Thursday, September 29, 2011

आसमान में घन कुरंग

पिछले दिनों लंदन के कुछ इलाकों में हुए भारी दंगों का बादल अब शहर पर से छंट चुका है.
पूरा शहर टेम्स नदी के किनारे सालाना जलसा 'टेम्स समारोह' मनाने के लिए जुटा हुआ है. यह समारोह लंदन शहर के जज्बे को सलाम करने और उसके दिल में बसे टेम्स नदी के प्रति अपना प्यार जताने के लिए मनाया जाता है.
टेम्स के किनारे चिनार के हरे और हल्के पीले पत्ते हवा के झोंके के संग इधर-उधर उड़ते रहते हैं. माहौल चारो तरफ काफी खुशगवार है.

दूर तक लगे झाड़-फानूस, खाने-पीने के खोमचों, सडकों पर नाच-गाने और शोर-शराबे को देख कर ऐसा लगता है कि हम किसी भारतीय शहर में आ गए हैं. लेकिन जहाँ भारत में पर्व-त्योहारों पर ही ऐसा रेला दिखता है, वहीं टेम्स के प्रति अपना हक अदा करने के लिए लंदनवासी इस पर्व का आयोजन करते हैं.
हमने अपनी नदियों को देवी-देवता मान कर उसे पूज्य बना दिया पर प्यार और सम्मान देना कहाँ सीखा!
बहरहाल गर्मी की अब बस छाया भर है और शरद की आहट हवाओं में है. हल्की बूंदा-बांदी और बादल के घिरने से ठंड का एहसास होने लगता है. हालांकि कुछ लोग कमीज में हैं तो कुछ लोग स्वेटर और जैकेट पहने हुए दिखते हैं.
वीक एंड पर पबों में मस्ती और सड़कों पर बीयर की टूटी हुई बोतलें! लेकिन सोमवार की सुबह होते ही ट्यूब स्टेशनों, लंदन के सड़कों की पहचान लाल रंग की दुमंजिली बसों पर काम-काज पर आने-जाने वालों की भीड़ का रेला. हल्की धूप में ‘ट्रैफल्गर स्कवेयर’ पर सैलानियों की चहल-पहल और रात में ‘सोहो’ की गलियों की रंगनियाँ! शहर अपनी पूरी रफ्तार में है.
पर इस भीड़ और कोलाहल के बीच भी आर्थिक बदहाली की चर्चा कहीं दबी जुबान में तो कहीं सरगोशी से सुनाई पड़ जाती है.
चर्चित सेंट पाल कैथिडरल और लंदन म्यूजियम के बीच सड़क के एक किनारे स्थित ‘इंडियन क्यूजिन’ नामक एक रेस्तरां में काम करने वाले महफूज कहते हैं, “बड़ा कठिन समय है...अजीब-अजीब लगता है कभी कि किस मुलुक में आ गए हैं हम.”
तीस वर्षीय महफूज मूलत: बांग्लादेश के सिलहट के हैं और पिछले चार वर्षों से वे लंदन में हैं.

