Tuesday, March 16, 2021

मणि कौल की मल्लिका: आषाढ़ का एक दिन के पचास साल

 


पिछले दिनों फिल्म निर्देशक अरुण खोपकर ने ‘आषाढ़ का एक दिन’ फिल्म के पचास साल पूरे होने पर कुछ तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा की थीं. जहाँ हिंदी में आधुनिक नाटक के प्रणेता मोहन राकेश के इस नाट्य कृति की चर्चा होती रहती है, मणि कौल (1944-2011) निर्देशित इस फिल्म की चर्चा छूट जाती है. ‘उसकी रोटी’, ‘दुविधा’, ‘सिद्धेश्वरी’ की तरह ही सिनेमाई दृष्टि और भाषा के लिहाज से ‘आषाढ़ का एक दिन’ हिंदी सिनेमा में महत्वपूर्ण स्थान रखता है.

इस फिल्म में मल्लिका (रेखा सबनीस) कालिदास (अरुण खोपकर) और विलोम (ओम शिव पुरी) की प्रमुख भूमिका है. मल्लिका कालिदास की प्रेयसी है. हिमालय की वादियों में बसे एक ग्राम प्रांतर में दोनों के बीच साहचर्य से विकसित प्रेम है. कालिदास को उज्जयिनी के राजकवि बनाए जाने की खबर मिलती है. मल्लिका और राजसत्ता को लेकर उनके मन में दुचित्तापन है. वहीं मल्लिका कालिदास को सफल होते देखना चाहती है और उन्हें स्नेह डोर से मुक्त करती है. उज्जयिनी और कश्मीर जाकर कालिदास सत्ता और प्रभुता के बीच रम जाते हैं. वे मल्लिका के पास लौट कर नहीं आते और राजकन्या से शादी कर लेते हैं. और जब वापस लौटते हैं तब तक समय अपना एक चक्र पूरा कर चुका होता है. सत्ता का मोह और रचनाकार का आत्म संघर्ष ऐतिहासिकता के आवरण में इस फिल्म (नाटक) के कथानक को समकालीन बनाता है.

दृश्य, प्रकाश, ध्वनि के संयोजन और परिवेश (मेघ, बारिश, बिजली) के माध्यम से सिनेमा में यह सब साकार हुआ है. कोलाहल के बीच एक रागात्मक शांति पूरी फिल्म पर छाई हुई है. मोहन राकेश के नाटक से इतर एक उदास कविता की तरह यह फिल्म हमारे सामने आती है. फिल्म में भावों की घनीभूत व्यंजना के लिए ‘क्लोज अप’ का इस्तेमाल किया गया है. मणि कौल के सहयोगी रह चुके, चर्चित फिल्म निर्देशक कमल स्वरूप कहते  हैं कि इस फिल्म में मणि कौल ने ‘विजुअल्स’ पर ज्यादा ध्यान रखा था. वे कहते हैं, “बजट कम था और उसी के हिसाब से ही फिल्म बनी है. सिंक साउंड में ज्यादा खर्च होता इसलिए नाटक के संवाद ट्रैक को पहले रिकॉर्ड कर लिया गया था. जैसे हम गाना प्ले बैक करते हैं उसी तरह फिल्म में साउंड प्ले बैक करती है. सबनीस भी पहले से सत्यदेब दुबे के प्ले में एक्टिंग करती थीं और बहुत अच्छी अदाकार थीं. मणि को बहुत कुछ रेडिमेड मिल गया था. उन्होंने आउटडोर सेट बनाया. इसमें प्रकृति और अंदर का सेट दोनों आ गया है.’

मणि कौल की फिल्में साहित्यिक कृतियों पर बनी, हालांकि सबका आस्वाद अलग है. उनकी फिल्मों में एक उत्तरोतर विकास दिखाई पड़ता है, पर पेंटिंग, स्थापत्य और संगीत का स्वर सबमें मुखर रहा है. असल में, उनकी फिल्मों में विभिन्न कला रूपों की आवाजाही सहजता से होती है. जहाँ वे भारतीय सौंदर्यशास्त्र में पगे थे और ध्रुपद संगीत के गुरु थे, वहीं वे अपनी कला में फिल्मकार रॉबर्ट ब्रेसां और आंद्रेई तार्कोवस्की के प्रभाव को स्वीकार करते थे. वे बातचीत में अक्सर ‘स्व भाव’ की बात करते थे. सारे प्रभावों के बावजूद जिस ‘स्पेस’ में वे अपनी कला  रच थे वह नितांत वैयक्तिक है, जो फिल्म के हर शॉट और फ्रेम में महसूस किया जा सकता है.

 

इस फिल्म में प्रेम पूरी गरिमा और लालित्य के साथ मौजूद है. मल्लिका की आँखें जिस तरह से अंतर्मन के भावों, अंतर्द्वंद को सामने लाती हैं बरबस वह कृष्ण के वियोग में गोपियों के कहे-‘अंखियां अति अनुरागी’ की याद दिलाती है. पर यहाँ आषाढ़ मास में जायसी के नागमती का विरह नहीं है. नागमती कहती हैं-‘मोहिं बिनु पिउ को आदर देई’.  जबकि फिल्म के शुरुआत में ही मल्लिका कहती है- ‘मल्लिका का जीवन उसकी अपनी संपत्ति है. वह उसे नष्ट करना चाहती है तो किसी को उस पर आलोचना करने का क्या अधिकार है?’ इस फिल्म में मल्लिका के अपरूप रूप और सौंदर्य के साथ उसकी चेतना उभर कर सामने आई है.

इंतजार और विछोह

वर्षों पहले एक मुलाकात में मणि कौल ने मुझसे कहा था कि उन्हें मोहन राकेश की कहानी में जो इंतजार और विछोह है, काफी प्रभावित किया था. उन्होंने कहा था कि ‘यह इंतजार हमें अनुभवजन्य समय से दूर ले जाता है, जहाँ एक मिनट भी एक घंटा हो सकता है.’  जब वे संगीत की शिक्षा ले रहे थे तब सम और विषम के अंतराल में इस बात को काफी अनुभव करते थे.


इस फिल्म में कई ऐसे दृश्य हैं जहाँ परस्पर संवाद करते पात्रों में अजंता भित्तिचित्र और मिथिला चित्रकला शैली की झलक मिलती है. छायांकन में एक लय है. कमल स्वरूप कहते हैं कि मणि कौल देश-विदेश की पेंटिंग शैली के रेफरेंस को सामने रख कर सचेत होकर फ्रेम बनाते थे. वे सिद्धेश्वरी फिल्म के एक दृश्य का खास तौर पर उदाहरण देते हैं, जहाँ वे पिकासो की पेंटिंग-थ्री म्यूजिशियन, से प्रेरित हैं. खुद मणि कौल हेनरी मातिस के प्रभाव को स्वीकार करते थे.

