Thursday, September 12, 2019

तथ्य और सत्य के बीच फेक न्यूज


समकालीन मीडिया के लिए 21वीं सदी का दूसरा दशक दुनिया भर में संभावनाओं और चुनौतियों से भरा रहा है. मेनस्ट्रीम मीडिया के बरक्स इंटरनेट जनित नया मीडिया (डिजिटल मीडिया) ने पब्लिक स्फीयर में बहस-मुबाहिसा को एक गति दी है और एक नए लोकतांत्रिक समाज का सपना भी बुना है. पर इस दशक के जाते-जाते फेक न्यूज का एक ऐसा तंत्र खड़ा हुआ जिसकी चपेट में नया मीडिया के साथ मेनस्ट्रीम मीडिया भी आ गया. वर्तमान में वैश्विक से लेकर स्थानीय स्तर पर लोकतांत्रिक समाज के लिए फेक न्यूज की पहचान और इससे निपटने की चुनौती मीडिया और नागरिक समाज में होने वाले विमर्श का एक महत्वपूर्ण विषय है. पर सवाल है कि फेक न्यूज क्या है? भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए और वर्ष 2019 में होने वाले सत्रहवीं लोकसभा चुनाव के लिए यह किस रूप में चुनौती बन कर उपस्थित है? क्या इसकी जड़ में सामाजिक-राजनीतिक कारण हैं या महज संचार की नई तकनीक से उपजी हुई समस्या है? और आखिर में, इस समस्या का समाधान किन रास्तों से होकर गुजरता है?
फेक न्यूज और प्रोपेगैंडा
फेक न्यूज का इतिहास प्रिंटिंग के इतिहास जितना ही पुराना है. पहली बार 16वीं सदी में इस परिघटना से हमारा सामना होता है. पहले पैंफलेट या न्यूजबुक की प्रतियों की बिक्री बढ़ाने के लिए कपोल कल्पित खबरों का इस्तेमाल होता था, फिर बाद में अखबारों में भी बिक्री को बढ़ाने के लिए मनगढंत खबरों का इस्तेमाल किया जाने लगा. हालांकि जैसे-जैसे 19वीं सदी में वैज्ञानिकता, वस्तुनिष्ठता और निष्क्षपता पर जोर बढ़ा अखबार अपनी प्रतिष्ठा को लेकर चिंतित होने लगे और साथ ही अपने पाठकों के प्रति भी उत्तरदायी होने लगे.[i] पर पिछले कुछ वर्षों में, खास कर वर्ष 2016 में अमेरिका में हुए राष्ट्रपति चुनाव के बाद, पूरी दुनिया के मीडियाकर्मियों, अध्येताओं, समाज वैज्ञानिकों के बीच फेक न्यूज को लेकर एक बहस छिड़ गई है.
जाहिर है खबर की शक्ल में मनगढंत बातें, दुष्प्रचार,  अफवाह आदि समाज में पहले भी फैलते रहते थे. पर उनमें और आज जिसे हम फेक न्यूज समझते हैंबारीक फर्क है. ऐसी खबर जो तथ्य पर आधारित ना हो और जिसका दूर-दूर तक सत्य से वास्ता ना हो फेक न्यूज कहलाता है. इस तरह की खबरों की मंशा सूचना, शिक्षा या मनोरंजन करना नहीं होता है बल्कि समाज में वैमनस्य फैलाना, लोगों को भड़काना होता है. लोगों के व्यावसायिक हित के साथ-साथ राजनीतिक हित भी इससे जुड़े होते हैं.
पिछले दिनों ब्रटिश ब्रॉडकास्टिंग कारपोरेशन (बीबीसी) ने फेक न्यूज के खिलाफ वैश्विक स्तर पर एक मुहिम शुरु किया. भारत में इसी के तहत लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए समाजवादी पार्टी के नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि जो लोग फेक न्यूज़ को बढ़ावा दे रहे हैंवो देशद्रोही हैं.’ साथ ही उन्होंने कहा कि ये प्रोपेगैंडा है और कुछ लोग इसे बड़े पैमाने पर कर रहे हैं.[ii]
फेक न्यूज भूमंडलीकरण के दौर में, मूलत: संचार क्रांति के साथ समाज में जो नई तकनीकी आई है उससे उभरी समस्या है. कंप्यूटरस्मार्ट फोनइंटरनेट (टूजीथ्री जीफोर जी) और सस्ते डाटा पैक की दूर-दराज इलाकों तक पहुँच ने मीडिया के बाजार में खबरों के परोसने, उसके उत्पादन और उपभोग की प्रक्रिया को खासा प्रभावित किया है. अब कोई भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति चाहे तो संदेश का उत्पादन और प्रसारण कर सकता हैइसे एक खबर की शक्ल दे सकता है. मेनस्ट्रीम मीडिया (अखबार, टेलीविजन समाचार चैनल, ऑन लाइन वेबसाइट आदि) पर जैसे-जैसे बाजार का दबाव बढ़ा और मनोरंजन का तत्व हावी हुआ है, खबरों की परिभाषा भी बदल गई. मीडिया उद्योग का मुख्य लक्ष्य मुनाफा कमाना, पाठकों की संख्या में बढ़ोतरी, टीआरपी बटोरना, ऑन लाइन ट्रैफिक बढ़ाना हो गया. मेनस्ट्रीम मीडिया के ऊपर विश्वसनीयता का संकट और  फेक न्यूज का जाल एक साथ फैलता गया. कई बार फेक न्यूज की चपेट में मेनस्ट्रीम मीडिया भी आ जाता है. कारण, टेलीविजन न्यूज चैनलों और अखबारों का एजेंडा सेट करने में सोशल मीडिया की एक बड़ी भूमिका उभर कर आई जो एक अलग शोध का विषय है.
पर क्या फेक न्यूज को हम महज तकनीक जनित समस्या के रूप में देखें या इसकी जड़ में सामाजिक, राजनीतिक प्रवृतियाँ हैं? सामाजिक विकास के साथ-साथ मीडिया के स्वरूप में परिवर्तन होता रहा है. किसी भी देश-काल में समाज में जो प्रवृतियाँ मौजूद रहती हैं मीडिया उससे अछूती नहीं रहती. साथ ही कोई भी तकनीक उसके इस्तेमाल करनेवालों पर आश्रित होती है. आधुनिक समय में फेक न्यूज की जड़ में असंवेदनशीलता, असुरक्षा, असहिष्णुता, समाज में व्याप्त भेद-भाव और राजनीतिक महत्वाकांक्षा है जो कई बार ट्रोल (troll)’ और बोट (bot)’ के रूप में सामने आती है.[iii] वर्तमान में पूरी दुनिया में- अमेरिका, ब्राजील से लेकर भारत तक- राजनीतिक फायदे के लिए इसका इस्तेमाल हो रहा है. बात राष्ट्रवादियों की हो या सामाजवादियों की, उनके पास एक पूरी टीम है जो फेक न्यूज के उत्पादन, प्रसारण में रात-दिन जुटी रहती है. वर्ष 2016 में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के समय और वर्ष 2018 में ब्राजील में हुए चुनावों के समय व्हाट्सएप और सोशल मीडिया के जरिए फेक न्यूज का कारोबार काफी फला-फूला. सत्रहवीं लोकसभा चुनाव के दौरान राजनीतिक पार्टियों से देकर चुनाव आयोग तक के लिए फेक न्यूज एक बड़ी चुनौती है. पर क्या राजनीतिक पार्टियों से यह उम्मीद रखनी चाहिए कि वे इस चुनौती से निपटेंगे?
फेक न्यूज के पीछे जो तंत्र काम करता है उसकी पड़ताल करते हुए  बीबीसी के शोध में पता चला है कि लोग 'राष्ट्र निर्माण की भावना से राष्ट्रवादी संदेशों वाले फेक न्यूज़ को साझा कर रहे हैं और राष्ट्रीय पहचान का प्रभाव खबरों से जुड़े तथ्यों की जांच की जरूरत पर भारी पड़ रहा है. हालांकि बीबीसी की इस शोध प्रविधि (मेथडोलॉजी) पर सवाल खड़ा किया जा रहा है. राष्ट्रवादी विचारधारा वाले,  बीबीसी के इस शोध को केंद्र में वर्तमान भारतीय जनता पार्टी सरकार के खिलाफ एक प्रोपेगैंडा कह रहे हैं.  बीबीसी ने भारत में महज 40 लोगों के सैंपल साइज़ के आधार पर लोगों के सोशल मीडिया के बिहेवियर को विश्लेषित किया है. बीबीसी का यह निष्कर्ष आधा-अधूरा ही माना जाएगा.  हालांकि जिस तरह के वातावरण में आज पत्रकारिता की जा रही है उसमें खबरों के उत्पादन में भावनाओं की भूमिका अलग से रेखांकित किए जाने की जरूरत है. गौरतलब है कि भारत की आजादी के दौरान जब राष्ट्रवाद का उभार हो रहा था तब आधुनिक संचार के साधनों के अभाव मेंमौखिक संचार के माध्यम से फैलने वाली अफवाहों से साम्राज्यवादियों के खिलाफ मुहिम में राष्ट्रवादियों को फायदा भी पहुँचता था. वर्ष 1857 में हुए भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अफवाह लोगों को एकजुट कर रहे थे, इतिहासकार रंजीत गुहा (2009:31-48) ने इस बात को रेखांकित किया है.[iv] शाहिद अमीन (2006: 43-45) ने भी चौरी-चौरा के प्रंसग में लिखा है कि मौखिक खबरों के माध्यम से अफवाह (गोगा) तेजी से फैल रहे थे.[v]
दूसरी तरफ साम्राज्यवादी ताकतें भी प्रोपेगैंडा से बाज नहीं आ रही थी. याद कीजिए कि बीबीसी में काम करते हुए लेखक-पत्रकार जार्ज ऑरवेल ने क्या लिखा था. उन्होंने बीबीसी के प्रोपेगैंडा से आहत होकर अपने इस्तीफा पत्र में लिखा था- मैं मानता हूं कि मौजूदा राजनीतिक वातावरण में ब्रिटिश प्रोपेगैंडा का भारत में प्रसार करना लगभग एक निराशाजनक काम है. इन प्रसारणों को तनिक भी चालू रखना चाहिए या नहीं इसका निर्णय और लोगों को करना चाहिए लेकिन इस पर मैं अपना समय खर्च करना पसंद नहीं करुंगा, जबकि मैं जानता हूँ कि पत्रकारिता से खुद को जोड़ कर ऐसा काम कर सकता हूं जो कुछ ठोस प्रभाव पैदा कर सके.[vi]  साथ हीनहीं भूलना चाहिए कि इराक युद्ध (2003) के दौरान बीबीसी ने जिस तरह से युद्ध को कवर कियाप्रोपगैंडा में भाग लिया, उसकी काफी भर्त्सना हो चुकी है.
पत्रकारिता के क्षेत्र में बीबीसी की साख वर्षों से रही है. वह खबरों को विश्वसनीय, वस्तुनिष्ठ ढंग से परोसने के लिए वह जानी जाती है. पर सवाल है कि फेक न्यूज क्या महज प्रोपेगेंडा हैयदि हम प्रोपेगेंडा को फेक न्यूज मानें तो इसकी जद में बीबीसी जैसे संगठन भी आ जाएँगे. पत्रकारिता जैसे पेशे में जहाँ डेडलाइन का दबाव पत्रकारों पर हमेशा रहता है, वहाँ मानवीय भूल की गुंजाइश भी हमेशा रहती है. पर जल्दीबाजी में या भूलवश तथ्यों के सत्यापन में की गई गलती को हम फेक न्यूज नहीं मान सकते हैं.
दस वर्ष पहले, वर्ष 2009 में लोगों के बीच आपसी संवाद के लिए व्हाट्सएप जैसे मैंसेजिंग प्लेटफार्म का इस्तेमाल शुरु किया गया और देखते ही देखेते फोन के माध्यम से संवादों के संप्रेषण की इस प्रविधि ने एसएमएसके इस्तेमाल को काफी पीछे छोड़ दिया. लेकिन हाल के वर्षों में भारत में व्हाट्सएप जैसे मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर कई बार झूठी खबरों (ऑडियो, वीडियो और फोटोशॉप का इस्तेमाल कर) को इस तरह परोसा और प्रसारित किया गया कि कई जगहों पर हिंसा भड़की उठी और मॉब लिंचिंग में जानें गईं. इस सबके मद्देनजर व्हाट्सएप ने एक साथ मैसेज को कई समूहों में फारवर्ड करने की सीमा तय कर दी है. साथ ही यदि कोई संवाद अग्रसारित (फॉरवर्ड) होकर किसी के पास पहुँचता है तो संवाद पाने वालों को इस बात की जानकारी मिल जाती है. इससे संवादों, खबरों के उत्पादन के स्रोत के बारे में अंदाजा मिल जाता है. हालांकि फेक न्यूज को रोकने में ये पहल नाकाफी साबित हुए हैं. पिछले दिनों देश की संसदीय समिति ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के कर्ताधर्ताओं को जवाबतलब किया ताकि आने वाले चुनाव में इन प्लेटफॉर्म के माध्यम से फैलने वाली अफवाहों और फेक न्यूज पर रोक लगे और नागरिकों के हितों और अधिकारों की रक्षा की जा सके.
चुनावी रणनीति में सोशल मीडिया की भूमिका
केपीएमजी और गूगल के मुताबिक वर्ष 2011 में भारतीय भाषाओं में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या 4 करोड़ 20 लाख थी जो वर्ष 2016 में बढ़ कर 23 करोड़ 40 लाख हो गई, वर्ष 2021 में यह संख्या बढ़ कर 53 करोड़ 60 लाख हो जाएगी. साथ ही वर्तमान में करीब 96 प्रतिशत लोग इंटरनेट का इस्तेमाल मोबाइल के माध्यम से करते हैं. किसी भी लोकतंत्र में राजनीतिक पार्टियों और कार्यकर्ताओं के लिए जहाँ मास मीडिया संवाद पहुँचाने का एक माध्यम हुआ करता था, पिछले कुछ वर्षों में यह एक-दूसरे से संवाद करने के साथ-साथ चुनावी रणनीति का एक हथियार भी बन कर उभरा है. चुनावों के दौरान हर बड़ी-छोटी राजनीतिक पार्टियों के अपने वार रूमहोते हैं, जहाँ से मीडिया पर निगाह रखी जाती है और इन्हें प्रभावित करने की कोशिश होती है ताकि इनके राजनीतिक एजेंडे को लागू किया जा सके.

