Tuesday, August 27, 2019

खबरनवीस का सम्मान


इस साल एशिया के प्रतिष्ठित रेमन मैग्सेसे पुरस्कार पानेवालों में म्यांमार के पत्रकार स्वे विन और भारत के चर्चित टेलीविजन एंकर और पत्रकार रवीश कुमार शामिल हैं.
रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड फाउंडेशन ने सच्चाई को बयान करने की ताकत और सामाजिक सरोकार से लैसपत्रकारिता के लिए स्वे विन को सम्मानित करने की घोषणा की, वहीं रवीश कुमार की पत्रकारिता को सत्य के प्रति निष्ठा रखते हुए बेजुबानों की आवाजबताया है. निस्संदेह मौजूदा दौर में रवीश भारतीय पत्रकारिता का एक विश्वसनीय चेहरा हैं. हिंदी टेलीविजन पत्रकारिता में जहां मनोरंजन और सनसनी पर जोर है, वहां सत्य के प्रति निष्ठा बहुत पीछे छूट गया लगता है.
हालांकि, जब सुरेंद्र प्रताप सिंह ने 90 के दशक में हिंदी टेलीविजन पत्रकारिता को एक पेशेवर अंदाज दिया, तब टीवी समाचार के प्रति लोगों में आकर्षण बढ़ा था, पर बाद में बाजार, सत्ता और टीआरपी के दबाव में टेलीविजन ने खबरों की नयी परिभाषा गढ़ी, जहां तथ्य से सत्य की प्राप्ति पर जोर नहीं रहा. आज टेलीविजन पत्रकारिता के ऊपर विश्वसनीयता का संकट है.
टेलीविजन के एंकरों की एक खास शैली होती है, जो उन्हें विशिष्ट बनाती है. भारतीय टेलीविजन पत्रकारों में रवीश जमीनी और लोक से जुड़े मुद्दों को सहज ढंग से चुटीले अंदाज में पेश करते हैं. सत्ता से ईमानदारी से सवाल पूछना भी इसमें शामिल है. वर्तमान में टीवी पत्रकारिता में स्टूडियो में होनेवाले बहस-मुबाहिसा और इंटरव्यू ज्यादा प्रमुख हो गया है. सत्ता पर काबिज सवालों से हमेशा बचते हैं और जवाब देने में आनाकानी करते हैं.
टेलीविजन के एक अन्य चर्चित पत्रकार करण थापर बीबीसी के महानिदेशक रह चुके जॉन बर्ट के हवाले से कहते हैं कि समसामयिक इंटरव्यू के दौरान चार तरह के उत्तर होते हैं- हां, , नहीं जानते और नहीं कह सकते. एक इंटरव्यूअर को तीसरे और चौथे विकल्प को हटा कर अपने गेस्ट को हां या न की तरफ मोड़ना होता है. खुद गेस्ट हां, या ना की दुविधा में रहते हैं और यह काम एक इंटरव्यूअर का है कि किस तरह वह गेस्ट के जवाब को लेकर सवाल करे.
वर्तमान दौर में टेलीविजन पत्रकारिता की सत्ता के साथ गलबहियां से खुद रवीश कुमार क्षुब्ध रहते हैं. विभिन्न मंचों पर उन्होंने इस बात को बार-बार जाहिर भी किया है. यहां तक कि पिछले दिनों उन्होंने लोगों से टेलीविजन न्यूज नहीं देखने की अपील तक कर डाली थी.
इक्कीसवीं सदी में टीवी भारतीय जनमानस और संस्कृति का एक अहम हिस्सा बनकर उभरा है. पिछले दो दशकों में भारतीय समाज और लोक मानस पर खबरिया चैनलों का प्रभाव किस रूप में पड़ा इसकी ठीक-ठीक विवेचना संभव नहीं. लेकिन, इस बात से शायद ही किसी को इनकार हो कि कमियों के बावजूद भारतीय राजनीति और लोकतंत्र के विस्तार में इन समाचार चैनलों की महती भूमिका है.
(प्रभात खबर, 27 अगस्त 2019)

Sunday, August 18, 2019

लोक रंग में दास्तानगोई


महमूद फारूकी और डारेन शाहिदी
पिछले दिनों दिल्ली में रिवायतनाम से एक लोक उत्सव का आयोजन किया गया. आश्चर्य की बात यह थी कि इसमें दास्तानगोई को भी शामिल किया गया था. दास्तानगोई नाटकीय अंदाज़ में कहानी कहने की एक मनोरंजक विधा है. पिछले दशक में जब उर्दू के चर्चित आलोचक और कई चाँद थे सरे आसमांके लेखक शम्सुर्रहमान फारूकी और अदाकार महमूद फारूकी ने इस विधा में नया रंग भरा तब लोगों की नज़र इस पारंपरिक कला की ओर गई.

मध्यकाल में अमीर हम्ज़ा की दास्तानें दास्तानगो के बीच काफी पसंद की जाती थी. तिलिस्म और ऐय्यारी कहानियों को रोचक बनाती थी और सुनने वालों को बांध कर रखती थी. फारूकी ने भी अपनी पहली प्रस्तुति में दास्तानए-अमीर हम्ज़ा के किस्सों में से तिलिस्म-ए-होशरुबाको ही चुना था.  आधुनिक काल में देवकी नंदन खत्री के उपन्यास चंद्रकांता संततिकी लोकप्रियता ऐय्यारी और तिलिस्म की वजह से हुई थी, जिसे पढ़ कर पाठकों के होश उड़ जाते थेऔर वे उपन्यास के अगले अंक का बेसब्री से इंतजार करते थे!

