Saturday, June 01, 2013

फालसे काले काले

तब हम बच्चे थे. माँ के पेट पर चिपके रहते. गर्मियों में बाहर जाने से रोकते हुए मां हमें अपने पास पकड़ कर रखती. पर थोड़ी देर में वो खुद सो  जाती. सोते हुए माँ के कानों में बड़े बड़े सोने के छल्ले अच्छे लगते थे.  बड़े भाई की जब शादी हुई तो भाभी के लिए वे वैसे ही छल्ले ढूंढ रहे थे...पर समय के साथ सोने में चमक और खनक दोनों ग़ायब होती गई. बहरहाल,  मां जब सो जाती तो हम उसके कानों के छल्ले को खोलते-खेलते थक जाते. फिर गर्मी से  बेपरवाह,  इधर-उधर देख, भाग जाते आम के टिकुलो की टोह में.

दिल्ली की इन गर्मियों में जब सुबह सबेरे नींद खुल जाती है और कानों में सुरीली फालसे काले काले  की आवाज़ सुनाई पड़ती है, मन जाने क्यूँ गाँव पहुँच जाता है. मैं फोन पर माँ से पूछता हूँ- क्या मिरचई अभी भी डुगडुगी बजाता, साइकिल पर 'बरफ' लेकर गाँव आता है?  बाड़ी में आम के टिकुले अब तो बड़े हो गए होंगेडबरे का पानी तो सूख गया होगा!

यायावर नागार्जुन ने लिखा है: “याद आता मुझे अपना वह तरौनी ग्राम/ याद आतीं लीचियां, वे आम/याद आते धान याद आते कमल, कुमुदनी और ताल मखान/ याद आते शस्य श्यामल जनपदों के रूप-गुण अनुसार ही रखे गए वे नाम. तरौनी की जगह बेलारही रख दीजिए. यह कविता मेरी हो जाएगी. वैसे तरौनी से मेरे गाँव की दूरी 20 किलोमीटर ही तो है, और ननिहाल?  महज चार. शायद हर प्रवासी की पीड़ा कहीं ना कहीं मिलती जुलती है. पहले नॉस्टेलजिया और फिर गहरा अवसाद!  

मार्च में हफ्तेभर के लिए गाँव गया था. पापा अपने स्वभाव के विपरीत शांत थे. उनकी युवोचित हँसी नहीं सुनाई पड़ रही थी. माँ से पूछा- पापा इतने चुप क्यों रहते हैं? पापा से पूछा- डिप्रेशन में तो नहीं हैं...? पापा ने कहा- नहीं. पर कुछ देर बाद कहा- अब यह उम्र पोते-पोतियों के संग खेलने की है, अकेले रहने की नहीं...रिटारयरमेंट के बाद ऐसा लगता है कि सारी ऊर्जा खत्म हो गई. बूढ़ी दादी के पूछता हूँ- दिल्ली चलोगी?  वो कहती है- मरने के समय क्या मगहर जाउँगी?

90 के दशक में जब हम बिहार से दिल्ली पढ़ने आए थे उस वक्त बच्चों को दिल्ली पढ़ने भेजना मध्यवर्गीय परिवार के लिए एक तरह का स्टेटस सिंबल था. जिनके पास भी थोड़ा-बहुत साधन था बच्चों को बाहर पढ़ने भेज दिया. और वे नौकरी-चाकरी के चक्कर में वहीं के होकर रह गए. बीस साल बाद अब दरभंगा-मधुबनी जिले के गाँव बूढ़ों का बसेरा बन गए हैं. बिहार में गाँवों में स्वास्थ्य और बिजली की सुविधा पिछले तीन दशकों में बमुश्किल सुधरी है. इन मूलभूत सुविधाओं के बिना बुढ़ापा एक रोग और भय की तरह आता है.

