Tuesday, November 20, 2018

उम्मीद-ए-सहर की बात


दीवाली के हफ्ते भर पहले से पांच साल की कैथी कुछ पंक्तियां गुनगुना रही थी- चकरी, बम, हवाई इनसे बचना भाई/ दीवाली आयी, खुशियों की बहार है लायी. मैंने उससे पूछा कि कहां से सीखी? उसने कहा कि स्कूल में मैडम ने सिखाया. फिर उसने मुझे दीवाली में बम-पटाखों से होने वाले ध्वनि और वायु प्रदूषण, बड़े-बूढ़ो को आने वाली दिक्कतें और इसकी वजह से जानवरों के अंदर होने वाले भय के बारे में बताया. आश्चर्य हुआ मुझे कि उसने मुझसे ग्रीन पटाखों के बारे में बात की और कहा कि अगले साल से हम उसे जलायेंगे.

 उच्चतम न्यायालय ने इस साल दिल्ली-एनसीआर में पटाखों की ब्रिकी और इस्तेमाल पर रोक लगा दिया था और सिर्फ ग्रीन पटाखे की इजाजत दी थी.

 साथ ही रात आठ से दस बजे के बीच ही पटाखे फोड़ने की समय सीमा तय कर दी थी. काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च के नेशनल इनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट की वैज्ञानिक डॉक्टर साधना रायलु से फोन पर जब मैंने पिछले दिनों बात की थी, तब उन्होंने स्पष्ट कहा था कि वर्तमान में भारत में ग्रीन पटाखों का उत्पादन नहीं होता है.

 इस दीवाली कैथी ने कोई भी पटाखा खरीदने की जिद नहीं की. पर दीवाली की रात ऐसा लगा कि उच्चतम न्यायालय के आदेश की अवहेलना जम कर हुई और लोगों ने मन से आतिशबाजी की. मीडिया में जो रिपोर्ट आयी, उसमें मास्क पहन कर लोग पटाखे जलाने में मशगूल दिखे. जाहिर है पहले से ही दिल्ली की प्रदूषित हवा, दीवाली की सुबह अवैध पटाखोंकी वजह से फैली गर्दो-गुबार से और भी प्रदूषित हुई.

 क्या पर्यावरण की चिंता सिर्फ न्यायालय की है? क्या इसमें नागरिकों और नागरिक समाज की कोई भूमिका नहीं है? स्पष्ट है कि न्यायालय की बात और आदेश का असर आम नागरिकों पर नहीं पड़ा और राजनीतिक पार्टियों में भी पर्यावरण के मुद्दों पर कोई आम सहमति नहीं दिखती. 

मैं कई ऐसे बुर्जुगों को जानता हूं जो दशकों से दिल्ली में रहते आए हैं, पर हाल के वर्षों में, दीवाली के दौरान, दिल्ली-एनसीआर छोड़ कर हफ्ते-दस दिन के लिए शहर से बाहर चले जाते हैं.  पर उनका क्या हाल है जो शहर छोड़ने में असमर्थ हैं? उन गर्भवती महिलाओं और गर्भ में पल रहे बच्चों की किसे चिंता है जो  प्रदूषण की मार झेल रहे हैं?

मुझे ऐसा लगा कि पांच साल की एक बच्ची जो बात आसानी से समझ सकती है, वह तथाकथित पढ़े-लिखे मध्यवर्ग के पल्ले नहीं पड़ा. पर्यावरण उनकी चिंता का विषय है ही नहीं. खाओ, पीओ और ऐश करो को मंत्र की तरह दुहारने वाला और वर्तमान में जीने वाला यह वर्ग, भविष्य के प्रति न तो संवेदनशील है, न हीं समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदार. फिर उम्मीद किस से है? मेरी समझ से उम्मीद स्कूली शिक्षा ले रहे इन्हीं बच्चों से है.

(प्रभात खबर, 20 नंवबर 2018 को प्रकाशित)

Thursday, November 15, 2018

दिल्ली में दरभंगा घराना


किसी भी राज्य और समाज की आर्थिक बदहाली की कहानी सांस्कृतिक बदहाली से भी गहरे जुड़ी होती है. जहाँ आर्थिक बदहाली के आंकड़े अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री और मीडिया के लिए महत्वपूर्ण होते हैं वहीं सांस्कृतिक रुग्णता इनके सरोकार का हिस्सा नहीं बन पाते. यह स्थिति कहीं भी देखी जा सकती है. लेकिन अगर बिहार की बात करूँ तो जैसे-जैसे वहाँ की आर्थिक-राजनीतिक परिस्थितयाँ प्रतिकूल होती गई, सदियों पुरानी शास्त्रीय संगीत की परंपरा भी सिमटती चली गई. बिहार की राज्य सत्ता और समाज अपनी परंपरा को सहेज नहीं सका. इन सब बातों को लक्ष्य कर दरभंगा-अमता घराने में प्रशिक्षितध्रुपद के गायक और लेखक जर्मनी के पीटर पानके ने दरभंगा घराने के ऊपर लिखी अपनी किताब का नाम सिंगर्स डाई ट्वाइस रखा है.  ऐसा लगता है कि पिछली सदी में दरभंगा ध्रुपद घराने के चर्चित कलाकारों की इहलौकिक मौत के बाद बिहार राज्य और समाज की नजर में उनकी स्मृति शेष हो गई.

पर परंपरा से नि:सृत प्रतिभाएँ समय और स्थान से प्रभावित भले हो, विषम परिस्थितियों में भी वह अपना रास्ता तलाश लेती है. पिछले दिनों दिल्ली ध्रुपद घराने के युवा कलाकार प्रशांत और निशांत मल्लिक को सुनना अह्लादकारी अनुभव रहा. जहाँ बिहार की एक अन्य ध्रुपद शैली- बेतिया घराने की परंपरा सिमट रही हैवहीं दरभंगा घराना के युवा कलाकार देश-विदेश में एक बार फिर से अपनी छाप छोड़ रहे है. गौरतलब है कि दरभंगा ध्रुपद घराने के संगीतकार खुद को तानसेन की परंपरा से जोड़ते हैं.