नए अवतार में दास्तानगोई में हम भारत की सामासिक संस्कृति की झलक पाते हैं.  उर्दू-फारसी की शैली में जब महमूद फारूकी और दारेन शाहिदी ने चर्चित रचनाकार विजयदान देथा की कहानी-चौबोलीसुनाई तो दर्शकों के सामने भाषा आड़े नहीं आई. जाहिर है राजस्थानी लोक कहानी चौबोलीको आधार बना कर 'दास्तान शहजादी चौबोली'  की मंच पर प्रस्तुति होगी तो लोक रंग और राग तो उसमें आएँगे ही. इस दास्तान में अमरबेल की तरह एक कहानी की डाल पर दूसरी, दूसरी के ऊपर तीसरी,  तीसरी के ऊपर चौथी कहानी रची-बसी है और दर्शक-श्रोता की उत्सुकता इस बात को जानने में हमेशा रहती है कि आगे क्या?

नब्बे के दशक के मध्य में एनएसडी के जाने-माने अदाकार पीयूष मिश्रा भी विजयदान देथा की एक अन्य चर्चित कहानी दुविधा’ (इस पर मणि कौल और अमोल पालेकर ने फिल्म भी बनाई) को मंच पर पेश किया करते थे, पर नाटकीय अंदाज के बावजूद दास्तानगोई में नाटकीय साजो-सामान का इस्तेमाल नहीं होता. जहाँ पीयूष मिश्रा हारमोनियम के साथ मंच पर होते थे, वहीं दास्तान शहजादी चौबोली कीमें संगीत का इस्तेमाल बिलकुल नहीं था. असल में, दास्तानगोई में गीत-संगीत का इस्तेमाल नहीं किया जाता है. संभव है कि आने वाले समय में दास्तानगो इस प्रयोग को अपनी अदायगी में शामिल करें.

बकौल फारूकी दिल्ली में वर्ष 1928 में मीर बाकर अली की मौत के साथ ही मुगल काल से चली आ रही दास्तानगोई की संवृद्ध परंपरा समाप्त हो गई. वे आखिर महान दास्तनागो थे. जामा मस्जिद के आसपास वे दास्तानें सुनाया करते थे. परंपरा के रूप में एक दास्तनागो बैठकों, महफिलों और सार्वजनिक जगहों पर लोगों को किस्से सुनाया करते थे, लेकिन आजकल दो दास्तानगो प्रस्तुति के दौरान मौजूद रहते हैं. मंच पर सफेद चादर और मसनद, अंगरखे में दास्तानगो, पानी पीने के लिए कटोरे और जलती मोमबत्तियां समां बांधने का काम करती है.

हालांकि पंद्रह वर्ष के बाद भी दास्तानगोई लोक या लोगों के करीब नहीं पहुँच पाई है.  देश-विदेश के महानगरों में साहित्यिक और सांस्कृतिक समारोहों के दौरान ही ज्यादातर इसे देखने को मिलता है. अच्छी बात यह है कि इस बीच कई युवा कलाकार इस विधा से जुड़े हैं. जेएनयू में हिमांशु वाजपेयी और अंकित चढ्ढा ने दास्ताने-सेडिशनको अनूठे अंदाज में पेश किया था.

जैसा कि कला की हर विधा के साथ होता है, दास्तानगोई भी अपने समय और समाज की चिंताओं से जुड़ी है. प्रस्तुति के दौरान दास्तानगो राजनीतिक और सामाजिक टिप्पणी करने से नहीं चूकते जो इस पारंपरिक विधा को समकालीन बनाता है और दर्शकों के साथ उनका संवाद कायम रहता है.

(प्रभात खबर, 18 अगस्त 2019)

Monday, July 29, 2019

हिंदी सिनेमा में दलित विमर्श


हिंदी फिल्मों के सौ वर्षों के इतिहास में समांतर सिनेमा आंदोलन का खासा महत्व है. आजादी से पहले वर्ष 1936 में फ्रांज ऑस्टेन ने अछूत कन्याबनायी थी. इस फिल्म में ब्राह्मण लड़के और एक अछूत लड़की के बीच प्रेम को दिखाया गया है. यह फिल्म महात्मा गांधी के अछूतोद्धार आंदोलन से प्रेरित था.

 वर्ष 1959 में विमल राय ने भी सुजातामें एक अछूत लड़की और ब्राह्मण लड़के के बीच प्रेम का चित्रण किया. लेकिन, इन फिल्मों में जो सवाल उठाये गये, वे ज्यादातर वैयक्तिक थे, इनमें एक वृहद् दलित समाज के संघर्ष, उनकी पहचान का सवाल गौण था.

 नब्बे के दशक में हिंदी साहित्य में दलित विमर्श मुख्य रूप से उभरा. इन्हीं वर्षों में हिंदी क्षेत्र में भी दलितों-पिछड़ों का आंदोलन देखने को मिला. पर हिंदी फिल्मों में दलितों के संघर्ष और उनके हक के सवाल हाशिये पर ही रहे. बैंडिट क्वीन’, ‘आरक्षण’, ‘मसानजैसी सफल फिल्मों में दलित किरदार तो हैं, पर वे हिंदी सिनेमा में नया विमर्श खड़ा करने में असफल रहे.