मणि कौल, एफटीआईआई के उनके समकालीन कुमार शहानी और कैमरामैन के के महाजन की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा में मनोरंजन से अलग सामाजिक-सांस्कृतिक तत्वों को कलात्मक रूप से समाहित किया, जिसे हम समांतर सिनेमा की धारा के नाम से जानते हैं. इसके लिए हिंदी की नयी कहानियों की ओर उन्होंने रुख किया.

उल्लेखनीय है कि ‘आषाढ़ का एक दिन’ के बाद, वर्ष 1972 में, कुमार शहानी ने निर्मल वर्मा की कहानी ‘माया दर्पण’ को निर्देशित किया था. दोनों ही फिल्मों को फिल्म फेयर पुरस्कार मिला था. दोनों निर्देशकों के फिल्म निर्माण की शैली मिलती जुलती भले हो (संगीत, पेंटिंग के इस्तेमाल को लेकर), विषय-वस्तु का ट्रीटमेंट काफी अलहदा है. मसलन, शहानी की तरण (माया दर्पण) फिल्म में सामंतवादी उत्पीड़न को तोड़ती है. जबकि निर्मल वर्मा की कहानी में सामंतवाद के खिलाफ विरोध नहीं दिखता है. शहानी का रुझान मार्क्सवादी विचारों की ओर रहा, जबकि मणि कौल अपनी कला में विचारधारा की सीमा का अतिक्रमण करते रहे. दोनों ही एफटीआईआई, पुणे में ऋत्विक घटक के शिष्य रहे थे. कमल स्वरूप कहते हैं कि मणि कौल राजनीतिक नहीं, रसिक थे.

बहरहाल, 70 और 80 के दशक में समांतर सिनेमा के दौर में बनी फिल्मों का प्रदर्शन मुश्किल था. दर्शकों का एक सीमित वर्ग था. 90 के दशक में होश संभालने वाली हमारी पीढ़ी की पहुँच से ये फिल्में बाहर थीं. मणि कौल से उनकी फिल्मों के बारे में पूछने पर वह बेतकल्लुफी से बात करते थे. उनकी फिल्में अमूमन सिनेमा समारोहों तक ही सीमित थीं. उदयन वाजपेयी से बातचीत करते हुए (1991) उन्होंने 'अभेद आकाश' किताब में स्वीकारा था, “शायद हमें फिल्म देखने की नयी पद्धति विकसित करनी होगी. फिल्मकार तो हैं लेकिन देखने वाले नहीं हैं. अगर देखने वाले हों तो फिल्मो में बहुत बदलाव आएगा. बिना देखने वालों के फिल्मकार नहीं होता.” पिछले दशकों में संचार की नई तकनीकी, इंटरनेट और ओटीटी प्लेटफॉर्म के आने के बाद प्रयोगधर्मी फिल्मकारों को एक नया दर्शक वर्ग मिला है. एक तरह से समांतर सिनेमा की धारा का विकास देखने को मिल रहा है. मुख्यधारा की हिंदी फिल्मों में भी बदलाव की इस बयार को महसूस किया जा रहा है. आश्चर्य नहीं कि एफटीआईआई से निकले कई युवा फिल्मकार मणि कौल को अपना गुरु मानते हैं.

(https://hindi.news18.com/blogs/arvind_5/fifty-years-of-ashadh-ka-ek-din-movie-by-mani-kaul-on-mohan-rakesh-play-3518123.html)

 

Saturday, March 13, 2021

मीडिया का मानचित्र


पिछले दशकों में सूचना की नयी तकनीकी से लैस भाषाई मीडिया, खास कर हिंदी अखबार, टेलीविजन, ऑनलाइन वेबसाइट ने शहरी केंद्रों से परे दूर-दराज के इलाकों तक नेटवर्क का अप्रत्याशित विस्तार किया है। निस्संदेह, सार्वजनिक दुनिया में मास मीडिया ने बहस-मुबाहिसा को गति दी है और लोकतांत्रिक समाज का सपना भी बुना है। लेकिन सच यह भी इन्हीं वर्षों में ‘फेक न्यूज’ और दुष्प्रचार का एक ऐसा तंत्र खड़ा हुआ है, जिसकी चपेट में डिजिटल मीडिया के साथ-साथ अखबार और टेलीविजन भी आ गए, जो लोकतंत्र के लिए खतरा बन कर उपस्थित हैं।

समकालीन मीडिया परिदृश्य पर सोशल मीडिया और टेलीविजन हावी हैं, हालांकि कोरोना महामारी के बीच समाचार पत्र जैसे पारंपरिक माध्यम की अहमियत फिर से बढ़ी है। पर सवाल है कि इक्कीसवीं सदी में हिंदी के अखबारों की प्रमुख प्रवृत्तियाँ क्या हैं? क्या ऑनलाइन वेबसाइट अखबारों के पूरक बन कर उभरी हैं या ये टीवी समाचार चैनलों के करीब हैं? समाचार चैनल सच दिखाने और  सत्ता से सच बोलने की हमेशा बात करते हैं। उग्र राष्ट्रवाद के इस दौर में क्या तथ्य से सत्य की प्राप्ति पर इनका जोर है?  क्या इनकी जवाबदेही नागरिक समाज के प्रति है? सवाल यह भी है कि आज का पाठक/दर्शक खुद को मीडिया के पूरे परिदृश्य में कहाँ खड़ा पाता है? 

शोध और न्यूज रूम के अपने अनुभवों के आधार पर लेखक ने इस किताब में समकालीन हिंदी मीडिया के सरोकारों और संस्कृतियों का भाषा और कथ्य के मार्फत आलोचनात्मक विवेचन और विश्लेषण किया है। 

समकालीन समाज और मीडिया में दिलचस्पी रखने वालों के लिए यह एक जरूरी किताब है।

प्रकाशक: अनुज्ञा बुक्स, ISBN: 978-81-951105-1-3 (PB)

कीमत: 250 रुपए

अमेजन लिंक: https://www.amazon.in/dp/B0919XNV1F?ref=myi_title_dp


(किताब 25 मार्च, 2021 के करीब प्रकाशित होगी)

Sunday, March 07, 2021

मैला आँचल के ‘डागदर बाबू’ की अधूरी कहानी

प्रसिद्ध साहित्यकार फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ (4 मार्च 1921- 11 अप्रैल 1977) की जन्मशती मनाई जा रही है. इस बहाने उनके साहित्य पर खूब चर्चा हो रही है. 20वीं सदी के दो प्रमुख साहित्यकार नागार्जुन और रेणु दोनों ही मिथिला से थे. दोनों के साहित्य की कथा भूमि मिथिला का ग्रामीण समाज है. जहाँ नागार्जुन ने मैथिली में थोड़ा-बहुत लिखा, वहीं रेणु का मैथिली में लिखा नहीं मिलता.