वीएस नायपाल के एक जुमले का इस्तेमाल कर कहें तो लालू-राबड़ी यादव के शासन के दौर में मीडिया में बिहार की छवि एक ऐसे राज्य की बन गई थी जहाँ सभ्यता का अंत हो गया है. पर नीतिश कुमार के शासन काल में मीडिया में एक ऐसी छवि बन रही है कि बिहार जल्दी ही अपने अतीत कालीन गौरवको पा लेगा. दोनों ही छवियाँ अतिरंजित और सच से परे हैं. मीडिया में इस समय सबसे ज्यादा जोर जीडीपी के आँकड़ों, नीतिश की सेक्यूलर छवि और प्रस्तावित नालंदा विश्वविद्यालय को लेकर है. पर जमीनी हकीकत बिहार के गाँव, खेत और खलिहानों में ही दिखता है,  चिकने-चुपड़े राष्ट्रीय राजमार्गों पर नहीं!

(जनसत्ता के समांतर स्तंभ में 5 जून 2013 को प्रकाशित)

Monday, May 13, 2013

हिंदी में समाचार का लोकार्पण

अविनाश,रवीश कुमार,करन थापर,वीर भारत तलवार,ओम थानवी

(ओम थानवी, तलवार और करन थापर बातचीत में मशगूल)

(वक्ताओं को सुनते हुए)

Thursday, May 02, 2013

Hindi Mein Samachar: Launch and Discussion

'Hindi Mein Samachar' from Antika Prakashan is slated to be released, followed by a panel discussion, on Saturday, 11th May at 5:30 at India International Centre, Seminar Hall number 3. Panelists include- Prof. Vir Bharat Talwar (JNU), Karan Thapar (President, ITV), Om Thanvi (Editor, Jansatta), Ravish Kumar  (Executive Editor, NDTV India) and Avinash (Moderator, Mohalla Live).You are cordially invited to celebrate the launch of my book.

Saturday, April 06, 2013

हिंदी में समाचार

अंतिका प्रकाशन, सजिल्द, मूल्य: 390 रुपए
ISBN Number: 9789381923573
किताब के बारे में
भूमंडलीकरण के साथ पनपे नव पूँजीवाद और हिंदी अखबारों के बीच संबंध काफी रोचक हैं। हिंदी अखबार जो अंग्रेजी अखबारों के पिछलग्गू बने हुए थे, अपनी निजी पहचान लेकर सामने आए। संचार क्रांति के दौर में इनके व्यावसायिक हितों के फलने-फूलने का खूब मौका मिला और आज ये ग्लोकल’  हैं।
उदारीकरण के बाद भारतीय राज्य और समाज के स्वरूप में आए परिवर्तनों के बरक्स भारतीय मीडिया ने भी खबरों के चयन, प्रस्तुतीकरण, प्रबंधन आदि में परिवर्तन किया। हिंदी अखबारों की सुर्खियों पर नजर डालें तो स्पष्ट दिखेगा कि खबरों के मानी, उसके उत्पादन के ढंग बदल गए हैं। अखबारों के माध्यम से बनने वाली हिंदी की सार्वजनिक दुनिया में जहाँ राजनीतिक खबरों और बहस-मुबाहिसा के बदले मनोरंजन का तत्व हावी है, वहीं भाषा, स्त्री और दलित विमर्श का एक नया रूप उभरा है। मिश्रित-अर्थव्यवस्था में जो मध्यवर्गीय इच्छा दबी हुई थी,  वह खुले बाजार में अखबारों के पन्नों पर खुल कर अभिव्यक्त हो रही है। खबरों के कारोबार में पेड न्यूजफाँस नजर आने लगी है। हिंदी पत्रकारिता की इन स्थितियों को यह शोधपरक किताब पहली बार सामग्री विश्लेषण और उदाहरणों के जरिये  निरूपित करती है।
वर्ष 1991 में उदारीकरण के रास्ते आए समकालीन भूमंडलीकरण ने हिंदी पत्रकारिता को किस रूप में प्रभावित किया? पिछले दो दशकों में भारतीय राज्य, समाज और भूमंडलीकरण के साथ हिंदी पत्रकारिता के संबंध किस रूप में विकसित हुए?  शोध और पत्रकारिता के अपने साझे अनुभव का इस्तेमाल कर अत्यधिक परिश्रम से लेखक ने इसका विवेचन और विश्लेषण किया है।
हिंदी में समाचारके मार्फत हिंदी पत्रकारिता में रुचि रखनेवाले तो इनमें आए बदलाव से जुड़ीं स्थितियों-परिस्थितियों को बेहतर ढंग से समझ ही सकते हैं, हिंदी पत्रकारिता के छात्रों-शोधार्थियों के लिए भी यह एक अनिवार्य सी पुस्तक है।