 समांतर सिनेमा के दौर में सामंती समाज के शोषण के इर्द-गिर्द बनी पुरस्कृत फिल्मों मसलन, ‘अंकुर’, ‘दामूल’, ‘पारआदि में दलितों के सवाल फिल्म के केंद्र में नहीं हैं. ऐसा लगता है कि हिंदी फिल्में सायास रूप से दलितों, वंचितों के संघर्ष और उनके सवालों से टकराने से बचती रही हैं. पहली बार अनुभव सिन्हा निर्देशित आर्टिकिल 15’ में समाज और सत्ता से किये गये दलितों के चुभते सवाल और उनके संघर्ष को हम फिल्म के केंद्र में पाते हैं. बिना किसी लाग-लपेट के फिल्म का मुख्य पात्र पूछता है- ये लोग कौन हैं?’ ये वे लोग हैं जो हमारे बीच हैं, पर ओझल हैं. या कहें कि हमने जिनके सवालों से मुंह मोड़ रखा है.

 सवाल हिंदी सिनेमा के कर्ता-धर्ता से भी पूछा जाना चाहिए कि हिंदी समाज में जब राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर पिछले दशकों में उथल-पुथल चलता रहा वे दलितों के हक के सवालों से क्यों मुंह चुराते रहे? क्या बॉलीवुड के सारे विषय बाजार के साथ उनके रिश्ते से तय होते रहेंगे?

 आर्टिकल 15’ की मुख्य आलोचना इस बात को लेकर हो रही है कि फिल्म का केंद्रीय पात्र ब्राह्मण है और ऐसा लगता है कि वह मसीहा बनकर आया है. सवाल सही है, पर मेरी समझ से सिनेमा में वह सूत्रधार की भूमिका में है. नायक से ज्यादा प्रभावशाली ढंग से फिल्म में अन्य पात्र जातिगत राजनीतिक सवाल उठाते हैं.

 यह बिंबों, सिनेमैटोग्राफी और संवाद से भी स्पष्ट है. सीवर सफाई कर्मचारी का कीचड़ में सना चेहरा दर्शकों की स्मृति में वर्षों तक रहेगा. प्रसंगवश, साहित्यकार ओम प्रकाश वाल्मीकि की चर्चित कहानी सलामको यहां याद किया जा सकता है, जिसमें दलित और ब्राह्मण पात्र के आपसी रिश्ते को संवेदनशील ढंग से उकेरा गया है.

 यह सुखद है कि पिछले वर्षों में बॉलीवुड का कैमरा पेरिस, लंदन और न्यूयॉर्क से दूर बनारस, बरेली, वासेपुर की गलियों में घूमने लगा है. महानगरों में एक नया दर्शक वर्ग भी उभरा है, जो समकालीन मुद्दों और विमर्शों को पर्दे पर देखना चाहता है. ऐसे में सिनेमा में उच्च और मध्यम वर्ग से इतर दलितों-पिछड़ों की अस्मिता और संघर्ष पर भी निर्माता-निर्देशकों का फोकस बढ़ेगा. हिंदी सिनेमा की रचनात्मकता इससे संवृद्ध होगी.

(प्रभात खबर, 28 जुलाई 2019)

Saturday, July 27, 2019

धीमी पत्रकारिता के प्रयोग: महात्मा गाँधी


समकालीन मीडिया परिदृश्य पर सोशल मीडिया और टेलीविजन हावी हैं. सूचना क्रांति से लैस इन माध्यमों में खबरों के उत्पादन और प्रसारण की हमेशा हड़बड़ाहट रहती है. ब्रेकिंग न्यूज’, ‘फास्ट न्यूजपर जोर रहता है. हालांकि मीडिया विमर्शकारों के बीच समाचार पत्र जैसे पारंपरिक माध्यम की अहमियत फिर से बढ़ी है. ऐसे में 150वें जयंती वर्ष में महात्मा गाँधी की पत्रकारिता और उनके मूल्यों को याद करना जरूरी लगता है. वे राजनेता, विचारक के साथ-साथ एक कुशल पत्रकार भी थे. जब वे बैरिस्टर की पढ़ाई करने लंदन गए तब कानून के एक छात्र के रूप में पत्रकारिता से उनका मुखामुखम हुआ. साथ ही वर्ष 1890 में द वेजिटेरियनमें छह लेखों की एक श्रृंखला से उनके पत्रकारिता कर्म की शुरुआत हुई. इन लेखों में उनके एक सजग आलोचक रूप के दर्शन होते हैं. बाद में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गाँधीजी ने पत्रकारिता के माध्यम से जो भूमिका निभाई, भारतीय जनमानस और पत्रकारों को जिस रूप में उद्वेलित किया वह भारतीय पत्रकारिता के इतिहास की एक धरोहर है. गाँधीजी के सत्य और अहिंसा के विचारों की गहरी छाप हिंदी अखबारों पर खास तौर पर पड़ी. उस दौर में हिंदी के अधिकांश पत्रकार-संपादक स्वतंत्रता सेनानी भी थे.

