Thursday, September 23, 2021

किसान आंदोलन और नागार्जुन की लोक चेतना


बेरि-बेरि अरे सिब हमे तोहि कहलहुँ किरिषि करिए मन लाए/रहिए निसंक भीख मँगइते सब गुन गौरव दुर जाए (विद्यापति)

एक साक्षात्कार में नागार्जुन से यह पूछने पर कि कभी आत्मकथा लिखने की इच्छा नहीं हुई? उनका जवाब था- सारी कविताएँ मिला दो, आत्मकथा हो जाएगी.[i] यह बात अंशत: ही सच है. नागार्जुन मूलत: कवि हैं, लेकिन उनका उपन्यासकार रूप उतना ही ठोस है जितना कवि रूप. नागार्जुन का कृतित्व और व्यक्तित्व तब मुकम्मल तौर पर हमारे सामने आता है जब दुखरन मास्टर’ ‘बलचनमासे मिले. सिंदूर तिलकित भाल रतिनाथ की चाचीके बिना अधूरी लगती है. हरिजन गाथा’ ‘वरुण के बेटेके बिना अपूर्ण है. अकाल और उसके बादकी महत्ता बाबा बटेसरनाथ के बिना हम नहीं समझ सकते.

नागार्जुन के सारे उपन्यास बहुजन समाज की प्रगति के निमित्त लिखे गए हैं. हमारा बहुजन समाज आजादी के 73 साल बाद भी शोषित, पीड़ित और उपेक्षित है. नागार्जुन इस समाज में ऐसी चेतना चाहते हैं जिससे आर्थिक-सामाजिक शोषण के विरुद्ध आवाज बुलंद हो. समाज को नई गति मिले. इसलिए वे बलचनमाजैसे प्रतिबद्ध चरित्र की रचना करते हैं. बाबा बटेसरनाथजैसे जड़ में चेतना का संचार करते हैं.

नागार्जुन प्रतिबद्ध लेखक हैं. प्रतिहिंसा उनका स्थायी भाव है. पर प्रतिबद्धता किसके लिए? प्रतिहिंसा किसके प्रति? नागार्जुन के शब्दों में- बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्तउनकी प्रतिबद्धता है. प्रतिहिंसा है उनके प्रति- लहू दूसरों का जो पिए जा रहे हैं. नागार्जुन के साहित्य के ऊपर मधुरेश की यह टिप्पणी सटीक है, उनका संपूर्ण साहित्य उन अत्यंत साधारण लोगों का साहित्य है, जो अपनी सारी मेहनत, निष्ठा और ईमानदारी के बावजूद एक घृणित  और नारकीय जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं. लेकिन इस बात का उन्हें अहसास है कि उनका वास्तविक शत्रु कौन है, लड़ाई किस मोर्च पर लड़नी है...[ii] जैकिसुन, जीवनाथ, दुखमोचन, बलचनमा और मधुरी को यह पता चल चुका है कि हमें अपनी लड़ाई खुड़ लड़नी होगी. बलचनमा कहता है, सच जानो भैया, उस बखत मेरे मन में यह बात बैठ गई कि जैसे अंग्रेज बहादुर से सोराज लेने के लिए बाबू-भैया लोग एक हो रहे हैं, उसी तरह जन-बनिहार, कुली मजदूर और बहिया-खबास लोगों को अपने हक के लिए बाबू भैया से लड़ना पड़ेगा.[iii] नागार्जुन अपने इस सबॉल्टर्न स्वर की वजह से अलग दिखते हैं, अपने पूर्ववर्तियों से, समकालीनों और परवर्ती उपन्यासकारों से. किसानों के मौजूदा संघर्ष और आंदोलनों की बीच उनके उपन्यासों में व्यक्त लोक और लोक-चेतना का महत्व बढ़ गया है. इस निबंध में हम नागार्जुन के उपन्यास बाबा बटेसरनाथ (1954) के माध्यम से उनके उपन्यासों में व्यक्त लोक-चेतना की पड़ताल करेंगे. पर यहाँ हम लोक की अर्थच्छवियों को पहले परखते हैं.

लोक का स्वरूप

हिंदी साहित्य जन्म से ही लोकधर्मी रहा है. लोक की गंध, लोक-चेतना का स्वर इस साहित्य में सदैव बसता-बजता रहा है. इस साहित्य के इतिहास की बनावट और बुनावट दोनों पर लोक की छाप स्पष्ट दिखाई पड़ती है. यह परंपरा सरहपाद-विद्यापति-कबीर-तुलसी से होते हुए प्रेमचंद-फणीश्वर नाथ रेणु-नागार्जुन से आगे समकालीन रचनाकारों तक जाती है. पर ऐसा नहीं है कि लोक का स्वर हमेशा एक सा रहा है. समाज के अनुरूप और समय के दबाव के फलस्वरूप लोक के स्वरूप में अंतर स्पष्ट है.

हिंदी साहित्य कोश के अनुसार, लोक के दो अर्थ विशेष प्रचलित हैं. एक तो वह जिससे इहलोक, परलोक अथवा त्रिलोक का ज्ञान होता है. वर्तमान प्रसंग मे यह अर्थ अभिप्रेत नहीं है. दूसरा अर्थ लोक का होता है जनसामान्य- इसी का हिंदी रूप लोग है. इसी अर्थ का वाचक लोकशब्द साहित्य का विशेषण है.[iv] पर लोक की शाब्दिक व्याख्या से इतर समाजशास्त्र और मानवशास्त्र में लोक की अवधारणा को लेकर असहमति और विवाद की स्थिति है. इस संबंध में समाजशास्त्री पूरनचंद्र जोशी कहते हैं, लोक अध्ययन अवधारणाओं के संबंध में एक तरफ ऐसी औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त रहे हैं जिसने लोक-समुदायों को आधुनित सभ्यता के दायरे के बाहर मानकर वास्तव में सभ्यताके ही बाहर माना है.[v] असल में लोक की अवधारणा अंग्रेजी के फोक (folk) की अवधारणा से काफी दूर तक प्रभावित है. एडवर्ड सईद ने ओरियंटलिज्म के प्रसंग में नोट किया है, “’पूरबीअवधारणा पश्चिम की निर्मिति है. ऐसी निर्मिति जो पूरब के शोषण, दमन और शासन के लिए बनाई गई है.[vi] यही बात अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक अवधारणाओं के प्रसंग में भी कही जा सकती है. औपनिवेशिक शासन प्रणाली और शिक्षा प्रणाली ने अपने अनुकूल सामाजिक-सांस्कृतिक अवधारणाओं को जाँचा-परखा और परिभाषित किया. प्राच्य विद्वानों ने जिस तरह विभिन्न अवधारणाओं को परिभाषित किया उसने जाने-अनजाने भारतीय मनीषियों के सोचने-समझने के क्रम को निर्धारित किया. जार्ज ए ग्रियर्सन ने लोक गीत/लोकोक्ति/लोक गाथा इत्यादि के संदर्भ में काम किया तो उन्होंने लोक की जगह फोक शब्द का प्रयोग किया. भारतीय विद्वानों ने जब इन्हीं विषयों पर काम शुरु किया तो उन्होंने भी फोक शब्द का प्रयोग किया. एक तरह से लोक के प्रसंग में फोक शब्द रुढ़ हो गया. प्राय: यह मान लिया गया कि फोक की अवधारणा और लोक की अवधारणा में कोई अंतर नहीं.

यहाँ पर फोक की चर्चा प्रासंगिक होगी. इनसाक्लोपीडिया ब्रिटानिका के अनुसार: “आम तौर पर फोक समाज सविधि शिक्षा से वंचित या आदिम समाज का प्रारूप माना जाता है जिसका मानवशास्त्रियों ने परंपरागत अध्ययन किया.स्पष्टत: फोक आदिम जनसमूह को लक्षित है. आदिम समाज इसका प्रस्थान बिंदु है. फोक शब्द का प्रयोग समाज विज्ञानों में 19वीं सदी में शुरु हो गया था. एम लेजरस, एच स्टाईनथल, वुंट, सम्नर आदि  समाजशास्त्रियों ने इसे अपने ढंग से परिभाषित किया. आम तौर पर इन समाज वैज्ञानिकों ने फोक शब्द को व्यापक परिप्रेक्ष्य में अपनाया. वे प्राय: इस शब्द का प्रयोग किसी देश या समाज में रहने वाले पूरे जनसमूह के लिए करते हैं. अमेरिका के प्रसिद्ध समाजशास्त्री राबर्ट रेडफिल्ड ने फोक के संबंध में एक आदर्श प्रारूप (Ideal Type), एक अमूर्त मॉडल प्रस्तुत किया. इस मॉडल में एक आदर्श फोक समाज के लक्षणों को प्रस्तुत किया. उनके अनुसार आदर्श फोक समाज के निम्नलिखित लक्षण हैं-छोटा आकार, पृथक, विलगित, दूसरे समाज से कोई संपर्क नहीं; अपने समाज के भीतर बहुत आत्मीय संपर्क; सिर्फ मौखिक संप्रेषण पर आधारित, लिखाई-पढ़ाई की कोई स्थिति नहीं; जन-समूह में कोई आर्थिक, समाजिक विभिन्नता नहीं; एकत्व की प्रचुर भावना; सारे व्यवहार परंपरा पर आश्रित, पूरा समाज एक धार्मिक समाज; जादू-टोना का प्रचुर मात्रा में प्रभाव; सारे लोग पारिवारिक, आनुवांशिक या धार्मिक बंधनों से जुड़े हुए, इत्यादि.”[vii] इस तरह रेडफिल्ड के लिए एक खास तरह के समाज ही फोक समाज हैं जिनका विकास नहीं हुआ है, जहाँ सभ्यता विकसित नहीं हुई है. यानि आदिवासी या कबीले! फोक समाज के परिप्रेक्ष्य में रेडफिल्ड की अवधारणा समाजशास्त्रियों के बीच काफी लोकप्रिय रही. पर वर्तमान में यह सर्वमान्य नहीं है.

फोक की इस परिभाषा के बरक्स लोक की समाजशास्त्रीय व्याख्या हम देखते हैं. भारतीय समाज के केंद्र में लोक की अवस्थिति रही है. लोक से विछिन्न भारतीय समाज का अध्ययन और विवेचन संभव नहीं है. इस बात की पुष्टि समाजशास्त्री हेतुकर झा लोक को लोकायत परंपरा से जोड़ कर करते हैं. भारत में लोकायत की पंरपरा दर्शनशास्त्री डॉ राधाकृष्णन के अनुसार प्राचीन काल से रही है. संभवत: यह 600 ईसा पूर्व से सन 200 के बीच विकसित हुआ. वेदों पर आधारित दर्शनशास्त्रों के समांतर लोकायत परंपरा चलती रही. अन्य विद्वान हरप्रसाद शास्त्री के मुताबिक विभिन्न तांत्रिक मार्ग, जैसे कापालिक, सहजिया इत्यादि लोकायत ही हैं. डॉ हेतुकर झा लिखते हैं- इस तरह प्रतीत होता है कि तंत्र के विभिन्न मार्ग, दक्षिणाचार को छोड़कर, लोकायत की परंपरा से जुड़े हैं और इस परंपरा का ताल्लुक वैदिक कर्मकांडों के भागीदार वर्गों के अतिरिक्त सारे जन-समूह से रहा, जिसे लोककी संज्ञा दी गई.[viii] मिथिला के समाज का जीवन दर्शन लोकायात या तंत्र शास्त्र से प्रभावित रहा है, जिसका चित्रण नागार्जुन के उपन्यासों में मिलता है.

