ढलती रात में मेघाच्छन्न आकाश तले, रंग-बिरंगी रौशनियों से नहाए वियना की गलियों में मेरे मन में एक मुग्ध नायिका की छवि उभरी.
Saturday, March 27, 2010
यात्रा में प्रेम: वियना डायरी
ढलती रात में मेघाच्छन्न आकाश तले, रंग-बिरंगी रौशनियों से नहाए वियना की गलियों में मेरे मन में एक मुग्ध नायिका की छवि उभरी.
Thursday, March 25, 2010
Time is changing here too
Before departing for my long cherished tour to Vienna, Manish, a dear friend in Delhi, wrote mischievously, 'Vivien is your kind of woman; you will instantly fall in love with her.'
Although I didn’t meet Vivian, a Viennese, in JNU (she attended a summer school there), I saw her pictures and heard about her creative quest and photographic skills from Manish.
At the Vienna railway station I went to buy a bouquet for Vivien.
It is good to be romantic in Delhi than in Vienna! Seeing the Euro tag on flowers, I thought words are enough here. But then how vulnerable you are, when you do not know the language…
A smile came on Vivian’s face. 'Hope these flowers last when I am back home.' She said. Vivien looked more mature than her age, when she smiled.
It was a cloudy evening, streets were sparsely crowded. In the fresco of lights night fell down silently.
The scenes of ‘Habermasian Public Sphere’, in the late 19th Century Europe, were before me. Newspapers and magazines were lying on a big desk near front door. People were chatting, smoking and sitting leisurely after day’s work. I can see coffee houses around every nook and corner of the city.
I was thrilled and clicked some photos. I asked Vivien to take some more.
'Camera looks more artistic in your hand.'
'I love this sound- ‘Tak’, when flash goes up…It is irresistible.' Vivien said.
I was as curious as 'Alice was in the wonderland.' Vivien was trying to answer my queries patiently. I joked, there is 'Google God', do not stress yourself too much, please.
In Vienna, you can bump into an actress at a street, meet a musician in a tube or metro, and chat with a painter near Zebra crossing. I can feel why legendary musicians Mozart and Beethoven and great painter like Klimt loved this city and nurtured their ideas and dreams here.
I thanked my father, for he never thrust his desire on us, and I could study arts and literature and search my own dreams. How happy he would be seeing the great architectures here…
'It is not the same what was till 40 years ago. Now, if you opt for a music or acting course you have to weigh what options, job opportunities are before you. Time is changing here too.' Vivien said.
A lot has changed in between these 40 years but relics of past still haunt this city. There is a 'nameless library' in Judenplatz, built in the memory of Austrian Jews killed by Nazis between 1938 to 1945, which was inaugurated in 2000.
I discussed with Vivien, a prominent Hindi writer, Nirmal Verma and his travelogues.
In mid 90s, while in college, I read his travelogues and dreamed about visiting Vienna some day. He must have been of my age only, when he visited Vienna in early 60s, I thought.
'For us researchers life starts at 30.', Zakia, a Bangladeshi-American friend’s casual remark, which she made five years ago in Delhi, was echoing in my mind.
You always have company of books, movies and memories, even when you are traveling alone.
I saw Vivien’s cup was empty, while I still had to drink it. I poured some coffee in her cup, she smiled sheepishly.
Saturday, March 20, 2010
Love and longing in Vienna
Thursday, March 11, 2010
धूप चमकती है चाँदी की साड़ी पहने: जर्मनी डायरी
बर्फ़ की मखमली सफ़ेद चादर में लिपटे सड़क, चौक-चौराहे, पेड़-पौधे, पार्क और जिगन विश्वविद्यालय का कैंपस.
धूप का एक टुकड़ा भी कितना सुकून देता है...आज पहली बार यहाँ धूप खुल के खिली है. मौसम बदल रहा है.
मुझे केदारनाथ अग्रवाल की कविता याद आ रही है..धूप चमकती है चाँदी की साड़ी पहने/ मैके में आई बिटिया की तरह मगन है...
पुराने शहर की ओर घूमने जाना है. मैंने एक हल्का स्वेटर और ऊपर जैकेट डाल लिया है.
बाहर जितनी अच्छी धूप है उतनी तेज़ हवा. अज़रा कहती है कि आज पहले के मुक़ाबले ज्यादा ठंड है.