एक आंकड़ा के मुताबिक भारत में करीब 90 करोड़ वोटर हैं जिसमें से करीब 50 करोड़ के पास इंटरनेट की सुविधा है. करीब 30 करोड़ फेसबुक यूजर्स हैं जबकि 20 करोड़ व्हाट्सएप मैसेज सेवा का इस्तेमाल करते हैं. आगामी लोकसभा चुनावों के दौरान हर राजनीतिक पार्टियाँ सोशल मीडिया के माध्यम से ज्यादा से ज्यादा फायदा उठना चाहेगी. यहाँ व्हाट्सएप के साथ-साथ शेयर चैट जैसे मैसेजिंग के देसी अवतारों पर भी सब दलों की नजर है, पर यह समकालीन मीडिया-विमर्श का हिस्सा नहीं बन पाया है और ज्यादातर लोगों की नजर से ओझल ही है. छोटे शहरों-कस्बों में शेयर चैट जैसे प्लेटफॉर्म, जो भारतीय भाषाओं में मुफ्त में उपलब्ध हैं, काफी लोकप्रिय हैं. फिलहाल राजनीतिक पार्टियाँ इन देसी मैसेजिंग प्लेटफॉर्म का प्रोपेगैंडा के लिए खूब इस्तेमाल कर रही हैं.