दरभंगा संगीत घराना दरभंगा राज की छत्रछाया में 18वीं सदी से फलता-फूलता रहा. पर दरभंगा राज की जमींदारी के विघटन के बाद संरक्षण के अभाव में यह घराना दरभंगा से निकल कर इलाहाबादवृंदावनदिल्ली आदि जगहों पर फैलता गया.

कहते हैं कि सत्यजीत राय की फ़िल्म जलसाघर’ (1958) दरभंगा राज घराने से ही प्रेरित है. ध्रुपद गायक प्रेम मल्लिक के पुत्र और विदुर मल्लिक के पौत्र प्रशांत और निशांत इस घराने की तेरहवीं पीढ़ी के गायक हैं. हालांकि जब मैंने प्रशांत और निशांत मल्लिक के ध्रुपद कार्यक्रम के आख़िर में विद्यापति’ सुनने की फरमाइश की तो उनका कहना था कि ध्रुपद शैली पर यह प्रोग्राम आयोजित किया गया है और मंच को देखते हुए यह उचित नहीं. उन्होंने मुझे यह कहीं और सुनाने की बात कहीं. निश्चित रूप से इसके पीछे कोई वाजिब वजह होगी.

दरअसल, दरभंगा घराना के संगीतज्ञ अपनी गायकी के आख़िर में विद्यापति के पद गाया करते थे और इस वजह से ही मैंने फरमाइश की थी. दो साल पहले जब मैं दरभंगा घराने के वयोवृद्ध गायकसंगीत नाटक अकादमी से पुरस्कृत पंडित अभय नारायण मल्लिक से मिला था तब उन्होंने भी मुझे उगना रे मोर कतय गेला’ गाकर सुनाया था. शायद ये उनकी परंपरा थी. दरभंगा घराने के गायक जिस रागात्मकता से ध्रुपद गाते थे उसी रागात्मकता से विद्यापति के पद भी. मल्लिक बंधुओं की प्रस्तुति सुन कर मुझे ऐसा लगा कि उनके गायन में ध्रुपद का नोम-तोम था पर मैथिल मिठास गायब थी. साथ ही उस लयकारी का अभाव था जिसकी वजह से दरभंगा घराना पूरे देश में पिछले तीन सौ वर्षों में अपनी विशिष्टता बनाए रखा.

ध्रुपद गायकी की चार शैलियां- गौहरडागरखंडार और नौहर में दरभंगा गायकी गौहर शैली को अपनाए हुए है. इसमें आलाप चार चरणों में पूरा होता है और जोर लयकारी पर होता है. ध्रुपद के साथ-साथ इस घराने में खयाल और ठुमरी के गायक और पखावज के भी चर्चित कलाकार हुए हैं. पखावज के नामी वादक पंडित रामाशीष पाठक दरभंगा घराने से ही थे. ध्रुपद के सिरमौर राम चतुर मल्लिक (पद्मश्री) के बारे में बड़े-बड़े संगीत साधक आज भी आदर से बात करते हैं. संगीत समीक्षक गजेंद्र नारायण सिंह (पद्मश्री) ने उनके बारे में लिखा है- रामचतुर दरअसल गानचतुर थे. गायकी की हर विधा पर उनकी ज़बरदस्त पकड़ थी.
रामचतुर मल्लिक के छोटे भाई विधुर मल्लिक 80 के दशक में वृदांवन चले गए और वहाँ पर उन्होंने ध्रुपद एकेडमी की स्थापना की थी. वर्ष 2002 में उनकी मौत हो गई. बातचीत के दौरान प्रशांत मल्लिक ने बताया कि हर राज्य के आयोजक और वहाँ के सांस्कृतिक विभाग अपने राज्य के कलाकारों को पहले आगे करते हैं, लेकिन अफसोस यह है कि बिहार सरकार और बिहार के आयोजकों ने कभी अपने कलाकारों की अहमियत नहीं समझी.’ बहरहाल, निस्संदेह विधुर मल्लिक ने कई योग्य शिष्यों को ध्रुपद गायकी में प्रशिक्षित किया जिनमें पंडित सुखदेव चतुर्वेदी और पंडित वृज मोहन गोस्वामी आदि प्रमुख हैं. पर यह यह घराना अपने सामाजिक आधार का विस्तार नहीं कर सका.

मशहूर शास्त्रीय संगीतकार और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता टीएम कृष्णा कर्नाटक संगीत में सामाजिक विस्तार और समरसता की वकालत करते हैं, ताकि शास्त्रीय संगीत में वर्ग और जाति के वर्चस्व को तोड़ा जा सके. समकालीन हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की भी यह ज़रूरत है. दरभंगा घराना यदि इस दिशा में पहल करे तो उसकी परंपरा की जड़ और मजबूत होगी.
(जनसत्ता, 15 नवंबर 2018 को, संस्कृति और सरोकार शीर्षक से प्रकाशित)

Thursday, November 08, 2018

बेख़ुदी में खोया शहर-एक पत्रकार के नोट्स

मेरी किताब बेख़ुदी में खोया शहर-एक पत्रकार के नोट्स' की प्री बुकिंग हो रही है।  अमेज़न से आप ख़रीद सकते हैं। किताब अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली से छपी है।

https://www.amazon.in/dp/B07K3CDC5J

किताब के बारे में: 


यह किताब वैचारिक लेखन में बहुआयामी है। लेखक की संवेदनशील दृष्टि, विषय-वस्तु का दायरा, मार्मिक अंदाज़ और सहज भाषा एक अलग आस्वाद लिए है जिसे लेखन की किसी एक विधा में अंटाया नहीं जा सकता।