तलघर और पहले मंजिल पर फैले इस रेस्तरां में महज दो-चार लोग डिनर करते हुए दिखते हैं. ‘करी’ भले ही भारतीय व्यंजन के रुप में लंदन में चर्चित हो लेकिन ज्यादातर भारतीय रेस्तरां में इसे बनाते बांग्लादेशी मूल के लोग ही हैं.
महफूज कहते हैं, “ आज कल सब कुछ मंदा चल रहा है. कम ही लोग रेस्तरां में आते हैं..पता नहीं क्यों है ऐसा, पर यह पिछले साल था और फिर इस साल भी है.”
महफूज अपनी बीवी और दो बच्चों के साथ रहते हैं. बीवी लंदन की नागरिक हैं और अब वे भी लंदन के नागरिक हो गए हैं.
बीवी टीचर थी लेकिन दो बच्चों को संभालने के लिए अभी नौकरी नहीं कर रही है. ऐसे में परिवार पर आर्थिक बोझ आज कल ज्यादा है. वे कहते हैं कि अब तो लगता है कि यहीं के होकर रह गए. अब वापस भी नहीं लौट सकते.
इससे पहले दिन में ‘यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टमिंस्टर’ में भारतीय मीडिया के लेकर एक कांफ्रेस के दौरान भारतीय मूल के प्रोफेसर और शोधार्थियों से मुलाकात हुई. विश्वविद्यालय में एक युवा रिसर्च एसोशिएट ने कहा ‘दोहरी मंदी की मार झेल रहे हैं हम. आप भारत में ही अच्छे हैं.’
ऐसा नहीं कि मंदी की मार सिर्फ लंदन पर है. ग्रीस से लेकर फ्रांस तक इससे जूझ रहा है.
ट्यूब में यात्रा के दौरान मिले ग्रीस के एक शोधार्थी का कहना था, “एक कमरे का 650 पाउंड देना पड़ रहा है जिसे हम कुछ छात्र मिल कर शेयर कर रहे हैं. और कमरा क्या है बस रहने लायक जगह है. “
ग्रीस के हालात को जानते हुए मुझसे यह पूछने कि हिम्मत नहीं हुई कि किस तरह से वे लंदन में जिंदगी बसर कर रहे हैं. मंदी की मार बेरोजगारों से बेहतर कौन जानता है.
शिशु घन-कुरंग लंदन के आसमान की पहचान हैं. इससे पहले भी 70 और 80 के दशक में लंदन आर्थिक मंदी की मार झेल कर मजबूती से उबरा था. पर इस बार मंदी का घना बादल लंदन के आसमान में फैला दिखता है.
ऐसा लगता है कि लोग ‘गर्मी की तपिश’ के बाद इस बार ‘शीत के असंतोष’ को झेलने के लिए मन को मजबूत कर रहे हैं.
(जनसत्ता, दुनिया मेरे आगे कॉलम में 6 अक्टूबर 2011 को प्रकाशित)