लेखक परिचय:अरविंद दास
जन्म: 1978 में बेलारही, मधुबनी (बिहार) में।
  शिक्षा: दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कॉलेज से अर्थशास्त्र की पढ़ाई, आईआईएमसी से पत्रकारिता में प्रशिक्षण और जेएनयू से हिंदी साहित्य और मीडिया में शोध।  भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान, पुणे से फिल्म एप्रिसिएशन कोर्स। नेशनल कौंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज  से उर्दू में डिप्लोमा। जर्मनी के जिगन विश्वविद्यालय से पोस्ट डॉक्टरल शोध। पीएचडी के लिए जूनियर रिसर्च फेलोशिप और पोस्ट डॉक्टरल शोध के लिए जर्मन रिसर्च फांउडेशन फेलोशिप। 
देश-विदेश में मीडिया को लेकर हुए सेमिनारों में शोध पत्रों की प्रस्तुति। भारतीय मीडिया के विभिन्न आयामों को लेकर जर्मनी के विश्वविद्यालयों में व्याख्यान।  इंटरनेशनल सेंटर फॉर जर्नलिस्ट के दक्षिण एशियाई देशों के पत्रकारों के लिए 2012 में 'न्यू मीडिया' को लेकर ट्रेनिंग और कोलंबो में हुए  वर्कशॉप में भागीदारी। 
   पत्रकारिता का ककहरा जनसत्ता से सीखा। बीबीसी के दिल्ली स्थित ब्यूरो में सलाहकार और स्टार न्यूज में मल्टीमीडिया कंटेंट एडिटर रहे। अलग अंदाज के ब्लॉगर। ब्लॉग लेखों का संकलन-'गुल,नज़ूरा और रामचंद पाकिस्तानी' शीघ्र प्रकाश्य। मिथिला कला को लेकर एक लघु पुस्तिका- गर्दिश में एक चित्र शैली प्रकाशित।
   फिलहाल पिछले दो वर्षों से करेंट अफेयर्स कार्यक्रम बनाने वाली प्रतिष्ठित प्रोडक्शन कंपनी आईटीवी के सीनियर रिसर्चर। विशेष तौर पर सीएनएन-आईबीएन पर प्रसारित होने वाले चर्चित कार्यक्रम 'डेविल्स एडवोकेट' और 'लास्ट वर्ड' के शोध की जिम्मेदारी।

विषयक्रम


प्रस्तावना

अध्याय 1
भूमंडलीकरण की अवधारणा
         भूमंडलीकरण का परिप्रेक्ष्य
 भूमंडलीकरण और पत्रकारिता
अध्याय 2
अखबार का बदलता स्वरूप: पहला पन्ना
रूप-रेखा
             सुर्खियाँ एवं उनके विषय
 भाषा-शैली
विज्ञापन
अध्याय 3
सामग्री विश्लेषण I
 स्त्री
 धर्म
    अर्थतंत्र
अध्याय 4
सामग्री विश्लेषण II
   साहित्य
खेल
अध्याय 5
सामग्री विश्लेषण III
             किसान एवं मजदूर
               दलित एवं आदिवासी
अध्याय  6
प्रबंधन एवं संचालन
           प्रबंधन का ढाँचा
                               मालिक और संपादक: भूमिका एवं संबंध
                        पत्रकारों का चयन एवं नियुक्तियाँ

निष्कर्ष

 परिशिष्ट

(गीता बुक सेंटर, जेएनयू में उपलब्ध)
(अंतिका प्रकाशन सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-II, गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.) फोन : 0120-2648212 मोबाइल नं.9868 380797, 98718 56053, अरविंद दास, मोबाइल: 09990 306477)   

