Saturday, August 20, 2022

आजाद भारत में बॉलीवुड का सफर

युवा अर्थशास्त्री श्रयना भट्टाचार्य ने हाल में ही प्रकाशित किताब डिस्परेटली सीकिंग शाहरुखमें उदारीकरण के बाद भारतीय महिलाओं की जिंदगी, संघर्ष और ख्वाबों का लेखा-जोखा बेहद रोचक अंदाज में प्रस्तुत किया है. खास बात यह है कि इस किताब में देश के विभिन्न भागों और वर्गों की महिलाओं की जिंदगी में साझेदारी फिल्म अभिनेता शाहरुख खान को लेकर बनती है, जो उनकी फैंटेसीऔर आजादीको पंख देता है.

इस बात पर शायद ही किसी को असहमति हो कि आजाद भारत में बॉलीवुड ने देश को एक सूत्र में बांधे रखने में एक प्रमुख भूमिका निभाई है. भले बॉलीवुड के केंद्र में मनोरंजन और स्टारका तत्व हो, पर ऐसा नहीं कि आजादी के 75 वर्षों में सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ से इसने नजरें चुराई हैं. खासकर, पिछले दशकों में तकनीक और बदलते बाजार ने इसे नए विषय-वस्तुओं को टटोलने, संवेदनशीलता के प्रस्तुत करने और प्रयोग करने को प्रेरित किया है-स्त्री स्वतंत्रता का सवाल हो या समलैंगिकता का!

आधुनिक समय में सिनेमा हमारे सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न हिस्सा है. किसी भी कला से ज्यादा सिनेमा का प्रभाव एक बहुत बड़े समुदाय पर पड़ता है. आजादी के तुरंत बाद से सरकार ने देश में सिनेमा के प्रचार-प्रसार में रुचि ली. वर्ष 1949 में सिनेमा उद्योग की वस्तुस्थिति की समीक्षा के लिए फिल्म इंक्वायरी कमेटीका गठन किया गया था. इस समिति ने सिनेमा के विकास के लिए सुझाव दिए थे. इसी के सुझाव के आधार पर फिल्म फाइनेंस कॉरपोरेशन’, जो बाद में नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशनके नाम से जाना गया, का गठन 1960 में किया गया. साथ ही सिनेमा के शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए पुणे में फिल्म संस्थान (1960) की स्थापना हुई. क्या यह आश्चर्य नहीं कि बॉलीवुड की मुख्यधारा धारा से इतर भारत में जो समांतर सिनेमा (न्यू वेब सिनेमा) की शुरुआत हुई उसमें इन सरकारी संस्थानों की बड़ी भूमिका रही है!

तत्कालीन पीएम नेहरू देश-दुनिया के सामने सिनेमा के माध्यम से एक स्वतंत्र राष्ट्र की ऐसी छवि प्रस्तुत करना चाह रहे थे जो किसी महाशक्ति के दबदबे में नहीं है. वर्ष 1952 में देश के चार महानगरों में किए गए पहला अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहके आयोजन को हम इस कड़ी के रूप में देख-परख सकते हैं. साथ ही देश के फिल्मकारों और सिनेमा प्रेमियों को विश्व सिनेमा की कला से परिचय और विचार-विमर्श का एक मंच उपलब्ध कराना भी उद्देश्य था. वे सिनेमा के कूटनीतिक महत्व से परिचित थे. तभी से सांस्कृतिक शिष्टमंडलों में बॉलीवुड के कलाकारों को शामिल किया जाता रहा है.

पचास और साठ के दशक की रोमांटिक फिल्मों में आधुनिकता के साथ-साथ राष्ट्र-निर्माण के सपनों की अभिव्यक्ति मिलती है. फिल्मों पर नेहरू के विचारों की स्पष्ट छाप है. दिलीप कुमार इसके प्रतिनिधि स्टार-अभिनेता के तौर पर उभरते हैं. हालांकि राज कपूर, देवानंद, गुरुदत्त जैसे अभिनेताओं की एक विशिष्ट पहचान थी.

सत्तर-अस्सी के दशक में अमिताभ बच्चन की सिनेमा-यात्रा देश में नक्सलबाड़ी आंदोलनकी पृष्ठभूमि से होते हुए युवाओं के मोहभंग, आक्रोश और भ्रष्टाचार को अभिव्यक्त करता है. हालांकि इसी दशक में देश-दुनिया में भारतीय समांतर सिनेमा की धूम रही. बॉलीवुड में शुरुआत से ही पॉपुलरके साथ-साथ गाहे-बगाहे पैरेललकी धारा बह रही थी, पर इन दशकों में पुणे फिल्म संस्थान से प्रशिक्षित युवा निर्देशकों, तकनीशियनों के साथ-साथ नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, शबाना आज़मी, स्मिता पाटील जैसे कलाकार उभरे. सिनेमा सामाजिक यथार्थ को बेहतर ढंग से अभिव्यक्त करने लगा. हम कह सकते हैं कि समांतर सिनेमा का सफर 21वीं सदी में भी जारी है, भले स्वरूप में अंतर हो.