संकलित लेखों में निजीपन, व्यक्ति विशेष, लोक-शहर के प्रति अनुराग एकाधिक बार है। लंदन, पेरिस, वियना, शंघाई, कोलंबो, दिल्ली, बंगलुरु, पुणे, श्रीनगर के साथ-साथ मैकलोडगंज, मगध, मिथिला व बेलारही, तिलोनिया, तरौनी जैसे गाँव भी हैं। जेएनयू और जिगन विश्वविद्यालय भी है। ग्लोबलऔर लोकलकी इस घुमक्कड़ी में जहाँ कुछ पहचाने चेहरे हैं, वहीं कुछ अनजाने राही। समंदर की आवाज़ के साथ-साथ डबरा, चहबच्चा की अनुगूंज भी है। होटल-रेस्तरां के साथ-साथ ढाबा भी।

इन पन्नों में समंदर पार से लहराती आती रेडियो की आवाज़ है। उदारीकरण के बाद अख़बार के पन्नों पर फैली ख़ुश ख़बरहै। न्यूज़रूम नेशनलिज्मकी आहट भी। बॉलीवुड का स्थानीय रंग है, हिंदुस्तानी और लोक संगीत की मधुर धुन है, साथ ही नौटंकी का शोक गीत भी। मिट्टी पर बने कोहबर की ख़ुशबू एक तरफ़ है, हवेलियों में बिखरते भित्तिचित्र दूसरी तरफ़।

उदास गिरगिट से बात करता हुआ एक विद्रोही कवि है। हाथ पकड़ कर सिखाने वाला एक कबीरा पत्रकार है। स्वभाव के विपरीत नहीं जाने की सलाह देने वाला एक फक्कड़ फ़िल्मकार भी। एक तरफ़ नॉस्टेल्जिया, स्मृति और विस्मृति के गह्वर हैं, दूसरी तरफ़ वर्तमान का यथार्थ है और भविष्य के रोशनदान भी।

उदारीकरण और भूमंडलीकरण के दौर में, 21वीं सदी के दो दशकों के बीच, लिखे गए इन लेखों में एक पत्रकार और शोधार्थी का साझा अनुभव है। वादी स्वर एक ब्लॉगर का है। शैली-मैंऔर टोका-टोकीकी है।

किताब अंश: 

https://satyagrah.scroll.in/article/122229/book-excerpts-bekhudi-mein-khoya-shahar-ek-patrakar-ke-notes-writer-arvind-das

https://www.thelallantop.com/bherant/book-excerpts-bekhudi-mein-khoya-shahar-ek-patrakar-ke-notes-by-arvind-das/

https://www.jankipul.com/2018/11/special-write-up-on-baba-nagarjun.html



Tuesday, October 30, 2018

बीते जमाने की तस्वीर

मौसम चाहे बहार का हो या पतझड़ का, वह आपके मन और मिजाज पर प्रभाव डालता है. इसलिए कवियों के यहाँ वसंत, या कह लें कि उम्मीद के मौसम का जिक्र ज्यादा होता है. मनोवैज्ञानिक भी इस बात पर जोर देते हैं कि सुबह-शाम, धूप-छांव के कारण पड़नेवाला असर मौसमी रोगों को बढ़ावा देते हैं. 
बहरहाल, जैसे ही ठंड की दस्तक हवाओँ में होती है मैं थोड़ा सा उदास और थोड़ा नॉस्टेलजिक होने लगता हूँ. मन बचपन की स्मृतियों, यानी गांव की ओर लौटने लगता है. हम जैसे प्रवासियों के लिए यह मौसम दशहरा, दीवाली, छठ की यादें लेकर आता है और आँखें भींग जाती है.
पिछले दिनों पटना से मेरी मौसी ने माँ-पापा की एक धुंधली सी तस्वीर की मोबाइल से ली गई तस्वीर भेजी, जो 27 साल पुरानी थी. माँ-पापा की एक साथ पुराने जमाने की ऐसी तस्वीर बमुश्किल एक-दो ही हैं. कहते हैं कि तस्वीर बीते समय के साथ एक समझौते की तरह होती है. जैसे ही मैंने माँ को यह तस्वीर दिखाई, माँ चौंक कर बोली- यह तो मैं हूँ. फिर उसने कहा कि मैंने इसे अपनी साड़ी से पहचाना.
मेरे लिए यह तस्वीर कवि आलोकधन्वा की कविता से भी जुड़ती है- एक जमाने की कविता. पापा जब भी गाँव आते, माँ के लिए साड़ी लाते थे. आलोकधन्वा ने लिखा है- माँ जब भी नयी साड़ी पहनती/गुनगुनाती रहती/हम माँ को तंग करते/ उसे दुल्हन कहते/माँ तंग नहीं होती/ बल्कि नया गुड़ देती/गुड़ में मूँगफली के दाने भी होते. 
पापा इन दिनों अस्वस्थ रहने लगे हैं. तस्वीर देख कर माँ ने कहा- आदमी भी क्या से क्या हो जाता है! मैंने आलोकधन्वा से फोन करके पूछा कि एक ज़माने की कवितापढ़ते हुए मैं भावुक हो गया, क्या लिखते हुए आप भी भावुक हुए थे? उन्होंने कहा- स्वाभाविक है. कविता अंदर से आती है. मेरी माँ 1995 में चली गई थी, जिसके बाद मैंने यह कविता लिखी. अब माँ तो सिर्फ एक मेरी ही नहीं है. भावुकता स्वाभाविक है.
मैंने उनसे कहा कि आपने लिखा है-माँ थी अनपढ़ लेकिन उसके पास गीतों की कमी नहीं थी/ कई बार नये गीत भी सुनाती/रही होगी एक अनाम ग्राम कवि'. जब मैंने उनसे कहा कि मेरी माँ भी गाना गाती थी (है) शाम में और अक्सर पापा उससे गाना सुनने की फरमाइश करते. तो इस पर उन्होंने कहा कि देखिए आप मेरी ही बात कह रहे हैं. फिर मैंने पूछा कि क्या यह नॉस्टेलजिया नहीं है? तब उन्होंने जवाब दिया कि नहीं, यह महज नॉस्टेलजिया नहीं है.
आलोकधन्वा ने कहा कि जो आदमी माँ से नहीं जुड़ा है, अपने नेटिव से नहीं जुड़ा है वह इसे महसूस नहीं कर सकता है. वह इस संवेदना को नहीं समझ सकता है. अपने नेटिव से जुड़ाव हर बड़े कवि के यहाँ मिलता है. चाहे वह विद्यापति हो, रिल्के हो या नेरुदा. मुझे याद हो आया कि बाबा नागार्जुन ने भी लिखा है- याद आता मुझे अपना वह तरौनी ग्राम…’