जहाँ गाँधी जी के द्वारा संपादित पत्रों- यंग इंडिया, नवजीवन, हरिजन आदि की चर्चा होती है, वहीं इंडियन ओपिनियन पत्र के साथ उनके जुड़ाव हमारे विचार-विमर्श में शामिल नहीं हो पाता, कहीं ना कहीं छूट जाता है. असल में, दक्षिण अफ्रीका में अपने प्रवास (1893-1914) के दौरान गाँधी जी ने इंडियन ओपिनियन के साथ जुड़ कर अपने विचारों की धार को तेज किया, जो बाद के उनके सत्याग्रह और पत्रकारीय कर्म में काफी महत्वपूर्ण साबित हुआ था. गाँधीजी ने अपनी आत्मकथा में इस पत्र के बारे में लिखा है: मनसुखलाल नाजर इसके संपादक बने. पर संपादन का सच्चा बोझ तो मुझ पर ही पड़ा.दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह की लड़ाई, भारतीयों के अस्मिता संघर्ष में इस पत्र की केंद्रीय भूमिका थी. उन्होंने इस बात को रेखांकित किया है कि इंडियन ओपिनियन के बिना सत्याग्रह असंभव होता.

वर्ष 1903में इंडियन प्रिंटिंग प्रेस से निकलने वाला यह एक बहुभाषी पत्र था. अंग्रेजी के अलावे गुजराती में यह पत्र प्रकाशित होता था. साथ ही कुछ समय तक यह तमिल और हिंदी में भी छपा. इतिहासकार उमा धुपेलिया मिस्त्री ने नोट किया है कि इस पत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना तब घटी जब गाँधी ने वर्ष 1904 में इसे डरबन से 24 किलोमीटर दूर फीनिक्स के सौ एकड़ फॉर्म में पुर्नस्थापित किया. यह गाँधी पर लियो टॉलस्टाय और जॉन रस्किन का प्रभाव दिखलाता है...इंडियन ओपनियन का इतिहास फीनिक्स आश्रम से साथ अंतर्गुंफित है.यह विचार प्रधान साप्ताहिक समाचार पत्र भारत, अफ्रीका और ब्रिटेन में मौजूद पाठकों को लक्षित था. पत्र का मुख्य लक्ष्य पाठकों में चेतना का विकास और नैतिक बल विकसित करना था. इसके लिए गाँधीजी इंडियन ओपिनियन में सदूर देशों के पत्रों से संकलित सार संग्रह को प्रकाशित किया करते थे. पत्र की भाषा उन्होंने सहज और सरल रखी. विचारों और खबरों के संप्रेषण और संपादन के लिए जो तरीका उन्होंने अपनाया वह साम्राज्यवाद विरोधी और मशीनी दखल से जिरह करता हुआ नजर आता है.

वर्ष 2013 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से छपी, इतिहासकार इसाबेल हॉफ्मायर की किताब गाँधीज प्रिंटिंग प्रेस: एक्सपेरिमेंट इन स्लो रीडिंगमें इस बात की विस्तार से चर्चा है कि किस तरह गाँधी ने खबरों के उत्पादन, प्रसारण और पढ़ने के तरीकों के लिए धीमी गति की पत्रकारिता पर जोर दिया. वे अपने लेखों में पाठकों को समाचारपत्र पढ़ने की गति धीमी रखने और पाठ को बार-बार पढ़ने को कहते थे. पाठकों के मनन और चिंतन उनकी चिंता के केंद्र में था. यह सब गाँधीजी के सत्याग्रही तेवर को दिखाता है. वे हर पाठक में एक सत्याग्रही की संभावना देखते थे. उल्लेखनीय है कि गाँधी ने इंडियन ओपिनियन के गुजराती के पाठकों के लिए ही पैफलेंट के रूप में हिंद स्वराज की रचना की थी, जहाँ पाठक और संपादक के बीच संवाद प्रमुख है.

सवाल है कि गाँधी जी की धीमी पत्रकारिता के प्रयोग को हम किस रूप में देखें. सोशल मीडिया और न्यूज चैनल आज भी सच दिखाने, सच के साथ खड़े होने, सत्ता से सच बोलने की बात करते हैं. जाहिर है उनका आग्रह भी सत्य के साथ ही है, पर गाँधी के सत्याग्रह के ये कितने करीब कहे जा सकते हैं? ‘फेक न्यूजके इस दौर में मुख्यधारा की पत्रकारिता की जवाबदेही राष्ट्र-राज्य और नागरिक समाज के प्रति पहले से कहीं ज्यादा है. पर क्या तथ्य से सत्य की प्राप्ति पर उनका जोर है? गाँधीजी ने ऐसी पत्रकारिता की परिकल्पना की थी जो राज्य और बाजार के दवाब से मुक्त हो. सवाल यह भी है कि आज का पाठक/दर्शक खुद को पत्रकारिता के पूरे परिदृश्य कहाँ खड़ा पाता है?

