Sunday, August 25, 2024
अवाम से गुफ्तगू करते गुलजार
Wednesday, September 06, 2023
रेडियो, फिल्म संगीत और इतिहास का एक पन्ना
हिंदी सिनेमा के चर्चित गीतकार शैलेंद्र की जन्मशती के अवसर पर मुख्यधारा और सोशल मीडिया में उनके योगदान की खूब चर्चा हो रही है. इसी सिलसिले में पिछले दिनों आकाशवाणी दिल्ली के रंग भवन सभागार में एक आयोजन किया गया था, जहाँ शैलेंद्र को याद करने जावेद अख्तर, इरशाद कामिल जैसे गीतकार मौजूद थे.
30 अगस्त 1923 को रावलपिंडी में जन्मे शैलेंद्र की मुख्तसर सी जिंदगी रही. महज 43 साल. लेकिन इस ‘छोटी सी जिंदगानी’ में उन्होंने करीब आठ सौ गीत लिखे, जो आज भी लोगों की जुबान पर चढ़े हैं.
‘मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंग्लिशतानी, सर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी या ‘दिल का हाल सुने दिलवाला, सीधी सी बात न मिर्च मसाला’ (श्री 420, 1955) वही लिख सकता है जो जीवन और जन से गहरे जुड़ा रहा हो. लोक मन में रचे-बसे ये गाने आजादी के बाद देश की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों को बखूबी व्यक्त करते हैं. बोलचाल की भाषा में लिखे और गहरे मानी से सजे न जाने कितने ही गाने मुहावरे की शक्ल ले चुके हैं.
बहरहाल, आजादी के बाद देश-दुनिया में हिंदी फिल्मी गीतों के प्रसार में रेडियो की प्रमुख भूमिका रही. उस दौर में अखबार का प्रसार बेहद कम था. यहाँ तक कि सिनेमाघरों की पहुँच भी देश के कोने-कोने तक नहीं थी. आज टीवी और इंटरनेट के दौर में भले दृश्य माध्यम जनसंचार के केंद्र में हो, लेकिन पिछली सदी के 80 के दशक तक रेडियो ही देश-दुनिया से जुड़ने और मनोरंजन का प्रमुख साधन था. सच तो यह है कि पचास-साठ के दशक में हिंदी सिनेमा में गीत-संगीत ने एक अलग विधा का रूप ग्रहण किया. फिल्म संगीत के इस ‘स्वर्णकाल’ में आकाशवाणी (ऑल इंडिया रेडियो) के एक अध्याय पर नज़र डालना जरूरी है, जो आम लोगों की नजर से ओझल ही रहता आया है.
यूँ तो वर्ष 1936 में ही ऑल इंडिया रेडियो अस्तित्व में आ गया था. पर उस दौर में (विश्व युद्ध के दौरान) अंग्रेज शासक इसका इस्तेमाल प्रोपगेंडा के रूप में करते थे. 40 के दशक में महज दो लाख लोगों के पास ही रेडियो रिसीवर थे. हाल ही में प्रकाशित इसाबेल अलोंसो की किताब-‘रेडियो फॉर द मिलियंस’ में रेडियो समाचार और द्वितीय विश्व युद्ध के प्रसंग की विस्तार से चर्चा है. जब देश आजाद हुआ तब मात्र छह रेडियो स्टेशन थे जो वर्ष 1954 में 22 हो गए. जाहिर है, रेडियो सुनने की संस्कृति का विकास 40 और 50 के दशक में होने लगा था.
बहरहाल, आजाद भारत में सरकार की एक नीति ने रेडियो पर फिल्मी गानों के प्रसार पर ग्रहण लगा दिया था. यह ग्रहण 1952 से 1957 तक लगा रहा. अक्टूबर 1952 में जब बी वी केसकर देश के नए सूचना और प्रसारण मंत्री बने तब उन्होंने ऐलान किया कि ‘ये गाने दिनों दिनों अश्लील होते जा रहे हैं और पाश्चात्य देशों की धुनों का कॉकटेल हैं.’ उस समय हर दिन कुछ घंटे विभिन्न रेडियो स्टेशन से फिल्मी गानों का प्रसार होता था. केसकर ने निर्देश जारी किया कि रेडियो स्टेशन से हिंदी गानों का प्रसार नहीं होगा. हिंदी फिल्मी गानों की लोकप्रियता को देखते हुए सिनेमा उद्योग के लिए यह आघात से कम नहीं था. असल में, रेडियो के माध्यम से केसकर शास्त्रीय और सुगम संगीत का प्रसार करना चाहते थे. वे कहते थे कि फिल्म संगीत भारतीय संगीत परंपरा से दूर चला गया है. वे खुद शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित थे.