(प्रभात खबर, 30 अक्टूबर 2018, कुछ अलग कॉलम के तहत प्रकाशित)

Tuesday, September 18, 2018

सबाल्टर्न स्वर का सौंदर्य: कविता वीरेन


नवारुण प्रकाशन से प्रकाशित
समकालीन हिंदी कविता की बनावट और बुनावट दोनों पर लोक की छाप स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है. लोक की यह परंपरा निराला-मुक्तिबोध-नागार्जुन-केदारनाथ सिंह से होकर अरुण कमल-मंगलेश डबराल-आलोकधन्वा-वीरेन डंगवाल तक जाती है. हालांकि समाज के अनुरूप और समय के दबाव के फलस्वरूप लोक चेतना के स्वर और स्वरूप में अंतर स्पष्ट है.

नवारुण प्रकाशन से हाल ही में प्रकाशित वीरेन डंगवाल (1947-2015) की संपूर्ण कविताओं की किताब-कविता वीरेन, को पढ़ते हुए यह बोध हमेशा बना रहता है. उनकी कविता का स्वर और सौंदर्य समकालीन कवियों से साफ अलग है. मंगलेश डबराल ने इस किताब की लंबी भूमिका में ठीक ही नोट किया है: “...रामसिंह, पीटी ऊषा, मेरा बच्चा, गाय, भूगोल-रहित, दुख, समय और इतने भले नहीं बन जाना साथी जैसी कविताओँ ने वीरेन को मार्क्सवाद की ज्ञानात्मक संवेदना से अनुप्रेरित ऐसे प्रतिबद्ध और जन-पक्षधर कवि की पहचान दे दी थी, जिसकी आवाज अपने समकालीनों से कुछ अलहदा और अनोखी थी और अपने पूर्ववर्ती कवियों से गहरा संवाद करती थी.उनकी कविताओं में जो चीजें सबाल्टर्नचेतना से लैस है, साधारण दिखती है वह गहरे स्तर पर जाकर हमारे मन के अनेक भावों को एक साथ उद्वेलित करने की क्षमता रखती है. अधिकांश कविताएँ 1980 के बाद की हैं. अपने समय और समाज से साक्षात्कार करती ये कविताएँ आत्मीय और सहज है. यह सहजता कवि के सायास कोशिश से ही संभव है. उन्हीं के शब्दों में:  एक कवि और कर ही क्या सकता है/सही बने रहने की कोशिश के सिवा.

वीरेन की कई कविताएँ जन आंदोलनों के लिए गीत बन चुकी हैं, ऐसे ही जैसे गोरख पांडेय की कविताएँ. उनकी मात्र तीन कविता संग्रह प्रकाशित हुई थी.  इस समग्र में तीनों संग्रहों के लिए लिखी गई भूमिका को भी शामिल किया गया है. दुष्चक्र में स्रष्टा’, जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, में शामिल इन पंक्तियों में- किसने आखिर ऐसा समाज रच डाला है/ जिसमें बस वही दमकता है, जो काला है?’क्षोभ और हताशा है. पर कवि उजले दिन जरूर आएँगेको लेकर आश्वस्त भी है. मैं नहीं तसल्ली झूठ-मूठ की देता हूँ/हर सपने के पीछे सच्चाई होती है/हर दौर कभी तो खत्म हुआ ही करता है/ हर कठिनाई कुछ राह दिखा ही देती है’, ये आशा और संघर्ष उनकी कविता का मूल स्वर भी है.

परमानंद श्रीवास्तव ने 1990 में समकालीन हिंदी कवितानाम से एक किताब लिखी थी जिसे साहित्य अकादमी ने छापा था. सभी प्रमुख समकालीन कवि और उनकी कविताएँ इसमें शामिल हैं. कॉलेज के दिनों में जब मैं हिंदी साहित्य का छात्र नहीं था तब मेरे लिए यह एक रेफरेंस बुक की तरह था और इस किताब में शामिल समकालीन कवियों की कविताएँ ढूंढ़ कर पढ़ता था. आश्चर्य है कि इस किताब में वीरेन नहीं हैं. मेरी मुलाकात वीरेन की कविताओं से विश्वविद्यालय में जाकर ही हुई.

कविता वीरेनइस कमी को पूरा करता है. इस खूबसूरत संग्रह में उनकी असंकलित और कुछ नयी कविताओं के साथ नाजिम हिकमत की कविताओँ के अनुवाद भी शामिल है. इस किताब के सुरुचिपूर्ण प्रकाशन के लिए नवारुण प्रकाशन के कर्ता-धर्ता संजय जोशी बधाई के पात्र हैं.


(जानकीपुल पर प्रकाशित)