Wednesday, March 13, 2013

खबरों का खेल वाया नभाटा

अखबार एक प्रोडक्ट(उत्पाद) है, जिसे संपादक की कम, ब्रांड मैनेजर की ज्यादा जरूरत है’, इस बात की चर्चा अखबारों के दफ्तरों में 80 के दशक के उतरार्द्ध में शुरू हो गई थी. टाइम्स ग्रुप के अखबार इस ब्रांड विमर्शके अगुआ थे. वर्तमान में हिंदी के लगभग सभी अखबार किस तरह से बाजार के सुर में सुर मिलाकर अपना व्यवसायिक हित साध रहे हैं यह वर्ष 2009 में हुए लोकसभा चुनाव और बाद के विधान सभा चुनावों में पत्रकारिता ने जो भूमिका निभाई उससे खुल कर सामने आ गया. प्रभाष जोशी ने इस सिलसिले में नोट किया था:“अखबारों ने बाकायदा पैकेज बनाए थे और रेट कार्ड छापे थे. पैकेज में चुनाव कवरेज के सभी क्षेत्र कवर किए गए थे. फोटू से लेकर इंटरव्यू और अपील तक की अलग-अलग साइज के अलग-अलग दाम तय किए थे. जिनने ये पैकेज खरीदे उन्हीं की खबरें छपीं. जिनने नहीं खरीदे वे अखबारों के पेजों से गायब रहे.
असल में जिसे 2009 में पेड न्यूज कहा गया और उसकी औपचारिक शुरुआत बैनेट कोलमन एंड कंपनी या टाइम्स ग्रुप, जिसके तहत नवभारत टाइम्स प्रकाशित होता है, ने 2003 में मीडिया नेट कंपनी बना कर कर दी थी. इसके तहत टाइम्स ग्रुप के अखबारों के परिशिष्टों (Supplement) में कोई व्यक्ति, संस्था, वस्तु या फिल्म का प्रमोशन खबर के रूप में पैसे देकर करवा सकता है. वर्ष 2005 में टाइम्स ग्रुप ने मीडिया नेट से आगे जा कर प्राइवेट ट्रीटीज- जिसे उन्होंने ब्रांड कैपिटल कहा- की शुरुआत की. इसके करार के तहत टाइम्स ग्रुप के अखबार कंपनियों के विज्ञापन की लागत के बदले उनसे इक्विटी लेता है. लगभग 500 कंपनियों के साथ बैनेट कोलमन कंपनी ने इस तरह का करार किया है. स्पष्टत: इस तरह का करार पाठकों के विश्वास के साथ धोखा है.
हाल ही में (2012) टाइम्स ग्रुप के मालिक ने प्रतिष्ठित अमेरिकी पत्रिका द न्यूयॉर्कर से बात करते हुए कहा हम खबरों का नहीं विज्ञापन का कारोबार करते हैं. हालांकि मीडियानेट को लेकर जब टाइम्स ऑफ इंडिया ने मार्च 2003 में अखबार में खबर दी तब उसने इसे हिताहित का ध्यान रखने वाला, लेखा परीक्षक और प्रहरी की भूमिका में देखा था जो मीडिया की पीआर सेक्टर के साथ बढ़ते मेल जोल का नियमन करेगा. जाहिर है पेड न्यूज की परिघटना का जनक टाइम्स ग्रुप है और भूमंडलीकरण के दो दशकों के बाद इस कारोबारको लेकर अखबार को कोई मलाल नहीं!
 पिछले दो दिनों से नवभारत टाइम्स, दिल्ली ने पहले पन्ने पर हो गया NBT+’ नाम से खुद का एक विज्ञापन दे रहा है जिसमें लिखा है-अब आपको हर रोज अखबार लगेगा एनबीटी प्लस. यानी अब आपको अपने पसंदीदी सप्लिमेंट हैलो डेल्ही का पूरा मसाला चार बढ़े हुए पेजों के साथ मुख्य अखबार के पन्नों में ही मिल जाएगा.’ और फिर इस बदलाव पर पाठकों से राय मांगी गई है.
जब मैंने नवभारत टाइम्स फोन कर पूछा कि पहले तो सप्लिमेंट के नीचे ' एडवरटोरियल, इनटरटेनमेंट प्रमोशनल फीचर लिखा होता था, लेकिन आज के अखबार में ऐसा तो नहीं दिख रहा है, क्यों?' संपादकीय विभाग से जुड़े एक सज्जन ने इस बारे में अनभिज्ञता जाहिर की और कहा कि इस बारे में पूछना पड़ेगा.
अगले लोकसभा चुनाव को साल भर भी नहीं बचे हैं, ऐसा लग रहा है कि अखबारों ने फिर से तैयारी शुरु कर दी है!
 ('हिंदी में समाचार' शीर्षक से लेखक की किताब अंतिका प्रकाशन से अप्रैल 2013 में आने वाली है)