Wednesday, September 21, 2011

टेम्स के किनारे


हम दिन भर पैदल लंदन की सड़कों को नाप चुके थे. विवियन यूँ तो वियना की है पर लंदन की गलियों से उसकी पहचान है. शहर के उन हिस्सों में उसकी दिलचस्पी ज्यादा है जो 'लोनली प्लैनेट' सरीखी किताबों और टूरिस्ट गाइडों में जगह नहीं पाती.
सबेरे ‘टेम्स नदी’ की खोज में हम निकले. सिटी सेंटर से टेम्स बहुत दूर तो नहीं थी पर इस खोज में हमने कई ऐसी इमारतें देखी जो शायद हम ट्यूब या बस में चढ़ कर नहीं देख सकते थे. वैसे भी शहर की पुरानी गलियों में भटकना नए इलेक्ट्रॉनिक उपकरण से खेलने की तरह होता है. कोई इंजीनियर हमें तकनीकी बारीकियाँ भले समझा दे पर सीखते हम खुद उससे उलझ कर ही है.
किसी भी पुरानी सभ्यता की तरह लंदन में पुराने स्थापत्य और नई इमारतें एक साथ हमजोली की तरह खड़ी नजर आती है. एक तरफ क्रिस्टोफर वारेन की तीन सौ साल पुरानी ‘सेंट पॉल कैथिडरल’ की अदभुत और दिलकश वास्तुशिल्प है तो दूसरी तरफ कारोबार के दमकते नए भवन हैं जो आधुनिक कला के नजारे दिखाते हैं. शहर के अंदरुनी हिस्सों में मजबूत और विशाल भवन ब्रितानी साम्राज्य के अतीत के गवाक्ष हमारे सामने खोलते हैं.
बहरहाल, थोड़ी दूर पर लंदन टॉवर ब्रिज के दो बुर्ज दिख रहे हैं. आसमान साफ है. सफेद-नीले बादलों का गुच्छा टेम्स नदी पर लटक रहा है. हल्की गुलाबी ठंड है और हवा में खनक. टेम्स नदी के किनारे काफी रौनक और चहल पहल है. नदी के तट पर एक जगह मुझे कुछ कंटीले गुलाबी रंग के फूल दिख रहे हैं मैंने ठहर कर अपने कैमरे में उसे कैद कर लिया. हल्की हवा का स्पर्श पाकर चिनार के हरे-पीले पत्ते इधर-उधर उड़ रहे हैं. एक पत्ता उठा कर मैंने अपनी जेब में रख ली.
टेम्स के सम्मोहन में मैं बंधने लगा हूँ. यूरोप की नदियाँ शहरों से इस कदर गुंथी हुई हैं कि आप उसे शहर की संस्कृति से अलगा नहीं सकते. पेरिस में सेन हो, कोलोन में राइन या लिंज में दुना! क्या कभी गंगा, यमुना और पेरियार भी हमारे शहर की संस्कृति का हिस्सा नहीं रही होंगी?
टेम्स के ‘साउथ बैंक’ पर सेकिंड हैंड किताबों का बाजार सजने लगा है. सामने नेशनल थिएटर की इमारत पर रंग-बिरंगे पोस्टर दिख रहे हैं. दूसरी ओर कुछ फर्लांग की दूरी पर ‘शेक्सपीयर ग्लोब थिएटर’ और ‘टेट मार्डन गैलरी’ है.
लंदन की यात्रा से पहले मेरे बॉस करण (थापर) ने कहा था कि ‘लंदन जाने पर वहाँ के थिएटर मे जरुर जाना और देखना कि किस तरह बिना चीखे-चिल्लाए वे अपने भावों को अभिव्यक्त करते हैं. हमारे बॉलीवुड की तरह नहीं...’
शेक्सपीयर ग्लोब थिएटर के पास पहुँचने पर हमने देखा कि शो छूटने में बस 10 मिनट है. हम पाँच पांउड में खड़े होकर नाटक देखने का टिकट लेकर ‘द गॉड ऑफ सोहो’ देखने ऑडिटोरियम में घुस गए. खुले आसमान में मंच बना है और दर्शकों के लिए दोनों ओर सामने लकड़ी की दो मंजिला बैठक है. खड़े हो कर देखने वालों के लिए बारिश की बूंदा-बांदी से बचाव का कोई साधन नहीं. जितने लोग दर्शक दीर्घा में बैठे है उतने ही खड़े.
नाटकों में मेरी अभिरुचि रही है पर इस तरह का बेबाक डॉयलॉग और अभिनय पहली बार देखा-सुना. वैसे हमें अगाह कर दिया गया था कि नाटक में ‘अभद्र भाषा (filthy language)’ का प्रयोग है और यह नाटक कमजोर दिलवालों के लिए नहीं है!!
थिएटर के निकल कर हम सोचते रहे कि कैसे नाटक की मुख्य स्त्री पात्र ने मंच पर एक-एक कर अपने कपड़े फेंक दिए...! हमारी संवेदना को झकझोरने के लिए यह एक नया और अलग अनुभव था. वैसे नाटक के कथानक को देखते हुए हम दृश्य संयोजन से अचंभित नहीं थे.
शाम हो रही थी और हमें तय करना था कि अब लंदन के किस कोने में हमें जाना है. किन सड़कों पर भटकना है.