Wednesday, September 12, 2018

लोक नाट्य विधाओं की बदहाल स्थिति: रंगमंच पर नेटुआ


किसी मंत्र की तरह अक्सर ही यह सुनने को मिलता है कि लोक उत्सवधर्मी होता है। लेकिन जिन परंपराओं, लोकविधाओं के कारण लोक में उत्सव आकार लेता रहा है आधुनिकता के संसर्ग में उसका विघटन भी हुआ है, इस पर बात कम की जाती है। यह अच्छी बात है कि आधुनिक रंगमंच के कलाकारों के बीच इस तरह का मंथन चल रहा है। पिछले दिनों रतन वर्मा के लिखे नाटक नेटुआ करम बड़ा दुखदायीका दिलीप गुप्ता के निर्देशन में दिल्ली में मंचन हुआ। इस नाटक में बिहार की लोक नाट्य शैली, नेटुआ को लेकर आधुनिक मन में जो दुचित्तापन है, समाज में जेंडर को लेकर जो स्टिरियोटाइप है, कलाकारों के साथ जो भेदभाव है उसे नृत्य-संगीत के साथ प्रस्तुत किया गया। मौजूदा समय में लोक नाट्य शैली की बदहाली पर भी यह एक महत्वपूर्ण टिप्पणी है।
बिहार में नेटुआ एक प्रकार का नृत्य है जिसे पुरुष पात्रों के द्वारा स्त्री के भेष में किया जाता रहा है। पैरों में घुंघरू बांध, स्त्रियों की आंगिक भाव-भंगिमाओं से नर्तक लोक का मनोरंजन करते रहे हैं। मेरे बचपन की अनेक स्मृतियों में यह भी सुरक्षित है। अपने इलाके, मिथिला की बात करूं तो वहां इसे नटुआ कहा जाता था। शादी-ब्याह के अवसर पर शामियाने के नीचे या किसी पर्व-त्योहार पर चौकियां जोड़ कर मंच तैयार किया जाता था, जिस पर ये नर्तक नाचते थे। ढोल, ढाक और अन्य वाद्य यंत्रों के बीच नाचते पैर देखने वालों को अपने सम्मोहन में बांधे रखते थे। हिंदी फिल्मों के प्रसिद्ध गायक उदित नारायण अपने कई इंटरव्यू में इस बात का उल्लेख कर चुके हैं कि इन्हीं महफिलों, मंचों से निकल कर उन्होंने बॉलिवुड की ऊंचाइयों को छुआ है।
प्रसंगवश, छह-सात साल पहले मैंने मनोज वाजपेयी से पूछा था कि आप नेटुआलेकर मंच पर कब आ रहे हैं? उन्होंने कहा था- जल्दी ही। पर लगता नहीं कि वे मंच पर फिर लौटेंगे। रंगमंच से जुड़े एक मित्र कहते हैं कि अब वे कहां वापस लौटेंगे! फिल्मों से पहले 90 के शुरुआती वर्षों में उन्हें दिल्ली रंगमंच पर नेटुआनाटक से ही प्रसिद्धि मिली थी।
इसी तरहपिछले साल भारत रंग महोत्सव में नौटंकी की वर्तमान समाज में स्थिति, उसके उरूज और अवसान को लेकर भी एक नाटक का मंचन किया गया था। बात चाहे नौटंकी की हो, जात्रा की, तमाशा या भवाई की, आधुनिक समाज में लोक नाट्य विधाओं की जो स्थिति है, वह सुखद नहीं कही जा सकती।
जब से पॉपुलर कल्चर और खासतौर पर सिनेमा का प्रचार-प्रसार हुआ लोक में प्रदर्शनकारी कला के जो रूप चलन में थे वे हाशिये पर आ गए। जाहिर है सिनेमा के प्रचलन में आने से पहले और बाद के दशकों में भी ये लोक नाट्य विधाएं लोगों की रुचि और प्रोत्साहन की वजह से चलन में रहीं। अगर आज ये दर्शकों या मंच के लिए तरस रही हैं तो इसके लिए हमारा समय और समाज भी जिम्मेदार है।
सच तो यह है कि हमारे समाज में अभिनेताओं को वह स्थान कभी नहीं दिया गया जो साहित्यकारों या मूर्तिकारों को प्राप्त रहा है। आधुनिक काल में फिल्मों के अभिनेताओं की प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा अपवाद है। इसी बात को लक्ष्य कर संजीव के लिखे चर्चित उपन्यास सूत्रधारके नायक, भोजपुरी के प्रसिद्ध लोक कलाकार भिखारी ठाकुर क्षोभ के साथ कहते हैं: जिस साहित्य और साहित्यकार को वे इतनी बड़ी चीज मानते आए थे, वहां भी वही कनफुसुकिया और चपड़-चालाकी, वही डाह, वही बाभन-सूद चलता है क्या?’
असल में लोक कलाओं, नाट्य विधाओं से जुड़ने वाले अधिकांश कलाकार समाज के हाशिए पर रहने वाले समुदाय से आते रहे हैं। सामंती और पूंजीवादी समाज की जाति और वर्ग व्यवस्था इस कला के सम्यक मूल्यांकन और कलाकारों के प्रति संवेदनशील दृष्टि में बाधा बन कर उपस्थित रही है। पर नृत्य जीवन है और इसलिए लोक में यह स्वर हमेशा सुनाई पड़ता है-जे नाची से बाची।

(नवभारत टाइम्स के संपादकीय पेज पर 12 सितंबर 2018 को प्रकाशित) 

Tuesday, August 28, 2018

जहां बुढ़ापा एक रोग है


साल 2011 में अ सेपरेशननाम से एक फिल्म आयी थी, जिसे ईरान के मशहूर निर्माता-निर्देशक असगर फरहादी ने बनाई थी. तेहरान के एक मध्यवर्गीय परिवार को केंद्र में रख कर इस फिल्म के बहाने अल्जाइमर बीमारी के प्रति लोगों को संवेदनशील बनाया गया है. इस फिल्म को ऑस्कर पुस्कार से भी नवाजा गया.

अल्जाइमर बीमारी में लोग पुरानी बातें भूल जाते हैं, सोचने-समझने की क्रिया में परेशानी आती है. यहां तक कि लोग सगे-संबंधी को भी भूल जाते हैं. अनेक तरह की मानसिक और शारीरिक अक्षमता आ जाती है.

इसी तरह पार्किंसंस रोग में भी बीमार व्यक्ति स्मृति लोप का शिकार होता है, मानसिक बीमारियां घेर लेती हैं और अंत में व्यक्ति व्हील चेयरकी शरण में चला जाता है. इन बीमारियों की रोक-थाम के लिए जो दवाएं अभी बाजार में हैं, वह अपर्याप्त है.