केदारनाथ चौधरी ने 'अबारा नहितन' में लिखा है कि जब वे 'ममता गाबय गीत' (मैथिली फिल्म) के मुहूर्त के प्रसंग में रेणु से मिले (1964) तब उन्होंने कहा था- 'नेना मे हम जखन नेपालक विराटनगर मे रही तखन मैथिली मे कइएक टा कथा लिखने छलहूँ. मुदा मैथिली भाषाक क्षेत्र सकुचल, समटल आ एक विशेष जातिक एकाधिकार मे. अपने लिखू अपने पढ़ू.' (बचपन में जब मैं नेपाल के विराटनगर में रहता था तब मैंने मैथिली में कई कथाएँ लिखी. लेकिन मैथिली भाषा का क्षेत्र सीमित और एक विशेष जाति के एकाधिकार में है. खुद लिखिए और खुद पढ़िए). उसी दौर में रेणु की चर्चित कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पर ‘तीसरी कसम’ फिल्म बन रही थी, जिसे बासु भट्टाचार्य ने निर्देशित किया था और शैलेंद्र प्रोड्यूसर थे.
बहरहाल, रेणु ने मैथिली की पहली फिल्म 'कन्यादान' (1965) का संवाद लिखा था और आगे भी मैथिली सिनेमा के लिए कुछ करने की उनमें लालसा थी. यह अलग बात है कि मैथिली सिनेमा का अपेक्षित विकास नहीं हो पाया. पर उनका जुड़ाव हिंदी सिनेमा से रहा. रेणु के इस रूप का जिक्र नहीं होता.
इसी प्रसंग में, जहाँ 'तीसरी कसम' फिल्म सबको याद है, वहीं मैला आँचल पर बनने वाली फिल्म- डागदर बाबू (डॉक्टर बाबू), जो अधूरी रह गई, उसकी चर्चा नहीं होती. मैला आँचल का कथानक पूर्णिया में स्थित है और कथानायक प्रशांत एक युवा डॉक्टर है. मेरीगंज गाँव के हवाले से जो सामाजिक-सांस्कृतिक यथार्थ का चित्रण हुआ है वह इस उपन्यास को कालजयी बनाता है. इस उपन्यास का हर पाठ पाठक के समक्ष एक नए अर्थ के साथ उद्धाटित होता है.
रेणु की लेखनी दृश्यात्मक है. इस वजह से उनके कथा साहित्य को सिनेमा के परदे पर चित्रित करने की पूरी संभावना है. बात ‘तीसरी कसम’ की हो या ‘पंचलाइट’ की. बशर्ते फिल्मकार शैलेंद्र या नवेंदु घोष जैसा पारखी हो. हिंदी के चर्चित आलोचक प्रोफेसर वीर भारत तलवार ‘रेणु’ की प्रेम कहानी ‘रसप्रिया’ का जिक्र फिल्म निर्माण के प्रसंग में हमेशा करते हैं. वे बताते हैं कि उन्होंने प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक चिदानंद दास गुप्ता से इस कहानी पर फिल्म बनाने का इसरार भी किया था.
मन में सहज रूप से यह सवाल उठता है कि नवेंदु घोष, जिन्होंने ‘तीसरी कसम’ फिल्म की पटकथा लिखी थी, के निर्देशन में बनने वाली इस फिल्म का क्या स्वरूप होता? बिंबो और ध्वनियों के माध्यम से यह फिल्म मैला आँचल कृति को किस तरह नए आयाम में प्रस्तुत करती?
70 के दशक के मध्य में यह फिल्म बननी शुरू हुई थी, पर निर्माता और वितरक के बीच अनबन के चलते इसे अधबीच ही बंद करना पड़ा. उस दौर के लोग डागदर बाबू की शूटिंग और फिल्म के पोस्टर को आज भी याद करते हैं. रेणु के पुत्र दक्षिणेश्वर प्रसाद राय कहते हैं कि फिल्म के 13 रील तैयार हो गए थे. वे बताते हैं कि ‘मायापुरी’ फिल्म पत्रिका में ‘आने वाली फिल्म’ के सेक्शन में इस फिल्म का पोस्टर भी जारी किया गया था. पिछले साल अमिताभ बच्चन ने विवेकानंद के गेट-अप में जया बच्चन की इस फिल्म से एक तस्वीर अपने इंस्टाग्राम पर शेयर की थी, तब लोगों में इसे लेकर उत्सुकता जगी थी. हालांकि उन्होंने गलती से इसे बांग्ला में बनने वाली फिल्म –डागदर बाबू (डॉक्टर बाबू) कह दिया था.
नवेंदु घोष के पुत्र और फिल्म निर्देशक शुभंकर घोष कहते हैं कि उस वक्त मैं एफटीआईआई में छात्र था और अपने पिता को असिस्ट करता था. वे दुखी होकर कहते हैं, “बाम्बे लैब में इस फिल्म के निगेटिव को रखा गया था. 80 के दशक में बंबई में आई बाढ़ में वहाँ रखा निगेटिव खराब हो गया... अब कुछ नहीं बचा है.”
शूटिंग के दिनों को याद करते हुए शुभंकर घोष नॉस्टेलजिक हो जाते हैं. वे कहते हैं “काफी खूबसूरत कास्टिंग थी. धर्मेंद्र, जया बच्चन, उत्पल दत्त, पद्मा खन्ना, काली बनर्जी इससे जुड़े थे. जब रेणु की जन्मभूमि फारबिसगंज में इसकी शूटिंग हो रही थी तब धर्मेंद्र-जया को देखने आने वालों का तांता लगा रहता था. कई लोग पेड़ पर चढ़े होते थे.’ फिल्म के प्रसंग में वे आर डी बर्मन के दिए संगीत का जिक्र खास तौर पर करते हैं. वे कहते हैं कि नंद कुमार मुंशी जो इस फिल्म के निर्माता एस.एच. मुंशी के पुत्र हैं, किसी तरह आरडी बर्मन के संगीत को संरक्षित करने में उनकी सहायता करें. घोष कहते हैं कि फिल्म में पंचम ने असाधारण संगीत दिया था, जो मुंशी परिवार के पास ही रह गया.
यदि यह फिल्म बन के तैयार हो गई होती तो हिंदी सिनेमा की थाती होती. शुभंकर याद करते हुए बताते हैं कि उनके पिता नवेंदु घोष और रेणु अच्छे दोस्त थे. ‘मैला आंचल’ की पॉकेट बुक की प्रति हमेशा अपने पास रखते थे और वर्षों तक उन्होंने उसकी पटकथा पर काम किया था. यहां पर यह जोड़ना उचित होगा कि देवदास, सुजाता, बंदिनी, अभिमान जैसी फिल्मों की पटकथा लिखने का श्रेय नवेंदु घोष को ही है. साथ ‘त्रिशांगी’ फिल्म उन्हीं के निर्देशन में बनी थी, जिसे बेस्ट डायरेक्टर का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था.
हालांकि बॉलीवुड में साहित्यिक कृतियो के साथ जिस तरह का व्यवहार किया जाता रहा है उसे लेकर रेणु नाखुश रहते थे. तीसरी कसम फिल्म का अंत बदलने का उन पर काफी दबाव बनाया गया था, पर वे राजी नहीं हुए. इसी सिलसिले में रॉबिन शॉ पुष्प ने अपने एक संस्मरण (1992) में नोट किया है कि किस तरह रेणु ने उनसे कहा था कि ‘हो सकता है कि मैं डॉक्टर बाबू न देखूं…’. यह पूछने पर कि क्यों? उन्होंने कहा था- “ पहले समीक्षा पढूंगा...देखने वालों से उनकी राय पूछूंगा.. यदि सब ठीक रहा, तभी देखूंगा. वरना जिस मैला आँचल ने मुझे यश दिया. मान दिया. साहित्य में स्थापित किया...उस कृति के विकृत रूप को देखने का शायद मैं साहस नहीं जुटा पाऊंगा...”
काश रेणु यह फिल्म देख पाते! दुर्भाग्यवश न हमने, न रेणु ने ही यह फिल्म देखी. क्या ही अच्छा होता कि नवेंदु घोष की लिखी पटकथा ही हम देख-पढ़ पाते, पंचम का दिया संगीत ही सुन पाते?