Monday, January 14, 2013

चैनलों का संक्रमण काल



सेना प्रमुख कह रहे हैं, समय और स्थान चुन कर जवाब देंगे’. संसद में विपक्ष की नेता कह रही हैं-वो एक सिर लेके गए हैं तो हम दस लेके आएँगे.’  और एक बार फिर से हमारे खबरिया चैनल ललकारते हुए पूछ रहे हैं- आखिर कब तक हम चुप रहेंगे!

जम्मू-कश्मीर की सीमा रेखा पर 8 जनवरी को दो भारतीय सैनिकों की निर्मम हत्या, उनके क्षत-विक्षत शव और एक सैनिक के सिर कलम करने की घटना पर जितना रोष आम जनों में है, उससे कहीं ज्यादा खबरिया चैनल अपने (अंध) राष्ट्रवादी होने का सबूत दे रहे हैं. शुरु में भारत और पाकिस्तान की सरकार सीमा रेखा के गिर्द होने वाली इस गोलीबारी की घटना को ज्यादा तूल नहीं दे रही थी, लेकिन अब ऐसा लगता है कि मीडिया के दबाव में भारतीय राज्य और सत्ता भी उसी स्वर में बात करने को बाध्य है.

खबरिया चैनल सुविधानुसार कुछ तथ्यों को मनमाने ढंग से विश्लेषित कर रहा है और उत्तेजना पैदा कर रहा है. शहीद सैनिकों के साथ बर्बरतापूर्ण और अमानवीय व्यवहार की निंदा होनी चाहिए, पर क्या सवाल भारतीय सत्ता और सैनिकों के व्यवहार पर नहीं होनी चाहिए. वर्ष 2003 में हुए संघर्ष विराम के बाद कई बार सीमा पर गोला-बारी हुई है. खबरों के मुताबिक इससे पहले भारतीय सेना की कार्रवाई में 6 जनवरी को पाकिस्तानी सेना के एक जवान मारे गए थे और फिर पलटवार में दो भारतीय सैनिक शहीद हुए. यहाँ पर यह नोट करना चाहिए कि देश के कुछ बड़े संवाददाताओं (बरखा दत्त) ने कारगिल युद्ध के दौरान नोट किया था कि किस तरह भारतीय सेना भी पाकिस्तानी सैनिकों का सिर कलम कर गौरवान्वित हो रही थी. (कंफेंशन्स ऑफ ए वार रिपोर्टर, हिमाल, जून 2001)

वर्ष 2001 में भारत के संसद भवन पर हुए आतंकवादी हमले के बाद सीमा रेखा पर दोनों देशों की सेनाओं का जमावड़ा था और युद्ध के बादल मंडरा रहे थे. आजतकजैसे चैनलों ने युद्ध का समां बाँधने और युयुत्सु मानसिकता तैयार करने में एक बड़ी भूमिका अदा की थी. उसी दौरान (2001-02) हम आईआईएमसी में पत्रकारिता का प्रशिक्षण ले रहे थे. आईआईएमसी के छात्र रहे और तब आज तक के स्टार संवाददाता दीपक चौरसिया हमें लेक्चर देने आए थे. बातों-बातों में उन्होंने हमसे पूछा कि- आज तक की प्रसिद्धि क्यों इतनी है?’ मैंने कहा था- युद्ध हो ना हो, आप टैंक स्टूडियो में तैनात रखते हैं और यह दर्शकों को लुभाता है!  चौरसिया साहब का चेहरा बुझ गया था. मेरे एक मित्र ने एक चिट बढ़ाई- भाई, आप को शायद नौकरी की जरुरत नहीं होगी, हमें है!

