश के लिखे कई गानों को स्वर दिया था. उन्होंने श्रद्धांजलि देते हुए याद किया कि 'योगश जी बहुत शांत और मधुर स्वभाव के इंसान थे.' इसी स्वभाव के चलते 80 के दशक में जिस तरह की तड़क-भड़क हिंदी फिल्मों के गीत-संगीत के क्षेत्र में देखने को मिली वे खुद को अनफिट पाते रहे. हालांकि उस दौर में बॉलीवुड में जो गुटबाजी थी इसके भी वे शिकार हुए, पर उन्होंने कभी गिला-शिकवा व्यक्त नहीं किया. 

बाद के वर्षों में भी कुछ गाने उन्होंने लिखे थे लेकिन उसमें 70 के दशक के योगेश की छाप नहीं दिखी. वर्ष 2017 में हरीश व्यास की फिल्म 'अंग्रेजी में कहते हैं' के भी कुछ गाने उन्होंने लिखे थे, जो उनकी आखिरी फिल्म थी. उन्हें वर्ष 1962 में आई फिल्म ‘सखी रॉबिन’ फिल्म के गाने- तुम जो आ जाओ तो प्यार आ जाए' से ब्रेक मिला था, जिसे मन्ना डे और सुमन कल्याणपुरे ने स्वर दिया.


पचपन साल के फिल्मी कैरियर में योगेश के लिखे गानों की फेहरिस्त भले ही उनके समकालीन गीतकारों जितनी लंबी नहीं हो, पर जो भी गीत उन्होंने लिखे वे धरोहर के रूप में हमारे पास हमेशा रहेंगे. जब भी सावन की फुहारें पडेंगी हम गुनगुना उठेंगे- ‘रिमझिम गिरे सावन सुलग सुलग जाए मन’ बिना यह महसूस किए कि इसे योगेश ने लिखा था! 


(प्रभात खबर, 31 मई 2020)