(जनसत्ता, 27 जुलाई 2019)

Tuesday, July 09, 2019

समांतर सिनेमा के पचास साल

पिछले दशक में दिल्ली में ओसियान फिल्म महोत्सव हुआ करता था, जिसमें एशिया और अरब सिनेमा का मेला लगता था. समांतर सिनेमा के पुरोधा, मणि कौल, ओसियान के क्रिएटिव डायरेक्टर थे. वर्ष 2008 में आर्थिक मंदी के बाद ओसियान महोत्सव को बंद करना पड़ा और दिल्ली में इस बड़े स्तर पर फिर से कोई सिनेमा का महोत्सव आयोजित नहीं हो सका. वे उन दिनों समांतर और मुख्यधारा के फिल्मकारों के बीच संवाद की कोशिश में थे.
असल में, इस साल हिंदी के न्यू वेव सिनेमा या समांतर सिनेमा के पचास साल पूरे हो रहे हैं. ‘फिल्म फाइनेंश कारपोरेशन’ से कर्ज लेकर मणि कौल ने 1969 में प्रयोगधर्मी फिल्म ‘उसकी रोटी’ बनाई थी. मृणाल सेन की ‘भुवन सोम’ और बासु चटर्जी की ‘सारा आकाश’ फिल्म के साथ इस फिल्म को समांतर सिनेमा की धारा शुरु करने का श्रेय दिया जाता है.
याद आया कि वर्ष 2006 के महोत्सव के दौरान मैंने मणि कौल से उनकी फिल्मों, समांतर और मुख्यधारा की फिल्मों के बीच रिश्ते और ऋत्विक घटक के बारे में लंबी बातचीत की थी. मणि कौल ने कहा था कि उन्हें मोहन राकेश की इस कहानी में जो इंतजार और विछोह है, काफी प्रभावित किया था. उन्होंने कहा था कि ‘यह इंतजार हमें अनुभवजन्य समय से दूर ले जाता है, जहाँ एक मिनट भी एक घंटा हो सकता है.’ बाद में जब वे संगीत की शिक्षा ले रहे थे (वे ध्रुपद के सिद्ध गायक थे), तब सम और विषम के अंतराल में इस बात को काफी अनुभव करते थे. उनकी फिल्मों- उसकी रोटी, आषाढ़ का एक दिन और दुविधा में स्त्रियों के द्वारा विभिन्न देश-काल में इस इंतजार का चित्रण मिलता है. साथ ही 'ध्रुपद' और 'सिद्धेश्वरी' फिल्म में संगीत के प्रति उनका लगाव दिखता है. मणि कौल साहित्य, संगीत और सिनेमा के बीच सहजता से आवाजाही करते थे.
हिंदी के चर्चित रचनाकार उदय प्रकाश ने पिछले दिनों एक बातचीत के दौरान मणि कौल की इसी सहजता को रेखांकित करते हुए मुक्तिबोध पर बनी उनकी फिल्म ‘सतह से उठता आदमी’ का उदाहरण दिया था और कहा था कि ‘मणि ही मुक्तिबोध को दाल-भात खाता हुआ दिखा सकते थे.’
सत्यजीत रे ने मणि कौल और समांतर सिनेमा के एक और प्रतिनिधि फिल्मकार कुमार शहानी की फिल्मों पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि इनकी फिल्मों में ऋत्विक घटक की तरह ही ‘ह्यूमर’ नहीं मिलता. ये दोनों एफटीआईआई, पुणे में घटक के शिष्य थे. पर निजी मुलाकातों में मणि कौल बेहद मजाकिया थे. बातचीत में उन्होंने हँसते हुए कहा था- ‘मुझसे ज्यादा एक्सट्रीम में बहुत कम लोग गए. जितनी फिल्में बनाई, सारी फ्लॉप!’ मणि कौल की फिल्में हिंदी सिनेमा को एक कला के रूप में स्थापित करती है. जरूरत है कि आधी सदी के बाद मणि कौल की फिल्मों का पुनरावलोकन हो ताकि हिंदी सिनेमा के इतिहास की इस महत्वपूर्ण धारा से नई पीढ़ी रू-ब-रू हो और मुख्यधारा के फिल्मकारों के साथ एक संवाद संभव हो सके. 
(प्रभात खबर, 9 जुलाई 2019)

Friday, July 05, 2019

समांतर सिनेमा की राह

कुमार शहानी मीता वशिष्ठ के साथ

सन 2010 की गर्मी के मौसम में हम पुणे स्थित फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआइआइ) में फिल्म एप्रीसिएशन कोर्स करने गए थे. उस दौरान समांतर सिनेमा के अग्रणी निर्देशक मणि कौल हमारे बीच सिनेमा को लेकर विचार-विमर्श करने आए थे. वे जितना फिल्मकार थे, उससे ज्यादा एक कुशल शिक्षक थे. अन्य बातों के अलावे उन्होंने एक बात और कही थी कि कभी आँख बंद कर भी आप लोग फिल्म देखने की कोशिश कीजिएगा’! असल में, वे हमें फिल्म में ध्वनि की बारीकियों को पकड़ने की सीख दे रहे थे.

मणि कौल एक प्रयोगधर्मी फिल्मकार थे. पचास वर्ष पहले 1969 में उन्होंने मोहन राकेश की कहानी उसकी रोटीपर फिल्म बनाई. साथ ही इसी साल मृणाल सेन की भुवन सोमऔर बासु चटर्जी की सारा आकाशफिल्म भी आई. कम बजट की इन फिल्मों में सितारों या स्टारपर जोर नहीं था. फिल्मकारों ने साहित्यिक कृतियों को कथा के लिए चुना. बिंब और ध्वनि के सुरूचिपूर्ण इस्तेमाल ने इन फिल्मों को व्यावसायिक सिनेमा से अलग एक खास पंक्ति में ले जाकर खड़ा किया. यहीं से हिंदी में 'न्यू वेव सिनेमा' या समांतर सिनेमा की शुरुआत मानी गई.