उस वक्त हमें लगता था और मीडिया के जानकार कहते थे कि ये संक्रमण काल है जो कुछ दिनों में ठीक हो जाएगा. दस वर्ष बाद एक बार फिर आपसी रंजिश में मारे गए दो भारतीय सैनिकों की मौत के बाद भारतीय खबरिया चैनल ने जो भूमिका बांध रखी है उससे साफ है कि यह संक्रमण बदस्तूर जारी है. हां, बदलाव ये आया कि उस वक्त आज तक जैसे एक-दो चैनल थे जबकि आज उसके साथ कुछ और बड़े नाम (अंग्रेजी चैनलों के) जुड़ गए हैं!

भारतीय भाषाई मीडिया पाकिस्तान संबंधी खबरों को राज्य और सत्ता के नजरिए से विश्लेषित करती रही है. भाषाई पत्रकारिता पर राष्ट्रवादी भावनाओं को बेवजह उभारने का आरोप हमेशा लगता रहा है, जो एक हद तक सच भी है. पर अब अंग्रेजी पत्रकारिता खास तौर से खबरिया चैनलों की भाषा और उनके तेवर देख कर लगता है कि अब अंग्रेजी और वर्नाक्यूलर के बीच विभाजक रेखा धीरे-धीरे मिट रही है. 

जाहिर है कि सीमा रेखा पर किसी चैनल का कैमरा नहीं लगा है और संघर्ष के वक्त पत्रकार वहाँ नहीं थे. खबरें विश्वस्त सूत्रों से ही मिलती है, पर विश्लेषण करने को तो हमारे स्वनामधन्य पत्रकार-संपादक स्वतंत्र हैं! कुछ समय पहले नोम चोमस्की ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था कि पाकिस्तानी मीडिया भारतीय मीडिया से ज्यादा स्वतंत्र है और उन पर सत्ता का दवाब अपेक्षाकृत कम है. संभव है इसमें हमें अतिरंजना लगे, पर जिस तरह से पाकिस्तानी की मीडिया ने इस मसले पर रूख अख्तियार किया है उससे चोमस्की का कहना ठीक लगता है. भारतीय खबरिया चैनलों पर कुछ सत्ता का दवाब है, कुछ बाजार का और कुछ कूठमगज़ ऐसे हैं जो खबरों का विश्लेषण करने की जहमत मोल नहीं लेते. ना ही वे सच कहना चाहते हैं जिसे हम तक पहुँचाने का दावा वे 24 घंटे करते रहते हैं.

Thursday, January 03, 2013

उदास मौसम के खिलाफ


मुनीरका के बस स्टैंड पर हमने कई दफे बसों का इंतजार किया है, बरसों तक. जेएनयू में पढ़ने-पढ़ानेवालों के लिए यह बस स्टैंड रात-देर रात जैसे एक उम्मीद का प्रतीक  रहा है. वह रात पारा मेडिकल की उस छात्रा के लिए भी उम्मीदों से भरी रही होगी, जब वह अपने मित्र के साथ घर जाने के लिए वहाँ बस का इंतजार कर रही थी... 

वहाँ से महज कुछ सौ मीटर की दूरी पर जेएनयू है. कैंपस के अंदर स्त्रियों की आजादी और उनके संघर्ष के नारे हमेशा से बुलंद रहे हैं. लेकिन एक लंबे अरसे के बाद कैंपस के बाहर सड़कों पर छात्र इस लड़ाई को लेकर उतरे. धीरे-धीरे दिल्ली और फिर मीडिया के मार्फत पूरे देश में यह लड़ाई फैली. भारत में सौ वर्ष से भी ज्यादा पुराने स्त्री संघर्ष का इतिहास देश की राजनीतिक, सामाजिक, मजदूर और दलित आंदोलनों से जुड़ा रहा है और उससे जीवन शक्ति पाता रहा है. शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि एक छात्रा के साथ चलती बस में हुए जघन्य बलात्कार के खिलाफ रोष और आंदोलन में छात्रों ने अग्रणी भूमिका निभाई. बिना किसी राजनीतिक नेतृत्व के उन्होंने अपनी आवाज देश और देश के बाहर पहुँचाई. 