असल में जैसा कि पामेला फिलिपोसे (2019: 152) ने हाल ही में प्रकाशित अपनी किताब में लिखा है:  वर्ष 2013 और वर्ष 2015 में दिल्ली में हुए विधानसभा चुनाव और वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान हमने पहली बार मीडिया जनित राजनीतिक गोलबंदी को अपने उच्चतम शिखर पर देखा और इन्हीं चुनावों में पहली बार देश में राजनीतिक संचार के लिए सोशल मीडिया के समुचित इस्तेमाल की परख एक टूल के रूप में हुई.[vii] अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी नये मीडिया के इस्तेमाल में आगे रही पर जल्दी ही कांग्रेस, समाजवादी पार्टी आदि भी सोशल मीडिया के इस्तेमाल की पहल में तेजी से आगे बढ़ी. वर्ष 2019 के फरवरी महीने में बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने भी टविटर जैसे माध्यम को अपनाया. गौरतलब है कि मेनस्ट्रीम मीडिया पर मनुवादी होने का आरोप लगाने के साथ ही उनका कहना था कि जिस तरह की राजनीति वे करती हैं उसमें सोशल मीडिया जैसे माध्यम की उन्हें जरूरत नहीं है. स्पष्ट है कि सोशल मीडिया की भूमिका को नजरअंदाज करना अब किसी भी राजनीतिक दल के लिए संभव नहीं है.

वर्ष 2014 में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी और सहयोगी दलों की सरकार बनने के बाद सरकार के मंत्री, राजनेता अखबारों और समाचार चैनलों से ज्यादा, नये मीडिया पर सक्रिय रहे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत सभी मंत्रियों और सांसदों की सक्रियता सोशल मीडिया पर ज्यादा दिखी. टिवटर पर नरेंद्र मोदी के 44.7 मिलियन और फेसबुक पर 43.2 मिलियन फॉलोअर हैं. 2014 में लोकसभा चुनाव हारने के बाद कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गाँधी टिवटर पर आए और तेजी से उनके फॉलोअरों की संख्या बढ़ी. वर्तमान में वे सत्ताधारी नेताओं की तरह ही सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं. जहाँ फेसबुक और टविटर जैसे माध्यमों का इस्तेमाल राजेनता अपने कार्यकर्ताओं तक संदेश पहुँचाने के लिए कर रहे हैं, वहीं इसका इस्तेमाल आम जनता तक अपनी बातें पहुँचाने के लिए भी कर रहे हैं. यह प्रोपेगैंडा और फेक न्यूज फैलाने का जरिया भी साबित होता है और जाने-अजाने पक्ष और विपक्ष के नेता, सरकार में शामिल मंत्री इस कृत्य में शामिल हो जाते हैं.

निष्कर्ष
फेक न्यूज के कई आयाम है जिसमें खबरों के उत्पादन, प्रसारण, स्रोत, तथ्य प्रमुख हैं. सोशल मीडिया के दौर में सच्ची और फर्जी खबरों के बीच तथ्यों, स्रोतों की पहचान (फैक्ट चेकिंग), क्रास चेकिंग आदि आम नागरिकों के लिए मुश्किल है. फेक न्यूज की वजह से फेसबुकव्हाट्सएपस्नैप चैट, ट्विटर जैसे प्लेटफार्म की विश्वसनीयता पर भी संकट है. बड़ी पूंजी से संचालित नये मीडिया पर राष्ट्र-राज्य और नागरिक समाज की तरफ से काफी दबाव है. इन पर पक्षधरता और वस्तुनिष्ठ नहीं होने का आरोप भी लगा है. वर्तमान में हिंदी में ऑन लाइन न्यूज मीडिया के जो वेबसाइट हैंवहाँ क्लिकबेट (हेडिंग में भड़काऊ शब्दों का इस्तेमाल ताकि अधिकाधिक हिट मिले) और सोशल मीडिया पर खबरों के शेयर करने की योग्यता (शेयरेबलिटी) पर ज्यादा जोर रहता है. निस्संदेह डिजिटल मीडिया की वजह से बहस-मुबाहिसा का एक नया क्षेत्र उभरा है जिससे लोकतंत्र मजबूत हुआ हैपर कई बार यहाँ पर जो असत्यापित या अपुष्ट खबरें दी जाती है वह सोशल मीडिया के माध्यम से लाखों लोगों तक पहुँचती है और फेक न्यूज की शक्ल लेती है. हालांकि इसी बीच मेनस्ट्रीम अखबार और टीवी समाचार चैनलों के साथ-साथ ऑनलाइन के कई ऐसे वेबसाइट भी उभरे हैं जो फेक न्यूज के बारे में जागरुकता फैलाते हैं और इन फर्जी खबरों से आम जनता को अवगत करा रहे हैं. हाल ही में सोशल मीडिया के कर्ताधर्ता भी विभिन्न संगठनों के साथ मिल कर फेक न्यूज को फैलने से रोकने के लिए जरूरी कदम उठा रहे हैं, जिनमें तथ्यों की जाँच, सत्यापन पर काफी जोर है.
साथ ही, दुनिया भर की सरकारें सोशल मीडिया पर फेक न्यूज की बढ़त को रोकने के लिए कानून लाने पर विचार कर रही है. लेकिन मीडिया पर किसी तरह की कानूनी बंदिश लोकतांत्रिक समाज के लिए मुफीद नहीं है. लोकतांत्रिक समाज के लिए मीडिया की स्वतंत्रता एक जरूरी शर्त है. मास मीडिया तथ्यों के माध्यम से सत्य तक पहुँचने का एक जरिया रहा है. लेकिन पोस्ट-ट्रुथ के इस दौर में यह स्वीकार करने में कोई गुरेज नहीं कि फेक न्यूज से लड़ाई लंबी है और हाल-फिलहाल फेक न्यूज की समस्या का कोई सीधा हल नहीं दिखता है. इसी को ध्यान में रखते हुए ट्विटर के सीईओ जैक डोरसे ने पिछले दिनों अपनी भारत यात्रा के दौरान कहा कि फेक न्यूज और दुष्प्रचार की समस्याओं से निपटने के लिए कोई भी समाधान समुचित नहीं है. फिर सवाल है कि रास्ता किधर है? रास्ता संचार की नई तकनीक और इन तकनीकी के मार्फत डिजिटल मीडिया का इस्तेमाल करने वाले समुदायों से होकर ही जाता है. लोगों में समझबूझ और जागरुकता फैलाने से लेकर, माध्यम के प्रति शिक्षित करने, तथ्यों को सत्यापित करने, क्रास चेकिंग आदि से फेक न्यूज की समस्या से लड़ा जा सकता है.