अज़रा के चेहरे पर बच्चों की सी मोहक मुस्कान तैर रही है.
'नहीं, मुझे ठंड नहीं लग रही है...सच!'
'हां, मुझे पता है कि तुम कभी नहीं कहोगे कि तुम्हें ठंड लग रही है... बस हँसते रहोगे...जब तुम बेवजह हँसते हो मैं समझ जाती हूँ कि तुम्हें ठंड लग रही है.'
मैं और ज़ोर से हँसने लगता हूँ...
पुराने शहर में घूमते हुए मुझे वहाँ की गलियाँ, स्थापत्य, गिरजे पहचानी हुई लगती हैं, न जाने क्यों. हां, फ़िल्मों-तस्वीरों में देखी, कहानियों और उपन्यासों में पढ़ी ये गलियाँ मेरे ज़ेहन में है.
भले ही एक ही महीने बीते हो, लेकिन ऐसा लगता है जैसे यहाँ आए कई महीने हो गए...सचमुच, जन संचार माध्यमों, भूमंडलीय संचार के साधनों ने कितना क़रीब ला दिया है हमें...दुनिया सिमट सी गई है.
क़रीब 700-800 साल पुराना है यह शहर. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान शहर का 80 प्रतिशत हिस्सा नष्ट हो गया था, फिर सब कुछ नए सिरे से रचा गया.
पुराने शहर में समय के थपेड़े खाता मध्ययुगीन कैसल जैसे हर आने-जाने वालों से कहता फिरता है: 'मैं बूढ़ा प्रहरी उस जग का/ जिसकी राह अश्रु से गिली.'
कुछ-कुछ फर्लांग की दूरी पर गिरजे दिख रहे है...वहाँ से गजर की आवाज़ आती रहती है...एक, दो, तीन...
'कुछ दिनों में यहाँ पर ख़ूबसूरत फूल खिलेंगे तब हम फिर आएँगे.' ठंड से उकताए लोग वसंत के आने की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे हैं.
छोटी-छोटी पहाड़ियों से घिरा यह शहर ऊँचाई से ऐसे दिखता है जैसे धूप में माँ की गोद में कोई नन्हा शिशु लेटा हो. वो रही हमारी यूनिवर्सिटी.
अन्ना सागर और फायसागर झीलों के किनारे चलते हुए, कार्तिक महीने का चाँद कितना मायावी लगता था...वैसा ख़ूबसूरत चाँद हम फिर कहाँ देख पाए.
यहाँ बर्फ़ की स्निग्ध चाँदनी में चाँद की चमक फिकी है. पता ही नहीं चला पूरे चाँद की रात कब आई और चली गई...
Wednesday, March 10, 2010
Now the slogan is, Internet first!
She says, "Now the slogan is, Internet first!"
Siegen Zeitung, 188 years old newspaper, published from Siegen, is quite popular in this region. Knoche has been associated with this newspaper for last 20 years.
Unprecedented changes have been taking place, in the last two decades, in the realm of global media. While there has been phenomenal growth of electronic media and online news worldwide, the future of print in the west is very much at stake.
In the 90s when Indian media was witnessing a ‘revolution’, German media was also seeing an upheaval in broadcasting sector. With the unification of Germany on 3 October 1990 a new commercial broadcasting sector has emerged.
Indian media, particularly Indian language newspapers, have been thriving and complementing growing news channels (there was only one state controlled news channel, Doordarshan, in 1991, however with the start of first private news channel in 1998, in 2010 there are more than 300 satellite channels which broadcast news in different languages in India) after liberalization and globalization of Indian economy. Newspaper industry in Germany is facing a serious competition from electronic media as television, radio and online news.
Knoche pointed out, ongoing economic crisis in Europe and dwindling readership is posing a major threat to Siegen Zeitung.
In 2006 Seigen Zeitung had a readership of 65 thousand people, in 2010 it has come down to 56 thousand. Besides Seigen Zeitung, two other daily newspapers get published from Siegen. Siegen, a medieval city, has one lakh and five thousand inhabitants.
Knoche says young people are not interested in buying and reading newspaper, moreover they read it online.