भारतीय साहित्य में लोक वेदसे भिन्न अर्थ का वाचक है. वैदिक कर्मकांडों से वंचित जनसमूहों, जो उच्च जातियों से संबंद्ध नहीं थे, दूसरे शब्दों में शूद्रों तथा सभी वर्णों/जातियों के लोगों का एक वर्ग वैदिक परंपरा से विमुख होकर या वंचित होकर लोकायत या तांत्रिक मार्गों से जुड़ते गए. हिंदी साहित्य का नाथ साहित्य, सिद्ध साहित्य इसी का बोध करता है. लेकिन ऐसा नहीं है कि लोक वेद से बिलकुल ही अलहदा रहा है. इनके बीच आवाजाही का संबंध बना रहा है. समाजाशास्त्री श्यामाचरण दुबे ने एक अध्ययन में रेडफिल्ड और मिल्टन सेंगर के महान और लघु परंपराओं (great/little tradition) और उनके अंतरावलंबन की बात को स्वीकार है. साथ ही उन्होंने इसे शास्त्रीय और लौकिक परंपराएँ कहने की बात की है. उनका मानना है कि, शास्त्रीय और लौकिक परंपराओं में समझौते हुए और आदान-प्रदान भी होता रहा.[ix] इस संबंध में लोक के अध्येता बद्री नारायण की यह टिप्पणी भी गौरतलब है: भारतीय परंपरा में लोक को श्रुति और स्मृति से युक्त एक ऐसा सांस्कृतिक प्रवाह माना गया है जिससे वेद जनित हुआ है. कुछ विचारकों का तो मानना है कि लोक का गेय पक्ष ही वेद बन गया. इस प्रकार लोक एवँ शास्त्र, देशी एवँ मार्गी अवधारणाओं में विरुद्ध नहीं बल्कि अंत:संवादी और आवाजाही का संबंध रहा है. बाद में शास्त्र ने अपना मानकीकरण कर अपने को लोक से अलग कर लिया. तब भी लोक एवँ शास्त्र के बीच आपस में आवाजाही एवँ लेन-देन का संबंध बना रहा.[x] आधुनिक समय में लोक की अवधारणा पर गौर करें तो हम पाते हैं लोक मूल शाब्दिक अर्थ की ओर लौट रहा है. जैसा कि वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोक शब्द जनता का वाचक है, जो भारत में स्वीकार्य हो चला है. अंग्रेजी का शब्द people का अनुवाद लोग है, जो लोक से दूर नहीं. भारतीय संविधान में व्यवहृत हम भारत के लोग- we, the people of India, इस ओर इंगित करता है. पीपुल शब्द में सबॉल्टर्न या निम्नवर्गीय स्वर भी शामिल है. जैसा कि इतिहासकार रणजीत गुहा इतिहास लेखन के प्रसंग मं निम्नवर्ग की भूमिका को रेखांकित करते हुए पीपुल की चर्चा करते हैं, जिसमें निम्नवर्ग-जिसका फैलाव श्रमिक जनसंख्या और समाज के मध्यवर्ती तबके (जो शहर और गाँव दोनों जगहों पर रहता है) तक है.[xi]

बाबा बटेसरनाथ में लोक चेतना

नागार्जुन के उपन्यासों में मिथिला का सामंती समाज अपनी संपूर्णता में अभिव्यक्त हुआ है. उनके उपन्यासों में मिथिला के लोक जीवन, लोक मन का चित्रण है. यहाँ आशा है, निराशा है, सुख है, दुख है और संघर्ष है. लेकिन उपन्यासों की कथा-भूमि मिथिलांचल होते हुए भी इसमें व्यापकता है जो पूरे भारतीय समाज को निरूपित करता है.

बाबा बटेसरनाथ की कथावस्तु और शिल्प विशिष्ट है. बाबा बटेसरनाथ का नायक एक बूढ़ा बरगद का पेड़ है जो रूपउली गाँव के सौ वर्षों के इतिहास को खुद में समेटे हुए है. वह गाँव में हाशिए पर जी रहे लोगों के शोषण और उनके संघर्ष का साक्षी है. नागार्जुन शोषण की इस पृष्ठभूमि में गाँव के लोगों की विकसित हो रही चेतना (लोक चेतना) को रेखांकित करते हैं. असल में, बाबा बटेसरनाथ इस चेतना का प्रतीक है.

नागार्जुन को प्रेमचंद की परंपरा का उपन्यासकार कहा जाता है. गोदान (1936) के प्रकाशन के बाद हिंदी उपन्यास की धारा ग्राम-जीवन से विमुख होकर शहर और अंतर्मन के गुह्य गह्वर में चक्कर काटने लगी थी. नागार्जुन अपने पहले उपन्यास रतिनाथ की चाची (1948) के माध्यम से भारतीय ग्रामीण समाज के सच को फिर से पकड़ते हैं. बलचनमा, नई पौध, बाबा बटेसरनाथ आदि उपन्यासों के माध्यम से प्रेमचंद की परंपरा और पुष्ट होती है. इस अर्थ में नागार्जुन स्वातंत्र्योत्तर भारतीय समाज में किसान जीवन की वास्तविकताओं और आकांक्षाओं के कथाकार हैं.  असल में, समाज और राजनीति को किसानों के जीवन और उनकी आकांक्षाओं से जोड़ कर देखने की दृष्टि उनकी विशेषता है. काल में अंतर के कारण प्रेमचंद और नागार्जुन की चेतना में फर्क नजर आता है, जो कि स्वाभाविक है. हालांकि चिंता एक ही है- स्वाधीनता की. प्रेमचंद के उपन्यासों में स्वाधीनता की चिंता अपनी संपूर्णता में स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ी है. नागार्जुन स्वाधीनता की चिंता आजादी के बाद और उसके बावजूदकी है. हालांकि वे सामंती-औपनिवेशिक पराधीनता को भी नहीं भूलते. हिंदी उपन्यासों में स्वाधीनता के लिए संघर्ष की चेतना प्रेमचंद के बाद सबसे ज्यादा नागार्जुन के यहाँ मिलती है. प्रेमचंद ने उत्तर प्रदेश के अवध-बनारस क्षेत्र के किसानों की कथा कह कर इस चेतना को अभिव्यक्त किया है, वहीं नागार्जुन ने मिथिलांचल के किसानों, खेतिहर मजदूरों की कथा कह कर. नागार्जुन के उपन्यासों में प्रेमचंद की तुलना में अधिक स्थानीयता है. इसलिए वे फणीश्वर नाथ रेणुके नजदीक दिखाई पड़ते हैं. इस वजह से उनके उपन्यासों को आंचलिकता के संदर्भ में परखने की कोशिश होती है. लेकिन नागार्जुन के उपन्यास आंचलिक होकर भी आंचलिकता का अतिक्रमण करते हैं. आंचलिकता के प्रसंग में मधुरेश लिखते हैं, आंचलिकता की अपेक्षा लोक चेतनापद अपनी व्यंजना और अर्थ विस्तार में निश्चय ही अधिक सार्थक है...लोक चेतना का सीधा-सादा  अर्थ है लोक जीवन में गहरी और आत्मीय संपृक्ति अर्थात उपन्यास में अंकित जनजीवन की समस्याओं, संघर्षों, जीवन पद्धति और आंकाक्षाओं की सहज एवँ कलात्मक अभिव्यक्ति.[xii]

हिंदी उपन्यासों में लोक चेतना किसी न किसी रूप में 20वीं सदी के आरंभिक दशकों से ही दिखाई देने लगती है. कहीं क्षेत्रीयता के आवरण में तो कहीं स्थानीयता का खोल पहन कर. गोपालराम गहमरी, अयोध्या सिंह उपाध्य हरिऔध’, प्रेमचंद, शिवपूजन सहाय, निराला से होकर नागार्जुन, शिव प्रसाद मिश्र रुद्र, रेणु सहित वर्तमान में संजीव, भगवानदास मोरवाल जैसे उपन्यासकारों के यहाँ इसे  देखा जा सकता है. यह सच है कि स्वतंत्रता के बाद के आरंभिक दशकों में लोक चेतना की जो तीव्रता थी, जो पैनापन था उसकी धारा कुंद हुई है, पर एक प्रवृत्ति के रूप में लोक चेतना की धारा अब भी प्रवहमान है.

बाबा बटेसरनाथ लोक चेतना का प्रतिनिधि उपन्यास है. इतने विस्तृत फलक पर नागार्जुन ने किसी अन्य उपन्यास की रचना नहीं की. एक सदी के लंबे कालखंड (1850-1953-4) को खुद में समेटे यह उपन्यास सामंती-औपनिवेशिक और लोकतांत्रिक भारत की यात्रा करता है.  नागार्जुन के उपन्यासों का लोक मुख्यत: मिथिलांचल का गाँव-देहात है. पर नागार्जुन के उपन्यासों की लोक चेतना का संबंध महज गाँव-देहात की संरचना से ही नहीं है. लोक चेतना एक ओर मेहनतकश गरीब, किसान-मजदूर, दलित-उत्पीड़ित जनता से जुड़ती है तो दूसरी ओर नागार्जुन की इतिहास चेतना, वर्ग चेतना और राष्ट्रीय नव जागरण की चेतना भी अभिव्यक्ति पाती है. त्योहारों और उत्सवों की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है. दूसरे शब्दों में यह लोक संस्कृति और लोकधर्म से विलग नहीं है. अंतोनिया ग्राम्शी ने लिखा है कि लोक संस्कृति में रूढ़िवादी, प्रतिक्रियावादी प्रवृत्तियों के साथ-साथ प्रगतिशील प्रवृत्तियाँ भी होती है. बाबा बटेसरनाथ इसका साक्ष्य है.

बाबा बटेसरनाथ का कथा-शिल्प हिंदी उपन्यास के क्षेत्र में एक अभिनव प्रयोग है. जैसा कि हमने कहा इस उपन्यास का नायक कोई मानव नहीं बल्कि एक बूढ़ा बरगद का पेड़ है. इस पेड़ के प्रति लोगों की आत्मीयता वैसी ही है जैसी घर के किसी बड़े-बूढ़े के प्रति होती है. इसलिए यह पेड़ बाबा बटेसरनाथहै. यह रूपउली गाँव के इतिहास, सुख-दुख, संघर्ष और विकास का साक्षी रहा है.

भूमंडलीकरण के इस दौर में भी देश की कामकाजी जनसंख्या का 70 प्रतिशत कृषि कर्म में लगा हुआ है. किसानों का शोषण पहले सामंतवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था के तहत होता था, अब किसान उदारीकरण और बाजारवाद की व्यवस्था से शोषित हो रहा है. पिछले दशकों में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, पंजाब, केरल के किसानों की आत्महत्याएँ इसका सबूत है. औपनिवेशिक भारत में किसानों के लिए कृषि कर्म पाँव की बेड़ी बन चुकी थी. इस व्यवस्था के रहते इस शोषण से निस्तार असंभव था. प्रेमचंद ने जिसे गोदानमें बखूबी दिखाया है. पूस की रात में हल्कू नील गाय के द्वारा खेत चर जाने के बाद भी प्रसन्न है!

भारतीय समाज में किसानों का शोषण और गरीबी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. सदियों से सामंती रूढ़ियों में जकड़ी, जर्जर सामाजिक व्यवस्था शोषण-उत्पीड़न के लिए दाना-पानी जुटाती रही है. कट्टर जातिवाद, स्त्रियों की दारूण दशा सामंती व्यवस्था से उपजी मानसिकता से परिचालित होती रही है. मिथिला का समाज अपनी संकीर्णता और रूढ़ियों के लिए कुख्यात है. इतिहासकार राधाकृष्ण चौधरी ने लिखा है, जब से हरसिंह देव ने कुलीनवाद[xiii] लागू की तब से इन 600 सौ वर्षों में मिथिला की पुरानी सामाजिक संरचना में बमुश्किल कोई बदलाव आया है. कुलीनवाद ने पहले से चली आ रही वर्णाश्रम व्यवस्था को और भी कठोर बना दिया था. विद्यापति ने अपनी नचारीऔर महेशवाणीमें जिस सामाजिक असमानता, निपट गरीबी, स्त्रियों की पराधीनता और दुख का बार बार वर्णन किया है वह आज के समय और मिथिला के समाज के लिए उतना ही सच है जितना विद्यापति के समय था. विद्यापति की ये पंक्तियां: दुखहि जनम भेल दुखहि गमाओल/ सुख सपेनहुं नहिं भेल हे भोलानाथ जैसे अभाव के भाव का टेक है जिसकी आवृत्ति बार बार होती रहती है. सुख आज भी स्वप्न है. सामंतवाद की जगह भले ही लोकतंत्र आ गया, तंत्र के बदलने से लोक की स्थिति नहीं बदली.