करीब दस वर्षों से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी अल्जाइमर रोग से बुरी तरह पीड़ित थे. इसी वजह से वर्ष 2004 में प्रधानमंत्री पद छोड़ने के बाद उन्हें सार्वजनिक जीवन में नहीं देखा जाता था. इस बात का जिक्र उल्लेख एनपी ने अपनी किताब द अनटोल्ड वाजपेयी : पॉलिटिशियन एंड पैराडॉक्समें किया है. समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडिस भी वर्षों से अल्जाइमर से जूझ रहे हैं.

हिंदुस्तान में इन बीमारियों के प्रति लोगों में सूचना और  संवेदना का अभाव है. आर्थिक और मानसिक दोनों तरह की परेशानियों को वहन करना मध्यवर्गीय परिवारों के लिए आसान नहीं होता. हिंदी के चर्चित साहित्यकार स्वदेश दीपक जो बायपोलर डिसआर्डरके मरीज थे, इसका उदाहरण हैं. वे बारह वर्षों से लापता हैं. यदि आप स्वस्थ हैं, तो इस बात की कल्पना से ही सिहरन पैदा होती है कि एक दिन ऐसा भी आ सकता है, जब आपकी स्मृति आपका साथ ना दें. बढ़ती हुई उम्र में मस्तिष्क की कई कोशिकाओं के काम करने की गति धीमी हो जाती है.

एक आंकड़ा के मुताबिक भारत में करीब 40 लाख लोग भूलने की बीमारी (डिमेंशिया) से पीड़ित हैं और वर्ष 2035 तक यह संख्या दुगुनी हो जायेगी. भारत युवाओं का देश है. देश की जनसंख्या का 65 प्रतिशत 35 वर्ष से कम आयु के हैं, पर हमारी पीढ़ी जब बूढ़ी होगी, तो ये बीमारियां और बढ़ेंगी. पर क्या हम उसके लिए तैयार हैं?

पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी के पास हर तरह की सुख-सुविधा थी, लेकिन देश के बहुसंख्यक लोगों के पास ऐसी सुविधाएं नहीं हैं. बिना किसी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा के बुढ़ापा एक रोग बन कर सामने आता है. सरकार को चाहिए इन बीमारियों से पीड़ित बूढ़े-बेसहारों के देख-भाल की अलग से सुविधा का बंदोबस्त करे. साथ ही मेडिकल शोध पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए, ताकि भविष्य में इन बीमारियों का इलाज संभव हो सके. मेरी समझ से पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी के प्रति यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी!
 (प्रभात खबर, 28 अगस्त 2018 को प्रकाशित)

Sunday, August 12, 2018

आधुनिक मन और पुष्कर पुराण

भारत में फीचर फिल्मों का इस कदर बोलबाला है कि डॉक्यूमेंट्री फिल्में महज फिल्म समारोहों तक ही सिमट कर रह जाती हैं. न तो इन फिल्मों का ठीक से प्रदर्शन होता है और न ही समीक्षक चर्चा के लायक समझते हैं. आनंद पटवर्धन या अमर कंवर जैसे फिल्म निर्देशक अपवाद हैं, जिनकी डॉक्यूमेंट्री फिल्मों की चर्चा गाहे-बगाहे हो जाती है.
पिछले दिनों एक फिल्म समारोह में फिल्म निर्देशक कमल स्वरूप की डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘पुष्कर पुराण’ देखने का मौका मिला. यह फिल्म भगवान ब्रह्मा की नगरी और उससे जुड़े मिथक, किंवदंतियों के बहाने वर्तमान पुष्कर की आबोहवा में रची-बसी है. उल्लेखनीय है कि पूरी दुनिया में ब्रह्मा का एक मात्र मंदिर राजस्थान के पुष्कर में ही स्थित है.
कमल स्वरूप कहते हैं- ‘मैं फीचर फिल्म डॉक्यूमेंट्री की शैली में और डॉक्यूमेंट्री फीचर फिल्म की शैली में बनाता हूं.’ कमल अजमेर में पले-बढ़े हैं और आसपास के समाज, हिंदू धर्म और कर्मकांडों से बखूबी परिचित हैं. बाद में उन्होंने फिल्म और टेलीविजन संस्थान, पुणे से फिल्म निर्माण की बारीकियों को सीखा-समझा.
इस फिल्म का विचार पक्ष रॉबर्तो कलासो की बहुचर्चित किताब- ‘का : स्टोरीज ऑफ द माइंड एंड गॉड्स ऑफ इंडिया’ से प्रेरित है. हालांकि कमल कहते हैं कि उनके लिए विषय वस्तु (कंटेंट) ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि शैली (क्राफ्ट) है. यह बात इस डॉक्यूमेंट्री को देखने पर स्पष्ट भी हो जाती है. इसमें दृश्य, बिंब और ध्वनि का जिस तरह से संयोजन किया गया है, वह इसे लीक से हटकर एक सफल वृत्तचित्र (डॉक्यूमेंट्री) बनाता है. विभिन्न तरह की ध्वनियों का संयोजन इसे समकालीन वृत्तचित्रों से अलग श्रेणी में ले जाता है. 
साल 1988 में बनी कमल स्वरूप की क्लासिक फीचर फिल्म ‘ओम दर-ब-दर’ की पृष्ठभूमि भी पुष्कर ही है, पर यह वृत्तचित्र उस फिल्म से अलग है. ‘पुष्कर पुराण’ में वेद, पुराण और वैदिक समाज की चर्चा के साथ ही पुष्कर के आसपास के समकालीन समाज का निरूपण है. इस तरह यह फिल्म एक साथ लोक और शास्त्र दोनों की आवाजाही करती है. कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर पुष्कर में लगनेवाले विशाल पशु मेले के दृश्यांकन में यह बेहद खूबसूरती से दर्शकों के सामने आता है. 
इस फिल्म में संवाद बेहद कम हैं. फिल्मकार अपनी तरफ से लोक में मौजूद विश्वास, अंधविश्वास पर टीका-टिप्पणी नहीं करता है. इसमें आये अश्वमेघ प्रसंग और घोड़े की बलि की बात आधुनिक मन को भले ही विचलित करे, पर दर्शकों को भारतीय मिथक और उसके विश्लेषण को भी बाध्य करता है. धर्म के बाजार और पिछले कुछ वर्षों में पर्यटकों की आवाजाही से स्थानीय स्तर पर जो संबंधों में तनाव आया है, उसे भी यह वृत्तचित्र संग्रहित करते चलता है. आश्चर्य नहीं कि एक घंटा चालीस मिनट लंबी इस वृत्तचित्र में ‘कालबेलिया का नृत्य’ और ‘बैले’ को निर्देशक ने एक साथ समाहित किया है.
समाजशास्त्रियों व धर्म-मिथक अध्येताओं के लिए जहां यह एक प्रमुख अध्ययन की तरह है, तो वहीं दर्शकों व फिल्म निर्माण से जुड़े छात्रों के लिए एक ‘मास्टर क्लास’ की तरह है.