An obituary of a newspaper in the land of Gutenberg (Gutenberg was born in Mainz, Germany and is credited with using first printing press around 1456, and making the multiple copies of a text) sounds depressing but it seems interesting to map the trajectories of German media industry in this era of globalisation.
Thursday, March 04, 2010
यात्रा में निर्मल वर्मा…
बारिश की हल्की फुहाड़ों के बीच
बर्फ़ीली पगडंडी से गुज़रते हुए
उस उदास गिरजे के पास
निर्मल वर्मा साथ हो लेते हैं मेरे
मुस्कुराते हुए
हौले से कहते हैं
'यह चमत्कार नहीं, सच है!'
सच जैसे
वह दिसंबर की शाम थी
दिल्ली की सर्द हवाओं में
उसकी चंपई नाक की नोंक पर
चमकती पसीने की बूँद
हरी घास पर टिके ओस की तरह...
फ़रवरी-मार्च की इन सफ़ेद रातों में
अक्सर वे मेरी नींद में आ जाते हैं
चुपके से
मेरे कानों में आवाज़ आती है
'बुरूस के लाल फूल लाए हो झूठे!'
और उसकी खिलखिलाती हुई हँसी
झिलमिलाती आँखों की कोर
सच जैसे
फ़रीदा ख़ानम की 'न जाने की ज़िद...'
पिक्चर पोस्टकार्ड उलटते-पुलटते
ज्योंही मेरी नज़र एक सुर्ख़ गुलाब पर टिक जाती है
इशारों से वे टोकते हैं
ये गर्मियों के दिन नहीं…
और मेरी ऑखें उन शब्दों के अर्थ ढूँढ़ने लगती है
जो समय के चहबच्चे में कहीं गुम गए
जैसे चेकोस्लोवाकिया...
Wednesday, March 03, 2010
राम भरोसे अपने राम के
Sunday, February 28, 2010
होरी खेलूँगी बिस्मिल्लाह
बिना रंग के आप किसी को 'होली' कैसे समझा सकते हैं...रंग तो क्या मैं ढूँढूंगा..हां, हल्दी साथ लेकर आया हूँ..उसे हल्दी ज़रूर लगाऊँगा..क्या पता वह कह उठे...बिस्मिल्लाह..!
Wednesday, February 24, 2010
'मार्क्स का राजनीतिक दर्शन मर चुका है'
Friday, February 12, 2010
घर एक सपना है
हम सपने बुनते थे कि जब इस पैसे से पेड़ निकलेगा तब कैसे-कैसे पैसे उसमें फलेंगे. क्या हम पेड़ पर चढ़ कर पैसे तोड़ पाएँगे. कोई बात नहीं, चाचा से हम कह देंगे वे तोड़ दिया करेंगे हमारे लिए. यों जब पैसे बड़े हो जाएँगें तब खुद गिर गिर के इधर-उधर बिखरें पड़ें मिलेंगे, पके आम की तरह. लेकिन यदि रुपए फले तो! वे तो तेज़ हवा में उड़ जाएँगे...!
वे बचपन के दिन थे. आपको याद है बब्बू, राजा भर्तहरी के गीत गाने वाले, बनगाँव महिषी के गुदरीया बाबा. चाचा उन्हें खाना खिलाते थे, माँ उन्हें गुदरी देती थी. चाचा ग्रहों के दोष से बचने के लिए उनसे उपाय पूछते थे. वे हर बार नए ग्रहों के दोष के बारे में बताते थे. कभी शनि की दशा ठीक नहीं होती थी, तो कभी चाचा के मंगल में दोष होता था.
गुदरीया बाबा हमारा भी हाथ देखते थे. क्या हमारे हाथ में विद्या रेखा है, क्या हम विदेश जाएँगे बताइए ना, हम उनसे पूछते थे. फ्रैंकफ़र्ट एयरपोर्ट पहुँच कर मैंने एक बार फिर से अपने हाथ को उलट-पुलट कर देखा, हां चंद्र पर्वत पर एक रेखा तो है शायद...!
यहां जिगन में (कल प्रोफ़ेसर डेटलिफ बता रहे थे जिग नाम की एक नदी है) विश्वविद्यालय के इस गेस्ट हाउस के बाहर, मेरे इस खूबसूरत कमरे के ठीक सामने बर्फ़ की चादर फैली है. यहां का तापमान अभी माइनस सात डिग्री है. सेमल के फूल की तरह बर्फ़ के फाहे हवा में तैर रहे हैं. सामने कई पत्रहीन नग्न गाछ (पेड़) एक सीध में खड़े हैं.