नब्बे के दशक में उदारीकरण (1991) और भूमंडलीकरण के बाद देश में जो सामाजिक-आर्थिक बदलाव हुए उसे शाहरुख, सलमान, आमिर खान, अक्षय कुमार, अजय देवगन की फिल्मों ने पिछले तीन दशकों में प्रमुखता से स्वर दिया हैं. अमिताभ बच्चन भी नए रूप में मौजूद हैं. यकीनन, बॉलीवुड मनोरंजन के साथ-साथ समाज को देखने की एक दृष्टि भी देता है.

कोई भी कला समकालीन समय और समाज से कटी नहीं होती है. हिंदी सिनेमा में भी आज राष्ट्रवादी भावनाएं खूब सुनाई दे रही है. आजादी के तुरंत बाद बनी फिल्मों में भी राष्ट्रवाद का स्वर था, हालांकि तब के दौर का राष्ट्रवाद और आज के दौर में जिस रूप में हम राष्ट्रवादी विमर्शों को देखते-सुनते हैं उसके स्वरूप में पर्याप्त अंतर है. यह एक अलग विमर्श का विषय है.

उदारीकरण के बाद भारत आर्थिक रूप से दुनिया में शक्ति का एक केंद्र बन कर उभरा है, लेकिन जब हम सांस्कृतिक शक्ति (सॉफ्ट पॉवर) की बात करते हैं तब बॉलीवुड ही जेहन में आता है. आजाद भारत में यह बॉलीवुड के सफर की सफलता है.

(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)

Friday, August 19, 2022

शहरनामा-झंझारपुर



जिले की चाह लिए एक कस्बा

गाँवों से घिरा झंझारपुर एक कस्बा हैजो शहर होना चाहता है. बिहार के मधुबनी जिले के इस सब डिवीजन के अंदर जिला बनने की ख्वाहिश कई दशक से है. जैसा कि छोटे कस्बों में रहने वालों की चाह होती हैस्कूल से पढ़-लिखकर हर कोई दरभंगा-दिल्ली की रेलगाड़ी पकड़ना चाहता है. अब तो दरभंगा में हवाईअड्डा भी है! क्या यह शहर हैयह सवाल बहुत बाद में हमारे मन में आयाजब हमने शहरों को देखा और वहीं के होकर रह गए. लेकिन हमारे बचपन का तो यही पहला शहर है. यहाँ थाना हैबाजार हैकोर्ट--कॉलेज हैस्टेडियम भी है. हांयहां के बांस टॉकीज’ में ही हमने पहली फिल्म देखी. माँ भी कहती है कि मैथिली की पहली फिल्म कन्यादान’ उन्होंने वर्ष 1972-73 में बांस टॉकीज में ही देखी थी.

जिसके आंगन बहती है नदी

झंझारपुर के आंगन में नदी बहती है. असल में कमला और बलान नदियों के तट पर बसा यह शहर राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण रहा है. यह लोकसभा क्षेत्र भी है जहाँ से चुनकर देवेंद्र यादव जैसे सांसद केंद्र सरकार में मंत्री बने. पर बिहार के राजनीतिक इतिहास में यह पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र की वजह से जाना जाता हैजो झंझारपुर विधानसभा से चुन कर बिहार के मुख्यमंत्री बनते रहे. लंगड़ा चौक पर बैठ कर राष्ट्रीय जनता दल के नेताप्रोफेसर रामदेव भंडारी को अखबार बांचते हमने देखा और बाद में राज्यसभा में भी. यहीं हमने राजीव गाँधीचंद्रशेखरवी पी सिंह और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता को देखा-सुना. दादी के मुँह से लाट साहबों से किस्से सुने.  भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वर्ष 1942 में झंझारपुर स्थित थाने को घेरने-जलाने की बात भी मैंने स्वतंत्रता सेनानियों के मुँह से सुनी है. किसी इतिहासकार को इस शहर के राजनीतिक इतिहास को पंक्तिबद्ध करनी चाहिए.

सांस्कृतिक एकता का पुल

बीसवीं सदी की शुरुआत में कमला-बलान नदी पर करीब दो सौ बीस फीट लंबा रेल बिज्र बना कर अंग्रेजों ने झंझारपुर को अन्य शहरों से जोड़ा था. 1970 के दशक की शुरुआत में इस पुल को रेल-सह-सड़क में तब्दील कर दिया गया, जो दशकों तक लोगों के लिए कौतुक का केंद्र बना रहा. ट्रैफिक के कारण और बाढ़ के दिनों में यह अक्सर परेशानी का सबब भी रहा. अब यह पुल इतिहास के पन्नों में है. पिछले दिनों इसी पुल के समांतर रेलवे ने एक ब्रिज तैयार कर दिया. वैसे दस-बारह साल पहले ही राष्ट्रीय राजमार्ग 57 ने इस ‘अजीबोगरीब पुल’ की अहमियत कम कर दी थी. कोसी के किनारे बसे शहर अब कमला-बलान के करीब आ गए हैं. रेलमार्ग और राजमार्ग मिथिला की सांस्कृतिक एकता के पुल हैजो शहर के कारोबारियों के लिए भी नए अवसर लेकर आया है.