(प्रभात खबर, रवि रंग,  12 अगस्त 2018)

Saturday, July 21, 2018

बच्चों का किताबी कोना

आधुनिक स्मार्ट फोन, लैपटॉप, टीवी और इंटरनेट के दौर में बीतता आज का बचपन हमारे बचपन से अलहदा है. हमारे बचपन में किताबें भले ही नहीं थी, लेकिन दादी-नानी की कहानियां थीं. तकनीक आज के बचपन पर हावी है. हालांकि तकनीक की मार्फत बच्चे कार्टून, वीडियो की शक्ल में किस्से-कहानियों से ही ज्यादा जुड़ते हैं, माध्यम का फर्क भले हो.
पर माध्यम के बदलने से हमारे वात्सल्य का स्वरूप, बच्चों के साथ रिश्ता भी बदल जाता है. सच तो यह है कि जब हम बच्चों को किस्से-कहानियाँ सुनाते हैं तब हम अपने बचपन में भी लौटते हैं. एक तरह से हमारे लिए यह विरेचन की अवस्था होती है. जैसे कि बच्चे बार-बार हमें याद दिलाते रहते हैं कि ‘वे अब बड़े हो गए है...!’ यह उनका ‘बड़प्पन’ है और साथ ही हमारे लिए ताकीद भी कि हम उनके बचपन के घरौंदे में घुसें तो इस बात खयाल रखें!
रोमानिया मूल की जर्मनी में रहने वाली मेरी एक दोस्त, अमेलिया बोनेआ, इन दिनों काफी उत्साहित हैं. साथ ही थोड़ी सी घबराई हुई भी हैं. उन्हें चिंता है कि वह बच्चों के बीच कैसे एक कहानी का पाठ कर पाएंगी. वे कहती हैं कि अपनी बेटी को पढ़ाना और बात है, पर बच्चों के बीच पाठ का उन्हें कोई अनुभव नहीं है. वे इतिहासकार हैं. हाल ही में उन्होंने बच्चों के लिए ‘टेलीग्राफ और जादुई आम’ के इर्द-गिर्द एक किताब लिखी हैं. वह अपने गृह प्रदेश सतु मारे में स्थित बच्चों के एक सार्वजनिक पुस्तकालय में इस किताब का पाठ करेंगी.
मुझे याद आया कि तीन साल पहले मैं अपनी नन्हीं-सी बेटी, कैथी, के लिए एक किताब, चूज डे, ख़रीद कर लाया था. कहानी में ‘चू पांडा’ अपने माँ-पिता के साथ पुस्तकालय, रेस्तरां और फिर सर्कस देखने जाता है और हर जगह उसे छींक आ जाती है. बेटी ने पूछा था कि पुस्तकालय क्या होता है! मैंने घर में रखी किताबों की रैक की ओर इशारा करके बताया कि पुस्तकालय में किताबें होती है पर सोचा कि उसे कोई पुस्तकालय घूमा लाऊं. मैंने आस-पास नज़र दौड़ाई पर मुझे बच्चों का कोई भी पुस्तकालय नजर नहीं आया. फिर मैं उसे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पुस्तकालय में ले गया था.
दिल्ली में स्थित ‘चिल्ड्रेन बुक ट्रस्ट’ जैसी जगह देश में बेहद कम है, जहाँ के पुस्तकालय में केवल बच्चों के लिए किताबें मौजूद हों. इसे प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट शंकर ने 1957 में स्थापित किया था. कुछ व्यक्तिगत प्रयासों को छोड़ दें तो पूरे देश में बच्चों के लिए सार्वजनिक पुस्तकालय का सर्वथा अभाव दिखता है. यहाँ तक कि बड़ों के लिए जो पुस्तकालय हैं, वहाँ भी बच्चों के लिए किताबों का कोई कोना ढूंढ़ने पर ही मिल पाता है.
हाल के वर्षो में एकलव्य, कथा, प्रथम जैसी प्रकाशन संस्थाएँ बच्चों के लिए काफी अच्छी और रचनात्मक किताबें छाप रही है. दिल्ली में होने वाले विश्व पुस्तक मेले में इन प्रकाशनों के स्टॉल पर माँ-पिता के संग बच्चों की भीड़ दिखाई देती है. बच्चों और स्कूल जाने वाले विद्यार्थियों के लिए यहाँ प्रवेश मुफ्त में होता है.
नेशनल बुक ट्र्स्ट (एनबीटी) भी बच्चों के लिए दशकों से कम कीमत में सचित्र किताबें छापता रहा है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में गैर सरकारी संस्थानों से भी किताबें छप कर आ रही हैं. कुछ महीने पहले नेहरू बाल पुस्तकालय के तहत एनबीटी से छपी बच्चों की एक पारंपरिक कहानी- 'कछुआ और खरगोश', पर मेरी नजर पड़ी जिसे जाकिर हुसैन ने मूल उर्दू में लिखा था और अनुवाद खुशवंत सिंह ने किया था. इस किताब में चित्राकंन मकबूल फिदा हुसैन ने किए थे. तीन दिग्गजों का नाम एक साथ किताब के मुख्य पृष्ठ पर देखना मेरे लिए सुखद था. यह कहा जा सकता है कि बच्चों के लिए लिखी गई किताबें बड़ों को ध्यान में रख कर ही लिखी जाती हैं, क्योंकि पहला पाठक बच्चों के अभिभावक ही होते हैं. बहरहाल, एनबीटी के पास संसाधनों की कमी नहीं है. उसे बच्चों के मानस को प्रभावित करने वाली दृष्टि के साथ नए प्रयोग कर किताबें निकालनी चाहिए.
बच्चों के बीच काम करने वाली गैर स्वंयसेवी संगठन, प्रथम ने दो साल पहले बच्चों के लिए एक ऑनलाइन लाइब्रेरी- ‘स्टोरीवीवर’ शुरु की है. यहाँ कोई भी मुफ्त में विभिन्न भारतीय भाषाओं में बच्चों के लिए किताबें डाउनलोड कर सकता है, पढ़ सकता है. 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में अठारह साल से कम उम्र के करीब 47 करोड़ बच्चे हैं. सफदर हाशमी ने बच्चों की एक कविता में लिखा है-‘किताबें कुछ कहना चाहती हैं/ तुम्हारे पास रहना चाहती हैं.’ लेकिन सवाल है कि हमने क्या आसपड़ोस में इन बच्चों के लिए कोई ऐसी जगह बनाई है, जहाँ पर उनके लिए किताबें हो, उनका अपना एक कोना हो, जहाँ पर उनकी कल्पना उड़ान भर सके.
(दुनिया मेरे आगे कॉलम, जनसत्ता में 21 जुलाई 2018 को प्रकाशित)