भाई, हमारा बचपन बीतता गया, पैसों के पेड़ हम कहाँ देख पाए...इन वर्षों में लेकिन सपनों के पेड़ में काफ़ी नव पल्लव खिलते गए. हमने सतरंगी सपने देखना छोड़ा नहीं. हमारे बचपन में न कोई समुद्र था न ही कोई बर्फ़. पापा के पास इतने पैसे कहां थे कि हमें कहीं बाहर घुमाने ले जाते. हमें घर से बाहर भेज कर पढ़ाने का साहस किया, यह क्या उनके लिए आसान था.? उनके सपने हमारे सपनों से जुड़ते गए.
अजीब संयोग है, ज़िंदगी में पहली बार समुद्र देखा था वह हमारी दुनिया नहीं थी. पहली बार बर्फ़ गिरते देख रहा हूँ यह भी एक दूसरी दुनिया है. यूरोप देखने की, वहाँ रह कर पढ़ने-लिखने की मन में चाह थी. लेकिन कब? यह पता नहीं था.
आज आपकी बहुत याद आ रही है. बचपन में मेरे लिए रेत का घरौंदा और बालू का घर आप बनाते थे. कितना अच्छा होता आप यहाँ होते और बर्फ़ में मेरे लिए एक घर बनाते. मेरा हाथ अब भी इतना सुघड़ नहीं कि घर बना पाऊँ. घर एक सपना है...!
Friday, November 06, 2009
ठाठ कबीरा
बात आधे घंटे की तय हुई थी, लेकिन जब बात चली तो दो घंटे से भी ज्यादा. मुझे ही कहना पड़ा- 'सर दो बजे आपकी मुंबई की ट्रेन है, मैं फिर कभी आऊँगा...ज़रूर आऊँगा.' लेकिन मुझे क्या पता था कि प्रभाष जोशी अचानक, इतनी जल्दी हमें छोड़ जाएँगे.Friday, September 18, 2009
हिंदी के पंडित फ़ादर कामिल बुल्के
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'अंग्रेजी हिंदी कोश' के लेखक, हिंदी के विद्वान और समाजसेवी फ़ादर कामिल बुल्के की जन्म शताब्दी इस वर्ष मनाई जा रही है.
फ़ादर कामिल बुल्के एक ऐसे विद्वान थे जो भारतीय संस्कृति और हिंदी से जीवन भर प्यार करते रहे, एक विदेशी होकर नहीं बल्कि एक भारतीय होकर.
बेल्जियम में जन्मे बुल्के की कर्मस्थली झारखंड की राजधानी राँची में उनके कृतित्व और व्यक्तित्व को लेकर इस हफ़्ते विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन कर हिंदी के इस साधक को याद किया गया.
रॉंची स्थित सेंट जेवियर्स कॉलेज में बुल्के ने वर्षों तक हिंदी का अध्यापन किया.
सेंट जेवियर्स कॉलेज के हिंदी विभाग के अध्यक्ष और बुल्के के शिष्य रहे डॉक्टर कमल कुमार बोस कहते हैं, "राज्य में पूरे वर्ष बुल्के जन्म शताब्दी समारोह मनाई जाएगी. उनके साहित्य और विचारों का प्रसार किया जाएगा. हमने उनके नाम पर कॉलेज में एक पीठ की स्थापना का निर्णय लिया है."
रामकथा के महत्व को लेकर बुल्के ने वर्षों शोध किया और देश-विदेश में रामकथा के प्रसार पर प्रामाणिक तथ्य जुटाए. उन्होंने पूरी दुनिया में रामायण के क़रीब 300 रूपों की पहचान की.
रामकथा पर विधिवत पहला शोध कार्य बुल्के ने ही किया है जो अपने आप में हिंदी शोध के क्षेत्र में एक मानक है.