(संवाद पथ, जनवरी-मार्च 2019 में प्रकाशित)

संदर्भ

[i] देखें,द इकॉनामिस्ट 1843 मैग्जीन, https://www.1843magazine.com/technology/rewind/the-true-history-of-fake-news

[ii] देखें, बीबीसी हिंदी, 12 नवंबर 2018, https://www.bbc.com/hindi/india-46175929

[iii] भारत में इंटरनेट ट्रोल किस तरह काम करते हैं इसके बारे में विस्तृत जानकारी के लिए देखें, स्वाति चतुर्वेदी (2016), आई एम ए ट्रोल, नयी दिल्ली: जगरनॉट. साथ ही देखें, रवीश कुमार (2018), द फ्री वॉयस, नयी दिल्ली: स्पीकिंग टाइगर.

[iv] रंजीत गुहा (2009), ट्रांसमिशन, अरविंद राजगोपाल (सं) द इंडियन पब्लिक स्फीयर में संग्रहित, नयी दिल्ली: आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस.

[v] शाहिद अमीन (2006), इवेंट, मेटाफर, मेमोरी:चौरी चौरा 1922-1992, नयी दिल्ली: पेंग्विन बुक्स.

[vi] देखें, जार्ज आरवेल का इस्तीफा पत्र (1943), http://www.bbc.co.uk/archive/orwell/7430.shtml

[vii] पामेला फिलिपोसे (2019), मीडियाज शिफ्टिंग टेरेन, नयी दिल्ली: ओरियंट ब्लैकस्वान


Sunday, September 08, 2019

जहाँ कैद है बचपन: झलकी

पिछले दशकों में बिहार और उत्तर प्रदेश के छोटे शहरों-कस्बों से बॉलीवुड पहुंची प्रतिभाओं ने हिंदी सिनेमा में एक नया और अलहदा रंग भरा है. हिंदी क्षेत्र में आर्थिक विपन्नता भले हो, सांस्कृतिक रूप से यह इलाका समृद्ध रहा है, जिसकी छाप फिल्मकारों के निर्माण-निर्देशन, गीत-संगीत के प्रति इनकी सूझ-बूझ में दिखती है.
निर्माता-निर्देशक ब्रह्मानंद एस सिंह की इस महीने रिलीज होनेवाली ‘झलकी’ ऐसी ही एक फीचर फिल्म है, जिसकी सोशल मीडिया पर खूब चर्चा हो रही है. विभिन्न फिल्म समारोहों में भी इस फिल्म ने लोगों का ध्यान खींचा है.
बिहार के पूर्णिया में पले-बढ़े ब्रह्मानंद सिंह एक ख्यात डाॅक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता-निर्देशक हैं. संगीतकार आरडी बर्मन और जगजीत सिंह के ऊपर बनायी डाक्यूमेंट्री- ‘पंचम अनमिक्स्ड: मुझे चलते जाना है’ और ‘कागज की कश्ती’ को राष्ट्रीय पुरस्कार समेत कई सम्मानों से नवाजा गया है. इन आत्मकथात्मक वृतांतों में फिल्मकार की विषय वस्तु की गहरी समझ और तरल संवदेनशीलता दिखायी पड़ती है.
दरअसल, सिंह ने अपनी फिल्म निर्माण की शुरुआत वर्ष 1997 में ध्रुपद की सिद्ध गायिका असगरी बाई के ऊपर बनायी वृत्तचित्र से ही की थी. उल्लेखनीय है कि सहरसा-पूर्णिया इलाके में संगीत की समृद्ध परंपरा रही है, जो एक विरासत के रूप में ब्रह्मानंद सिंह की फिल्मों में दिखायी देती है.
‘झलकी’ फिल्म में भी ब्रह्मानंद सिंह का लोक और संगीत के प्रति प्रेम दिखायी पड़ता है, जबकि यह फिल्म भारतीय समाज में घृणित बाल मजदूरी और तस्करी की समस्या को हमारे सामने लेकर आती है. कालीन बुनाई उद्योग की पृष्ठभूमि में इस फिल्म का कथानक बुना गया है.
फिल्म में बिहार और उत्तर प्रदेश में प्रचलित इस लोकगीत का निर्देशक ने बखूबी इस्तेमाल किया है- बढ़ई-बढ़ई खूंटा चीर/ खूंटा में मोर दाल है/ का खायीं का पीं/ का ले परदेस जायीं... असल में इस फिल्म की कथा का सूत्र भी यही है- ‘एक बार एगो खजन चिरइया एगो दाना लिये फुर्र से चलल जात रहल’. चिड़िया की यात्रा, उसका संघर्ष और जिजीविषा इस फिल्म में बाबू और उसकी बहन झलकी के संघर्ष के रूप में मिलता है.
नौ वर्ष की झलकी अपने सात वर्षीय भाई बाबू की खोज में निकल पड़ती है, जो बाल मजदूरी के शोषण और उत्पीड़न की अंधेरी खोह में फंसा पड़ा है. अंतरराष्ट्रीय श्रमिक संगठन (आइएलओ) के मुताबिक दुनियाभर में करीब 15 करोड़ बच्चे बतौर बाल मजूदर काम कर रहे हैं, वहीं साल 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में एक करोड़ से ज्यादा बच्चे बाल मजदूरी में झोंक दिये गये हैं.
डॉक्यूमेंट्री फिल्मों को एक बड़ा दर्शक वर्ग नहीं मिल पाता, न कहीं इनकी व्यापक चर्चा ही होती है. डॉक्यूमेंट्री फिल्मों से फीचर फिल्मों की अपनी यात्रा के संबंध में ब्रह्मानंद सिंह कहते हैं: ‘सिनेमा एक सशक्त माध्यम है. इसकी पहुंच बहुत दूर तक है, जो डॉक्यूमेंट्री के साथ संभव नहीं. इस तरह की फिल्म बनाने का उद्देश्य समाज के लिए कुछ योगदान करना है, सिर्फ अवॉर्ड लेना या वाहवाही लूटना मकसद नहीं है.’ बाल मजदूरी और तस्करी हमारे समाज का एक ऐसा सच है, जिसे लेकर जागरूकता फैलाने की जरूरत है. नोबेल पुरस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी के ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ की छाप इस फिल्म पर दिखायी देती है.
फिल्म के आखिर में सत्यार्थी गरीबी, अशिक्षा का बाल मजदूरी और तस्करी के साथ संबंधों की व्याख्या करते हैं. चर्चित अभिनेता बोमन ईरानी का चरित्र सत्यार्थी से प्रेरित है, साथ ही गोविंद नामदेव, दिव्या दत्ता, संजय सूरी जैसे मंझे अभिनेता भी इस फिल्म का हिस्सा हैं.
फिल्मकार ब्रह्मानंद सिंह ‘सिनेमा फॉर चेंज’ की बात करते हैं. सही भी है, सिनेमा सामाजिक बदलाव का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरे, इससे बेहतर और बात क्या हो सकती है.