वे एक तरफ मानते थे कि संगीत लोगों की भावनाओं को अभिव्यक्त करता है, वहीं दूसरी तरफ सिनेमा गीत-संगीत जैसे जनमाध्यम से लोगों को दूर कर रहे थे. संचार के साधनों के समुचित विकास के बाद भी आज देश में शास्त्रीय संगीत का प्रसार एक खास तबके तक ही सीमित रहा है, जबकि फिल्म संगीत की पहुँच एक विशाल वर्ग तक हो चुकी है.
इस रोक के बाद फिल्मी गीत-संगीत की तलाश में श्रोताओं ने अन्य रेडियो स्टेशन की खोज शुरू की. यही दौर था जब रेडियो सिलोन (श्रीलंका ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन) क्षितिज पर उभरा, जहाँ से मुख्यतया फिल्मों गानों का ही प्रसार होता था. सरहद के पार, सिलोन भारत में फिल्मी गानों के लिए परिचित नाम हो गया. उद्घोषक अमीन सयानी और 'बिनाका गीतमाला' को लोग आज भी याद करते हैं. आकाशवाणी के श्रोताओं की संख्या घटती चली गई, मजबूरन सरकार ने अपने फरमान वापस लिए. साथ ही उसी साल संगीत को समर्पित ‘विविध भारती (बंबई)’ की स्थापना भी की गई.
एक तरह से फिल्म गीत-संगीत पर रोक केसरकर और भारत सरकार का शुद्धतावादी रवैया था जो ‘राष्ट्र’ और ‘नागरिक निर्माण को लेकर तत्पर दिखाई देता था. ऐसा नहीं कि इस फरमान का विरोध नहीं हुआ, पर जैसा कि अलोंसो ने लिखा है देश के प्रधानमंत्री नेहरू ने भी इस मुद्दे पर ध्यान नहीं दिया और केसकर की ही चली थी.
अंत मे, कहते हैं कि नेहरू शैलेंद्र के लिखे गीत, ‘हम उस देश के वासी हैं जिस देश मे गंगा बहती है' (1960) को खूब पसंद करते थे. नेहरू के साथ शैलेंद्र की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर भी खूब शेयर की जा रही है.
(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)
Monday, October 25, 2021
कल और आज के शायर साहिर
वर्षों पहले
गुलजार ने कहा था कि ‘सिनेमा वाले मुझे साहित्य का आदमी समझते हैं
और साहित्य वाले सिनेमा का’. साहिर लुधियानवी (1921-1980) के साथ ऐसा
नहीं है. वे सिनेमा और साहित्य दोनों दुनिया में एक साथ समादृत रहे हैं. वे जितने अच्छे शायर थे उतने ही
चर्चित गीतकार. पिछले दिनों अर्जुमंद आरा और रविकांत के संपादन में जनवादी लेखक
संघ की पत्रिका ‘नया पथ’ ने
साहिर लुधियानवी जन्मशती विशेषांक प्रकाशित किया है जो यह इस बात की ताकीद
करता है. खुद साहिर इस बात से वाकिफ थे कि साहित्य क्षेत्र में फिल्मी साहित्य को
लेकर अच्छी राय नहीं है. इसलिए
उन्होंने फिल्मी गीतों के संकलन ‘गाता जाये बंजारा’ की भूमिका
में लिखा है: “मेरा सदैव प्रयास रहा है कि यथासंभव फिल्मी गीतों को
सृजनात्मक काव्य के निकट ला सकूँ और इस प्रकार नये सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण
को जन-साधरण तक पहुँचा सकूं.” साहिर मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित थे और प्रगतिशील
आंदोलन से जुड़े थे. उनके कृतित्व और व्यक्तित्व पर नजर डालने पर यह स्पष्ट हो
जाता है कि वे मजलूमों, मखलूकों के साथ थे अपने काव्य और जीवन
में.
खुद वे अपने ऊपर फैज, मजाज, इकबाल
आदि की शायरी के असर की बात स्वीकार करते थे. इस विशेषांक में अतहर फारुकी ने नोट
किया है कि ‘उर्दू शायरी के
अवामी प्रसार में, यानी अवाम के साहित्यक आस्वादन को बेहतरीन शायरी से परिचित
कराने में साहिर लुधियानवी फैज से भी आगे निकल जाते हैं.’ हो सकता है कि इसमें अतिशयोक्ति लगे पर यह स्वीकार करने में किसी को कोई गुरेज
नहीं होना चाहिए कि उनकी रोमांटिक शायरी फिल्मी गीतों का अंग बन कर, रेडियो,
कैसेट और अब यू-टयूब जैसे माध्यमों से होकर देश और दुनिया के बड़े
हिस्से तक पहुँची.