हिंदी प्रेम
दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफ़ेसर नित्यानंद तिवारी कहते हैं, "फ़ादर कामिल बुल्के और मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक डॉक्टर माता प्रसाद गुप्त के निर्देशन में अपना शोध कार्य पूरा किया था. मैंने उनमें हिंदी के प्रति हिंदी वालों से कहीं ज्यादा गहरा प्रेम देखा. ऐसा प्रेम जो भारतीय जड़ों से जुड़ कर ही संभव है. उन्होंने रामकथा और रामचरित मानस को बौद्धिक जीवन दिया."
बुल्के ने हिंदी प्रेम के कारण अपनी पीएचडी थीसिस हिंदी में ही लिखी.
जिस समय वे इलाहाबाद में शोध कर रहे थे उस समय देश में सभी विषयों की थीसिस अंग्रेजी में ही लिखी जाती थी. उन्होंने जब हिंदी में थीसिस लिखने की अनुमति माँगी तो विश्वविद्यालय ने अपने शोध संबंधी नियमों में बदलाव लाकर उनकी बात मान ली. उसके बाद देश के अन्य हिस्सों में भी हिंदी में थीसिस लिखी जाने लगी.
उन्होंने एक जगह लिखा है, "मातृभाषा प्रेम का संस्कार लेकर मैं वर्ष 1935 में रॉंची पहुँचा और मुझे यह देखकर दुख हुआ कि भारत में न केवल अंग्रेजों का राज है बल्कि अंग्रेजी का भी बोलबाला है. मेरे देश की भाँति उत्तर भारत का मध्यवर्ग भी अपनी मातृभाषा की अपेक्षा एक विदेशी भाषा को अधिक महत्व देता है. इसके प्रतिक्रिया स्वरूप मैंने हिंदी पंडित बनने का निश्चय किया."
विदेशी मूल के ऐसे कई अध्येता हुए हैं जिन्हें इंडोलॉजिस्ट या भारतीय विद्याविद् कहा जाता है. उन्होंने भारतीय भाषा, समाज और संस्कृति को अपने नजरिए से देखा-परखा. लेकिन इन विद्वानों की दृष्टि ज्यादातर औपनिवेशिक रही है और इस वजह से कई बार वे ईमानदारी से भारतीय भाषा, समाज और संस्कृति का अध्ययन करने में चूक गए.
बुल्के ने भारतीय साहित्य और संस्कृति को उसकी संपूर्णता में देखा और विश्लेषित किया.
जीवन यात्रा
फ़ादर कामिल बुल्के का जन्म बेल्जियम के फलैण्डर्स प्रांत के रम्सकपैले नामक गाँव में एक सितंबर 1909 को हुआ.
लूवेन विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग कॉलेज में बुल्के ने वर्ष 1928 में दाखिला लिया. इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने संन्यासी बनने की ठानी.
इंजीनियरिंग की दो वर्ष की पढ़ाई पूरी कर वे वर्ष 1930 में गेन्त के नजदीक ड्रॉदंग्न नगर के जेसुइट धर्मसंघ में दाखिल हो गए. जहाँ दो वर्ष रहने के बाद आगे की धर्म शिक्षा के लिए हॉलैंड के वाल्केनबर्ग के जेसुइट केंद्र में भेज दिए गए. यहाँ रहकर उन्होंने लैटिन, जर्मन और ग्रीक आदि भाषाओं के साथ-साथ ईसाई धर्म और दर्शन का गहरा अध्ययन किया.
वाल्केनबर्ग से वर्ष 1934 में जब बुल्के लूवेन की सेमिनरी में वापस लौटे तब उन्होंने देश में रहकर धर्म सेवा करने के बजाय भारत जाने की अपनी इच्छा जताई.
वर्ष 1935 में वे भारत पहुँचे जहाँ पर उनकी जीवनयात्रा का एक नया दौर शुरू हुआ. शुरूआत में उन्होंने दार्जिलिंग के संत जोसेफ कॉलेज और गुमला के एक मिशनरी स्कूल में विज्ञान विषय के शिक्षक के रूप में काम करना शुरू किया.
लेकिन कुछ ही दिनों में उन्होंने महसूस किया कि जैसे बेल्जियम में मातृभाषा फ्लेमिश की उपेक्षा और फ्रेंच का वर्चस्व था, वैसी ही स्थिति भारत में थी जहाँ हिंदी की उपेक्षा और अंग्रेजी का वर्चस्व था.