(प्रभात खबर, 8 सितंबर 2019)

Tuesday, August 27, 2019

खबरनवीस का सम्मान


इस साल एशिया के प्रतिष्ठित रेमन मैग्सेसे पुरस्कार पानेवालों में म्यांमार के पत्रकार स्वे विन और भारत के चर्चित टेलीविजन एंकर और पत्रकार रवीश कुमार शामिल हैं.
रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड फाउंडेशन ने सच्चाई को बयान करने की ताकत और सामाजिक सरोकार से लैसपत्रकारिता के लिए स्वे विन को सम्मानित करने की घोषणा की, वहीं रवीश कुमार की पत्रकारिता को सत्य के प्रति निष्ठा रखते हुए बेजुबानों की आवाजबताया है. निस्संदेह मौजूदा दौर में रवीश भारतीय पत्रकारिता का एक विश्वसनीय चेहरा हैं. हिंदी टेलीविजन पत्रकारिता में जहां मनोरंजन और सनसनी पर जोर है, वहां सत्य के प्रति निष्ठा बहुत पीछे छूट गया लगता है.
हालांकि, जब सुरेंद्र प्रताप सिंह ने 90 के दशक में हिंदी टेलीविजन पत्रकारिता को एक पेशेवर अंदाज दिया, तब टीवी समाचार के प्रति लोगों में आकर्षण बढ़ा था, पर बाद में बाजार, सत्ता और टीआरपी के दबाव में टेलीविजन ने खबरों की नयी परिभाषा गढ़ी, जहां तथ्य से सत्य की प्राप्ति पर जोर नहीं रहा. आज टेलीविजन पत्रकारिता के ऊपर विश्वसनीयता का संकट है.
टेलीविजन के एंकरों की एक खास शैली होती है, जो उन्हें विशिष्ट बनाती है. भारतीय टेलीविजन पत्रकारों में रवीश जमीनी और लोक से जुड़े मुद्दों को सहज ढंग से चुटीले अंदाज में पेश करते हैं. सत्ता से ईमानदारी से सवाल पूछना भी इसमें शामिल है. वर्तमान में टीवी पत्रकारिता में स्टूडियो में होनेवाले बहस-मुबाहिसा और इंटरव्यू ज्यादा प्रमुख हो गया है. सत्ता पर काबिज सवालों से हमेशा बचते हैं और जवाब देने में आनाकानी करते हैं.
टेलीविजन के एक अन्य चर्चित पत्रकार करण थापर बीबीसी के महानिदेशक रह चुके जॉन बर्ट के हवाले से कहते हैं कि समसामयिक इंटरव्यू के दौरान चार तरह के उत्तर होते हैं- हां, , नहीं जानते और नहीं कह सकते. एक इंटरव्यूअर को तीसरे और चौथे विकल्प को हटा कर अपने गेस्ट को हां या न की तरफ मोड़ना होता है. खुद गेस्ट हां, या ना की दुविधा में रहते हैं और यह काम एक इंटरव्यूअर का है कि किस तरह वह गेस्ट के जवाब को लेकर सवाल करे.
वर्तमान दौर में टेलीविजन पत्रकारिता की सत्ता के साथ गलबहियां से खुद रवीश कुमार क्षुब्ध रहते हैं. विभिन्न मंचों पर उन्होंने इस बात को बार-बार जाहिर भी किया है. यहां तक कि पिछले दिनों उन्होंने लोगों से टेलीविजन न्यूज नहीं देखने की अपील तक कर डाली थी.
इक्कीसवीं सदी में टीवी भारतीय जनमानस और संस्कृति का एक अहम हिस्सा बनकर उभरा है. पिछले दो दशकों में भारतीय समाज और लोक मानस पर खबरिया चैनलों का प्रभाव किस रूप में पड़ा इसकी ठीक-ठीक विवेचना संभव नहीं. लेकिन, इस बात से शायद ही किसी को इनकार हो कि कमियों के बावजूद भारतीय राजनीति और लोकतंत्र के विस्तार में इन समाचार चैनलों की महती भूमिका है.
(प्रभात खबर, 27 अगस्त 2019)

Sunday, August 18, 2019

लोक रंग में दास्तानगोई


महमूद फारूकी और डारेन शाहिदी
पिछले दिनों दिल्ली में रिवायतनाम से एक लोक उत्सव का आयोजन किया गया. आश्चर्य की बात यह थी कि इसमें दास्तानगोई को भी शामिल किया गया था. दास्तानगोई नाटकीय अंदाज़ में कहानी कहने की एक मनोरंजक विधा है. पिछले दशक में जब उर्दू के चर्चित आलोचक और कई चाँद थे सरे आसमांके लेखक शम्सुर्रहमान फारूकी और अदाकार महमूद फारूकी ने इस विधा में नया रंग भरा तब लोगों की नज़र इस पारंपरिक कला की ओर गई.

मध्यकाल में अमीर हम्ज़ा की दास्तानें दास्तानगो के बीच काफी पसंद की जाती थी. तिलिस्म और ऐय्यारी कहानियों को रोचक बनाती थी और सुनने वालों को बांध कर रखती थी. फारूकी ने भी अपनी पहली प्रस्तुति में दास्तानए-अमीर हम्ज़ा के किस्सों में से तिलिस्म-ए-होशरुबाको ही चुना था.  आधुनिक काल में देवकी नंदन खत्री के उपन्यास चंद्रकांता संततिकी लोकप्रियता ऐय्यारी और तिलिस्म की वजह से हुई थी, जिसे पढ़ कर पाठकों के होश उड़ जाते थेऔर वे उपन्यास के अगले अंक का बेसब्री से इंतजार करते थे!

नए अवतार में दास्तानगोई में हम भारत की सामासिक संस्कृति की झलक पाते हैं.  उर्दू-फारसी की शैली में जब महमूद फारूकी और दारेन शाहिदी ने चर्चित रचनाकार विजयदान देथा की कहानी-चौबोलीसुनाई तो दर्शकों के सामने भाषा आड़े नहीं आई. जाहिर है राजस्थानी लोक कहानी चौबोलीको आधार बना कर 'दास्तान शहजादी चौबोली'  की मंच पर प्रस्तुति होगी तो लोक रंग और राग तो उसमें आएँगे ही. इस दास्तान में अमरबेल की तरह एक कहानी की डाल पर दूसरी, दूसरी के ऊपर तीसरी,  तीसरी के ऊपर चौथी कहानी रची-बसी है और दर्शक-श्रोता की उत्सुकता इस बात को जानने में हमेशा रहती है कि आगे क्या?

नब्बे के दशक के मध्य में एनएसडी के जाने-माने अदाकार पीयूष मिश्रा भी विजयदान देथा की एक अन्य चर्चित कहानी दुविधा’ (इस पर मणि कौल और अमोल पालेकर ने फिल्म भी बनाई) को मंच पर पेश किया करते थे, पर नाटकीय अंदाज के बावजूद दास्तानगोई में नाटकीय साजो-सामान का इस्तेमाल नहीं होता. जहाँ पीयूष मिश्रा हारमोनियम के साथ मंच पर होते थे, वहीं दास्तान शहजादी चौबोली कीमें संगीत का इस्तेमाल बिलकुल नहीं था. असल में, दास्तानगोई में गीत-संगीत का इस्तेमाल नहीं किया जाता है. संभव है कि आने वाले समय में दास्तानगो इस प्रयोग को अपनी अदायगी में शामिल करें.

बकौल फारूकी दिल्ली में वर्ष 1928 में मीर बाकर अली की मौत के साथ ही मुगल काल से चली आ रही दास्तानगोई की संवृद्ध परंपरा समाप्त हो गई. वे आखिर महान दास्तनागो थे. जामा मस्जिद के आसपास वे दास्तानें सुनाया करते थे. परंपरा के रूप में एक दास्तनागो बैठकों, महफिलों और सार्वजनिक जगहों पर लोगों को किस्से सुनाया करते थे, लेकिन आजकल दो दास्तानगो प्रस्तुति के दौरान मौजूद रहते हैं. मंच पर सफेद चादर और मसनद, अंगरखे में दास्तानगो, पानी पीने के लिए कटोरे और जलती मोमबत्तियां समां बांधने का काम करती है.

हालांकि पंद्रह वर्ष के बाद भी दास्तानगोई लोक या लोगों के करीब नहीं पहुँच पाई है.  देश-विदेश के महानगरों में साहित्यिक और सांस्कृतिक समारोहों के दौरान ही ज्यादातर इसे देखने को मिलता है. अच्छी बात यह है कि इस बीच कई युवा कलाकार इस विधा से जुड़े हैं. जेएनयू में हिमांशु वाजपेयी और अंकित चढ्ढा ने दास्ताने-सेडिशनको अनूठे अंदाज में पेश किया था.