इस धारा की फिल्म के निर्माण-निर्देशन में एफटीआइआइ के युवा छात्र अगुआ थे. सन 1960 में ही एफटीआइआइ की स्थापना हुई थी. फिल्म के अध्येता मणि कौल और कुमार शहानी जैसे निर्देशक और के के महाजन जैसे कैमरामैन की भूमिका को रेखांकित करते रहे हैं. उल्लेखनीय है कि इस संस्थान के शुरुआत में ही ऋत्विक घटक जैसे निर्देशक शिक्षक के रूप में जुड़ गए थे, जिन्होंने युवा फिल्मकारों में एक नई दृष्टि और सिनेमा की समझ विकसित की.

फिर 1972 में निर्मल वर्मा की कहानी माया दर्पणपर इसी नाम से फिल्म बना कर हिंदी सिनेमा में फॉर्मके प्रति एकनिष्ठता को लेकर एक विमर्श खड़ा करने वाले कुमार शहानी, मणि कौल के सहपाठी थे. वे बातचीत में ऋत्विक घटक की फिल्म मेघे ढाका ताराफिल्म को शिद्दत से याद करते हैं. साथ ही समांतर सिनेमा के परिप्रेक्ष्य में जिस 'एपिक फॉर्म' की चर्चा होती है उसे वे घटक से प्रेरित मानते हैं. मणि कौल और कुमार शहानी फ्रेंच न्यू वेव और खास कर चर्चित फ्रेंच फिल्म निर्देशक रॉबर्ट ब्रेसां से भी काफी प्रभावित थे.


मुख्यधारा का सिनेमा हमेशा से ही बड़ी पूंजी की मांग करता है और वितरक प्रयोगशील सिनेमा पर हाथ डालने से कतराते रहते हैं. सन 1969 में ही फिल्म फाइनेंस कारपोरेशनने प्रतिभावान और संभावनाशील फिल्मकारों की ऑफ बीटफिल्मों को कर्ज देकर सहायता पहुँचाने का निर्देश जारी किया था. इसका लाभ मणि कौल जैसे निर्देशक उठाने में सफल रहे. इसी दौर में हिंदी के अतिरिक्त क्षेत्रीय भाषाओं मसलन, मलयालम, बांगला, कन्नड़ आदि में भी कई बेहतरीन फिल्में बनी जो दर्शकों के सामने एक अलग भाषा और सौंदर्यबोध लेकर आई. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन फिल्मों की आज भी चर्चा होती है.

समांतर सिनेमा से जुड़े फिल्मकारों के लिए 70 और 80 का दशक मुफीद रहा. हालांकि इन फिल्मों की आलोचना एक बड़े दर्शक तक नहीं पहुँच पाने की वजह से होती रही है. उसी दौर में सत्यजीत रे ने फिल्म को मास मीडिया मानते हुए एक अलहदा दर्शक वर्ग के लिए फिल्म बनाने के विचार की आलोचना की थी. उन्होंने 'भुवन सोम' के बारे में कटाक्ष करते हुए सात शब्दों में फिल्म का सार इस तरह लिखा था- बिग बैड ब्यूरोक्रेट रिफार्मड बाय रस्टिक बेल’. वे माया दर्पणसे भी बहुत प्रभावित नहीं थे. पर मृणाल सेन, मणि कौल, कुमार शहानी जैसे फिल्मकार, सत्यजीत रे से अलग रास्ता अपनाए हुए थे और अपनी फिल्मों में प्रयोग करने से कभी नहीं हिचके. वे चाहते थे कि उनकी फिल्में देखकर दर्शक उद्वेलित हों. पॉपुलर सिनेमा की तरह उनकी फिल्में हमारा मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि संवेदनाओं को संवृद्ध करती हैं.

फिल्मों के बदलते स्वरूप और उसके दर्शक वर्ग के मसले पर अब विचार होने लगा है. कुमार शहानी ने बताया कि मॉल में बने मल्टीप्लेक्स सिनेमा हॉल उनकी फिल्मों के प्रदर्शन के उपयुक्त नहीं है जहां लोग खाने-पीने और खरीदारी के लिए ज्यादा जाते हैं. पिछले कुछ वर्षों में नेटफ्लिक्स, हॉटस्टार और अमेजन प्राइम जैसे वेबसाइटों ने फिल्म निर्माण और वितरण को काफी प्रभावित किया है. लेकिन चूंकि इन वेबसाइटों पर समांतर फिल्मों की उपलब्धता आसान हो गई है, इसलिए इनके आने के बाद युवा वर्ग में एक बार फिर से समांतर फिल्मों के प्रति रूचि जगी है. साथ ही भूमंडलीकरण के साथ आई नई तकनीक ने कई युवा फिल्मकारों को प्रयोग करने का मौका दिया है.

आज कई समकालीन फिल्म निर्देशकों मसलन अमित दत्ता, गुरविंदर सिंह, अनूप सिंह आदि की फिल्मों में समांतर सिनेमा के पुरोधाओं की छाप स्पष्ट दिखाई देती है. सिनेमा को एक कला माध्यम के रूप में प्रतिष्ठित करने में इन प्रयोगशील फिल्मकारों की भूमिका ऐतिहासिक है.