वर्ष 1947 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उन्होंने हिंदी साहित्य में एमए किया और फिर वहीं से 1949 में रामकथा के विकास विषय पर पीएचडी किया जो बाद में ‘रामकथा: उत्पत्ति और विकास’ किताब के रूप में चर्चित हुई.
राँची स्थित सेंट जेवियर्स कॉलेज के हिंदी विभाग में वर्ष 1950 में उनकी नियुक्ति विभागाध्यक्ष पद पर हुई. इसी वर्ष उन्होंने भारत की नागरिकता ली.
वर्ष 1968 में अंग्रेजी हिंदी कोश प्रकाशित हुआ जो अब तक प्रकाशित कोशों में सबसे ज्यादा प्रामाणिक माना जाता है. मॉरिस मेटरलिंक के प्रसिद्ध नाटक 'द ब्लू बर्ड' का नील पंछी नाम से बुल्के ने अनुवाद किया. इसके अलावे उन्होंने बाइबिल का हिंदी में अनुवाद किया.
छोटी-बड़ी कुल मिलाकर उन्होंने क़रीब 29 किताबें लिखी.
भारत सरकार ने 1974 में उन्हें पद्मभूषण दिया.
दिल्ली में 17 अगस्त 1982 को गैंग्रीन की वजह से उनकी मौत हुई.
(बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए, 7 सितंबर 2009)
Monday, July 27, 2009
'थीसिस लिख रहे हो क्या'
दस-ग्यारह साल का रहा होऊँगा… माँ खाना खाने के लिए ओसारे से आवाज़ लगाती और मैं कहता कि होम वर्क पूरा करके खाऊँगा. “जल्दी करो, थीसिस लिख रहे हो क्या?” माँ कहा करती थी.
ग्रेजुएशन के ठीक दस साल बाद जब पीएचडी थीसिस की लिखाई पूरी कर रहा हूँ माँ की कही ये बात पिछले कई दिनों से बरबस याद आ रही है. पिछले कुछ महीनों से रोज़ माँ फ़ोन पर पूछती है कि घर कब आओगे. क़रीब 15 वर्षों से घर से दूर हूँ लेकिन पहली बार ऐसा हुआ कि डेढ़ साल से उनसे मिल नहीं पाया हूँ...
पापा कहते थे कि ‘स्कॉलर बनो’. मिथिला के उस कूपमंडूक समाज में पता नहीं उनके दिमाग़ में यह बात कैसे आई. मैथिलों ने ‘पोथी-पतरा-पाग’ में से पोथी को बोझ समझ कर बहुत पहले ही त्याग दिया लेकिन पतरा और पाग से वे चिपके रहे. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है, “पंडिताई भी एक बोझ है-जितनी ही भारी होती है उतनी ही तेजी से डुबाती भी है. जब वह जीवन का अंग बन जाती है तो सहज हो जाती है।” पर क्या जीवन में सहजता आसानी से मिल पाती है. शायद शोध आत्मपरिष्कार का भी एक माध्यम है.
लेकिन इस शोध का, इस ‘अनामदास के पोथे’ का मोल क्या है? जब मैं अपने इस शोध का निष्कर्ष लिख रहा हूँ, लैपटॉप पर मेरी अंगुलियाँ बार-बार रुक जा रही है...कुछ काम का लिखा भी या सिर्फ़ कागद ही कारे किए..
मेरे शोध निर्देशक प्रोफेसर वीर भारत तलवार एक ख़्यात शोध अध्येता (रिसर्च स्कॉलर) हैं. वे कहा करते हैं कि ‘शोध वही कर सकता है जो शोध किए बिना नहीं रह सकता है।’
पता नहीं आज के दौर में इस जुनून के क्या मानी है? तथ्य और सत्य की खोज क्या आप अपने समय और समाज के यथार्थ से बेख़बर होकर कर सकते हैं? बाहर बाज़ार में तो हाय-तौबा मची है. शार्ट कट के रास्ते सब कुछ संभव है, शोध नहीं. ऐसा नहीं कि हिंदी समाज के पास सांस्कृतिक पूँजी का अभाव है, फिर शोध के प्रति यह उदासीनता क्यों?
(चित्र में, माँ के साथ शोधार्थी)