(https://hindi.news18.com पर प्रकाशित)

Sunday, February 28, 2021

कामगारों के दुख की ध्वनियाँ- ‘ईब आले ऊ’


कई फिल्म समारोहों में दिखाए जाने के बाद प्रतीक वत्स के निर्देशन में बनी फिल्म ‘ईब आले ऊ’ को पिछले दिनों नेटफ्लिक्स पर रिलीज किया गया है. एक लंबे अरसे के बाद हिंदी में कोई ऐसी फिल्म बनी है जिसमें रोजगार का सवाल, समाज में वर्गीय विभाजन और समकालीन राजनीति पर एक तीखी टिप्पणी है. हालांकि इसे ऐसे बिंबों और ध्वनियों के माध्यम से कहा गया है जिसका विश्लेषण शब्दों में मुश्किल है.

आम तौर पर हम सिनेमा में ध्वनि के इस्तेमाल पर गौर नहीं करते हैं. इस फिल्म के नाम में तीन ध्वनियाँ हैं. ईब-बंदर के लिए, आले-लंगूर के लिए और ऊ-मनुष्य के लिए. विभिन्न प्रकार के ध्वनियों को जिस कुशलता से इस फिल्म में समाहित किया गया है वह इसे विशिष्ट बनाता है. इस फिल्म का कथानक दिल्ली के रायसीना हिल के आस-पास बुना गया है. यहाँ पर सरकारी दफ्तर हैं, राजपथ पर गणतंत्र दिवस का परेड होता है. लेकिन यहाँ ‘बंदरों का वर्चस्व है’ और उनका आतंक एक सच्चाई. रायसीना हिल सत्ता का प्रतीक भी है. सत्ता को बंदरों के आतंक से बचाए रखने के लिए कुछ लोगों को बकायदा नौकरी पर रखा जाता है, जो बंदरों को भगाने में माहिर होते हैं. एक बेहतर जिंदगी की तलाश में दिल्ली आए ग्यारहवीं पास अंजनी को इस नौकरी पर उसके जीजा रखबा देते हैं. खुद जीजा और अंजनी की बहन की आर्थिक स्थिति दयनीय है और वे झुग्गी झोपड़ी में रह कर किसी तरह जीवन बसर कर रहे हैं.

गालिब की दिल्ली में अंजनी ‘वजीफाख्वार हुआ’ पर उसे ‘शाह की दुआ’ नहीं मिलती. उसे महिंद्र का साथ मिलता है जो सात पुश्तों से ‘ईब आले ऊ’ की ध्वनि निकाल कर बंदरों को भागता रहा है. महिंद्र के लिए यह ध्वनि निकालना जितना आसान है, अंजनी के लिए वह उतना ही मुश्किल साबित होता है. वह अंजनी से बंदरों की तरह सोचने की ताकिद करता है. अंजनी के लिए नौकरी निभाने और उसे बचाने की जद्दोजहद शुरू होती है. वह बार-बार अपने काम में उलझता जाता है. एक जगह वह कहता हैं- ‘कहाँ नरक में लाके फंसा दिए हैं.’  दिल्ली में रहने वाले प्रवासी कामगारों को जिस अमानवीय परिस्थितियों में नौकरी करनी होती है वह हाशिए के समाज का ऐसा सच है जो सत्ता और सुविधाभोगी वर्ग की आँखों से ओझल ही रहता है.

यह फिल्म बिना किसी मेलोड्रामा के कामगारों के संघर्ष और जिजीविषा को हमारे सामने लेकर आती है. अंजनी के किरदार में शारदुल भारद्वाज का अभिनय दोष रहित है. एक बिहारी प्रवासी की भाषा, माधुर्य, भंगिमा और क्षोभ मिश्रित हताशा के भाव को उन्होंने बखूबी पकड़ा है. वहीं महिंद्र के किरदार में महिंद्र नाथ हैं जो निजी जीवन में बंदर पकड़ने का काम करते हैं. इस फिल्म में कैमरा बंदरों के करतूतों को सहजता से कैद करता है, जो हास्य का संचार करता है. सामाजिक यथार्थ को चित्रित करते हुए फिल्म कहीं भी बोझिल नहीं होती है. बिंबों और रूपकों का इस्तेमाल कर यह फिल्म धार्मिक कट्टरता, राष्ट्रवाद और समकालीन राजनीति पर टिप्पणी करने से भी नहीं चूकती. अपनी पहली फिल्म में जिस विश्वास के साथ प्रतीक वत्स सामने आते हैं उनसे काफी उम्मीद बंधती है.