बातों बातों में मैंने कहा कि ‘कार्ल मार्क्स की कब्र लंदन में ही है.’
अच्छा! मुझे पता नहीं था….विवियन ने कहा. हाइड पार्क या मार्क्स की कब्र- दो में एक चुनना था और हमनें हाईगेट कब्रगाह जाने का निश्चय किया.
कब्रगाह शहर से बाहर था. हाईगेट स्टेशन पर ट्यूब से निकल कर हम जिस कॉलोनी से कब्रगाह की ओर बढ़ रहे थे वह पॉश कॉलोनी लग रही थी. ऊँची पहाड़ियों पर खूबसूरत भवन. महंगे कार और करीने से सजे लॉन.
दो-तीन किलोमीटर पैदल चल कर जब हम कब्रगाह पहुँचे शाम के करीब सात बज रहे थे.
चारों तरफ सन्नाटा था और कब्रगाह में ताला लटक रहा था. अगल-बगल हमने नजर दौड़ाई पर वहाँ कोई नहीं दिख रहा था. अलबत्ता कब्रगाह के अंदर एक लोमड़ी टहलती दिख रही थी.
इसी बीच सड़क पर निकले एक व्यक्ति को रोक कर हमने पूछा कि ‘क्या मार्क्स की कब्रगाह यही है?’
भले मानुष ने थोड़ी हताशा भरी स्वर में कहा कि ‘बेशक यही है. पर आप देर हो चुके हैं. यह पाँच बजे बंद हो जाती है.’
हमारे चेहरे पर आए निराशा के भाव को पढ़ कर उन्होंने पूछा आप कहाँ से आए हैं?
मैं भारत से हूँ और ये ऑस्ट्रिया से आई हैं...
कोई नहीं, आप फिर कल आ जाइएगा...
विवियन ने कहा कि क्यों ना हम मार्क्स के नाम एक संदेश छोड़ जाएँ. मैनें कहा जरूर..
‘कामरेड मार्क्स, हृदय के अंतकरण से हमारी श्रद्धांजलि! दुनिया बदल गई है पर इस बदली हुई दुनिया में तुम्हारे सिद्धांतों की जरुरत कम नहीं हुई, बल्कि और बढ़ गई है!’
विवियन ने कपड़े के एक छोटे से टुकड़े में इस संदेश को लपेट कर कब्रगाह के दरवाजे पर बांध दिया...
(चित्र में, टेम्स पर बने मिलेनिएम ब्रिज से सेंट पॉल कैथिडरल का नजारा, हाईगेट सेमिटेरी के गेट पर विवियन. जनसत्ता में समांतर कॉलम के तहत 9 नवंबर 2011 को प्रकाशित)

Saturday, August 13, 2011

सावन का संगीत


खेत-मेड़, पगडंडिया- सब कीचड़ से सने हैं. धान की बुवाई लगभग पूरी हो गई है. सावन की हल्की बयार में नन्हें शावकों की तरह धान के पौधे हवा में लहराते रहते हैं.

आम के बगीचों में इक्का-दुक्का आम दिखता है जिसे शायद कौवों और गिलहरियों के खाने के लिए छोड़ दिया गया है. घर में सबको खाना खिलाने के बाद गृहिणी के चेहरे पर जो तृप्ति दिखती है, कुछ-कुछ ऐसी ही रंगत आम के पेड़ों पर है.

आम और लीचियों का मौसम खत्म होने के बाद बगीचों में अमरूद और कटहल के पेड़ों की डाल फलों से लकदक है. फल अभी पके नहीं है, ये अपनी उम्र की वयसंधि पर खड़े हैं.

गाँव में डबरा और चहबच्चा पानी से ऊब-डूब है. घर के सामने डबरे में मखाना के पत्ते धीरे-धीरे गल के बिखर रहे हैं, कुछ दिनों में मछुआरे कीचड़ और पानी से छान कर इसे निकालेंगे.

गाँव में हाल ही में बने ‘उत्क्रमित (अपग्रेडेड) मध्य विद्यालय’ के बच्चे मास्टर साहब की गैर मौजूदगी में कांटों की परवाह किए बिना मखाना के पौधे से कच्चे मखाना निकालने में मग्न हैं. बिहार के स्कूलों में ‘मिड डे मिल’ और लड़कियों के लिए साइकिल की चर्चा सब करते हैं, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता पर किसी का ध्यान नहीं है. दादी अपने लोक अनुभव का आश्रय लेकर कहती है ‘आसमान में ही जब छेद हैं तब दर्जी के बाप का दिन है कि उसे सिलेगा...’

बाहर फिर झकझोर के बारिश हो रही है. खिड़की को जान बूझ कर मैंने बंद नहीं किया है. बारिश की कुछ छीटें मेरे बिस्तर पर पर रही है.