जैसा कि कला की हर विधा के साथ होता है, दास्तानगोई भी अपने समय और समाज की चिंताओं से जुड़ी है. प्रस्तुति के दौरान दास्तानगो राजनीतिक और सामाजिक टिप्पणी करने से नहीं चूकते जो इस पारंपरिक विधा को समकालीन बनाता है और दर्शकों के साथ उनका संवाद कायम रहता है.

(प्रभात खबर, 18 अगस्त 2019)

Monday, July 29, 2019

हिंदी सिनेमा में दलित विमर्श


हिंदी फिल्मों के सौ वर्षों के इतिहास में समांतर सिनेमा आंदोलन का खासा महत्व है. आजादी से पहले वर्ष 1936 में फ्रांज ऑस्टेन ने अछूत कन्याबनायी थी. इस फिल्म में ब्राह्मण लड़के और एक अछूत लड़की के बीच प्रेम को दिखाया गया है. यह फिल्म महात्मा गांधी के अछूतोद्धार आंदोलन से प्रेरित था.

 वर्ष 1959 में विमल राय ने भी सुजातामें एक अछूत लड़की और ब्राह्मण लड़के के बीच प्रेम का चित्रण किया. लेकिन, इन फिल्मों में जो सवाल उठाये गये, वे ज्यादातर वैयक्तिक थे, इनमें एक वृहद् दलित समाज के संघर्ष, उनकी पहचान का सवाल गौण था.

 नब्बे के दशक में हिंदी साहित्य में दलित विमर्श मुख्य रूप से उभरा. इन्हीं वर्षों में हिंदी क्षेत्र में भी दलितों-पिछड़ों का आंदोलन देखने को मिला. पर हिंदी फिल्मों में दलितों के संघर्ष और उनके हक के सवाल हाशिये पर ही रहे. बैंडिट क्वीन’, ‘आरक्षण’, ‘मसानजैसी सफल फिल्मों में दलित किरदार तो हैं, पर वे हिंदी सिनेमा में नया विमर्श खड़ा करने में असफल रहे.

 समांतर सिनेमा के दौर में सामंती समाज के शोषण के इर्द-गिर्द बनी पुरस्कृत फिल्मों मसलन, ‘अंकुर’, ‘दामूल’, ‘पारआदि में दलितों के सवाल फिल्म के केंद्र में नहीं हैं. ऐसा लगता है कि हिंदी फिल्में सायास रूप से दलितों, वंचितों के संघर्ष और उनके सवालों से टकराने से बचती रही हैं. पहली बार अनुभव सिन्हा निर्देशित आर्टिकिल 15’ में समाज और सत्ता से किये गये दलितों के चुभते सवाल और उनके संघर्ष को हम फिल्म के केंद्र में पाते हैं. बिना किसी लाग-लपेट के फिल्म का मुख्य पात्र पूछता है- ये लोग कौन हैं?’ ये वे लोग हैं जो हमारे बीच हैं, पर ओझल हैं. या कहें कि हमने जिनके सवालों से मुंह मोड़ रखा है.

 सवाल हिंदी सिनेमा के कर्ता-धर्ता से भी पूछा जाना चाहिए कि हिंदी समाज में जब राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर पिछले दशकों में उथल-पुथल चलता रहा वे दलितों के हक के सवालों से क्यों मुंह चुराते रहे? क्या बॉलीवुड के सारे विषय बाजार के साथ उनके रिश्ते से तय होते रहेंगे?

 आर्टिकल 15’ की मुख्य आलोचना इस बात को लेकर हो रही है कि फिल्म का केंद्रीय पात्र ब्राह्मण है और ऐसा लगता है कि वह मसीहा बनकर आया है. सवाल सही है, पर मेरी समझ से सिनेमा में वह सूत्रधार की भूमिका में है. नायक से ज्यादा प्रभावशाली ढंग से फिल्म में अन्य पात्र जातिगत राजनीतिक सवाल उठाते हैं.

 यह बिंबों, सिनेमैटोग्राफी और संवाद से भी स्पष्ट है. सीवर सफाई कर्मचारी का कीचड़ में सना चेहरा दर्शकों की स्मृति में वर्षों तक रहेगा. प्रसंगवश, साहित्यकार ओम प्रकाश वाल्मीकि की चर्चित कहानी सलामको यहां याद किया जा सकता है, जिसमें दलित और ब्राह्मण पात्र के आपसी रिश्ते को संवेदनशील ढंग से उकेरा गया है.

 यह सुखद है कि पिछले वर्षों में बॉलीवुड का कैमरा पेरिस, लंदन और न्यूयॉर्क से दूर बनारस, बरेली, वासेपुर की गलियों में घूमने लगा है. महानगरों में एक नया दर्शक वर्ग भी उभरा है, जो समकालीन मुद्दों और विमर्शों को पर्दे पर देखना चाहता है. ऐसे में सिनेमा में उच्च और मध्यम वर्ग से इतर दलितों-पिछड़ों की अस्मिता और संघर्ष पर भी निर्माता-निर्देशकों का फोकस बढ़ेगा. हिंदी सिनेमा की रचनात्मकता इससे संवृद्ध होगी.

(प्रभात खबर, 28 जुलाई 2019)

Saturday, July 27, 2019

धीमी पत्रकारिता के प्रयोग: महात्मा गाँधी


समकालीन मीडिया परिदृश्य पर सोशल मीडिया और टेलीविजन हावी हैं. सूचना क्रांति से लैस इन माध्यमों में खबरों के उत्पादन और प्रसारण की हमेशा हड़बड़ाहट रहती है. ब्रेकिंग न्यूज’, ‘फास्ट न्यूजपर जोर रहता है. हालांकि मीडिया विमर्शकारों के बीच समाचार पत्र जैसे पारंपरिक माध्यम की अहमियत फिर से बढ़ी है. ऐसे में 150वें जयंती वर्ष में महात्मा गाँधी की पत्रकारिता और उनके मूल्यों को याद करना जरूरी लगता है. वे राजनेता, विचारक के साथ-साथ एक कुशल पत्रकार भी थे. जब वे बैरिस्टर की पढ़ाई करने लंदन गए तब कानून के एक छात्र के रूप में पत्रकारिता से उनका मुखामुखम हुआ. साथ ही वर्ष 1890 में द वेजिटेरियनमें छह लेखों की एक श्रृंखला से उनके पत्रकारिता कर्म की शुरुआत हुई. इन लेखों में उनके एक सजग आलोचक रूप के दर्शन होते हैं. बाद में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गाँधीजी ने पत्रकारिता के माध्यम से जो भूमिका निभाई, भारतीय जनमानस और पत्रकारों को जिस रूप में उद्वेलित किया वह भारतीय पत्रकारिता के इतिहास की एक धरोहर है. गाँधीजी के सत्य और अहिंसा के विचारों की गहरी छाप हिंदी अखबारों पर खास तौर पर पड़ी. उस दौर में हिंदी के अधिकांश पत्रकार-संपादक स्वतंत्रता सेनानी भी थे.

जहाँ गाँधी जी के द्वारा संपादित पत्रों- यंग इंडिया, नवजीवन, हरिजन आदि की चर्चा होती है, वहीं इंडियन ओपिनियन पत्र के साथ उनके जुड़ाव हमारे विचार-विमर्श में शामिल नहीं हो पाता, कहीं ना कहीं छूट जाता है. असल में, दक्षिण अफ्रीका में अपने प्रवास (1893-1914) के दौरान गाँधी जी ने इंडियन ओपिनियन के साथ जुड़ कर अपने विचारों की धार को तेज किया, जो बाद के उनके सत्याग्रह और पत्रकारीय कर्म में काफी महत्वपूर्ण साबित हुआ था. गाँधीजी ने अपनी आत्मकथा में इस पत्र के बारे में लिखा है: मनसुखलाल नाजर इसके संपादक बने. पर संपादन का सच्चा बोझ तो मुझ पर ही पड़ा.दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह की लड़ाई, भारतीयों के अस्मिता संघर्ष में इस पत्र की केंद्रीय भूमिका थी. उन्होंने इस बात को रेखांकित किया है कि इंडियन ओपिनियन के बिना सत्याग्रह असंभव होता.