(जनसत्ता, 5 जुलाई 2019)

Saturday, June 29, 2019

फिल्मों में तकनीकी दखल ज्यादा हो गया है: कुमार शहानी


वर्ष 1969 में मणि कौल की फिल्म उसकी रोटीऔर मृणाल सेन की भुवन सोमने भारतीय फिल्मों की एक नई धारा की शुरुआत की जिसे समांतर या न्यू वेव सिनेमा कहा गया। कुमार शहानी इस धारा के एक प्रतिनिधि फिल्मकार हैं। उनकी माया दर्पण’, ‘तरंग’, ‘ख्याल गाथा’, ‘कस्बा’, ‘चार अध्यायआदि फिल्मों को कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। समांतर सिनेमा के इस आधी सदी के सफर पर अरविंद दास ने हाल ही में कुमार शहानी से लंबी बातचीत की। प्रस्तुत हैं मुख्य अंश :

न्यू वेव सिनेमा को पचास साल हो गए। मेनस्ट्रीम सिनेमा के बरक्स समांतर सिनेमा की इस यात्रा को आप किस रूप में देखते हैं?

हम पूंजीवादी व्यवस्था में रहते हैं जिसमें कारोबार मुख्य होता है, हम इसे चाहें या ना चाहें। मेनस्ट्रीम फिल्में लाभ से संचालित होती हैं, बिना इसके उनका खर्च नहीं निकल सकता। उनका कला से कोई ताल्लुक नहीं होता। इस लिहाज से हमें मेनस्ट्रीम और कला सिनेमा की तुलना नहीं करनी चाहिए।

कला सिनेमा के निर्माण में एफटीआईआई की क्या भूमिका रही?

मैं, मणि कौल और केके महाजन एफटीआईआई में थे। कुछ समय पहले ही पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट की शुरुआत हुई थी। 70 और 80 के दशक में जब हम न्यू वेव सिनेमा बना रहे थे तब न्यू यॉर्क टाइम्स, ला मोंद (पेरिस) जैसे अखबारों में एफटीआईआई की खूब चर्चा होती थी। वे मानते थे कि हम कुछ अच्छा काम कर रहे हैं। इससे एफटीआईआई की एक अंतरराष्ट्रीय पहचान बनी।

एफटीआईआई में फिल्म निर्देशक ऋत्विक घटक आपके गुरु थे, आपकी फिल्मों पर उनका कैसा असर रहा?

फिल्मों के प्रति उनकी जो निष्ठा थी, उस पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता। चार अध्यायटैगोर का आखिरी उपन्यास है जिसमें उन्होंने स्वानुभूति और आत्मनिर्णय पर जोर दिया है। आध्यात्मिक भाव के साथ राजनीतिक हिंसा का सामंजस्य बहुत मुश्किल होता है। जब आप मेरी यह फिल्म देखेंगे तो ऋत्विक दा आपको भरपूर नजर आएंगे।

आपकी फिल्मों को लेकर एपिक फॉर्मकी चर्चा होती है। क्या ऋत्विक घटक इस फॉर्म के पीछे रहे?

ऋत्विक दा ने ही इस एपिक फॉर्म से हमारा परिचय करवाया था। ब्रेख्त के नाटकों का अनुवाद उन्होंने किया है। कॉकेशियन चॉक सर्किलका उन्होंने उसी वक्त अनुवाद किया, जब हम इंस्टीट्यूट में उनके शिष्य थे। बांग्लादेश में एपिक थिएटर पर काफी काम किया गया है। वे वहीं के थे। वे विभाजन की संतान थे और मैं भी हूं।


मैं सौभाग्यशाली था कि ब्रेसां और ऋत्विक घटक जैसे गुरुओं ने मेरा लालन-पालन किया। वर्ष 1967 में मैंने फ्रांस में एक गधे को केंद्र में रख कर बनाई गई उनकी फिल्म बलथाजारदेखी थी और खूब पसंद की। मोक्ष और निर्वाण उनकी फिल्मों में जिस रूप में दिखता है, उस तरफ मैं अपने वाम विचारों के बावजूद काफी आकर्षित था। जब मैं टैगोर की रचनाओं और घटक दा की फिल्मों की ओर देखता हूं तो पाता हूं कि उनमें जो आध्यात्मिक ऊर्जा है उसका कोई सानी नहीं। इन सबसे मैंने यही चीजें विरासत में पाई हैं।

आप लोगों ने हिंदी की नई कहानी को अपनी फिल्मों के लिए चुना, पर उसका ट्रीटमेंट अलग दिखता है। जैसे निर्मल वर्मा की कहानी माया दर्पणमें सामंतवाद के खिलाफ विरोध नहीं दिखता जबकि आपकी फिल्म में यह स्पष्ट है...

निर्मल असल में एक लिरिकल राइटर थे। हालांकि निर्मल एक जमाने में कम्यूनिस्ट पार्टी के कार्ड होल्डर थे, पर जब प्राग पर सोवियत यूनियन ने कब्जा किया तब वे संदेहशील हो उठे। मैंने माया दर्पणमें सामंतवादी उत्पीड़न दिखाने की कोशिश की है। इस फिल्म के अंत में डांस सीक्वेंस है, उसके माध्यम से मैंने इस उत्पीड़न को तोड़ने की कोशिश की है। उस डांस में जो ऊर्जा है वह सामंतवादी व्यवस्था के खिलाफ है। यह काली के रंग में भी है।

इस फिल्म के अंत को लेकर निर्मल वर्मा की क्या प्रतिक्रिया थी?