बाबा बटेसरनाथमें किसानों के शोषण, उससे उपजी गरीबी का यर्थाथ वर्णन है. मिथिला में अतिवृष्टि और अनावृष्टि की घटना सामान्य है. बाबा बटेसरनाथ में अकाल और बाढ़ का नागार्जुन ने हृदयविदारक चित्रण किया है- दूसरे के खेतों में मजदूरी करके जीविका चलानेवालों का तो और भी बुरा हाल था. यह बाढ़ उनके लिए तो भुखमरी का बिगुल बजाती आई थी. रास्ते बंद थे, भागना भी आसान नहीं था.[xiv]

ये प्रसंग बाढ़ और अकाल के हैं, लेकिन आम दिनों में भी खेतिहर किसानों, मजदूरों की स्थिति इससे अच्छी नहीं थी. दरंभगा जिले के निम्नवर्गीय रैयत और खेत-मजदूरों की स्थिति पर 1888 इस्वी की एक रिपोर्ट में लिखा है-इसमें कोई शक नहीं कि बिहार के इस भाग में उच्च और मध्यवर्ग के लोग समृद्धशाली हैं; साधारण मजदूर और छोटे खेतिहर किसानों की स्थिति उनके ही जैसे बंगाल के खेतिहर किसानों, मजदूरों से बहुत बुरी है. इनकी जनसंख्या कुल का चालीस प्रतिशत है...दैनिक मजदूरी कहीं भी दो आना से ज्यादा नहीं देखी गई और कई मामलों में यह प्रतिदिन पाँच-छह पैसों से ज्यादा नहीं थी.[xv]

जाति व्यवस्था ग्रामीण समाज में व्याप्त गरीबी, शोषण के कोढ़ में खाज का काम करती है. दलित लेखकों की आत्मकथाएँ पहली बार हिंदी साहित्य में इस सच को पुरअसर ढंग से व्यक्त करती है. नागार्जुन जाति व्यवस्था का यर्थाथपरक चित्र प्रस्तुत करते हुए लिखते हैं, छोटी जातवालों की पाठकों के उस खानदानी बरहममें उतनी दिलचस्पी नहीं थी जितनी कि उनके देवताओं- भुइयाँ महाराज, सलहेस राजा और दीना भद्री वगैरह में.[xvi] देवताओं के भी जाति-क्रम हैं. यही नहीं, गाँवों में भूतों का भी जाति-क्रम है. नागार्जुन गाँवों में जाति-भेद को आसानी से पहचान लेते हैं. ब्राह्मणों के मरने पर बरहम बाबाऔर निम्न या दलित जाति के लोगों के मरने पर मलेच्छकी अवधारणा! शोषण महज आर्थिक पहलूओं तक ही सीमित नहीं होता, सामाजिक शोषण धार्मिक और सांस्कृतिक रूप में ज्यादा प्रभावकारी होता है. आर्थिक प्रक्रियाएं धीरे-धीरे बदलती हैं पर धार्मिक-सांस्कृतिक प्रक्रियाएँ परंपरा के नाम पर जटिल और कठोर बनी रहती है. अवसर पाते ही वह पुऩ: क्रियाशील हो उठती है. रतिनाथ की चाचीमें बाल-विधवा सुशीला काशी में जयनाथ से कहती है, तुम जिस जाति में, जिस समाज में पैदा हुए हो, वह जिंदा नहीं, मुर्दाघर है...[xvii] इस मुर्दाघर में बमुश्किल ही कहीं कोई रोशनदान दिखता है. बाबा बटेसरनाथ में नागार्जुन ने मिथिला की लोक संस्कृति और लोक धर्म को बिना किसी लाग लपेट के उत्कृष्ट रूप में इन पंक्तियों में चित्रित किया है: “ लेकिन पाठक बाबा की ध्वजा जब से यहाँ खड़ी हुई, तब से मेरे प्रति सभी की भावना बदल गई. श्रद्धा, भक्ति, भय और आतंक...मनोरथ पूरा होने पर लोग आकर धूमधाम से मनौतियाँ चढ़ाते..बारह महीनों में बीस-पच्चीस बकरे भी बलि चढ़ते थे- मचलते मुण्डों और तड़पते धड़ों की खूनी पिचकारियों से मेरा सीना सुर्ख हो उठता था, रगों में बिजली दौड़ जाती थी...दिन के समय कुत्ते और रात के वक्त गीदड़ मेरे बदन पर जमी बलिदानी लहू की मलाई चाटा करते...[xviii] इस उद्धरण पर कृष्णा सोबती ने सटीक टिप्पणी की है, इसे पढ़ते-पढ़ते नथुनों में खून की बू चढ़ने लगती है और समूची जाति कि निरामिष अहिंसा, मूढ़ता, धर्मोन्माद और अंधविश्वास की गाँठों में बँटी रस्सी और उसमें कराहती वह जीवन परंपरा भी, जिसकी पुण्यमयी गौरवशाली बपौती को सराहते हम अघाते नहीं.[xix] लेकिन नागार्जुन की लोक चेतना अंधविश्वासों, परंपराओं के नाम पर रूढ़ियों का समर्थन नहीं करती है- राजाओं, पुरोहितों, सामंतों, सेठों और तीर्थंकरों की बातों को बढ़ा-चढ़ा कर बखान करनेवाले बहुत सारे विद्वान सुदूर अतीत की उन क्रूर घटनाओं पर अब भी पर्दा डाले हुए हैं; वह उन लोगों के लिए सत्ययुग है, स्वर्णयुग है! साधारण जनता का स्वर्णयुग तो अभी आगे आनेवाला है बेटा!”[xx]

स्वर्णयुग की अवतारणा तब ही संभव है जब गरीबी, शोषण, जाति व्यवस्था का दंश मिटे. गाँवों में सामाजिक आर्थिक बदलाव आए. एक वैज्ञानिक चेतना आकार ले. बाबा बटेसरनाथ में नागार्जुन ने स्वतंत्रता संघर्ष में किसानों-मजदूरों की भागीदारी के माध्यम से अपनी इतिहास चेतना और वर्ग चेतना को व्यक्त किया है. स्वतंत्रता संघर्ष की अनुगूंज किस तरह मिथिलांचल के गाँव-देहातों तक थी इसे बाबा बटेसरनाथ में नमक कानून तोड़ने की घटना के रूप में नागार्जुन ने इस रूप में चित्रित किया है: “गड्ढा खोदकर तीन चूल्हे बना लिए गए थे. उनमें आँच जलाई गई. तीन नई हँडियों में नोनी मिट्टी और पानी घोलकर उन्हें चूल्हों पर चढ़ा दिया दयानाथ ने. ..नमक कानून तोड़ने का यज्ञ जिले में कहीं न कहीं आए दिन होता ही रहता था.[xxi] लेकिन वर्ष 1947 में जब देश को आजादी मिली, गाँव के जमींदार लोकतंत्र का मजाक उड़ाते हुए सामूहिक जमीन पर कब्जा करने की राजनीति करने लगे. बाबा बटेसरनाथ के माध्यम से रूपउली गाँव में एक नवचेतना विकसित होती है कि कोई व्यवस्था निष्क्रियता से नहीं सक्रियता से ही परिवर्तित हो सकती है. शोषण का अंत कोई दैवी शक्ति नहीं केगी. कोई कानून या सरकार भी नहीं! जीवनाथ और जैकिसुन समझ चुके हैं, जनबल को अच्छी तरह संगठित कर लेना चाहिए. अपनी रूपउली के इस जनआंदोलन को जनसंघर्ष की जिला और प्रदेशव्यापी धारा से मिला देना होगा.[xxii] बाबा बटेसरनाथ किसानों, मजदूरों की जागृति, संगठन और संघर्ष की चेतना का साक्षी है. नागार्जुन की वर्ग चेतन दृष्टि शोषितों में शक्ति देखती है. शोषण, गरीबी, जहालत की जिंदगी से मुक्ति संगठन के द्वारा ही संभव है. बेदखली के विरुद्ध जीवनाथ के नेतृत्व में सर्वहारा वर्ग का संयुक्त मोर्चा बनता है. नागार्जुन ने अदभुत कला कौशल से बटेसरनाथ की कथा को सामूहिक प्रचेष्टा से एकमेक कर दिया है. नागार्जुन की लोक चेतना प्रतिरोध की चेतना से संपृक्त है. बाबा बटेसरनाथ सामूहिक संघर्ष की चेतना का प्रतीक है.

नागार्जुन के उपन्यास प्रतिबद्ध जीवन दृष्टि की सृष्टि है. नागार्जुन कहते हैं, हम सर्वहारा के साथ हैं अपनी राजनीति में, अपने साहित्य में....[xxiii] सर्वहारा वर्ग के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के चलते नागार्जुन के पात्र वर्ग चेतन दृष्टि से संपन्न है. उनके पात्र अपार जिजीविषा के मूर्त रूप हैं. लोक की प्रतिरोधी शक्ति उनके पात्रों में अंतिम समय तक लड़ने का हौसला बनाए रखती है. लोक संस्कृति अपने मूल रूप में सामासिक होती है. सामूहिकता इसका विशिष्ट गुण है. बाबा बटेसरनाथ में सामूहिक प्रचेष्टास्वार्थ की व्यक्तिगत भावना से चेतना को धुंधला नहीं बनने देती है. बाबा बटेसरनाथ इस उपन्यास में कहता है, तुम लोगों ने तो बस्ती की हवा ही बदल दी. अब तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते पाठक और जैनारायन. पाठक और जैनारायन ही क्यों, कोई हिम्मत नहीं करेगा तुम लोगों से टकराने की...सुखमय जीवन के लिए तुम्हारी यह सामूहिक प्रचेष्टा कभी मंद न हो, स्वार्थ की व्यक्तिगत भावना कभी तुम्हारी चेतना को धुंधला न बनाए.[xxiv] इस उपन्यास में नागार्जुन ने सामूहिकता की जो मांग उठाई है, वह लोक चेतना का ही रूप है. लोक चेतना अपने रूप में स्थिर नहीं बल्कि परिवर्तनशील होती है. इस उपन्यास के वर्ग चेतन पात्र आजादी के बाद जमींदारों और कांग्रेसी नेताओं की सांठ गांठ द्वारा गाँव की सामूहिक जमीन को हथियाने की रणनीति को विफल कर देते हैं. उपन्यास के अंत में पुराने बरगद की जगह बरगद का नया पौधा एक नई चेतना का द्योतक है. यह नई चेतना स्वातंत्र्योत्तर भारत में आस्था और विश्वास की चेतना है. नागार्जुन की इतिहास दृष्टि वर्तमान की चिंता से संपृक्त भविष्योन्मुखी दृष्टि है जो, अरुण कमलके प्रति आस्थावान है. बाबा बटेसरनाथ कहता है, घबराने की जरूरत नहीं. अंत में जीत तुम्हारी ही होगी. आज न सहीं, कल. कल न सहीं परसों.[xxv] चंद्रशेखर कर्ण ने ठीक ही नोट किया है, प्रेमचंद के पात्र क्रांति के आकांक्षित स्वप्न को पालते हुए भी टूटे हुए हैं. वे अपने इच्छित फल की प्राप्ति के लिए सर्वहारा हैं. पर नागार्जुन का बलचनमा निरीह होकर भी जीना सीख लेता है. और अंत में अपनी परंपरागत चेष्टाओं के बीच दीपशिखा-सा भभककर जल उठता है.[xxvi]  बाबा बटेसरनाथ में नागार्जुन ने जड़ को कथा नायक बना कर एक अनूठा प्रयोग किया है. बरगद के पेड़ के साथ लोक मानस में अनेक किंवदंतियाँ, मान्यताएँ और विश्वास जुड़ी होती है.