(प्रभात खबर, 28 फरवरी 2021)

Tuesday, February 09, 2021

भील पेंटिंग में आज भी घोड़े पुरुष ही बनाते हैं: भूरीबाई


भील शैली के चित्रों के लिए मशहूर भूरीबाई को पद्मश्री पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई है। वे पहली भील महिला हैं जिन्होंने कागज और कैनवास पर अपने अनुभवों और जातीय स्मृतियों को दर्ज किया है। 52 वर्षीया भूरीबाई ने भारत भवन में मजदूरी से शुरुआत की और प्रसिद्ध कलाकार जे. स्वामीनाथन के कहने पर कागज पर चित्रों को उकेरना शुरू किया। फिलहाल वे मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय, भोपाल से कलाकार के रूप में जुड़ी हैं। उनसे बात की अरविंद दास ने, प्रस्तुत हैं मुख्य अंश :

संघर्षों से भरी अपनी लंबी जीवन यात्रा में पद्म पुरस्कार को किस रूप देखती हैं?
झाबुआ जिले के छोटे से गांव से मेरी यात्रा शुरू हुई। खुद को यहां तक काफी संघर्ष करके लेकर आई। इस बीच मुझे कुछ अवॉर्ड भी मिले, जैसे शिखर सम्मान, देवी अहिल्या बाई सम्मान, रानी दुर्गावती सम्मान। लेकिन इस अवॉर्ड के बारे में सुनकर मैं बहुत खुश हूं। मैं अपनी कला यहां तक लेकर आई, लेकिन जो नए कलाकार हैं, जिन्हें तलाशा नहीं गया है, जिन्हें कुछ करने का मौका नहीं मिला है, उनको आगे लाने की जरूरत है। मैं सरकार से चाहूंगी कि उनको भी मौका दिया जाए। उनके लिए मैं अपनी कला बांटना चाहूंगी।

आप पहली महिला कलाकार हैं जिन्होंने भील शैली को कागज-कैनवास पर अपनाया। देखा-देखी कई और महिला कलाकार इससे जुड़ी हैं। आप इस बारे में क्या कहना चाहेंगी?


मेरे जो गुरु हैं, उनका आशीर्वाद मेरे ऊपर है। कोरकू, गोंड, भील कलाकारों के लिए मैं कहना चाहूंगी कि मेरी कला तो प्रशासन ने जान ली, पर मेरी तरह और भी कलाकार आगे बढ़ें। मैं सबके बीच- कलाकारों, उनके बच्चों के बीच अपनी कला बांटना चाहती हूं, उनको बताना चाहती हूं, उनको भी यही सिखा रही हूं।सबसे यही बोलती हूं आप भी अपनी कला लेकर आगे आएं, नाम बढ़ाएं।


आनुष्ठानिक पिठौरा पूजा के दौरान जो भित्तिचित्र उकेरा जाता है, उसमें पारंपरिक रूप से पुरुषों का दखल रहा है। आपने इसे कैसे बनाना शुरू किया?
मैं आदिवासी भील हूं, हमारे यहां पिठौरा बनता है। पिठौरा देव के घोड़े को महिलाएं, लड़कियां नहीं बनाती हैं। इसे पुरुष ही मिल कर गांव में बनाते हैं। आज भी मैं खास घोड़े को छोड़ कर इस अनुष्ठान से जुड़ी जो अन्य पेंटिंग्स हैं, जैसे पेड़ हैं, मोर हैं, और भी बहुत सी चीजें हैं, वह मैं बनाती हूं। इसके अलावा मैं अपने गांव-घर के जीवन, पेड़-पौधे, जानवरों को अपनी पेंटिंग में बनाती हूं।

जे. स्वामीनाथन जब भारत भवन के निदेशक थे, तब उन्होंने आपकी कला और प्रतिभा को पहली बार पहचाना। आप उन्हें किस रूप में याद करती हैं?
वे भगवान के पास चले गए, लेकिन मेरे आस-पास, मेर ऊपर देव बनकर वे मेरी सुरक्षा कर रहे हैं। मुझे आशीर्वाद दे रहे हैं। ऊपर जाने के बाद भी वे मुझे कला बांट रहे हैं। मुझे बता रहे हैं। वे मेरे गुरु भी थे और देव के रूप में भी मैं उनको मानती हूं। कोई भी कला बनाने से पहले मैं उनको याद कर लेती हूं कि मुझे सफल करना। उनके आशीर्वाद से कोई व्यवधान नहीं आया और अपनी पेंटिंग को आगे बढ़ा रही हूं।

आपकी पेंटिंग में बिंदियों (डॉट) का ज्यादा प्रयोग मिलता है और रंग भी चटख होते हैं। इसके क्या मायने हैं?
जो गोंड पेंटिंग है उसमें कहते हैं कि ये भित्ति चित्र है। गोंड पेंटिंग की पहचान है- लाइनें। उसमें रेखाओं का ज्यादा इस्तेमाल होता है। जो मक्का हमारे यहां उगाया जाता है, वहीं से यह बिंदी आई है। हम जब खेतों में बोअनी करते हैं, या धान बैठाते हैं, उसी दिन से हम ककड़ी, भुट्टा, भिंडी बोअनी करने के बाद खाना छोड़ देते हैं। ये जब पक जाता है, तब हमारे देव को मक्के चढ़ा कर उसके दाने का नवेद रखते हैं। फिर ककड़ी, भिंडी की पूजा करते हैं, तब खाते हैं। यही हमारी पहचान है। पहला अन्न जीवन के लिए है और हम पहले देवों को खिलाएंगे तब खाएंगे। गेरू, नील जैसे रंगों से मैं बचपन से घर की दीवारों को रंगती थी। आस-पास का जीवन मेरी पेंटिंग में उतर आता है। यही चटख रंग मेरी पेंटिंग में उतर आता है।


(नवभारत टाइम्स, 9 फरवरी 2021)

Sunday, February 07, 2021

नाच के सौंदर्य का सम्मान: रामचंद्र मांझी


कोरोना काल में लोक कलाकारों की स्थिति बदहाल रही. ऐसे में इस बार पद्म पुरस्कारों में लोक कलाकारों की पहचान और उन्हें पुरस्कृत करने की पहल प्रशंसनीय है ‘भोजपुरी के शेक्सपीयर’ भिखारी ठाकुर (1887-1971) के सहयोगी रहे बिहार के चर्चित कलाकार रामचंद्र मांझी को नाच परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए पद्मश्री देने की घोषणा हुई है, वहीं मिथिला पेंटिंग के लिए दुलारी देवी और भीली शैली चित्रकला के लिए भूरीबाई को भी यह पुरस्कार मिला है. ये सभी कलाकार हाशिए के समाज से आते हैं जिन्हें काफी संघर्ष से अपने क्षेत्र में प्रसिद्धि मिली है.