कला पारखी की तलाश में

मधुबनी मिथिला पेंटिंग का दूसरा नाम है, हालांकि यह नाम मिथिला पेंटिंग के साथ न्याय नहीं करता. झंझारपुर के आस-पड़ोस के लगभग हर गाँव में मिथिला पेंटिंग होती है. दरभंगा-मधुबनी से दूरी होने की वजह से कलाकारों की पहुँच सत्ता केंद्रों तक नहीं हो पाती है. मधुबनी जिले के रांटी’ और जितवारपुर’  गांव राष्ट्रीय पटल पर छा गएझंझारपुर के गाँव उसी तरह कला पारखियों के इंतजार में हैं. क्या पता कोई सीता देवीगंगा देवीदुलारी देवी भविष्य के गर्भ में छिपी हो?

मिथिला के इतिहासकार राधाकृष्ण चौधरी ने लिखा है कि झंझारपुर के बने कांस्य-पीतल के बर्तनों की मांग दक्षिणी राज्यों में थी. आज भी बाजार में कुशल कारीगर मौजूद हैंलेकिन वस्तुओं की मांग नहीं है. बाजार में गहमागहमी रहती हैपर वह रौनक नहीं जो तीन दशक पहले तक थी. कई मारवाड़ी उद्यमी शहर छोड़ कर दिल्लीसूरतमुंबई जा बसे हैं.

बेलारही का पुस्तकालय

शहरी क्षेत्र से सटे गांव बेलारही में 85 साल पुराना एक पुस्तकालय है, मिथिला मातृ-मंदिर. पिछले दिनों इसे सांसद-विधायक विकास निधि से किताबों की आमद हुई है. शहर में एक भी पुस्तकालय न होना अखरता है, जबकि ललित नारायण जनता कॉलेज करीब साठ साल पुराना है. केजरीवाल और टेवरीवाल हाईस्कूल से निकले पुराने छात्र पूरे देश में मौजूद हैंलेकिन अपनी मातृ संस्था की सुध किसे है! कहते हैं प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर डी एन झा ने अपनी नौकरी की शुरुआत झंझारपुर से ही की थी. यशवंत सिन्हा ने भारतीय प्रशासनिक सेवा के दौरान अपना पहला प्रशिक्षण नजदीक के 'सिमरा' गाँव के निवासी आइएएस भागीरथ लाल दास के साथ किया था. शांति स्वरूप भटनागर सम्मान से सम्मानित गणितज्ञ अमलेंदु कृष्ण भी इसी जगह से ताल्लुक रखते हैं.

कोई भी बन जाए भोजन भट्ट

मिथिला अपनी सांस्कृतिक विशिष्टता की वजह से पूरी दुनिया में जाना जाता है. शहर में ‘पग-पग पोखर माछ मखान’ है. तरह-तरह की मछलीकिस्म-किस्म के चावलचूड़ासाग-सब्जीआम के विभिन्न प्रकार किसी को भी भोजन भट्ट’ बनाने के लिए पर्याप्त हैं. अब स्ट्रीट फूड- मुरहीचूड़ाकचरीचप के साथ-साथ चाउमीन और चाट भी नुक्कड़-चौराहे पर मिलने लगे हैं.

आस-पड़ोस के लोग शहर छोड़कर महानगरों में जा बसे हैंलेकिन वे शादी-ब्याहछठ आदि में गामक घर’ देखने जरूर आते हैं. यदि यहाँ स्वास्थ्य सुविधा बहाल हो जाए तो आने वाले सालों में लोग वापस अपनी जड़ों की ओर लौटेंगे और अपने अनुभव से इस शहर को संवृद्ध करेंगे. यूं एक मेडिकल कॉलेज का निर्माण कार्य जोर-शोर से चल रहा है.