नागार्जुन ने बाबा बटेसरनाथ के माध्यम से किसानों के शोषण और प्रतिरोध को बखूबी पेश किया है. नामवर सिंह ने लिखा है, नागार्जुन की वर्ग चेतना का आधार कोई अमूर्त विचार प्रणाली या राजनीति का फौरी कार्यक्रम नहीं, बल्कि ठेठ जन-जीवन है-जीवंत लोकधर्म.[xxvii] बाबा बटेसरनाथ एक ऐसा शांति निकेतनहै जहाँ सामूहिकता आकार लेती है. यह निजी जगह नहीं है. नागार्जुन इस सार्वजनिक स्थल का इस्तेमाल एक राजनीतिक स्थल के रूप में करते हैं जहाँ संघर्ष की भूमि पर चेतना जन्म लेती है-बहुजन हिताय बहुजन सुखाय लोकानुम्पाय. दक्षिणी अमेरिकी अपन्यासों के प्रसंग में जिस जादुई यथार्थवादकी बात की जाती है और जिसका उत्कृष्ट रूप कारपेंटियरऔर गैब्रियल गार्सिया मार्खेजजैसे उपन्यासकारों के यहाँ मिलती है, उसकी झलक हम बाबा बटेसरनाथ में पाते हैं. इस उपन्यास में इतिहास के तथ्य और फैंटेसी का कलात्मक संयोजन है. नागार्जुन ने लोक में व्याप्त विश्वास, लोक जीवन से जुड़े मिथक, लोक मानस में बैठी किंवदंतियों का इस्तेमाल कर मिथिला के सौ सालों का इतिहास प्रस्तुत किया है. पर यह महज इतिहास नहीं है. मार्खेज ने एकांत के सौ वर्षके बारे में एक इंटरव्यू में कहा था-एकांत के सौ वर्ष लातिन अमेरिका का इतिहास नहीं है. वह लातिन अमेरिका का एक रूपक है.[xxviii] कहा जा सकता है कि बाबा बटेसरनाथ मिथिलांचल का एक रूपक है, प्रतीक है- लोक चेतना का. कृषि कानूनों के खिलाफ मौजूदा किसान आंदोलन में यह उपन्यास एक नई अर्थवत्ता के साथ हमारे प्रस्तुत होता है.

 

 



[i] नागार्जुन के साथ बातचीत, सुभाष चंद्र यादव, समकालीन भारतीय साहित्य, अक्टूबर-दिसंबर, नई दिल्ली, 1995, पेज 21

[ii] नागार्जुन: रचना प्रसंग और दृष्टि, राम निहाल गुंजन (संपादक), नीलाभ प्रकाशन, इलाहाबाद, 2002, पेज 71

[iii] बलचनमा, नागार्जुन, किताब महल, नई दिल्ली, 2002, पेज 71

[iv] हिंदी साहित्य कोश, भाग-1, धीरेंद्र वर्मा (संपादक), पेज 591

[v] लोक, पीयूष दईया (संपादक), भारतीय लोक मण्डल, उदयपुर, 2002, पेज 367

[vi] ओरियंटलिज्म, पेंग्विन बुक्स, 2001, पेज 3

[vii] इंटरनेशनल इनसाइक्लोपीडिया ऑफ द सोशल साइंसेज, वाल्यूम 3, 4 पेज 177

[viii] लोक, पीयूष दईया (संपादक), भारतीय लोक मण्डल, उदयपुर, 2002, पेज-378

[ix] समय और संस्कृति, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पेज 38-39

[x] लोक, पीयूष दईया (संपादक), भारतीय लोक मण्डल, उदयपुर, 2002 पेज-346

[xi] सबॉल्टर्न स्टडीज 1, राइटिंग आन साउथ एशियन हिस्ट्री एंड सोसाइटी, रंजीत गुहा, (संपादक)  ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1982, पेज 4

[xii] हिंदी उपन्यास सार्थक पहचान, स्वराज प्रकाशन, दिल्ली, 2002, पेज 142

[xiii]  मिथिला इन द एज ऑफ विद्यापति, चौखंभा औरिएंटेलिया, वाराणसी, 1976, पेज 401

[xiv]  बाबा बटेसरनाथ, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 1985, पेज 59

[xv]  पी नोलन, सेक्रेटरी टू गवर्नमेंट ऑफ बंगाल, टू द सेक्रेटरी टू द गवर्नमेंट ऑफ इंडिया, रेवेन्यू एंड एग्रीकल्चरल डिपार्टमेंट, रेवेन्यू डिपार्टमेंट, एग्रीकल्चर, नं-87 टी आर दार्जिलिंग, डेटेड द 30 जून 1881, पेज 5-6, हेतुकर झा, उद्धृत, उपनिवेशकालीन मिथिलाक गाम ओ शासक निम्नवर्ग, मैथिली अकादमी पटना, 1988, पेज 31

[xvi] बाबा बटेसरनाथ, पेज-55

[xvii] नागार्जुन, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 1996, पेज 70

[xviii] बाबा बटेसरनाथ, पेज-50

[xix]  आलोचना, जनवरी-मार्च-अप्रैल-जून 81, पेज 80

[xx] बाबा बटेसरनाथ, पेज18

[xxi] वही, पेज 75

[xxii] वही, पेज 95

[xxiii]  मेरे साक्षात्कार: नागार्जुन; किताबघर, दिल्ली, 2000, पेज 181

[xxiv] बाबा बटेसरनाथ, पेज 115

[xxv]  वही, पेज 81

[xxvi]  चंद्रशेखर कर्ण, प्रतिबद्ध जीवन दृष्टि की शक्ति और सीमाएँ, आलोचना (संपादक नामवर सिंह), अप्रैल-जून, वर्ष 80, पेज -37

[xxvii] आलोचना, जनवरी-मार्च-अप्रैल-जून’ 81, पेज4

[xxviii] मार्खेज से क्लॉडिया ड्राइफुस की बातचीत; प्लेबॉय, अमेरिका, अनुवाद: मंगलेश डबराल; कथादेश (संपादक हरिनारायण), सितंबर, 2002, पेज-6

(आजकल , अक्टूबर 2021, पेज 17-20)

Sunday, September 19, 2021

स्टारडम के तामझाम से परे अभिनेता


कोरोना महामारी के दौरान मलयालम सिनेमा प्रेमियों की संख्या बढ़ी है. हिंदी सहित विभिन्न भाषाओं में सब-टाइटल के साथ ओटीटी प्लेटफॉर्म इन फिल्मों के प्रदर्शन के लिए मुफीद साबित हुआ है. ‘जोजी’, ‘आरकारियम’, ‘द ग्रेट इंडियन किचन’, ‘मालिक’ आदि फिल्मों को दर्शकों ने हाथों-हाथ लिया. युवा निर्देशकों-अभिनेताओं के साथ-साथ मलयालम के चर्चित अभिनेता ममूटी की एक फिल्म ‘वन’ भी इन दिनों ओटीटी पर दिखाई जा रही है, जिसमें वे मुख्यमंत्री के किरदार में नजर आते हैं.

पिछले दिनों ममूटी ने जीवन के सत्तर और फिल्मी यात्रा के पचास वर्ष पूरे किए हैं. एक बार फिर से उनकी फिल्मों की चर्चा हो रही है. इन पचास वर्षों में मलयालम सिनेमा ने कई उतार-चढ़ाव देखे पर ममूटी की मकबूलियत बरकरार रही. उन्होंने करीब चार सौ फिल्मों में अभिनय किया है, जिसमें मलयालम के अतिरिक्त तेलगू, कन्नड़ आदि भाषाओं में बनी फिल्में भी शामिल हैं.
वे हिंदी फिल्म ‘धरती पुत्र’ (1993) में नजर आए थे, लेकिन हिंदी सिनेमा उद्योग का यह दुर्भाग्य है कि मुहम्मद कुट्टी उर्फ ममूटी की प्रतिभा का वह समुचित इस्तेमाल नहीं कर सका. राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित जब्बार पटेल निर्देशित बायोपिक ‘डॉक्टर बाबासाहेब अंबेडकर’ (1998) का निर्माण हालांकि अंग्रेजी और हिंदी दोनों ही भाषा में हुआ, जिसमें अंबेडकर की भूमिका में ममूटी आज भी लोगों के जेहन में हैं. अंबेडकर की जीवन यात्रा, सिद्धांत और संघर्ष को समझने के लिए इससे बेहतर फिल्म मौजूद नहीं है. अंबेडकर के किरदार को उन्होंने जीवंत बना दिया है. इस फिल्म में सहज अभिनय के लिए ममूटी को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. वे राजनीतिक रूप से एक सचेत अभिनेता हैं.
ममूटी के अभिनय की विशेषता यह है कि फिल्मी दुनिया के दो पाटों-देसी और मार्गी, दोनों को उन्होंने एक साथ साधा है. एक तरफ व्यावसायिक सिनेमा में स्टार की हैसियत से उनकी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल रही, वहीं दूसरी तरफ सधे, भाव-पूर्ण अभिनय से उन्होंने कला फिल्मों में अपनी काबिलियत को साबित किया. ‘ओरु वडक्कन वीरगाथा’, ‘महायानम’ और ‘किंग’ जैसी फिल्मों के साथ ‘मेला’, ‘यवनिका’, ‘अनंतरम’, ‘विधेयन’ और ‘मतिलुकल’ जैसी कलात्मक फिल्में भी उनके खाते में है. यहां नोट करना उचित होगा कि प्रयोग करने, नए निर्देशकों के साथ काम करने में उन्हें गुरेज नहीं है.
विभिन्न किरदारों को जिस तरह से वे आत्मसात करते हैं उसे देख कर उनके अभिनय के फैलाव, क्राफ्ट पर उनकी पकड़ का पता चलता है जबकि उन्होंने अभिनय का कोई विधिवत प्रशिक्षण नहीं लिया है. अडूर गोपालकृष्णन की फिल्म ‘विधेयन’ में निरंकुश जमींदार भाष्कर पाटेलर और ‘मथिलकुल’ में लेखक बशीर के किरदार को उनसे बेहतर शायद ही कोई निभा पाता. दोनों ही फिल्मों में अभिनय के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था.
बीस वर्ष पहले बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में ममूटी ने स्वीकार किया था कि अस्सी के दशक में एक ऐसा भी दौर आया जब वे खुद की प्रतिभा पर संदेह करने लगे थे और फिल्मी करियर से हट कर कुछ और करने की सोचने लगे थे. एक जुझारू अभिनेता की तरह उन्होंने खुद को पुनर्नवा किया. अडूर गोपालकृष्णन ठीक ही उन्हें एक ऐसा साहसी अभिनेता कहते हैं ‘जिसमें स्टार के ताम-झाम से आगे जाने की इच्छा रही है.’

(प्रभात खबर 19.09.21)

Saturday, September 18, 2021

रे की फिल्में 'देखने' की तमीज देती हैं

 


फिल्म निर्देशक सत्यजीत रे का यह जन्म शताब्दी वर्ष है. बांग्ला के अतिरिक्त उन्होंने दो फिल्में हिंदी में भी बनाई थीं. दोनों ही प्रेमचंद की चर्चित कहानियाँ हैं. जहाँ शतरंज के खिलाड़ीब्रिटिश राज और नवाबी संस्कृति के विघटन को लेकर है वहीं सदगतिभारतीय समाज के जीवंत यथार्थ से मुठभेड़ करती है. इसके केंद्र में जाति का सवाल है. इस फिल्म के दो प्रमुख किरदारों में से एक, थिएटर और सिनेमा से चर्चित अभिनेता मोहन आगाशे से अरविंद दास ने लंबी बातचीत की.  प्रस्तुत हैं मुख्य अंश:

सत्यजीत रे को आप किस रूप में याद करते हैं?