बारह वर्ष की उम्र में मंच पर पैर रखने वाले 94 साल के मांझी आज भी नाच कला में सक्रिय हैं. पिछले साल एनएसडी के भारत रंग महोत्सव में ‘भिखारीनामा’ में लोगों ने उन्हें मंच पर देखा था. असल में लौंडा नाच की प्रसिद्धि का श्रेय भिखारी ठाकुर और उनकी मंडली को है. रामचंद्र मांझी भिखारी ठाकुर की नाट्य मंडली में शामिल थे. स्त्री रूप और साज-सज्जा में मंच पर आकर दर्शकों को रिझाने की कला को भिखारी ठाकुर और उनकी मंडली ने अपूर्व ऊंचाई दी, पर धीरे-धीरे यह कला समाज से ओझल होती चली गयी.रात भर दर्शकों का मनोरंजन करने वाली यह कला सामंती संस्कृति की उपज थी, जिसे मंडली ने पिछले सदी में सामाजिक-राजनीतिक जागरूकता का औजार बनाया. भिखारी ठाकुर की रचना में निम्नवर्गीय चेतना (सबअल्टर्न) मुखर रूप से अभिव्यक्त हुई है.
गीत-संगीत, हास्य, व्यंग्य इस कला के मूल में है. ‘बिदेसिया’ नाटक में जो पलायन और अपनी जमीन से बिछुड़ने की पीड़ा है वह सिनेमा और नाटक के समकालीन कलाकारों को आज भी अपनी कला में ढालने के लिए उकसाता रहता है. हाल के दशक में इस कला के प्रति सामाजिक अस्वीकृति और तिस्कार का भाव जन्मा है. समाजशास्त्री पूरनचंद जोशी ने लिखा है, “लोक अध्ययन अवधारणाओं के संबंध में एक तरफ हम ऐसी औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त रहे हैं, जिसने लोक समुदाय को आधुनिक सभ्यता के दायरे से बाहर मानकर वास्तव में सभ्यता के ही बाहर माना है.” हालांकि भिखारी ठाकुर की कला को लेकर कुछ शोध हुए हैं.

हिंदी के प्रसिद्ध रचनाकार संजीव ने भिखारी ठाकुर को केंद्र में रख कर ‘सूत्रधार’ की रचना की थी. उत्साह से भरपूर ठेठ भोजपुरी में मांझी कहते हैं कि ‘समाज में इसे हीन भावना से लोगों ने देखना शुरू किया पर इस पुरस्कार से लोगों में कला के प्रति फिर से वैसी ही सम्मान की भावना जागेगी जैसा कि भिखारी ठाकुर के समय में थी.’ वे कहते हैं कि उन्हें पहले भी बहुत पुरस्कार मिले हैं, पर यह सम्मान उनके लिए खास है.
हाल ही में जैनेंद्र दोस्त और शिल्पी गुलाटी ने चार कलाकारों को केंद्र में रख कर ‘नाच भिखारी नाच’ वृत्तचित्र का निर्देशन किया है. चारों कलाकार भिखारी ठाकुर नाच मंडली के सदस्य रह चुके हैं. इस वृत्तचित्र में लोक कला की राजनीति और सौंदर्य बोध को उजागर किया है. साथ ही इस कला से जुड़ा जातीय पहलू भी सामने आता है, क्योंकि ज्यादातर कलाकार सामाजिक रूप से पिछड़े तबके से ही आते रहे हैं.

(प्रभात खबर, 7 फरवरी 2021)

Monday, February 01, 2021

दुलारी देवी और भूरी बाई: संघर्ष से जन्मी कला


मिथिला पेंटिंग के क्षेत्र में योगदान के लिए मधुबनी जिले के रांटी गाँव की दुलारी देवी को पद्मश्री पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई है. यूँ तो मिथिला पेंटिंग के क्षेत्र में अब तक छह महिला कलाकारों को पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है, पर उनकी कला यात्रा उन्हें एक अलग लीक में ले जाती है. पारंपरिक रूप से मिथिला कला में कायस्थों और ब्राह्मणों की उपस्थिति रही है, पर पिछले कुछ दशकों में दलित कलाकारों का दखल बढ़ा है. दुलारी देवी हाशिए के समाज से आती हैं. उनकी कला में उनका जीवन अनुभव और संघर्ष स्पष्ट रूप से दिखता है.


पद्मश्री की घोषणा के बाद जब मैंने उनसे बात किया तो उन्होंने कहा- बहुत कष्ट स गुजरल छी. बहुत संघर्ष में सीखने छी. आई हमरा बहुत खुशी होइय. एते दिन सुनै छलिए. हमर गाम के महासुंदरी देवी, गोदावरी दत्त...बौआ देवी (जितवारपुर) के भेटल रहैन. आई हमरो भेटल ए त आरो खुशी होइए. (बहुत कष्ट से गुजरी हूँ. बहुत संघर्ष में रह कर सीखी. मुझे बहुत खुशी है. पहले सुनती थी कि मेरे गाँव की महासुंदरी देवी, गोदावरी दत्त...बौआ देवी (जितवारपुर) को पुरस्कार मिला. आज मुझे भी मिला तो और भी खुशी हुई.)


असल में,
मछुआरा जाति में जन्मी दुलारी देवी की ज़िंदगी किसी लोक कथा से मिलती-जुलती है. बिना किसी शिक्षा-दीक्षा के उनकी शादी बचपन में एक निठल्ले से कर दी गई. कम उम्र में एक लड़की को जन्म दिया जो ज़िंदा नहीं रही. फिर पति के ताने. पंद्रह साल की होते होते उन्होंने अपने पति को छोड़ दिया. खेतों में मजदूरी और संपन्न लोगों के घर झाड़ू-बुहारी करते उनका समय बीतता रहा. इसी क्रम में जब वो मिथिला चित्र शैली की राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कलाकार कर्पूरी देवी के घर काम करती थी तो उनकी उत्सुकता इन चित्रों के प्रति बढ़ी. कुछ वर्ष पहले जब मेरी मुलाकात उनसे हुई थी तब उन्होंने कहा था, “मैं जब महासुंदरी देवी, कर्पूरी देवी को चित्र बनाती हुई देखती थी तो मेरी भी इच्छा होती थी मैं भी इन्हें बनाऊँ. मैंने महासुंदरी देवी के साथ छह महीने की ट्रेनिंग ली और फिर चित्र बनाने लगी.”  फिर धीरे-धीरे उनकी ख्याति बढ़ती गई. मधुबनी स्थित विद्यापति टॉवर में उन्होंने अपनी कूची से सीता के जन्म से लेकर उनकी जीवन यात्रा का मनमोहक भित्तिचित्र बनाया  है. मिथिला पेंटिंग को लेकर वह चैन्नई, कोलकाता, बैंगलोर आदि जगहों पर भी गई.