{आउटलुक (5 सितंबर 2022)}

Sunday, August 07, 2022

अमृत महोत्सव में आलोचक की याद


हिंदी के आलोचक और झारखंड के चर्चित बुद्धिजीवी वीर भारत तलवार अपने पचहत्तरवें वर्ष में हैं. लोकतंत्र में आलोचना को केंद्रीयता हासिल है, ऐसे में आजादी के अमृत महोत्सव में उनके कृतित्व और व्यक्तित्व को याद करना जरूरी है. तलवार जैसा जीवन बहुत कम बौद्धिकों को नसीब होता है. जमशेदपुर में जन्मे, सत्तर के दशक में उन्होंने धनबाद के कोयला-खदान के मजदूरों और राँची-सिंहभूम के आदिवासियों के बीच काम किया. झारखंड राज्य आंदोलन में अग्रणी पंक्ति में रहे. फिर अस्सी के दशक में दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर नामवर सिंह के निर्देशन में प्रेमचंद के साहित्य पर शोध किया और वहीं भारतीय भाषा केंद्र में छात्रों के चहेते शिक्षक भी बने. उन्होंने हिंदी नवजागरण को आधार बना कर ‘रस्साकशी’ जैसी मौलिक शोध पुस्तक की रचना की और हिंदी नवजागरण को प्रश्नांकित किया है. वे इसे ‘हिंदी आंदोलन’ कहने के हिमायती हैं क्योंकि इसका ‘यही लक्ष्य था’.
देश में 19वीं सदी का नवजागरण उनकी चिंता के केंद्र में रहा है. उन्होंने ‘हिंदू नवजागरण की विचारधारा’ में लिखा है: ‘अपनी परंपरा, धर्म, रीति-रिवाजों और सामाजिक संस्थाओं को आलोचनात्मक दृष्टि से देखना, उन्हें बुद्धि-विवेक की कसौटी पर जांच कर ठुकराना या अपने समय के मुताबिक सुधारना हर नवजागरण -चाहे वह यूरोपीय हो या भारतीय- की सबसे केंद्रीय विशेषता रही है.’ उनके शोध को पढ़ कर हम समकालीन सांस्कृतिक और राजनीतिक समस्याओं को नए परिप्रेक्ष्य में देखने लगते हैं. तलवार की रचनाओं में शोध और आलोचना का दुर्लभ संयोग मिलता है. इस लिहाज से उनकी किताब ‘सामना’ खास तौर पर उल्लेखनीय है. इस किताब में शामिल ‘निर्मल वर्मा की कहानियों का सौंदर्यशास्त्र और समाजशास्त्र’ अपनी पठनीयता और आलोचनात्मक दृष्टि की वजह से काफी चर्चित रहा है. उनकी आलोचना भाषा सहजता और संप्रेषणीयता की वजह से अलग से पहचान में आ जाती है. यहाँ बौद्धिकता का आतंक या दर्शन की बघार नहीं दिखती. अकारण नहीं कि उनके लिखे राजनीतिक पैम्फलेट भी काफी चर्चित रहे हैं.
वाम आंदोलन के दिनों में तलवार ने फिलहाल (1972-74) नाम से जो राजनीतिक पत्र का संपादन किया उसका ऐतिहासिक महत्व है. इसके चुने हुए लेख ‘नक्सलबाड़ी के दौर में’ किताब में संग्रहित हैं. इसी तरह उन्होंने ‘झारखंड वार्ता’ और ‘शालपत्र’ का भी संपादन किया. ‘झारखंड के आदिवासियों के बीच एक एक्टिविस्ट के नोट्स’ में उनके अनुभव संकलित हैं. इस किताब को उनके ‘झारखंड में मेरे समकालीन किताब’ के साथ रख कर पढ़ना चाहिए. खास तौर पर इस किताब में संकलित रामदयाल मुंडा पर लिखा उनका विश्लेषणात्मक निबंध उल्लेखनीय है.
जेएनयू में उनके जैसा शिक्षक और गाइड बहुत कम थे. शोध के प्रसंग में अक्सर मंत्र की तरह कहा करते थे- ‘ढूंढ़ो, खोजो, पता लगाओ’. जब भी उनसे बातचीत होती है वे सबसे पहले पूछते हैं: अच्छा, आज कल क्या लिख-पढ़ रहे हो.’ सिनेमा से तलवार जी का काफी लगाव है. उनका ‘सेवासदन पर फिल्म: राष्ट्रीय आंदोलन का एक और पक्ष’ लेख (राष्ट्रीय नवजागरण और साहित्य) एक साथ कई विषयों को समेटे है. ‘सेवासदन’ फिल्म (1934) के बहाने स्वाधीनता आंदोलन के दौरान उठे सांस्कृतिक आंदोलन और उसकी असफलता को वे रेखांकित करते हैं. वे सवाल उठाते हैं कि इन वर्षों में हिंदी फिल्में क्यों हिंदी जगत की संस्कृति और परंपराओं से दूर रही?

Wednesday, August 03, 2022

अमृतकाल में जनता के कवि आलोकधन्वा


हिंदी के चर्चित और विशिष्ट कवि आलोकधन्वा जीवन के 75वें वर्ष में हैं. कम ऐसे रचनाकार हुए हैं जिन्होंने बहुत कम लिख कर पाठकों की बीच इस कदर मकबूलियत पाई हो. पचास वर्षों से आलोकधन्वा रचनाकर्म में लिप्त हैंपर अभी तक महज एक कविता संग्रह- दुनिया रोज बनती हैप्रकाशित है. सच तो यह है कि इस किताब को छपे भी करीब पच्चीस साल हो गए.

वर्ष 1972 में फिलहाल और वाम पत्रिका में उनकी कविता गोली दागो पोस्टर’ और जनता का आदमी प्रकाशित हुई थी. राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर आधारित फिलहाल पत्रिका खुद वर्ष 1972 में ही प्रकाश में आई थी. इस पत्रिका के संपादक वीर भारत तलवार थेजो उन दिनों पटना में रह कर वाम आंदोलन से जुड़े एक्टिविस्ट थे. उनकी कविता की भाषा-शैलीआक्रामकता और तेवर को लोगों ने तुरंत नोटिस कर लिया था. 70 का दशक देश और दुनिया में राजनीतिक उथल-पुथल का दौर था.