मैं सत्यजीत रे ऊपर कुछ भी बात करने का अधिकारी नहीं हूँ. वे मेरे लिए कद्दावर निर्देशक, कलाकार हैं, जैसा कि वे सबके लिए हैं. लेकिन मैं एक-दो बातें आपसे शेयर करुँगा. उन्होंने मुझे एक पत्र लिख कर सद्गति फिल्म का हिस्सा बनने का निमंत्रण दिया था, जिसे मैंने बिना बिलंब किए स्वीकार किया. यह महज 52 मिनट की एक टेलीफिल्म है, फिर भी इस फिल्म ने मुझे यह समझने का मौका दिया कि रे आखिरकार रे क्यों हैं? क्यों वह सबसे मीलों आगे रहे. उनकी महानता उनकी रूचि में है. प्रेमचंद खुद एक बड़ी हस्ती रहे. रे इस कहानी को एक मीडियम से दूसरे मीडियम में लेकर आए. कहानी को उसी रूप में चित्र और ध्वनि के मार्फत उन्होंने रूपांतरित किया है, जिस रूप में यह शब्दों में लिखी गई है. शब्दों के मार्फत जो प्रेमचंद ने कहा उसे रे ने सिनेमा के माध्यम से कहा है. प्रेमचंद ने जिस समय यह कहानी लिखी थी उस वक्त शिक्षा पर प्रसार बहुत कम था. माणिक दा (सत्यजीत रे) ने इस बात का ख्याल सिनेमा बनाते हुए रखा है कि बहुसंख्यक लोग इसे ग्रहण कर सकें. भारत में सिनेमा व्यवसायियों के हाथों में चला गया. मनोरंजन का बोलबाला रहा पर हमने देखनासीखा ही नहीं. रे की फिल्में हमें देखना सिखाती है. रे, ऋत्विक घटक जैसे लोगों ने कलाकार के रूप में अपनी पहचान के लिए संघर्ष किया. फिल्म सोसाइटी के माध्यम से उन्होंने ये लड़ाई लड़ी. रे ने फिल्म को कला के रूप में स्थापित किया.

कुछ अपवाद को छोड़ दें तो हिंदी सिनेमा जाति  के सवाल पर मुखर नहीं रही है. सामाजिक न्याय का सवाल ओझल ही रहा है. ऐसे में आप सद्गतिको किस रूप में देखते हैं?

मैं इसी सवाल पर आ रहा था.  माणिक दा के बारे में यह एक दूसरा पहलू है जिसका मैं जिक्र करना चाहता हूँ. बहुत से लोगों ने जाति के सवाल को लेकर फिल्म बनाई है. पर कोई भी फिल्म इस फिल्म की तरह से ऑथेंटिकनही है. इसका कारण यह कि जाति की संस्कृति इतने गहरे धंसी हुई है कि प्रेमचंद की कहानी और न ही माणिक दा की फिल्म में कोई हीरो या विलेन नहीं है. जिस समय कहानी लिखी गई उस समय समाज में छुआछूत था. एक सामाजिक व्यवस्था के तहत ऐसा था. इस फिल्म में दुखीसमझता है कि ब्राह्मण हमारे लिए मुहूर्त निकालने वाला है, इसलिए मुझे इसके लिए कुछ करना है.

 फिल्म की बात करें तो इसमें दशानन का बिंब आता है, पर इसका इस्तेमाल नहीं होता है. कहानी में यह बिंब नहीं है?

रावण सामाजिक बुराई का प्रतीक है जिसे फिल्म में खत्म होना था, लेकिन यह होता नहीं है. माणिक दा ने आखिर पलों में  अंत को बदलने का फैसला कर लिया. असल में बारिश आ गई थी. माणिक दा इस बात को लेकर बेहद सतर्क रहते थे कि क्या शूट करना है. वह आर्थिक पक्ष का भी ध्यान रखते थे. इस फिल्म का अंत चिलचिलाती धूप में होना था, लेकिन मौसम बदल गया. माणिक दा ने फिल्म के अंत को प्रकृति के साथ जोड़ दिया. जब आप फिल्म का अंत देखेंगे तो महसूस करेंगे कि किस तरह दलदल में, रोते हुए स्त्री आती है जैसे की प्रकृति कुपित है. माणिक दा ने अंत को मजबूती देने के लिए बदलाव को अपनाया था. संभव है रावण की प्रतिमा जलाने से यह नहीं होता.

फिल्म में दुखी (ओम पुरी) की आँखों में जो आक्रोश है वह इस फिल्म को अलग तेवर देता है जो कि रे की फिल्मों में नहीं दिखता.

बिलकुल. आक्रोश नाम से गोविंद निहलानी की एक फिल्म भी है, जो इसी मुद्दे पर है, पर सद्गति फिल्म मौन आक्रोश से भरी हुई है.

जहाँ शतरंज के खिलाड़ीकी चर्चा होती है, वहीं सद्गतिफिल्म पीछे छूट जाती है. इसकी क्या वजह आप देखते हैं?

इस सवाल का जवाब मैं अधिकारपूर्वक नहीं दे सकता. मुझे लगता है कि शतरंज के खिलाड़ीमें स्टारथे. संजीव कुमार, सईद जाफरी, फारुख शेख, शबाना आजमी... यह फीचर फिल्म थी, जिसे सुरेश जिंदल ने प्रोडयूस किया था, जबिक सदगतिको 35 एमएम पर शूट किया गया और दूरदर्शन ने इसे प्रोडूयस किया था. यह भारत की पहली टेलीफिल्म थी. उस वक्त टेलीविजन का मौहाल नहीं था. मीडियम का फर्क था. माणिक दा का करार फ्रांस के साथ भी था. लेकिन आज माणिक दा की पाथेर पांचाली, ‘अपराजिता और अपूर संसार के साथ सद्गति का नाम लिया जाता है. उनकr जन्मशती पर इस फिल्म की खूब चर्चा हो रही है. मुझे इस बात की खुशी है.

फिल्म की शूटिंग कहां हुई थी?  ओम पुरी, स्मिता पाटिल आपके सहकर्मी थे...

रायपुर से थोड़ी दूर पर स्थित एक गाँव में हमने शूट किया था. ओम पुरी और मैं एक ही कमरे में रहते थे. माणिक दा स्मिता को काफी पसंद करते थे. मुझे दुख है कि ओम पुरी,स्मिता पाटिल और गीता सिद्धार्थ में से कोई भी हमारे बीच नहीं है.

(नवभारत टाइम्स, 18.09.21)

 

Sunday, September 12, 2021

बीस साल बाद: 9/11

ग्यारह सितंबर को अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेंड सेंटर के टॉवरों पर आंतकी हमले की 20वीं बरसी मनाई गई. फिर से टेलीविजन चैनलों पर अगवा किए यात्री विमानों के टकराने से ढहते टॉवरों के दृश्य दिखाए गए. टेलीविजन के इतिहास में इस तरह के हृदय विदारक दृश्य कम ही मिलते हैं. मेरा मन बीस साल पहले लौट गया. वर्ष 2001 में एक महीने पहले ही हम पत्रकारिता का प्रशिक्षण लेने भारतीय जनसंचार संस्थान, दिल्ली गए थे.  यह दृश्य ऐसा था जैसे कि स्वप्न में कोई हॉलीवुड का सिनेमा चल रहा हो. प्रसंगवश इसी दौर में भारत में चौबसी घंटे टेलीविजन चैनलों ने अपना प्रसारण शुरु किया था. आने वाले दिनों में बार-बार ये दृश्य दिखाए जाते रहे. टीवी स्टूडियो में बहस-मुहाबिसा के नए दौर की यह शुरुआत थी.

इस हमले के बाद इकॉनामिस्ट पत्रिका ने ध्वस्त टॉवरो से बने अपन कवर पेज के नीचे लिखा था- द डे द वर्ल्ड चेंज्ड. निस्संदेह, इस घटना ने पिछले बीस सालों में दुनिया को काफी बदल दिया. हालांकि इस पर कम ही बात की जाती है कि किस तरह इस घटना ने मीडिया और खास कर टेलीविजन समाचार की संस्कृति को बदला.

आतंकी हमलों में करीब तीन हजार लोगों की मौत हुई थी. अमेरिकी समाज में देशभक्ति का ज्वार इस तरह फैला कि मीडिया में तथ्य और सत्य की जगह भावनाओं पर जोर बढ़ा. राज्य सत्ता ने मीडिया पर नकेल कसने शुरु किए. इस बीच बाजार और इंटरनेट के घोड़े पर सवाल भूमंडलीकरण का रथ भी उतरा. भारतीय मीडिया भी इससे अछूता नहीं रहा. पत्रकारिता की शब्दावली में कई नए शब्द जुड़े. वॉर ऑन टेरर’ (आतंक के खिलाफ लडाई) और इस्लामिक टेररिज्म (इस्लामिक आतंकवाद) जैसे शब्द पर्यायवाची बन गए. मीडिया में इस्लाम को हिंसा के साथ जोड़ कर देखा जाने लगा. मुसलमानों की स्टरियोटाइप छवियों के साथ गुड मुस्लिम, बैड मुस्लिम जैसे खांचे बना कर टीवी स्टूडियो बहस किए जाने लगे. दूसरे शब्दों में, राजनीतिक लड़ाई सांस्कृतिक हथियारों से लड़ी जाने लगी. मीडिया जाने-अनजाने इसमें सहयोग देने लगा, बिना यह पूछे कि आतंकवाद के पीछे क्या राजनीति हैं. शीत युद्ध और सभ्यताओं के संघर्ष के अख्यान की इसमें क्या भूमिका रही है? बाद के सालों में टीवी चैनलों पर राष्ट्रवाद की जो बहस चली उसमें मुसलमानों को अन्य के रूप में देखने पर जोर रहा.

बहरहाल, जैसे-जैसे अफगानिस्तान, इराक में आतंकवाद के खिलाफ युद्ध फैलता गया, पश्चिमी देशों के कई मीडिया संस्थानों की विश्वसनीयता संदिग्ध होती गई.  सैन्य इकाइयों से जुड़े पत्रकारों- एंबेडेड जर्नलिस्ट, की संख्या बढ़ती गई, ऐसे में उनकी निष्पक्षता और स्वतंत्रता पर सवाल उठने लगे. यहाँ तक कि इराक युद्ध (2003) के दौरान बीबीसी ने जिस तरह से युद्ध को कवर किया, प्रोपगैंडा (वेपन ऑफ मास डिस्ट्रकशन-सामूहिक विनाश के हथियार) में भाग लिया उसकी काफी आलोचना हुई. इसी बीच संचार की तकनीकी, इंटरनेट और सोशल मीडिया के उभार से आतंकी समूहों ने भी समाचार संस्थानों का इस्तेमाल शुरु किया. यह प्रवृति बाद के वर्षों में बढ़ती गई.

अफगानिस्तान युद्ध के दौरान कवरेज को लेकर सीएनएन और बीबीसी से इतर अल-जजीरा समाचार चैनल खास तौर से उल्लेखनीय है. हग माइल्स ने अपनी किताब अल जजीरा: हाउ अरब टीवी न्यूज चैलेंज्ड द वर्ल्ड में  सितंबर 11 शीर्षक अध्याय में लिखा है: अमेरिकी प्रशासन की नजर में  9/11 का मुख्य आरोपी ओसामा बिन लादेन था. अल जजीरा को ओसामा बिन लादेन का एक फैक्स 16 सितंबर को मिला जिसमें उसने कहा था कि वह अफगानिस्तान में है और सत्ताधारी तालिबान के कानूनों का पालन करेगा. हालांकि उसने अमेरिका में हमले से इंकार किया था. इस तरह के फैक्स अल-जजीरा को बाद के दिनों में भी मिलते रहे. 20 सितंबर को अल-जजीरा ने ओसामा बिन लादेन के वर्ष 1998 में दिए एक इंटरव्यू को फिर से प्रसारित किया था. काबुल पर जब अक्टूबर में अमेरिका ने हमला किया अल जजीरा ने फिर से ओसामा बिन लादेन का एक टेप किया हुआ भाषण प्रसारित किया जिसमें उसने अमेरिका में हुए हमले की जिम्मेदारी नहीं ली थी, पर जिन आतंकवादियों ने इसे अंजाम दिया था उसे अपना सहयोग देने की बात की थी. शुरुआत में अल-जजीरा की आलोचना और भर्त्सना हुई पर पश्चिमी देशों के मीडिया संस्थानों ने बाद में अफगानिस्तान में युद्ध के दौरान इस चैनल के फुटेज का इस्तेमाल अपने कार्यक्रम में किया. अल-जजीरा की ख्याति बढ़ती चली गई. यहाँ यह नोट करना उचित होगा कि बीस साल चले इस युद्ध में हजारों आम नागरिकों, सैनिकों की मौत के साथ-साथ 72 पत्रकारों ने अपनी जान गवाँई.