आजाद हिंदुस्तान के दस साल बाद प्यासा (1957) फिल्म के लिए लिखा उनका गाना
समाज में व्याप्त विघटन और मूल्यहीनता को दर्शाता है, जो
आज भी मौजू है.
ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया
ये इंसान के दुश्मन समाजों की दुनिया
ये दौलत के भूखे रिवाजों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
इसी फिल्म वे पूछते हैं, ‘जिन्हें नाज है
हिंद पर वो कहां हैं’. साहिर ने 1948 में पहला फिल्मी गीत (बदल रही है
जिंदगी, फिल्म-आजादी की राह पर) लिखा और सौ से ज्यादा फिल्मों में
करीब 800 गाने लिखे. उनके इस सफर पर एक नजर डालने पर स्पष्ट है कि
सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियाँ उनके गानों में बखूबी व्यक्त हुई.
हिंदी सिनेमा में गीत-संगीत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. गानों के
माध्यम से कहानियाँ आगे बढ़ती है जिसमें किरदारों के मनोभाव व्यक्त होते हैं पर
साहिर, शैलैंद्र जैसे शायर रूपकों, बिंबों के
माध्यम से आजाद भारत के आस-पड़ोस की घटनाओं, देश-विदेश की
हलचलों को भी बयान करते हैं. सच तो यह है कि फिल्मी गानों को आधार बना कर आधुनिक
भारत की राजनीति और इतिहास का अध्ययन किया जा सकता है.
पिछले सदी के साठ का दशक देश के लिए काफी उथल-पुथल भरा रहा था. इसी दशक में
चीन और पाकिस्तान के साथ भारत ने युद्ध लड़ा था. देश के पहले प्रधानमंत्री
जवाहरलाल नेहरू की मौत हुई थी. हरित क्रांति के बीज इसी दशक में बोये गए थे.
निराशा और उम्मीद के बीच साहिर ने आदमी और इंसान (1969) फिल्म में लिखा:
फूटेगा मोती बनके अपना पसीना
दुनिया की कौमें हमसे सीखेंगी जीना
चमकेगा देश हमारा मेरे साथी रे
आंखों में कल का नजारा मेरे साथी रे
कल का हिदुंस्तान जमाना देखेगा
जागेगा इंसान जमाना देखेगा
समाजवादी व्यवस्था का स्वप्न और सामाजिक न्याय साहिर के मूल सरोकार रहे हैं
जिसे संपादक अर्जुमंद आरा ने ‘साहिर के सरोकार’ लेख में रेखांकित किया है. अब्दुल हई साहिर लुधियानवी की प्रसिद्धि
फिल्मी गानों से पहले उनके काव्य संग्रह तल्खियाँ (1944) से फैल चुकी थी. साहिर की
मौत से पहले रिलीज हुई कभी-कभी (1976) फिल्म के गानों ने उनकी शोहरत में और
भी तारे टांके. पैतालिस साल के बाद भी उनका लिखा युवाओं के
लब पर है. --
कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
कि जैसे तू मुझे चाहेगी उम्र भर यूँ ही
उठेगी मेरी तरफ प्यार की नजर यूँ ही
मैं जानता हूँ कि तू गैर है मगर यूँ ही...
यहाँ पर यह नोट करना जरूरी है कि असल में यह गाना उनके पहले काव्य संग्रह ‘तल्खियाँ’ में संकलित है जिसका सरल रूप गाने में इस्तेमाल किया गया. इस गीत के लिए उन्हें दूसरा फिल्म फेयर पुरस्कार मिला
(पहला फिल्म फेयर पुरस्कार ‘ताजमहल’ फिल्म के गाने ‘जो वाद किया’ के लिए). इस गाने में नॉस्टेलजिया है और बीते जमाने की तस्वीर है. इसे देश में लगे
आपातकाल (1975) की पृष्ठभूमि में भी सुना समझा जा सकता है.
पत्रिका के संपादकों ने बिलकुल ठीक लिखा है कि : साहिर साहब सिर्फ किताबी अदब के नहीं थे, सिनेमा, ग्रामोफोन,
कैसेट और रेडियो के भी उतने ही थे, जितने
मुशायरों और महफिलों के, जितने हिंदी के उतने ही उर्दू के,
जितने हिंदुस्तान के उतने ही पाकिस्तान के, और
जितने कल के उतने ही आज के.”
(न्यूज 18 हिंदी के लिए)