Wednesday, July 04, 2018

गांव में पुस्तकालय


बिहार में पठन-पाठन की प्राचीन संस्कृति रही है. जहां मिथिला वैदिक सभ्यता का केंद्र था, वहीं मगध बौद्ध सभ्यता का. लेकिन गुणात्मक रूप से शिक्षा का प्रसार भले हुआ हो, यह इलाका शिक्षा के क्षेत्र में आजादी के बाद भी पिछड़ा रहा. आधुनिक काल में शिक्षा का लोकतंत्रीकरण हुआ. इस संबंध में सार्वजनिक पुस्तकालयों की क्या भूमिका रही, यह शोध का विषय है.
मिथिला के मधुबनी जिले में स्थित गांव, बेलारही, में एक पुस्तकालय है- मिथिला मातृ-मंदिर. पिछले दिनों जब गांव गया तो यह देखकर खुशी हुई कि पिछले चार साल में करीब डेढ़ लाख रुपये की किताब की आमद हुई है. यह सांसद-विधायक विकास निधि के योगदान से संभव हुआ. हालांकि, पुस्तकालय में किताबों के रख-रखाव की व्यवस्था नहीं थी. बैठने के लिए मेज-कुर्सियां भी नहीं थीं. अंधेरे कमरे में किताबों की गंध आकर्षित करने की बजाय उनसे दूरी बढ़ा रही थी.
नब्बे के दशक में जब बिहार के गांवों से मध्यवर्ग के बच्चे पढ़ने-लिखने के लिए दूसरे राज्यों में पलायन करने लगे, तबसे पुस्तकालय की स्थिति बदहाल होने लगी. साथ ही सरकार और नागरिक समाज की बेरुखी का भी इसमें योगदान है.
बीसवीं सदी के शुरुआती दशक में, आजादी के आंदोलन के दौरान, मिथिला के गांवों में सार्वजनिक पुस्तकालय की स्थापना हुई थी. मेरे गांव का पुस्तकालय 80 साल पुराना है. 
मां ने बताया कि प्रेमचंद, हरिमोहन झा, फणीश्वरनाथ रेणु की किताबें उन्होंने इसी पुस्तकालय से मंगवाकर पढ़ी थी. कई संग्रहणीय पुस्तकें वहां मौजूद थीं, पर किसी पेशेवर के हाथों में नहीं होने के कारण दुर्लभ किताबें गायब होती गयीं.
इस बीच किताबों की खरीद में कोई दृष्टि नहीं दिखती. सरकारी खरीद में पाठकों की रुचि का ख्याल नहीं दिखता. बच्चों के लिए कोई किताब नहीं है, जबकि गांव में प्राइमरी और माध्यमिक विद्यालय है. विचारधारा विशेष की किताबों को पुस्तकालय पहुंचाने पर जोर है. आश्चर्य नहीं कि दीन दयाल उपाध्याय संपूर्ण वांग्मयके दर्शन हुए.
मिथिला मातृ मंदिर पुस्तकालय की एक किताब
एक जमाने में यह पुस्तकालय पूरे जिले में जाना जाता था. मैंने एक किताब इश्यू करवायी, जो 1942 में छपी थी. शिवपूजन सहाय और हरिमोहन झा जैसे साहित्यकारों की देख-रेख में रामलोचन शरण की स्वर्ण जयंती और चर्चित प्रकाशन संस्था पुस्तक भंडारकी रजत जयंती के बहाने इस किताब में बिहार की संस्कृति, साहित्य और इतिहास पर विद्वानों के लेख संग्रहित हैं.

चर्चित चित्रकार और कला मर्मज्ञ उपेंद्र महारथी के बनाये चित्र इस संग्रह की एक उपलब्धि है. प्रसंगवश रामलोचन शरण पुस्तक भंडार के संस्थापक थे. उन्होंने बच्चों के लिए चर्चित पत्रिका बालकका संपादन किया था. उनकी पुस्तक मनोहर पोथी आज भी बच्चों के बीच लोकप्रिय है.

मोबाइल और तकनीक के दौर में किताबों के प्रति लोगों का रुझान कम हुआ है. यदि इन पुस्तकालयों को नयी दृष्टि के साथ पेशेवर ढंग से चलाया जाये, तो सूरत बदल सकती है.
(प्रभात खबर के कुछ अलग कॉलम के तहत 4 जुलाई 2018 को प्रकाशित)