बीस साल बाद अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के सैनिक अफगानिस्तान छोड़ कर जा चुके हैं. तालिबान फिर से सत्ता में हैं. पिछले महीने काबुल हवाई अड्डे पर हुए आत्मघाती बम विस्फोट में सैकड़ों लोगों की जान गई. टेलीविजन चैनलों पर विमर्शकारों के बीच तालिबान 1.0 और तालिबान 2.0 की बहस जारी है. आतंकवाद देश-दुनिया से खत्म नहीं हुआ है. अल कायदा ने अपने रूप बदल लिए हैं. आने वाले सालों में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में मीडिया की क्या भूमिका होगी, यह देखना रोचक होगा.

(न्यूज 18 हिंदी के लिए)

Saturday, September 04, 2021

समांतर सिनेमा और मणि कौल

वर्ष 1969 में मणि कौल की फिल्म ‘उसकी रोटी’, बासु चटर्जी की ‘सारा आकाश’ और मृणाल सेन की ‘भुवन सोम’ ने भारतीय फिल्मों की एक नई धारा की शुरुआत की जिसे समांतर या न्यू वेव सिनेमा कहा गया. फिल्मकार और समीक्षक चिदानंद दास गुप्ता इस धारा की फिल्मों को ‘अनपापुलर फिल्म’[i] कहते हैं. जाहिर है, भारतीय सिनेमा और खास कर बॉलीवुड की मनोरंजन प्रधान फिल्मों, जिसमें नाच-गाने पर जोर रहता है और सितारों (‘स्टारों’) की केंद्रीयता रहती है, उससे अलगाने के लिए समीक्षक इस तरह की संज्ञा देते हैं. इसे कला सिनेमा भी कहा गया. मणि कौल (1942-2011), फिल्म संस्थान, पुणे के उनके समकालीन कुमार शहानी और कैमरामैन के के महाजन की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा में मनोरंजन से अलग सामाजिक-सांस्कृतिक तत्वों को कलात्मक रूप से समाहित किया. इसके लिए हिंदी साहित्य (नयी कहानियों) की ओर उन्होंने रुख किया.