 
दुलारी देवी को शब्दों की पहचान भले ना हो, पर रंगों की बखूबी पहचान है जो उनके चित्रों में दिखती है. उनके चित्रांकन की शैली मिथिला पेंटिंग के ‘कचनी शैली’ से मिलती है. इस शैली में रेखाओं की स्पष्टता पर जोर रहता है. उनके चित्रों में मिथिला पेंटिंग की पारंपरिक विषयों के अतिरिक्त उनके जीवन की छवियाँ, आत्म संघर्ष अंकित है. कुछ वर्ष पहले आई उनकी आत्मकथा ‘फालोइंग माइ पेंट ब्रश’ में उन्होंने इसे रेखाचित्र के माध्यम से उकेरा है.  


मुझे याद है कि जब मैं रांटी में उनसे मिलने गया तब उनसे एक पेंटिंग खरीदी थी और उनसे कहा था कि अपना नाम लिख दीजिए. पर जब मैंने दिनांक अंकित करने को कहा तब उन्होंने कहा था कि ‘बस मुझे नाम लिखना आता है!’


इसी तरह इस साल भीली शैली चित्रकला के लिए चर्चित कलाकार भूरीबाई को पद्मश्री दिए जाने की घोषणा हुई. उनका जीवन भी दुलारी देवी की तरह ही संघर्ष से भरा रहा है. वह भील जनजाति से आने वाली पहली महिला है जिन्होंने कागज और कैनवास पर अपने अनुभवों  और जातीय स्मृतियों को दर्ज किया है. उनके चित्रों में जीवन के अनुभव जीवंत है. अस्सी के दशक में मशहूर कलाकार जगदीश स्वामीनाथन जब भोपाल स्थित भारत भवन के निदेशक थे, तब भूरीबाई की प्रतिभा को पहचाना था और उन्हें चित्र बनाने को प्रेरित किया. भूरीबाई वहाँ पर मजदूरी के लिए आई थी. आज भी वह शिद्दत से उन्हें याद करती हैं. वह कहती हैं, ‘ऊपर जाने के बाद भी वे मुझे कला बाँट रहे हैं. वे मेरे गुरु भी थे और देव के रूप में भी मैं उनको मानती हूँ.’

 
भूरीबाई के चित्रों के माध्यम से भीलों का जीवन आधुनिक भारतीय चेतना का हिस्सा बना. दुलारी देवी की तरह ही उनके चित्रों में आत्मकथात्मक रंग भरा है. उन्होंने भी अपनी कहानी दीवारों पर अंकित करने के साथ ‘डॉटेड लाइंस’ किताब में कही है. इसमें वह झाबुआ जिले में स्थित अपने गाँव के बारे में रेखांकित करती हैं.  अपने पेंटिंग में वह पारंपरिक ‘पिठौरा’ पर्व के चित्रण के माध्यम से भीलों की संस्कृति को खूबसूरत रंगों से उकेरती हैं. वह कहती हैं कि “पिठौरा देव के घोड़े को महिलाएँ नहीं बनाती है. इसे पारंपरिक रूप से पुरुष ही मिल कर बनाते हैं. इस अनुष्ठान से जुड़ी जो अन्य पेंटिंग हैं-मोर, पेड़ और भी बहुत कुछ वह मैं बनाती हूँ.” उनके अन्य चित्रों में भीलों का जन-जीवन, पेड़-पौधे, घोड़े-बैल, ढोल-मांदल, गाँव के आस-पड़ोस का अंकन है. 

 

उनकी रेखाओं और चटख रंगों के चयन में एक सहजता सब जगह दिखती है. यहाँ बिंदियों की प्रधानता है, जो भील जनजाति के जीवन-यापन से जुड़ी है. इन बिंदियों को वह खेती के समय मक्का बोने की स्मृतियों से जोड़ती है. भूरीबाई अपनी कला के संग देश के अनेक हिस्सों सहित अमेरिका भी गई. उनकी सफलता से प्रभावित होकर आज भील समुदाय की बहुत सारी युवतियाँ इस कला से जुड़ी हैं. 

(बीबीसी, 1 फरवरी 2021)

Sunday, January 24, 2021

नाउम्मीदी के बीच बेहतरीन की तमन्ना


पिछले दिनों जयपुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का ऑनलाइन आयोजन किया गया. इस समारोह में पाकिस्तान के युवा निर्देशक उमर रियाज की एक डॉक्यूमेंट्री- ‘कोई आशिक किसी महबूब से’, भी दिखाई गई. जहाँ फीचर फिल्मों के प्रदर्शन के लिए कई माध्यम हैं वहीं आज भी वृत्तचित्रों का प्रदर्शन फिल्मकारों के लिए मुश्किल पैदा करता है.

बहरहाल, ‘कोई आशिक किसी महबूब से’ वृत्तचित्र का शीर्षक दक्षिण एशिया के मकबूल और महबूब शायर फैज अहमद फैज की शायरी से उधार लिया गया है. असल में इस डॉक्यूमेंट्री में फैज अहमद फैज की शायरी, गज़ल और उनकी जिंदगी के लम्हों को कैद किया गया है. हालांकि इसमें फैज खुद उपस्थित नहीं है. उनके संस्मरण उनकी बेटियों के हवाले से इस डॉक्यूमेंट्री में आया है. साथ ही पाकिस्तान के चर्चित अदाकार और उर्दू साहित्य को लयात्मक और अपने सस्वर पाठ से चर्चित करने वाले जिया मोहिउद्दीन के हवाले से फैज की उपस्थिति दर्ज होती है.