आजादी के बीस साल बाद देश में नक्सलबाड़ी आंदोलन की गूंज उठी थी. युवाओं में सत्ता और व्यवस्था के प्रति जबरदस्त आक्रोश था. साथ ही सत्ता का दमन भी चरम पर था. सिनेमा में इसकी अभिव्यक्ति मृणाल सेन अपनी कलकत्ता त्रयी फिल्मों में कर रहे थे. भारतीय भाषाओं के साहित्य में नक्सलबाड़ी आंदोलन की अनुगूंज पहुँच रही थी. आलोकधन्वापाश (पंजाबी), वरवर राव (तेलुगू) जैसे कवि अपनी धारदार लेखनी से युवाओं का स्वर बन रहे थे. वीर भारत तलवार ने अपनी किताब नक्सलबाड़ी के दौर में लिखा है: ‘आलोक की कविता में बेचैनी भरी संवेदनशीलता के साथ प्रतिरोध भाव और आक्रामक मुद्रा होती थी. वाणी में ओजस्वितारूप विधान में कुछ भव्यता और शैली में कुछ नाटकीयता होती थी.’ गोली दागो पोस्टर में वे लिखते हैं:

यह कविता नहीं है

यह गोली दागने की समझ है

जो तमाम क़लम चलानेवालों को

तमाम हल चलानेवालों से मिल रही है.

इसी कम्र में भागी हुई लड़कियाँ’, ‘ब्रूनो की बेटियाँ’, ‘कपड़े के जूते जैसी उनकी कविताएँ काफी चर्चित हुई थी. भागी हुई लड़कियाँ कविता सामंती समाज में प्रेम जैसे कोमल भाव को अपनी पूरी विद्रूपता के साथ उजागर करती है.

आलोकधन्वा की कविताओं में एक तरफ स्पष्ट राजनीतिक स्वर हैजो काफी मुखर है, वहीं प्रेमकरुणास्मृति जैसे भाव हैं जो उनकी कविताओं को जड़ों से जोड़ती हैं. महज चार पंक्तियों की रेल शीर्षक कविता में हर प्रवासी मन की पीड़ा है. एक नॉस्टेलजिया हैजड़ों की ओर लौटने की चाह है:

हर भले आदमी की एक रेल होती है

जो माँ के घर की ओर जाती है

सीटी बजाती हुई

धुआँ उड़ाती हुई.

इसी तरह एक और उनकी रचना हैएक जमाने की कविता. आलोकधन्वा ने लिखा है:

माँ जब भी नयी साड़ी पहनती

गुनगुनाती रहती

हम माँ को तंग करते

उसे दुल्हन कहते

माँ तंग नहीं होती

बल्कि नया गुड़ देती

गुड़ में मूँगफली के दाने भी होते.

एक ज़माने की कविता’ पढ़ते हुए मैं अक्सर भावुक हो जाता हूँ. एक बार मैंने उनसे पूछा था क्या लिखते हुए आप भी भावुक हुए थेउन्होंने कहा- "स्वाभाविक है. कविता अंदर से आती है. मेरी माँ 1995 में चली गई थीजिसके बाद मैंने यह कविता लिखी. अब माँ तो सिर्फ एक मेरी ही नहीं है. भावुकता स्वाभाविक है.

फिर मैंने पूछा कि क्या यह नॉस्टेलजिया नहीं हैतब उन्होंने जवाब दिया कि नहींयह महज नॉस्टेलजिया नहीं है. आलोकधन्वा ने कहा कि जो आदमी माँ से नहीं जुड़ा हैअपने नेटिव से नहीं जुड़ा है वह इसे महसूस नहीं कर सकता है. वह इस संवेदना को नहीं समझ सकता है. अपने नेटिव से जुड़ाव हर बड़े कवि के यहाँ मिलता है. चाहे वह विद्यापति होरिल्के हो या नेरुदा.

आलोकधन्वा की कविता में जीवन का राग हैलेकिन यह राग उनके जीवन के अमृत काल में भी विडंबना बोध के साथ उजागर होता है. हाल ही में साहित्य वार्षिकी (इंडिया टुडे) पत्रिका में छपी उनकी ये पंक्तियाँ इसी ओर इशारा करती है:

अगर भारत का विभाजन नहीं होता

तो हम बेहतर कवि होते

बार-बार बारुद से झुलसते कत्लगाहों को पार करते हुए

हम विडंबनाओं के कवि बनकर रह गए.

देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है. आजादी के साथ देश विभाजन की विभीषिका लिपटी हुई चली आई थीउस त्रासदी का दंश आज भी कवि भोग रहा है.

आलोकधन्वा कविता पाठ करते हुए अक्सर इसरार करते हैं कि ताली मत बजाइएगा’. उनकी कविताएँ मेहनतकश जनता की कविताएँ हैं, यहाँ जीवनसंघर्ष और प्रतिरोध समानार्थक हैं.

(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)

Sunday, July 24, 2022

नदी के लहरों में जीवन संघर्ष

 
कोरोना महामारी की मार सबसे ज्यादा प्रदर्शनकारी कला पर पड़ी है. पहली और दूसरी लहर के दौरान नाट्यकर्मियों की सुध लेने वाला कोई नहीं था, ये दर्शकों से दूर थे. सुखद है कि उस दौर को पीछे छोड़ते हुए एक बार फिर से नाट्यकर्मी दर्शकों से आमने-सामने जुड़ रहे हैं. पिछले दिनों दो साल के बाद दिल्ली में महिंद्रा एक्सीलेंस इन थिएटर अवार्ड्स एंड फेस्टिवल- (मेटा) का आयोजन किया गया.