मुख्यधारा का सिनेमा हमेशा से ही बड़ी पूंजी की मांग करता है और वितरक प्रयोगशील सिनेमा पर हाथ डालने से कतराते रहते हैं. सन 1969 में ही ‘फिल्म फाइनेंस कारपोरेशन’ ने प्रतिभावान और संभावनाशील फिल्मकारों की ‘ऑफ बीट’ फिल्मों को कर्ज देकर सहायता पहुँचाने का निर्देश जारी किया था. इसका लाभ मणि कौल जैसे निर्देशक उठाने में सफल रहे. इसी दौर में हिंदी के अतिरिक्त क्षेत्रीय भाषाओं मसलन, मलयालम, बांगला, कन्नड़ आदि में भी कई बेहतरीन फिल्मकार उभरे जिनकी फिल्में दर्शकों के सामने एक अलग भाषा और सौंदर्यबोध लेकर आई. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन फिल्मों की आज भी चर्चा होती है.
समांतर सिनेमा से जुड़े फिल्मकारों के लिए 70 और 80 का दशक मुफीद रहा. हालांकि इन फिल्मों की आलोचना एक बड़े दर्शक तक नहीं पहुँच पाने की वजह से होती रही है. उसी दौर में सत्यजीत रे (2012: 99) ने फिल्म को मास मीडिया मानते हुए एक अलहदा दर्शक वर्ग के लिए फिल्म बनाने के विचार की आलोचना की थी. उन्होंने 'भुवन सोम' के बारे में कटाक्ष करते हुए सात शब्दों में फिल्म का सार इस तरह लिखा था- ‘बिग बैड ब्यूरोक्रेट रिफार्मड बाय रस्टिक बेल’[ii]. वे कुमार शहानी की ‘माया दर्पण’ से भी बहुत प्रभावित नहीं थे. पर मृणाल सेन, मणि कौल, कुमार शहानी जैसे फिल्मकार, सत्यजीत रे से अलग रास्ता अपनाए हुए थे और अपनी फिल्मों में प्रयोग करने से कभी नहीं हिचके. वे चाहते थे कि उनकी फिल्में देखकर दर्शक सोचें, विचारें और उद्वेलित हों. पॉपुलर सिनेमा की तरह उनकी फिल्में हमारा मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि संवेदनाओं को संवृद्ध करती हैं. यहाँ नोट करना उचित होगा कि समांतर सिनेमा के बीज सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक और मृणाल सेन की फिल्मों में छुपे थे.
वर्ष 2006 में दिल्ली में हुए एक फिल्म महोत्सव के दौरान मैंने मणि कौल से उनकी फिल्मों, समांतर और मुख्यधारा की फिल्मों के बीच रिश्ते और ऋत्विक घटक के बारे में लंबी बातचीत की थी. मणि कौल ने कहा था कि उन्हें मोहन राकेश की इस कहानी में जो इंतजार और विछोह है, काफी प्रभावित किया था. ‘उसकी रोटी’ में बालो अपने पति सुच्चा सिंह के लिए रोज रोटी बना मीलों पैदल चल कर हाई वे की सड़क पर आती है, जहाँ सुच्चा सिंह बस चलाता है. हफ्ते में वह एक दिन घर आता है. इंतजार की इस चक्र की तरह बालो का जीवन बीतता है. हिंदी की नई कहानियों की तरह ही इस फिल्म में आदि, मध्य, अंत के क्रम का पालन नहीं किया है, फिल्म एक रैखिक नैरेटिव के तहत नहीं चलती है. इस फिल्म की पटकथा मोहन राकेश के साथ मिल कर लिखी थी, पर मणि कौल ने शूटिंग के दौरान उसका पालन नहीं किया. आशीष राजध्यक्षया (2012: 322-323) ने ठीक ही नोट किया है कि “यह अस्पष्ट है कि उसकी रोटी में ऐसा क्या था जिसने मणि कौल को इस तक जाने के लिए अनुशंसित (रिकॉमेंड) किया...जो भी कारण हो, तथ्य यह है कि पंजाब के एक दोपहर की इस कहानी को भारतीय सिनेमा की पूरी तरह से पहली अवांगार्द प्रयोग के असंभाव्य विषय के रूप में चुना गया.”[iii] मणि कौल ने मुझे कहा था कि ‘यह इंतजार हमें अनुभवजन्य समय से दूर ले जाता है, जहाँ एक मिनट भी एक घंटा हो सकता है.’[iv] बाद में जब वे संगीत की शिक्षा ले रहे थे (वे ध्रुपद के सिद्ध गायक थे), तब सम और विषम के अंतराल में इस बात को काफी अनुभव करते थे. ‘उसकी रोटी’ की तरह ही ‘ आषाढ़ का एक दिन’ और ‘दुविधा’ में भी स्त्रियों के द्वारा विभिन्न देश-काल में इस इंतजार का चित्रण मिलता है. इन तीनों फिल्मों की अवस्थिति साफ अलग है. पंजाब, कश्मीर (पहाड़) और राजस्थान का देश-काल इनमें उभर कर आया है. खास कर चर्चित रचनाकार विजयदान देथा की कहानी पर आधारित ‘दुविधा’ फिल्म में चटक रंगों का इस्तेमाल है. बालो, मल्लिका और लच्छी के इंतजार के साथ ही अंतर्मन की पीड़ा उभर कर आती है, जिसे हम लेख में आगे देखेंगे. इन फिल्मों में पार्श्व संगीत का मणि कौल ने बेहद सादगी से इस्तेमाल किया है. पर हिंदुस्तानी संगीत के प्रति उनका लगाव 'ध्रुपद' और 'सिद्धेश्वरी' डॉक्यूमेंट्री फिल्म में दिखता है. मणि कौल साहित्य, संगीत और चित्र कला के बीच सहजता से आवाजाही करते थे.
हिंदी के चर्चित रचनाकार उदय प्रकाश ने पिछले दिनों मुझसे एक बातचीत के दौरान मणि कौल की इसी सहजता को रेखांकित करते हुए मुक्तिबोध पर बनी उनकी फिल्म ‘सतह से उठता आदमी’ का उदाहरण दिया था और कहा था कि ‘मणि ही मुक्तिबोध को दाल-भात खाता हुआ दिखा सकते थे.’[v] सत्यजीत रे (2012) ने मणि कौल और समांतर सिनेमा के एक और प्रतिनिधि फिल्मकार कुमार शहानी की फिल्मों पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि इनकी फिल्मों में ऋत्विक घटक की तरह ही ‘ह्यूमर’ नहीं मिलता. ये दोनों फिल्म संस्थान (एफटीआईआई), पुणे में घटक के शिष्य थे. पर निजी मुलाकातों में मणि कौल बेहद मजाकिया थे. बातचीत में उन्होंने हँसते हुए कहा था- ‘मुझसे ज्यादा एक्सट्रीम में बहुत कम लोग गए. जितनी फिल्में बनाई, सारी फ्लॉप!’
मणि कौल की फिल्में हिंदी सिनेमा को एक कला के रूप में स्थापित करती है. मणि कौल हालांकि एक निर्देशक के साथ-साथ सिनेमा के कुशल शिक्षक भी थे. वर्ष 2010 में जब मैं फिल्म एप्रिसिएशन का पाठ्यक्रम पूरा कर रहा था तब पुणे फिल्म संस्थान में एक व्याख्यान के दौरान उन्होंने बताया कि ‘सिनेमा ध्वनि और बिंब का कुशल संयोजन होता है और उसे उसी रूप में पढ़ना चाहिए.’[vi] उस व्याख्यान के बाद हमें उनकी बहुचर्चित फिल्म ‘सिद्धेश्वरी’ दिखाई गई थी. फिल्म के प्रदर्शन से पहले फिल्म की भूमिका बांधते हुए उन्होंने अपने परिचित अंदाज में मुस्कुराते हुए कहा था कि ‘अगर कुछ चीजें समझ में नहीं आए तो ज्यादा दिमाग मत लगाइएगा, यह बहुत महत्वपूर्ण नहीं है.’ लेकिन ‘सिद्देश्वरी’ देखते हुए ऐसे लगा कि हम एक लंबी कविता को परदे पर पढ़ रहे हैं.
सत्यजीत रे जब मणि कौल की फिल्मों की आलोचना यह कह कर करते हैं कि उनकी पहुँच बेहद सीमित तबके तक रही तो यह सच के करीब है. उनकी फिल्मों का सिनेमाघरों में प्रदर्शन नहीं हुआ. पर वे इस बात को खुद भी स्वीकार करते थे. दर्शकों के बीच अपनी फिल्म की पहुँच को लेकर उन्होंने मुझे एक वाकया सुनाया था. हिंदी सिनेमा के चर्चित अभिनेता राज कुमार उनके चाचा थे. एक फिल्म पार्टी के दौरान उन्होंने आवाज देकर मणि कौल को बुलाया और कहा, ‘जानी, मैंने सुना है कि तुमने फिल्म बनाई है..उसकी रोटी. क्या है यह? रोटी के ऊपर फिल्म! और वह भी उसकी रोटी?तुम मेरे साथ आ जाओ हम मिल कर अपनी फिल्म बनाएँगे- अपना हलवा.” बातचीत के दौरान उन्होंने कहा था कि ‘मैं हिंदी में ही सोचता और लिखता हूँ.’ उसकी रोटी, आषाढ़ का एक दिन, दुविधा, सतह से उठता आदमी और नौकर की कमीज’ हिंदी की चर्चित कृतियाँ है. मणि कौल ने हिंदी साहित्य की इन कृतियों को आधार बना कर फिल्म रची और इन्हें एक नया आयाम दिया. मुंबइया फिल्मों के कितने फिल्मकार आज हिंदी में सोचते और रचते हैं?
मणि कौल ने माना था कि उन्हें फिल्म बनाने में हमेशा वित्तीय संकट से जूझना पड़ा था. पर सृजनात्मकता से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया. जीवन के अंतिम दिनों में वे विनोद कुमार शुक्ल की कृति ‘खिलेगा तो देखेंगे’ को सिनेमाई भाषा में रच रहे थे. समांतर सिनेमा के निर्देशक इस बात पर जोर देते रहे हैं कि व्यावसायिकता को लेकर मुख्याधारा और कला फिल्मों की तुलना नहीं की जा सकती. कुमार शहानी कहते हैं, “हम पूंजीवादी व्यवस्था में रहते हैं जिसमें कारोबार मुख्य होता है, हम इसे चाहें या ना चाहें. मेनस्ट्रीम फिल्में लाभ से संचालित होती हैं, बिना इसके उनका खर्च नहीं निकल सकता. उनका कला से कोई ताल्लुक नहीं होता. इस लिहाज से हमें मेनस्ट्रीम और कला सिनेमा की तुलना नहीं करनी चाहिए.”[vii]
वर्ष 1964-65 में ऋत्विक घटक उप प्राचार्य के रूप में एफटीआईआई नियुक्त हुए थे और एक पूरी पीढ़ी को सिनेमा की नई भाषा से रू-ब-रू करवाया. मणि कौल ऋत्विक घटक के शिष्य थे. मलयालम फिल्मों के चर्चित निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन अक्सर बातचीत में यह बताते हैं कि मणि कौल घटक के सबसे ज्यादा करीब थे. अपने गुरु ऋत्विक घटक के प्रति मणि कौल बेहद कृतज्ञ थे. उनका कहना था “मैं ऋत्विक दा से बहुत कुछ सीखता हूँ. उन्होंने मुझे नव यथार्थवादी धारा से बाहर निकाला.” अक्सर ऋत्विक घटक की फिल्मों की आलोचना मेलोड्रामा कह कर की जाती है. मणि कौल का कहना था कि वे मेलोड्रामा का इस्तेमाल कर उससे आगे जा रहे थे. उस वक्त उन्हें लोग समझ नहीं पाए.
‘उसकी रोटी’ फिल्म में जिस तरह के आख्यान शैली का इस्तेमाल किया गया है, उसे आशीष राजध्यक्षया (2012) ने लिखा है, मणि कौल के शब्दों में ‘यथार्थवाद में द्रष्टा का निवेश’ के तहत ही समझा जा सकता है. यहाँ दर्शक जो ग्रहण कर रहा है, उसकी व्यक्तिनिष्ठता पर जोर है. वे कहते थे कि ‘देखने के तरीके में बहुत कुछ छुपा होता है’. यहां मणि कौल यथार्थवाद की गति को अपने प्रयोगात्मक विजुल्स से पकड़ने की कोशिश करते हैं. जाहिर है फिल्म देखने के क्रम में दर्शकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो उठती है और उसे अपने अनुभवों का निवेश फिल्म देखने के क्रम में करना पड़ता है. फिल्म के कई दृश्यों के फिल्मांकन की शैली पेंटिंग (अमृता शेरगिल) से प्रभावित है. फिल्म की गति बेहद धीमी है और बॉलीवुड की फार्मूला फिल्मों के अभ्यस्त दर्शकों के लिए यह फिल्म बहुत धैर्य की मांग करती है! यहाँ हम मणि कौल की एक अन्य फिल्म ‘आषाढ़ का एक दिन’ पर एक दृष्टि डालते हैं.
जहाँ हिंदी में आधुनिक नाटक के प्रणेता मोहन राकेश के चर्चित नाट्य कृति ‘आषाढ़ का एक दिन’ की चर्चा होती रहती है, मणि कौल निर्देशित इस फिल्म की चर्चा छूट जाती है. उन्होंने वर्ष 1971 में इस फिल्म को निर्देशित किया था. ‘उसकी रोटी’, ‘दुविधा’, ‘सिद्धेश्वरी’ की तरह ही सिनेमाई दृष्टि और भाषा के लिहाज से ‘आषाढ़ का एक दिन’ हिंदी सिनेमा में महत्वपूर्ण स्थान रखता है. इस फिल्म में मल्लिका (रेखा सबनीस) कालिदास (अरुण खोपकर) और विलोम (ओम शिव पुरी) की प्रमुख भूमिका है. मल्लिका कालिदास की प्रेयसी है. हिमालय की वादियों में बसे एक ग्राम प्रांतर में दोनों के बीच साहचर्य से विकसित प्रेम है. कालिदास को उज्जयिनी के राजकवि बनाए जाने की खबर मिलती है. मल्लिका और राजसत्ता को लेकर उनके मन में दुचित्तापन है. वहीं मल्लिका कालिदास को सफल होते देखना चाहती है और उन्हें स्नेह डोर से मुक्त करती है. उज्जयिनी और कश्मीर जाकर कालिदास सत्ता और प्रभुता के बीच रम जाते हैं. वे मल्लिका के पास लौट कर नहीं आते और राजकन्या से शादी कर लेते हैं. और जब वापस लौटते हैं तब तक समय अपना एक चक्र पूरा कर चुका होता है. सत्ता का मोह और रचनाकार का आत्म संघर्ष ऐतिहासिकता के आवरण में इस फिल्म के कथानक को समकालीन बनाता है.
दृश्य, प्रकाश, ध्वनि के संयोजन और परिवेश (मेघ, बारिश, बिजली) के माध्यम से सिनेमा में यह सब साकार हुआ है. कोलाहल के बीच एक रागात्मक शांति पूरी फिल्म पर छाई हुई है. मोहन राकेश के नाटक से इतर एक अलग अनुभव लेकर यह फिल्म हमारे सामने आती है. फिल्म में भावों की घनीभूत व्यंजना के लिए ‘क्लोज अप’ का इस्तेमाल किया गया है. मणि कौल के सहयोगी रह चुके, चर्चित फिल्म निर्देशक कमल स्वरूप कहते हैं कि इस फिल्म में मणि कौल ने ‘विजुअल्स’ पर ज्यादा ध्यान रखा था. वे कहते हैं, “बजट कम था और उसी के हिसाब से ही फिल्म बनी है. सिंक साउंड में ज्यादा खर्च होता इसलिए नाटक के संवाद ट्रैक को पहले रिकॉर्ड कर लिया गया था. जैसे हम गाना प्ले बैक करते हैं उसी तरह फिल्म में साउंड प्ले बैक करती है. सबनीस भी पहले से सत्यदेब दुबे के प्ले में एक्टिंग करती थीं और बहुत अच्छी अदाकार थीं. मणि को बहुत कुछ रेडिमेड मिल गया था. उन्होंने आउटडोर सेट बनाया. इसमें प्रकृति और अंदर का सेट दोनों आ गया है.”[viii]
मणि कौल की फिल्में साहित्यिक कृतियों पर बनी, हालांकि सबका आस्वाद अलग है. उनकी फिल्मों में एक उत्तरोतर विकास दिखाई पड़ता है, पर पेंटिंग, स्थापत्य और संगीत का स्वर सबमें मुखर रहा है. असल में, उनकी फिल्मों में विभिन्न कला रूपों की आवाजाही सहजता से होती है. जहाँ वे भारतीय सौंदर्यशास्त्र में पगे थे और ध्रुपद संगीत के गुरु थे, वहीं वे अपनी कला में फिल्मकार रॉबर्ट ब्रेसां और आंद्रेई तार्कोवस्की के प्रभाव को स्वीकार करते थे. ब्रेसां की फिल्मों की ‘मिनिमलिज्म’ यानी सादगी का प्रभाव उनकी फिल्मों पर है. ब्रेसां का प्रभाव कुमार शहानी की फिल्मों पर भी है, जिसे वे सहज रूप से स्वीकार भी करते हैं. बातचीत में वे अक्सर एक गधे को केंद्र पर रख कर बनाई गई उनकी फिल्म ‘बालथाजार’ की चर्चा करते हैं. प्रसंगवश, कुमार शहानी रॉबर्ट ब्रेसां के सहयोगी भी रह चुके हैं.
मणि कौल बातचीत में अक्सर ‘स्व भाव’ की बात करते थे. सारे प्रभावों के बावजूद जिस ‘स्पेस’ में वे अपनी कला रच थे वह नितांत वैयक्तिक है, जो फिल्म के हर शॉट और फ्रेम में महसूस किया जा सकता है. इस फिल्म में प्रेम पूरी गरिमा और लालित्य के साथ मौजूद है. मल्लिका की आँखें जिस तरह से अंतर्मन के भावों, अंतर्द्वंद को सामने लाती हैं बरबस वह कृष्ण के वियोग में गोपियों के कहे-‘अंखियां अति अनुरागी’ की याद दिलाती है. पर यहाँ आषाढ़ मास में जायसी के नागमती का विरह नहीं है. नागमती कहती हैं-‘मोहिं बिनु पिउ को आदर देई’. जबकि फिल्म के शुरुआत में ही मल्लिका कहती है- ‘मल्लिका का जीवन उसकी अपनी संपत्ति है. वह उसे नष्ट करना चाहती है तो किसी को उस पर आलोचना करने का क्या अधिकार है?’ इस फिल्म में मल्लिका के अपरूप रूप और सौंदर्य के साथ उसकी चेतना उभर कर सामने आई है. इस फिल्म में मणि कौल के ऊपर भारतीय सौंदर्यशास्त्र का प्रभाव स्पष्ट दिखता है. वे अपनी फिल्मों में ‘ध्वनि’ पर बहुत जोर देते थे. इस फिल्म में कई ऐसे दृश्य हैं जहाँ परस्पर संवाद करते पात्रों में अजंता भित्तिचित्र और मिथिला चित्रकला शैली की झलक मिलती है. छायांकन में एक लय है. कमल स्वरूप कहते हैं कि मणि कौल देश-विदेश की पेंटिंग शैली के रेफरेंस को सामने रख कर सचेत होकर फ्रेम बनाते थे. वे सिद्धेश्वरी फिल्म के एक दृश्य का खास तौर पर उदाहरण देते हैं, जहाँ वे पिकासो की पेंटिंग-थ्री म्यूजिशियन, से प्रेरित हैं. खुद मणि कौल हेनरी मातिस के प्रभाव को स्वीकार करते थे. पर मणि की फिल्मों में संगीत, चित्र और ध्वनि मिल कर एक ऐसा कला संसार रचता है जो सिनेमा कला की महत्ता को सिद्ध करता है.
उल्लेखनीय है कि ‘आषाढ़ का एक दिन’ के बाद, वर्ष 1972 में, कुमार शहानी ने निर्मल वर्मा की कहानी ‘माया दर्पण’ को निर्देशित किया था. दोनों ही फिल्मों को फिल्म फेयर पुरस्कार मिला था. दोनों निर्देशकों के फिल्म निर्माण की शैली मिलती जुलती भले हो (संगीत, पेंटिंग के इस्तेमाल को लेकर), विषय-वस्तु का ट्रीटमेंट काफी अलहदा है. मसलन, शहानी की तरण (माया दर्पण) फिल्म में सामंतवादी उत्पीड़न को तोड़ती है. जबकि निर्मल वर्मा की कहानी में सामंतवाद के खिलाफ विरोध नहीं दिखता है. शहानी का रुझान मार्क्सवादी विचारों की ओर रहा, जबकि मणि कौल अपनी कला में विचारधारा की सीमा का अतिक्रमण करते रहे. कमल स्वरूप कहते हैं कि मणि कौल राजनीतिक नहीं, रसिक थे.
बहरहाल, न सिर्फ मणि कौल की फिल्में, बल्कि 70 और 80 के दशक में समांतर सिनेमा के दौर में बनी अधिकांश फिल्मों का प्रदर्शन मुश्किल था. मलायमल फिल्मों के चर्चित निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन अपवाद कहें जाएँगे जिनकी फिल्में सिनेमाघरों में पहुँची. पर अधिकांश कला फिल्मकारों के दर्शकों का एक सीमित वर्ग था. ज्यादातर फिल्म समारोहों, समीक्षकों तक ही इन फिल्मों की पहुँच रही. कोई आश्चर्य नहीं कि 90 के दशक में होश संभालने वाली हमारी पीढ़ी की पहुँच से ये फिल्में बाहर थीं. जैसा कि हमने ऊपर नोट किया मणि कौल से उनकी फिल्मों के बारे में पूछने पर वह बेतकल्लुफी से बात करते थे. उनकी फिल्में भी अमूमन सिनेमा समारोहों तक ही सीमित थीं. उदयन वाजपेयी से बातचीत करते हुए (2012:45) उन्होंने 'अभेद आकाश' किताब में स्वीकारा था, “शायद हमें फिल्म देखने की नयी पद्धति विकसित करनी होगी. फिल्मकार तो हैं लेकिन देखने वाले नहीं हैं. अगर देखने वाले हों तो फिल्मो में बहुत बदलाव आएगा. बिना देखने वालों के फिल्मकार नहीं होता.”[ix]
सिनेमा को एक कला माध्यम के रूप में प्रतिष्ठित करने में समांतर सिनेमा के प्रयोगशील फिल्मकारों की भूमिका ऐतिहासिक है. पिछले दशकों में संचार की नई तकनीकी, इंटरनेट और ओटीटी प्लेटफॉर्म के आने के बाद मणि कौल जैसे प्रयोगशील फिल्मकारों को एक नया दर्शक वर्ग मिला है. आज कई समकालीन फिल्म निर्देशकों मसलन अमित दत्ता, गुरविंदर सिंह, अनूप सिंह आदि की फिल्मों में समांतर सिनेमा के पुरोधाओं की छाप स्पष्ट दिखाई देती है. युवा प्रयोगशील फिल्मकारों में एक तरह से समांतर सिनेमा की धारा का विकास देखने को मिल रहा है. मुख्यधारा की हिंदी फिल्मों में भी बदलाव की इस बयार को महसूस किया जा रहा है. आश्चर्य नहीं कि एफटीआईआई से निकले कई युवा फिल्मकार मणि कौल को अपना गुरु मानते हैं. वे मणि कौल की फिल्मों से प्रेरणा ग्रहण कर भीड़ और लीक से हट कर हिंदी सिनेमा का एक नया संसार रच रहे हैं. यही उनकी फिल्मों की सार्थकता है.
संदर्भ:
[i] चिदानंद दास गुप्ता (2008), सीइंग इज विलिविंग, पेंग्विन रेंडम हाउस: इंडिया
[ii] सत्यजीत रे (2012), आवर फिल्मस देयर फिल्मस, ओरियंट ब्लैक स्वान: नय़ी दिल्ली पेज, 81-99
[iii] आशीष राजाध्यक्षया (2012), इंडियन सिनेमा इन द टाइम ऑफ सेल्यूलाइड, तुलिका बुक्स: नयी दिल्ली
[iv] अरविंद दास, समांतर सिनेमा के पचास साल, प्रभात खबर, 9 जुलाई 2019
[v] निजी बातचीत
[vi] अरविंद दास (2019), बेखुदी में खोया शहर, अनुज्ञा बुक्स: नयी दिल्ली
[vii] अरविंद दास से कुमार शहानी की बातचीत, फिल्मों में तकनीकी दखल ज्यादा हो गया है, नवभारत टाइम्स, 29 जून 2019
[viii] निजी बातचीत
[ix] उदयन वाजपेयी (2012), अभेद आकाश, वाणी प्रकाशन: नयी दिल्ली