निस्संदेह मेनस्ट्रीम और न्यू मीडिया की इसमें भूमिका रेखांकित करने योग्य हैं. ऐसा नहीं है कि मीडिया में इससे पहले स्त्री विषयक खबरें नहीं होती थी. होती थीं, लेकिन उनमें एक किस्म की उदासीनता रहती थी. ज्यादातर खबरें खानापूर्ति के नाम पर ही अखबारों में या टेलीविजन चैनलों पर दिखाई जाती थी. लेकिन इस बार मीडिया ने कुछ अतिरेक को छोड़ कर संयम का परिचय दिया. इसे लगातार सुर्खियों में बनाए रखा और आलाकमानों से जवाब-तलब किया.

इन दिनों मुझे बार-बार एक वॉल पोस्टर की याद आती रही जो जेएनयू में पढ़ने के दौरान अक्सर देखा करता था: "अंधेरे कमरों और बंद दरवाजों के बाहर सड़क परजुलूस में और युद्ध में तुम्हारे होने के दिन आ गए हैं…"


बहरहाल, जेएनयू के छात्र और शिक्षक संघ ने मिल कर बलात्कारियों को सजा दिलाने और स्त्रियों के खिलाफ हिंसा के विरोध में  जाते साल की आखिरी रात एक जुलूस और विरोध कार्यक्रम का आह्वान किया था.

जेएनयू में मेरे गुरु प्रोफेसर वीर भारत तलवार ने नव वर्ष की पूर्व संध्या हमें खाने पर बुलाया था. पर दिन में उन्होंने फोन कर कहा कि 'मिठाई  या फल कुछ भी  लेके मत आना. हम बैठ कर बातें करेंगे और घर में जो भी चावल-दाल बना है, खाएँगें.

लेकिन केवल उनका मन दुखी नहीं था. पूरी दिल्ली की सड़कों पर नए साल के स्वागत का रौनक इस बार गायब थी. लोग गमगीन थे.

रात में जब जुलूस के लिए हम निकले तो जेएनयू की सड़कों पर चलते लड़के-लड़कियों की हुजूम को देख तलवार जी ने रीना को सुनाते हुए कहा- आज की रात लड़कियाँ अपने मित्रों, प्रेमियों को लेकर सड़कों पर उतरी है. यह संदेशा देने के लिए कि ये सड़क, दुनिया हमारी है और हम बेखौफ घूमेंगे!

बलात्कार की इस घटना ने समाज और मीडिया को एक साथ उद्वेलित किया है. भूमंडलीकरण के बाद समाज में जहाँ स्त्रियों के प्रति हिंसा बढ़ रही है, वहीं समाज का एक तबका स्त्रियों की दशा के प्रति ज्यादा मुखर और संवेदनशील हो रहा है. इसमें मीडिया, अपने अधिकारों को लेकर सचेत युवा पीढ़ी और नागरिक समाज (सिविल सोसाइटी) की खास भूमिका है.

साल के आखिरी उस उदास, सर्द रात में मुनीरका के खुले पार्क में छात्रों, शिक्षकों, नाटयकर्मियों, सांस्कृतिककर्मियों और आस-पड़ोस के लोगों की भीड़ से एक सरगर्मी थी. टेलीविजन चैनलों के ओबी वैन खड़े थे. रिपोर्टर अपने कैमरामैन के साथ इधर-उधर घूम रहे थे. 
 
हम लड़ेंगे साथी इस उदास मौसम के खिलाफ! उस रात यह नारा हवा में तैर रहा था. पाश ने लिखा है: हम लड़ेंगे/ कि लड़ें बगैर कुछ नहीं मिलता/ हम लड़ेंगे/ कि अब तक लड़ें क्यों नहीं/ अपनी सजा कबूलने कि लिए/ लड़ते हुए जो मर गए/ उनकी याद जिंदा रखने के लिए. 

अरावली की पहाड़ियों पर दिवंगत छात्रा की याद में जलती मोमबती अंधेरे में एक रौशनदान की तरह दिख रही थी. यह नई सुबह का आगाज था.

(जनसत्ता में समांतर स्तंके तहत 5 जनवरी 2013 को प्रकाशित)