इसमें हिंदी, असमिया, मलयालम, बांग्ला के चार नाटकों का मंचन किया गया, जिसे मेटा 2020 में पुरस्कृत किया गया था. सबसे ज्यादा चर्चा साहिदुल हक निर्देशित ‘द ओल्ड मैन’ नाटक की हुई. यह नाटक अर्नेस्ट हेमिंग्वे की प्रसिद्ध कृति ‘द ओल्ड मैन एंड द सी’ पर आधारित है, पर इसकी भावभूमि ब्रह्मपुत्र नदी है और भाषा असमिया है. हेमिंग्वे के मुख्य पात्र सेंटियागो की तरह ही इस नाटक में एक बूढ़ा, वोदाई, बिना कोई मछली पकड़े लगातार 84 दिनों तक नदी से खाली हाथ लौटता है. निराशा और अवसाद के साथ-साथ उसे सामाजिक उपेक्षा भी झेलनी पड़ती है. युवा रोंगमोन को उसके पास नहीं जाने की सलाह दी जाती है. एक तरह से लोग उसे अपशकुन की तरह देखते हैं. पर वोदाई जिजीविषा और संघर्ष से अपनी परिस्थिति पर विजय पाता है.
यह नाटक जहाँ मानवीय भावों के इर्द-गिर्द बुना गया है, वहीँ एक बड़े सवाल जो प्रकृति और मानवीय रिश्तों से से जुड़ा हुआ उसे अपने घेरे में लेता है. इस समय असम में बाढ़ से लाखों लोग बेघर हुए हैं और जान-माल का काफी नुकसान हुआ है. सच तो यह है कि यह तबाही हर साल आती है. जो अपनी जीविका के लिए नदी पर निर्भर हैं, वे नदीपुत्र कैसे जीवन-बसर करते हैं, किस तरह झंझावतों से लड़ते हैं? वोदाई प्रकृति और मानव के बीच संघर्ष का प्रतिनिधित्व करता है. हाल के वर्षों में मुख्यधारा के मीडिया में भले पर्यावरण की चिंता देखने-सुनने को मिल रही हो, पर सिनेमा-नाटक में अभी भी यह विषय अपवाद स्वरूप ही दिखाई देते हैं. ऐसे में 'द ओल्ड मैन’ नाटक अपने विषय-वस्तु की वजह से अलग से रेखांकित किए जाने योग्य है.
इस नाटक की भाषा असमिया है, लेकिन निर्देशक ने रंगयुक्ति के बल पर वाचिक पक्ष को गौण कर दिया और यहाँ आंगिक पक्ष प्रधान है. साथ ही प्रकाश संयोजन इस नाटक का एक सशक्त पक्ष है. नदी में आई बाढ़ की विकरालता, लहरों में फंसे नाव को बिंब और ध्वनि के मेल से बेहद कौशल से निर्देशक ने मंच पर जीवंत किया है. अनायास नहीं कि नाटक देखते हुए सिनेमाई तत्वों का ख्याल मन में आता रहता है, जबकि यहाँ किसी कैमरे या यंत्र की कोई भूमिका नहीं थी. निरंजन नाथ वोदाई की भूमिका में प्रभावी थे. मंच पर साज-सज्जा बेहद सीमित था. एक छोटा सा नाव उनके लिए जीवन-यापन का साधन और घर भी है. असल में नाव अपना रूप बदलता रहता है. साहिदुल कहते हैं कि ‘द ओल्ड मैन’ में वोदाई और रोंगमोन में अपने पिता और खुद को देखते हैं. मूलत: असम से ताल्लुक रखने वाले साहिदुल की ‘बबल्स इन द रिवर’ नाटक भी काफी चर्चित रहा है.

Friday, July 22, 2022

‘पापुलर’ के रास्ते पर आगे बढ़ती दक्षिण भारतीय फिल्में

आज पापुलर मीडिया में दक्षिण भारतीय सिनेमा की चर्चा हर तरफ है. कहा तो यह भी जा रहा है कि दक्षिण की तरफ से आ रही इस तेज बयार में कहीं बॉलीवुड बिखर न जाए. वैसे हाल के वर्षों में बाहुबलीपुष्पाआरआरआरकेजीएफ जैसी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर जो धूम मचाई है और हिंदी क्षेत्र में अल्लू अर्जुनरश्मिका मंदानाएनटीआर जूनियरसाई पल्लवी जैसे कलाकारों की जो लोकप्रियता हैवह आश्चर्यचकित करता है. इन फिल्मों को अखिल भारतीय (पैन इंडियन) सिनेमा कहा जा रहा है. इस बात से किसी को इंकार भी नहीं कि जिस तरह पुष्पाद राइज ने लटके-झटकेचरित्र-चित्रण, एक्शनगानों और संवाद से लोगों का मनोरंजन कियाइस फिल्म के दूसरे भाग का दर्शक बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं.