वर्ष 1903में इंडियन प्रिंटिंग प्रेस से निकलने वाला यह एक बहुभाषी पत्र था. अंग्रेजी के अलावे गुजराती में यह पत्र प्रकाशित होता था. साथ ही कुछ समय तक यह तमिल और हिंदी में भी छपा. इतिहासकार उमा धुपेलिया मिस्त्री ने नोट किया है कि इस पत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना तब घटी जब गाँधी ने वर्ष 1904 में इसे डरबन से 24 किलोमीटर दूर फीनिक्स के सौ एकड़ फॉर्म में पुर्नस्थापित किया. यह गाँधी पर लियो टॉलस्टाय और जॉन रस्किन का प्रभाव दिखलाता है...इंडियन ओपनियन का इतिहास फीनिक्स आश्रम से साथ अंतर्गुंफित है.यह विचार प्रधान साप्ताहिक समाचार पत्र भारत, अफ्रीका और ब्रिटेन में मौजूद पाठकों को लक्षित था. पत्र का मुख्य लक्ष्य पाठकों में चेतना का विकास और नैतिक बल विकसित करना था. इसके लिए गाँधीजी इंडियन ओपिनियन में सदूर देशों के पत्रों से संकलित सार संग्रह को प्रकाशित किया करते थे. पत्र की भाषा उन्होंने सहज और सरल रखी. विचारों और खबरों के संप्रेषण और संपादन के लिए जो तरीका उन्होंने अपनाया वह साम्राज्यवाद विरोधी और मशीनी दखल से जिरह करता हुआ नजर आता है.

वर्ष 2013 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से छपी, इतिहासकार इसाबेल हॉफ्मायर की किताब गाँधीज प्रिंटिंग प्रेस: एक्सपेरिमेंट इन स्लो रीडिंगमें इस बात की विस्तार से चर्चा है कि किस तरह गाँधी ने खबरों के उत्पादन, प्रसारण और पढ़ने के तरीकों के लिए धीमी गति की पत्रकारिता पर जोर दिया. वे अपने लेखों में पाठकों को समाचारपत्र पढ़ने की गति धीमी रखने और पाठ को बार-बार पढ़ने को कहते थे. पाठकों के मनन और चिंतन उनकी चिंता के केंद्र में था. यह सब गाँधीजी के सत्याग्रही तेवर को दिखाता है. वे हर पाठक में एक सत्याग्रही की संभावना देखते थे. उल्लेखनीय है कि गाँधी ने इंडियन ओपिनियन के गुजराती के पाठकों के लिए ही पैफलेंट के रूप में हिंद स्वराज की रचना की थी, जहाँ पाठक और संपादक के बीच संवाद प्रमुख है.

सवाल है कि गाँधी जी की धीमी पत्रकारिता के प्रयोग को हम किस रूप में देखें. सोशल मीडिया और न्यूज चैनल आज भी सच दिखाने, सच के साथ खड़े होने, सत्ता से सच बोलने की बात करते हैं. जाहिर है उनका आग्रह भी सत्य के साथ ही है, पर गाँधी के सत्याग्रह के ये कितने करीब कहे जा सकते हैं? ‘फेक न्यूजके इस दौर में मुख्यधारा की पत्रकारिता की जवाबदेही राष्ट्र-राज्य और नागरिक समाज के प्रति पहले से कहीं ज्यादा है. पर क्या तथ्य से सत्य की प्राप्ति पर उनका जोर है? गाँधीजी ने ऐसी पत्रकारिता की परिकल्पना की थी जो राज्य और बाजार के दवाब से मुक्त हो. सवाल यह भी है कि आज का पाठक/दर्शक खुद को पत्रकारिता के पूरे परिदृश्य कहाँ खड़ा पाता है?

(जनसत्ता, 27 जुलाई 2019)

Tuesday, July 09, 2019

समांतर सिनेमा के पचास साल

पिछले दशक में दिल्ली में ओसियान फिल्म महोत्सव हुआ करता था, जिसमें एशिया और अरब सिनेमा का मेला लगता था. समांतर सिनेमा के पुरोधा, मणि कौल, ओसियान के क्रिएटिव डायरेक्टर थे. वर्ष 2008 में आर्थिक मंदी के बाद ओसियान महोत्सव को बंद करना पड़ा और दिल्ली में इस बड़े स्तर पर फिर से कोई सिनेमा का महोत्सव आयोजित नहीं हो सका. वे उन दिनों समांतर और मुख्यधारा के फिल्मकारों के बीच संवाद की कोशिश में थे.
असल में, इस साल हिंदी के न्यू वेव सिनेमा या समांतर सिनेमा के पचास साल पूरे हो रहे हैं. ‘फिल्म फाइनेंश कारपोरेशन’ से कर्ज लेकर मणि कौल ने 1969 में प्रयोगधर्मी फिल्म ‘उसकी रोटी’ बनाई थी. मृणाल सेन की ‘भुवन सोम’ और बासु चटर्जी की ‘सारा आकाश’ फिल्म के साथ इस फिल्म को समांतर सिनेमा की धारा शुरु करने का श्रेय दिया जाता है.
याद आया कि वर्ष 2006 के महोत्सव के दौरान मैंने मणि कौल से उनकी फिल्मों, समांतर और मुख्यधारा की फिल्मों के बीच रिश्ते और ऋत्विक घटक के बारे में लंबी बातचीत की थी. मणि कौल ने कहा था कि उन्हें मोहन राकेश की इस कहानी में जो इंतजार और विछोह है, काफी प्रभावित किया था. उन्होंने कहा था कि ‘यह इंतजार हमें अनुभवजन्य समय से दूर ले जाता है, जहाँ एक मिनट भी एक घंटा हो सकता है.’ बाद में जब वे संगीत की शिक्षा ले रहे थे (वे ध्रुपद के सिद्ध गायक थे), तब सम और विषम के अंतराल में इस बात को काफी अनुभव करते थे. उनकी फिल्मों- उसकी रोटी, आषाढ़ का एक दिन और दुविधा में स्त्रियों के द्वारा विभिन्न देश-काल में इस इंतजार का चित्रण मिलता है. साथ ही 'ध्रुपद' और 'सिद्धेश्वरी' फिल्म में संगीत के प्रति उनका लगाव दिखता है. मणि कौल साहित्य, संगीत और सिनेमा के बीच सहजता से आवाजाही करते थे.
हिंदी के चर्चित रचनाकार उदय प्रकाश ने पिछले दिनों एक बातचीत के दौरान मणि कौल की इसी सहजता को रेखांकित करते हुए मुक्तिबोध पर बनी उनकी फिल्म ‘सतह से उठता आदमी’ का उदाहरण दिया था और कहा था कि ‘मणि ही मुक्तिबोध को दाल-भात खाता हुआ दिखा सकते थे.’
सत्यजीत रे ने मणि कौल और समांतर सिनेमा के एक और प्रतिनिधि फिल्मकार कुमार शहानी की फिल्मों पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि इनकी फिल्मों में ऋत्विक घटक की तरह ही ‘ह्यूमर’ नहीं मिलता. ये दोनों एफटीआईआई, पुणे में घटक के शिष्य थे. पर निजी मुलाकातों में मणि कौल बेहद मजाकिया थे. बातचीत में उन्होंने हँसते हुए कहा था- ‘मुझसे ज्यादा एक्सट्रीम में बहुत कम लोग गए. जितनी फिल्में बनाई, सारी फ्लॉप!’ मणि कौल की फिल्में हिंदी सिनेमा को एक कला के रूप में स्थापित करती है. जरूरत है कि आधी सदी के बाद मणि कौल की फिल्मों का पुनरावलोकन हो ताकि हिंदी सिनेमा के इतिहास की इस महत्वपूर्ण धारा से नई पीढ़ी रू-ब-रू हो और मुख्यधारा के फिल्मकारों के साथ एक संवाद संभव हो सके. 
(प्रभात खबर, 9 जुलाई 2019)