(संवाद पथ पत्रिका में प्रकाशित, जनवरी-मार्च 2020)

Thursday, September 02, 2021

सिनेमा संस्कृति की बदलती तस्वीर


मुंबई भले ही मायानगरी हो, सिनेमा की संस्कृति दिल्ली में फली-फूली. आम दर्शकों के अलावे दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में कई नेता सिनेमाप्रेमी हुए हैं. पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरूलालकृष्ण आडवाणी से लेकर दिल्ली के वर्तमान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तक. पिछले दिनों मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जब दक्षिण दिल्ली में स्थित प्रिया सिनेमाहॉल के आधुनिक साज-सज्जा और तकनीक से लैसनवीन रूप का उद्घाटन किया तो उन्होंने शिद्दत से सिनेमा के प्रति अपने प्रेम को याद किया. प्रिया में ही बैल बॉटम’ फिल्म के ट्रेलर के लांच के अवसर पर अभिनेता अक्षय कुमार ने उन दिनों को याद किया जब ब्लैक में टिकट लेकर उन्होंने दिल्ली के अम्बा सिनेमाहॉल में अमर अकबर एंथोनी’ देखी थी. किसी भी शहर की संस्कृति को सिनेमा के रास्ते भी हम देख-परख सकते हैं.  दिल्ली में कई पुराने सिनेमाघर आज बंद हो गए हैंपर उन सिनेमाघरों की स्मृति लोगों के जेहन में है. मिनरवा, फिल्मिस्तान, कमल, पारस, सावित्री कुछ ऐसे ही नाम हैं. किसी भी शहर के लिए सिनेमाघर लैंडमार्क की हैसियत रखते हैं. सिनेमाघरों की रोशनी से शहर के कोने प्रकाशित होते रहे हैं.

यूँ तो किसी भी सिनेमा हॉल के नवीनीकरण की घटना सामान्य ही कही जाएगीलेकिन दिल्ली की सिनेमा संस्कृति में प्रिया सिनेमाहॉल खास महत्व रखता है. कोरोना महामारी से पहले ही इसे नए रूप में लाने की तैयारी शुरु हुई थी. महामारी के दौरान लॉकडाउन और सोशल डिस्टेनसिंग की वजह से करीब दो साल के बाद इसे आम दर्शकों के लिए फिर से खोला गया है.

प्रसंगवश, महामारी के दूसरी लहर के बाद बैल बॉटम’ बॉलीवुड की पहली बड़े बजट की फिल्म है जिसे सिनेमाघरों में रिलीज किया गया है. हालांकि सिनेमाघरों में अभी भी पचास प्रतिशत सीट ही दर्शकों के लिए उपलब्ध हैं. ऐसे में डिस्टेनसिंग का पालन करते हुए परिवार या दोस्तों के साथ सिनेमा देखने का लुत्फ नहीं उठाया जा सकता है. जाहिर है, कोरोना महामारी के दौरान ओटीटी प्लेटफार्म ने मध्यवर्गीय दर्शकों के सिनेमा देखने की संस्कृति को काफी बदल दिया है. मलयालम फिल्मों के चर्चित निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन ने पिछले दिनों एक बातचीत के दौरान जोर देकर कहा कि अभी लोग लैपटॉपटीवीमोबाइल पर सिनेमा देख रहे हैंपर सिनेमा को वापस हॉल में आना ही होगा. यह एक सामूहिक अनुभव है. छोटे परदे पर आप दृश्यध्वनि की बारीकियों से वंचित हो जाते हैं. घर में बहुत तरह के व्यवधान भी मौजूद रहते हैं. महीनों बाद जब हम सिनेमाहॉल (पीवीआर प्रिया XL) में पहुँचे तो इसे बखूबी महसूस किया. हालांकि यह नोट करना उचित होगा कि अक्षय कुमार अभिनीत बैल बॉटम’ हाल ही में ओटीटी पर रिलीज हुई मलयालम फिल्मों के टक्कर की नहीं कही जा सकती. कोरोना महामारी के दौरान इस फिल्म की शूटिंग हुई थी जिसका दबाव इस फिल्म के निर्माण-निर्देशन में है.

बहरहालउदारीकरण-भूमंडलीकरण के कारण पिछले सदी के नब्बे के दशक में समाज में आए बदलावों के साथ ही महानगरों में सिनेमा देखेने की संस्कृति भी प्रभावित हुई. सिंग्ल स्क्रीन की जगह मल्टीप्लेक्स ने ले लिया और सिंग्ल स्क्रीन थिएटर धीरे-धीरे हाशिए पर चले गए. आज देश में करीब तीन हजार स्क्रीन मल्टीप्लेक्स में उपलब्ध हैं. प्रिया सिनेमा के मालिक अजय बिजली ने ऑस्ट्रेलिया की कंपनी विलेज रोडशो के साथ साझेदारी में प्रिया विलेज रोडशो लिमिटेड (1995)जिसे पीवीआर से नाम से हम जानते हैंशुरु किया.  इस साझेदारी को वे प्रिया के साथ ही आरंभ करना चाह रहे थेइसलिए इसे पीवीआर नाम दिया गया, पर दक्षिण दिल्ली में स्थित अनुपम सिनेमाघर को मल्टीप्लेक्स में बदल कर वर्ष 1997 में इसकी विधिवत शुरुआत हुईप्रिया भी वर्ष 2000 में पीवीआर प्रिया में तब्दील हुआ. इसे आज भी सिंग्ल स्क्रीन ही रखा गया है.

जेएनयू के बेहद करीब होने की वजह से  कॉलेजों के छात्र-छात्राओं के मिलने-जुलनेडेटिंग का प्रिया सिनेमा एक प्रमुख अड्डा था. बदलती दिल्ली की एक छवि यहाँ आने पर मिल जाती थी. 70 के दशक में शुरु हुए इस सिनेमा हॉल के बारे में सिनेमा समीक्षक जिया उस सलाम ने दिल्लीफोर शोज में लिखा है, वर्षों तक प्रिया धनी-मनी सिनेमा प्रेमियोंमहिलाओं और पुरुषों के लिए ऐसी जगह रहा जिनके लिए सिनेमा का मतलब हॉलीवुड की ताजातरीन फिल्में थी. कभी-कभी यहां मध्यमार्गी हिंदी फिल्में भी दिखाई जाती थीपर व्यावसायिक मसाला फिल्मों से निश्चित दूरी रही. हालांकि बाद के दशक में ही बॉलीवुड की फिल्मों पर यहाँ जोर बढ़ा. इसी बीच समाज में नव मध्यमवर्ग का उभार भी हुआजिसे हम बॉलीवुड की फिल्मों की विषय-वस्तु में भी देखते हैं. प्रसंगवश, पीवीआर मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों की आवक से नए तरह की सिनेमा के बनने और प्रसारण का रास्ता भी निकला है. कम बजट की ऑफ बीट फिल्मेंजो बॉलीवुड के स्टारों की लकदक से दूर हैं, आसानी से यहाँ दिखाई जाने लगी है.

यह तय है कि आने वाले समय में बॉलीवुड को ओटीटी पर रिलीज होने वाली फिल्मोंवेबसीरिजों से चुनौती का सामना करना पड़ेगा. सवाल है कि सिनेमाघरों तक दर्शकों को खींच लाने के लिए क्या बॉलीवुड तैयार है? सवाल यह भी है कि सिनेमाघरों तक जाने के लिए युवा दर्शक तैयार हैं या सिनेमाहॉल आने वाले समय में नॉस्टेलजिया का हिस्सा बन कर रह जाएगी?

(न्यूज 18 हिंदी के लिए)