पर क्या भारतीय सिनेमा के सौ वर्षों के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है कि क्षेत्रीय और तेलुगुतमिलकन्नड़मलयालम के भाषाई इलाके से बाहर निकल कर ये फिल्में राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियाँ बटोर रही हैं पिछले दिनों जब मैंने कन्नड़ सिनेमा के राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित निर्देशक गिरीश कसारावल्ली से एक बातचीत के दौरान यही सवाल किया तो उनका कहना था कि यह सही है कि इन फिल्मों ने सबका ध्यान दक्षिण भारतीय सिनेमा की तरफ खींचा है और दर्शकों से बड़ी मान्यता पाई है. लेकिन दक्षिण भारतीय सिनेमा बहुत पहले से लोगों का ध्यान खींचता आ रहा है. यह कोई हाल की बात नहीं हैअडूर गोपालकृष्णन की बात हो या पट्टाभिरामा रेड्डी की संस्कार (1970)बीवी कारांत की चोमाना डुडी (1975) की. अन्य फिल्मों को भी उनकी सामग्री और कला के लिए अखिल भारतीय पहचान मिली थी. चूंकि इन फिल्मों को कभी बहुत बड़े स्तर पर रिलीज नहीं किया गयाइसलिए उन्हें दर्शकों से इतनी मान्यता नहीं मिलीजितनी आज की फिल्मों को मिल रही है. पिछली सदी के  सत्तर-अस्सी के दशक में खुद कसारावल्ली की घाटश्रद्धा (1977), तबराना कथे (1986) जैसी फिल्मों ने कन्नड़ सिनेमा को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्थापित किया था. पर अडूरशाजी करुण या कसारावल्ली की फिल्में पापुलर सिनेमा के फ्रेम में नहीं बनाई गई थी. ये फिल्में कला या समांतर सिनेमा के दौर में बनी जिसकी पहुँच एक खास दर्शक वर्ग तक सीमित रही. आज भी हिंदी भाषा में इनकी फिल्में बमुश्किल मिलती हैजबकि दक्षिण भारतीय भाषाओं में बनी जिन फिल्मों की आज चर्चा हो रही हैवे हिंदी भाषा में भी साथ-साथ डब की गई. इन्हें इंटरनेट और ओटीटी प्लेटफॉर्म का भी सहयोग मिला है.

बहरहालपिछली सदी में जब तकनीक और मीडिया का विस्फोट नहीं हुआ था तब भी एनटी रामाराव और एम जी रामचंद्रन जैसे अभिनेता-राजनेता की लोकप्रियता अखिल भारतीय स्तर पर थी. प्रसंगवश तेलुगु सिनेमा के प्रसिद्ध अभिनेता एनटीआर की इस साल जन्मशती मनाई जा रही है, जहाँ उनके सिनेमा और राजनीतिक जीवन को प्रमुखता से याद किया जा रहा है. उल्लेखनीय है कि सत्तर साल पहलेवर्ष 1952 में जब भारत के चार महानगरों में पहला अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह का आयोजन किया गया (यह एशिया का भी पहला अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव था) तब इसमें राज कपूर की फिल्म आवाराके साथ एनटी रामाराव अभिनीत पाताल भैरवी (तेलुगू)वी शांताराम की अमर भूपाली (मराठी)और अग्रदूत की बाबला (बांग्ला)दिखाई गई थी. इसी तरह रजनीकांतकमल हासनचिरंजीवीममूटी जैसे अभिनेता और मणि रत्नम जैसे निर्देशक हिंदी दर्शकों के दिलों पर राज करते रहे हैं. यह बॉलीवुड का दुर्भाग्य है कि वह इन कलाकारों की प्रतिभा का समुचित इस्तेमाल नहीं कर पाया. यहाँ जोड़ना उचित है कि मणि रत्नम की फिल्में जैसेनायकन (1987)रोजा (1992)बाम्बे (1995) अखिल भारतीय स्तर पर काफी सफल रही थी.

गिरीश कसारावल्ली हालांकि कहते हैं कि व्यक्तिगत तौर पर मुझे इन फिल्मों की सामग्री और कला पक्ष को लेकर चिंता है. इन्हें व्यापक स्तर पर दर्शकों की मान्यता मिलती है और ये बॉक्स ऑफिस पर भी सफल हैंलेकिन ना तो आपको और ना ही मुझे इससे फायदा होता है. अगर सौंदर्यशास्त्र के नजरिए से कोई फिल्म अच्छी तरह गढ़ी गई है और कुछ सामाजिक मुद्दों को संबोधित करती है (जिन्हें नज़रंदाज किया जा रहा है)तभी मुझे लगता है कि हमें उससे कुछ हासिल होगा.’ ऐसा भी नहीं कि दक्षिण भारतीय सिनेमा पापुलर फ्रेम में ही अवस्थित है. मलयालम में बनी जलीकट्टू’, द ग्रेट इंडियन किचेन तमिल में बनी काला’, ‘ जय भीम और हाल ही में तेलुगु में रिलीज हुई विराट पर्वम’ जैसी फिल्में उदाहरण है कि कलात्मकता और सामाजिक यथार्थ का संयोजन एक साथ संभव है.