Friday, July 05, 2019

समांतर सिनेमा की राह

कुमार शहानी मीता वशिष्ठ के साथ

सन 2010 की गर्मी के मौसम में हम पुणे स्थित फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआइआइ) में फिल्म एप्रीसिएशन कोर्स करने गए थे. उस दौरान समांतर सिनेमा के अग्रणी निर्देशक मणि कौल हमारे बीच सिनेमा को लेकर विचार-विमर्श करने आए थे. वे जितना फिल्मकार थे, उससे ज्यादा एक कुशल शिक्षक थे. अन्य बातों के अलावे उन्होंने एक बात और कही थी कि कभी आँख बंद कर भी आप लोग फिल्म देखने की कोशिश कीजिएगा’! असल में, वे हमें फिल्म में ध्वनि की बारीकियों को पकड़ने की सीख दे रहे थे.

मणि कौल एक प्रयोगधर्मी फिल्मकार थे. पचास वर्ष पहले 1969 में उन्होंने मोहन राकेश की कहानी उसकी रोटीपर फिल्म बनाई. साथ ही इसी साल मृणाल सेन की भुवन सोमऔर बासु चटर्जी की सारा आकाशफिल्म भी आई. कम बजट की इन फिल्मों में सितारों या स्टारपर जोर नहीं था. फिल्मकारों ने साहित्यिक कृतियों को कथा के लिए चुना. बिंब और ध्वनि के सुरूचिपूर्ण इस्तेमाल ने इन फिल्मों को व्यावसायिक सिनेमा से अलग एक खास पंक्ति में ले जाकर खड़ा किया. यहीं से हिंदी में 'न्यू वेव सिनेमा' या समांतर सिनेमा की शुरुआत मानी गई.

इस धारा की फिल्म के निर्माण-निर्देशन में एफटीआइआइ के युवा छात्र अगुआ थे. सन 1960 में ही एफटीआइआइ की स्थापना हुई थी. फिल्म के अध्येता मणि कौल और कुमार शहानी जैसे निर्देशक और के के महाजन जैसे कैमरामैन की भूमिका को रेखांकित करते रहे हैं. उल्लेखनीय है कि इस संस्थान के शुरुआत में ही ऋत्विक घटक जैसे निर्देशक शिक्षक के रूप में जुड़ गए थे, जिन्होंने युवा फिल्मकारों में एक नई दृष्टि और सिनेमा की समझ विकसित की.

फिर 1972 में निर्मल वर्मा की कहानी माया दर्पणपर इसी नाम से फिल्म बना कर हिंदी सिनेमा में फॉर्मके प्रति एकनिष्ठता को लेकर एक विमर्श खड़ा करने वाले कुमार शहानी, मणि कौल के सहपाठी थे. वे बातचीत में ऋत्विक घटक की फिल्म मेघे ढाका ताराफिल्म को शिद्दत से याद करते हैं. साथ ही समांतर सिनेमा के परिप्रेक्ष्य में जिस 'एपिक फॉर्म' की चर्चा होती है उसे वे घटक से प्रेरित मानते हैं. मणि कौल और कुमार शहानी फ्रेंच न्यू वेव और खास कर चर्चित फ्रेंच फिल्म निर्देशक रॉबर्ट ब्रेसां से भी काफी प्रभावित थे.


मुख्यधारा का सिनेमा हमेशा से ही बड़ी पूंजी की मांग करता है और वितरक प्रयोगशील सिनेमा पर हाथ डालने से कतराते रहते हैं. सन 1969 में ही फिल्म फाइनेंस कारपोरेशनने प्रतिभावान और संभावनाशील फिल्मकारों की ऑफ बीटफिल्मों को कर्ज देकर सहायता पहुँचाने का निर्देश जारी किया था. इसका लाभ मणि कौल जैसे निर्देशक उठाने में सफल रहे. इसी दौर में हिंदी के अतिरिक्त क्षेत्रीय भाषाओं मसलन, मलयालम, बांगला, कन्नड़ आदि में भी कई बेहतरीन फिल्में बनी जो दर्शकों के सामने एक अलग भाषा और सौंदर्यबोध लेकर आई. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन फिल्मों की आज भी चर्चा होती है.

समांतर सिनेमा से जुड़े फिल्मकारों के लिए 70 और 80 का दशक मुफीद रहा. हालांकि इन फिल्मों की आलोचना एक बड़े दर्शक तक नहीं पहुँच पाने की वजह से होती रही है. उसी दौर में सत्यजीत रे ने फिल्म को मास मीडिया मानते हुए एक अलहदा दर्शक वर्ग के लिए फिल्म बनाने के विचार की आलोचना की थी. उन्होंने 'भुवन सोम' के बारे में कटाक्ष करते हुए सात शब्दों में फिल्म का सार इस तरह लिखा था- बिग बैड ब्यूरोक्रेट रिफार्मड बाय रस्टिक बेल’. वे माया दर्पणसे भी बहुत प्रभावित नहीं थे. पर मृणाल सेन, मणि कौल, कुमार शहानी जैसे फिल्मकार, सत्यजीत रे से अलग रास्ता अपनाए हुए थे और अपनी फिल्मों में प्रयोग करने से कभी नहीं हिचके. वे चाहते थे कि उनकी फिल्में देखकर दर्शक उद्वेलित हों. पॉपुलर सिनेमा की तरह उनकी फिल्में हमारा मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि संवेदनाओं को संवृद्ध करती हैं.

फिल्मों के बदलते स्वरूप और उसके दर्शक वर्ग के मसले पर अब विचार होने लगा है. कुमार शहानी ने बताया कि मॉल में बने मल्टीप्लेक्स सिनेमा हॉल उनकी फिल्मों के प्रदर्शन के उपयुक्त नहीं है जहां लोग खाने-पीने और खरीदारी के लिए ज्यादा जाते हैं. पिछले कुछ वर्षों में नेटफ्लिक्स, हॉटस्टार और अमेजन प्राइम जैसे वेबसाइटों ने फिल्म निर्माण और वितरण को काफी प्रभावित किया है. लेकिन चूंकि इन वेबसाइटों पर समांतर फिल्मों की उपलब्धता आसान हो गई है, इसलिए इनके आने के बाद युवा वर्ग में एक बार फिर से समांतर फिल्मों के प्रति रूचि जगी है. साथ ही भूमंडलीकरण के साथ आई नई तकनीक ने कई युवा फिल्मकारों को प्रयोग करने का मौका दिया है.

आज कई समकालीन फिल्म निर्देशकों मसलन अमित दत्ता, गुरविंदर सिंह, अनूप सिंह आदि की फिल्मों में समांतर सिनेमा के पुरोधाओं की छाप स्पष्ट दिखाई देती है. सिनेमा को एक कला माध्यम के रूप में प्रतिष्ठित करने में इन प्रयोगशील फिल्मकारों की भूमिका ऐतिहासिक है.

(जनसत्ता, 5 जुलाई 2019)