उन्हें पसंद नहीं था। कुछ युवा लेखकों ने उनसे कहा कि वे गलत हैं और उन्हें फिल्म फिर से देखनी चाहिए। निर्मल ने अनेक बार यह फिल्म देखी, पर उन्हें पसंद नहीं आई। (हंसते हुए) यह काफी अजीब था।

भूमंडलीकरण के साथ नई तकनीक ने नए युवा फिल्मकारों को प्रयोग करने का काफी मौका दिया है। आप इसे किस रूप में देखते हैं?

थोड़ा-बहुत काम तो हो रहा है, लेकिन बलथाजारऔर मेघे ढाका ताराकी ऊंचाई तक पहुंचने में उन्हें वक्त लगेगा। एक बड़ी समस्या यह है कि तकनीक का दखल मानवीय हस्तक्षेप से कहीं ज्यादा है। युवा फिल्मकारों में सत्य और सुंदर की तलाश है, पर वे निराश हैं क्योंकि उनके पास अवसर नहीं है, कोई उनको महत्व नहीं दे रहा।

(नवभारत टाइम्स, 29 जून 2019 को प्रकाशित)

Wednesday, June 12, 2019

अयोघ्या नगर के सिंदूरिया


वर्षों पहले किसी पत्रिका में एक लेख पढ़ा था- शादी हो तो मिथिला में. जाहिर है, इस लेख में जानकी और पुरुषोत्तम राम की शादी की चर्चा के साथ मिथिला की मेहमाननवाजी और संस्कृति का जिक्र था. पिछले कुछ दशकों में मिथिला क्षेत्र से भारी मात्रा में विस्थापन और पलायन हुआ है, लेकिन शादी-विवाह के लिए मध्यवर्ग वापस गांव-घर लौटता रहा है.
पिछले दिनों जब ऐसे ही एक शादी में भाग लेने का मौका मिला, तो इस लेख की याद हो आयी. मिथिला की संस्कृति शादी-विवाह के अवसर पर अपनी संपूर्णता में निखरकर आती है. बात गीत-संगीत की हो, मिथिला पेंटिंग-सिक्की कला की हो या खान-पान में विन्यास की. इनमें एक निरंतरता दिखती है, पर ऐसा नहीं है कि इनमें बदलाव नहीं आया है.
अस्सी के दशक में ही कैसेट कल्चरने शादी-विवाह में लाउड स्पीकरऔर तकनीक का प्रचलन बढ़ा दिया था. यही दौर था जब पद्म भूषण से सम्मानित शारदा सिन्हा के गाये लोक गीतों की धूम मची थी. आज भी शादी-विवाह का आंगन उनके गाये गीतों से गूंजता रहता है. बात चाहे माय हे अयोध्या नगर के सिंदूरिया सिंदूर बेचे आयल हेकी हो या मोहे लेलखिन सजनी मोर मनवा पहुनवा राघोकी. प्रसंगवश, शारदा सिन्हा अपनी मैथिल पहचानको बार-बार रेखांकित करती रही हैं.
वैसे भोजपुरी भाषा-भाषियों के बीच और हिंदी फिल्मों में गाये चर्चित गीतों के माध्यम से उनकी पहुंच राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक तक है. पर ऐसा नहीं है कि नयी पीढ़ी मैथिली लोक-गीतों से विमुख है. पसाहीन¸ कुमरम, लावा भुजाई, सिंदूर दान जैसी रस्मों में यह दिखायी देती है. हां, जहां कहीं इनकी टेक टूटती है, वहां घर की बड़ी-बूढ़ी महिलाएं संभाल लेती हैं.
पहले शादी-विवाह के दौरान महिलाओं की उपस्थिति परिवार के अंत:पुर में ही दिखती थी, वहीं पिछले कुछ वर्षों में बारात में भी वे नजर आने लगी हैं. सच तो यह है कि बारात में पुरुष बारातियों से ज्यादा उत्साह इनमें ही दिखता है.
मिथिला में शादी के बाद नवविवाहित वर-वधू जिस घर में चार दिन तक रहते हैं, उसे कोहबर कहा जाता है. कोहबर की रस्मों के साथ मिथिला पेंटिंग लिपटी हुई है. शादी के अवसर पर जिस कागज में भरकर सिंदूर वर पक्ष की तरफ से वधू के यहां भेजा जाता है, उसमें से दो कोहबर, एक दशावतार, एक कमलदह और एक बांस लिखे होने का रिवाज आज भी है, पर समयाभाव के कारण अब एक दिन के बाद ही द्विरागमन (लड़की की विदाई) की प्रथा चल पड़ी है.
साथ ही शादी-बारात में खान-पान के समय जो रच-रच कर खाने का चलन था, वह भी अब कुछ कम हुआ है. इन वर्षों में शादी के समय बारातियों को जो गाली गीत (डहकन) से नवाजने की परंपरा थी, वह कहीं विलुप्त हो रही है. समाजशास्त्रीय दृष्टि से नये संबंधों के प्रगाढ़ बनाने में यह एक मजबूत आधार का काम करता था. 

(प्रभात खबर, 12 जून 2019 को प्रकाशित)