पर क्या यह सच नहीं कि दशकों से दर्शक बॉलीवुड की फिल्मों की तरफ इसलिए भागते रहे हैं कि उन्हें रोजमर्रा की कश्मकश और दौड़-भाग से छुटकारा मिले और उनका मनोरंजन हो. पुष्पा क्या हमें बॉलीवुड के 70 और 80 के दशक में बनी व्यावसायिक फिल्मों की याद नहीं दिलाताऐसे में पापुलर’ के रास्ते, तकनीक के सहयोग से आगे बढ़ती हुई ये फिल्में यदि सफल हो रही है तो आश्चर्य कैसा

(नेटवर्क 18 हिंदी के लिए)

Sunday, July 10, 2022

विविध समुदायों के बीच मेल-जोल


पिछले दिनों दिल्ली में सफदर हाशमी मेमोरियल ट्रस्ट (सहमत) के एक कार्यक्रम में चर्चित गायिका शुभा मुद्गल ने जब ‘गजब ढा गयो तोरे नैना मुरारी/ मैं खो अपनी सुध-बुध दिल-ओ-जान हारी’ गजल गाया, तब वह यह जोड़ना नहीं भूली थी कि इसके लेखक अब्दुल हादी ‘काविश’ हैं. यह कार्यक्रम आजादी के पचहत्तरवें वर्षगांठ के तहत आयोजित किया गया जिसमें करीब दो सौ कलाकारों, कवियों, फोटोग्राफरों की एक प्रदर्शनी ‘हम सब सहमत’ नाम से जवाहर भवन में लगी है.

आज देश में जैसा माहौल है लोग सामाजिक सद्भाव, साहित्य या हिंदुस्तानी संगीत की उस परंपरा को याद नहीं करते, जहाँ पर हिंदू-मुस्लिम का राजनीतिक विभाजन मिट जाता है. विविधता में एकता भारतीय संस्कृति का ऐसा पहलू है जिस पर बहुत कम बातचीत होती है. सहिष्णुता की भावना इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है.
याद आया कि मिथिला के कर्ण कायस्थों में आषाढ़ के महीने में कुल देवता धर्मराज की पूजा की परंपरा रही है, जिसमें बच्चों का मुंडन संस्कार भी करवाया जाता है. इस पूजा में अनेक देवी-देवताओं का आह्वान होता है. ध्यान देने की बात है कि यहाँ पैगंबर हजरत मोहम्मद और मूसा की भी पूजा होती है. यह बात आज भले लोगों को आश्चर्य लगे पर परंपरा के रूप में यह सैकड़ों वर्षों से जारी है. जैसा कि सब जानते हैं कायस्थ कोर्ट-कचहरी में मुस्लिम शासकों के साथ रहते आए हैं, फारसी-उर्दू भी सीखते रहे. खान-पान, पहनावे के साथ-साथ धर्म और संस्कृति का इससे मेल-जोल हुआ. पूजा के अंत में यह विनती पढ़ी जाती है: हजरत छी हजार छी, पहुमीपुर पाटल छी. ओतय दीअ पीठ, अतय दीअ दृष्टि. बार-बार गुनाह माफ करब.”
शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में बिहार में कायस्थों का काफी योगदान रहा है. कहा जाता है कि कर्ण कायस्थों के पूर्वज सैकड़ों वर्ष पहले दक्षिण राज्यों से आए थे. मिथिला के इतिहासकार कर्णाट वंश (1097-1325) के शासन के प्रसंग में कायस्थों का उल्लेख करते हैं. सैकड़ों वर्ष पुरानी ‘पंजी प्रथा’ का मुकम्मल अध्ययन अभी बाकी है. मिथिला पर गियासुद्दीन तुगलक के आक्रमण के साथ कर्णाट शासन का अंत हो गया पर बाद के शताब्दी में भी उनका दबदबा बना रहा.
एक यही दृष्टांत नहीं है जिससे विविध संस्कृतियों के आपसी मेल-जोल की झलक मिलती हो. इस लिहाज से चर्चित लेखक-प्रशासक कुमार सुरेश सिंह का 43 खंडों में प्रकाशित ‘पीपुल ऑफ इंडिया’ काफी महत्व रखता है. इसमें भारत के कुल 4694 समुदायों का अध्ययन किया गया है.
इस अध्ययन की महत्ता को रेखांकित करते हुए प्रोफेसर वीर भारत तलवार ने लिखा है कि ‘भारत देश के विभिन्न समुदायों की विविधता, उनकी एकता और उनकी विशिष्टताओं को दर्शाने वाला ऐसा विराट दूसरा कोई शोध-कार्य नहीं हुआ.’ सिंह ने अपने अध्ययन में विभिन्न समुदायों के बीच साझी प्रवृत्तियों का विस्तार से उल्लेख किया है. आजादी के अमृत महोत्सव में विभिन्न समुदायों के बीच संकीर्णता के बदले आपसी सद्भाव के उन पहलूओं पर जोर दिया जाना चाहिए जिससे कि संघर्ष मिटे और शांति बहाल हो सके.