यह वृत्तचित्र खुद मोहिउद्दीन की जीवन यात्रा भी है. गौरतलब है कि मोहिउद्दीन का प्रशिक्षण लंदन स्थित रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामेटिक आर्टस (राडा) से पचास के दशक में हुआ था और तब से वे विभिन्न रूपों में पाकिस्तान और ब्रिटेन के मंच पर अपनी अदाकारी का प्रदर्शन करते रहे हैं. टीवी और सिनेमा से भी उनका जुड़ाव रहा है. करीब तीस साल से वे लाहौर में साल के आखिरी दिन उर्दू साहित्य का पाठ करते रहे हैं, जिसका इंतजार पाकिस्तान के साहित्य प्रेमी बेसब्री से करते हैं. फैज के जन्मशती वर्ष में उन्होंने सिर्फ उन्हीं के नज्मों का पाठ किया.
यह वृत्तचित्र व्यक्ति विशेष से ऊपर उठ कर पाकिस्तानी समाज में उर्दू भाषा, कला और रिवायत की बेकद्री पर एक आलोचनात्मक नजरिया प्रस्तुत करता है. जैसा कि मोहिउद्दीन एक जगह टिप्पणी करते हैं- ‘यहां अदाकारी को फन नहीं समझा जाता है’. काव्य पाठ और पढ़ने के दौरान स्वर के उतार-चढ़ाव पर जोर देते हुए मोहिउद्दीन पूछते हैं- लफ्ज के नीचे जो नहीं कहीं गई बात है, वो क्या है?’ इसी बात को कवि केदारनाथ सिंह अपनी कक्षाओं में कहते थे कि कविता ‘बिटविन द लाइंस’ होती है.
इस डॉक्यूमेंट्री में क्राफ्ट पर काफी ध्यान दिया गया है. बकौल रियाज इसे बनाने में उन्हें सात साल लगे और उनकी मेहनत दिखती भी है. सिनेमैटोग्राफी और कुशल संपादन इस वृत्तचित्र को एक सफल फीचर फिल्म के करीब ले जाता है. पाकिस्तान के आम नागरिकों, चौक-चौराहों के जो दृश्य कैद किए गए हैं वे काव्यात्मक हैं, फैज की कविता के भाव बोध और संवेदना से मेल खाते हैं. साथ ही पुरानी तस्वीरों-फुटेज का इस्तेमाल भी बारीकी से किया गया है.

जब मोहिउद्दीन फैज की इस नज्म को पढ़ते हैं- आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो/ दस्त-अफ़्शाँ चलो मस्त ओ रक़्साँ चलो/ ख़ाक-बर-सर चलो ख़ूँ-ब-दामाँ चलो/ राह तकता है सब शहर-ए-जानाँ चलो, तब पाकिस्तान की राजनीति, मिलिट्री शासन और समाज के हाशिए पर रहने वालों की पीड़ा एक साथ उभर कर सामने आ जाती है.
डॉक्यूमेंट्री के शुरुआत में एक टिप्पणी है- महबूब जिंदगी में बेहतरीन की तमन्ना है और आशिक उस बेहतरीन की तलाश. यह किसी भी कला और कलाकार के लिए हमेशा सच है.

(प्रभात खबर, 24 जनवरी 2021)

Sunday, January 10, 2021

जीवन में सही सुर की तलाश


नए साल की शुरुआत ‘तेरहवीं’ से करना
अटपटा लगता है, पर मौत का कोई कैलेंडर नहीं होता. सिनेमाघरों में रिलीज हुई फिल्म ‘रामप्रसाद की तेरहवीं’ के केंद्र में मौत का सवाल है, पर साथ ही यह सवाल भी लिपटा हुआ है कि जीवन की तरह मौत भी क्या उत्सव है?

फिल्म के शुरुआत में मद्धिम रोशनी में घर के कोने वीरान पड़े हैं. परिवार के मुखिया संगीतकार रामप्रसाद (नसीरुद्दीन शाह) को जीवन में सही सुर की तलाश है. रामप्रसाद की मौत के बाद शोक मनाने आए उनके छह बच्चों, नाते-रिश्तेदारों के आपसी व्यवहार, संवादों से घर में जीवन का एक नया रूप दिखाई देता है. ऐसे में मौत का शोक, क्रिया-कर्म की बातें पारिवारिक सवालों-उलझनों में पीछे छूट जाती है. यहां ‘मृत्यु का अमर अपार्थिव पूजन’ नहीं है. सिर्फ रामप्रसाद की पत्नी (सुप्रिया पाठक) के चेहरे पर वेदना और पीड़ा की झलक है. ऐसे में वह व्यथित होकर पूछती है कि शोक का क्या अर्थ है? तस्वीर पर फूल-माला अर्पित कर, क्या महज तेरह दिनों में क्रिया-कर्मो के सहारे दिवंगत की स्मृतियों से पिंड छुड़ाया जा सकता है?

चर्चित अदाकार सीमा पाहवा के निर्देशन में बनी इस ‘फैमिली ड्रामा’ में हास्य-व्यंग्य के तत्वों का कुशलता से समावेश किया गया है, जिससे फिल्म कहीं बोझिल नहीं होती. श्मशान घाट में अंतिम क्रिया के लिए लकड़ी की खरीददारी में भी यहां मोल-तोल है! मृत्यु भोज के लिए बनी कचौड़ी के लिए भी सवाल-जवाब है! जैसा कि हर हास्य-व्यंग्य की कलाकृति के साथ होता है, पहले हम हंसते हैं पर अंतत: यथार्थ की चुभन हमें रुलाती है. रामप्रसाद छह बच्चों के पिता हैं, उनके निधन के बाद कोई भी उनकी विधवा को संग-साथ रखने को राजी नहीं होता. सबके पास अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों का बहाना है. माता-पिता का अपने बच्चों के साथ पालक-पोषक का रिश्ता होता है, पर उन दोनों के बीच के आत्मीय रिश्ते बच्चों की आँखों से अक्सर ओझल ही रहते हैं. दोनों के बीच करीब पचपन साल का संग-साथ रहा है. इस फिल्म में पिता के जाने के बाद बच्चों से ज्यादा माँ की स्मृतियों में ही वे जिंदा हैं. मौत के बाद घर-परिवार के सदस्यों के आपसी रिश्ते को यह फिल्म यथार्थपरक ढंग से संवेदनशीलता के साथ सामने लाती है. साथ ही मध्यवर्गीय परिवार की नैतिकता, पाखंड और खोखलापन भी उजागर होता है. हालांकि फिल्म में अच्छा-बुरा, हीरो-विलेन आदि का द्वंद नहीं है.

अपनी पहली फिल्म में सीमा पाहवा का लेखन-निर्देशन आश्वस्त करता है. इस फिल्म में विभिन्न चरित्रों को मनोज पाहवा, विनय पाठक, निनाद कामत, परमब्रत चटर्जी, विनीत कुमार, बिजेंद्र काला, विक्रांत मेसी, कोंकणा सेन शर्मा आदि ने बखूबी निभाया है. किरदारों के लिए स्क्रीन टाइम भले ही कम हो, सबने अपनी अलग पहचान छोड़ी है. फिल्म में गीत-संगीत का समावेश खलता है. फिल्म को आगे ले जाने या मनोरंजन में इसकी कोई भूमिका नहीं है.

नए साल में कोरोना का भय अभी हावी है. दिल्ली के जिस मल्टीप्लेक्स में हम सिनेमा देखने गए थे, वहाँ बमुश्किल पंद्रह लोग मौजूद थे. ऐसे में क्या ओटीटी प्लेटफॉर्म पर इस फिल्म को रिलीज करना मुफीद नहीं होता जहाँ इसकी पहुँच एक बड़े दर्शक वर्ग तक सहज ही होती?

(प्रभात खबर, 10 जनवरी 2021)