माँ को शायद इस बात का पता नहीं है कि बिस्तर भींग रहा है, नहीं तो पहले झिड़केगी. फिर हँसेगी और पापा की ओर मुखातिब होते हुए कहेगी कि ‘कैसे तुम रहते हो दिल्ली में पता नहीं! जाओ, नहीं सुधरोगे तुम!’


बचपन में जब बारिश के मौसम में स्कूल से लौटना पड़ता था, तब अपने बस्ते को पन्नी में लपेट कर, पेट से सटाए हम बुशर्ट के अंदर कर लेते थे. माँ घर के ओसारे में बैठी हमारा इंतजार कर रही होती और बारिश की बूंदें फूस के घर से हरहरा कर ओलती में गिरती जातीं.

बाद में जायसी को पढ़ते हुए ‘बरसै मेघा झकोरी, झकोरी मोरे दुइ नैन चुवै जस ओरि’ का मतलब समझा. प्रोफेसर मैनेजर पांडेय साहित्य का समाजशास्त्र पढ़ाते हुए बताते थे कि किस तरह राजस्थान में कुछ कक्षाओं में उन्हें ‘नागमती का विरह वर्णन’ और इन पंक्तियों का अर्थ समझाने में दिक्कत आती थी. महानगरों में रहने वाले जिन्होंने केवल फिल्मों गीतों में सावन-भादो में नायिकाओं को भींगते देखा है उन्हें कभी-कभी मिथिला और अवध के गाँवों को भी अपनी यात्रा में शामिल करना चाहिए. किस तरह से किसानों का जीवन स्याह मेघ और उमड़ते-घुमड़ते बादल की मौजों पर टिका रहता है. कैसे फूस के घर की छावन की चिंता उन्हें सताती रहती है, जिनके घर के पुरुष दिल्ली और पंजाब में मजदूरी कर रहे हैं.

वर्ष 1987 में मधुबनी जिले में आई भीषण बाढ़ में फूस का घर बह गया तब उसकी जगह ईंट और सीमेंट का घर बना. हर मानसून में दिल्ली में मुझे अपने फूस के घर की याद आती रही है. ओलती में बारिश की पीली बूंदों को टप -टप गिरते बरसों से मैंने नहीं सुना है.

स्मृतियों के एलबम में हम अक्सर चित्रों को सहेजते हैं पर ध्वनियाँ भी अनकहे संग हो लेती हैं. जब-तब आश्रय पा कर ये ध्वनियाँ हमें उद्वेलित कर जाती हैं. इस बार जब सावन में घर गया तो मेरी आँखें पुराने घर को ढूंढ़ रही थी. गाँव से सटे रेलवे हॉल्ट पर डीजल से चलने वाली ट्रेन में कोयले से चलने वाली ट्रेनों की छुक-छुक और घुम-घुम ढूंढ़ रही थी.

बहरहाल, बिस्तर पर अधलेटे, हाथ में किताब लिए मैं हवा के झोंकों के संग बाहर बांस, जामुन, आम, अमरूद के पेड़ों के झूलने और झिर झिर बारिश की बूंदों से उपज रही संगीत को सुन रहा हूँ.
क्या खाना है, कहां जाना है, किस-किस से मिलना है कि सूची में यह भी लिखके आया था कि पापा से बहस नहीं करनी है, माँ से वो सब पूछना है जो बातें फोन पर नहीं कर पाता, दादी से आजादी के दिनों और निपट गरीबी की बात करनी है.

साल भर बाद घर आया मैं अपने ही घर में चार दिन का मेहमान भर हूँ. कल फिर दिल्ली के लिए ट्रेन पकड़नी है...

कहते हैं कि जब भी फणीश्वर नाथ रेणु अपने गाँव औराही हिंगना जाते, वहाँ से अनेक किस्से- कहानियों के संग लौटते थे. मुझमें वह प्रतिभा कहाँ!

बहरहाल, इन वर्षों में गाँव में भी डीटीएच की तारें और इनवर्टर दिखने लगे हैं, एफएम रेडियो के स्वर सुनाई देने लगे हैं. पर सावन-भादो की वही पुरानी संगीत की धुनें है जिसे गाँव में छोड़ हम शहर आ गए थे. दिल्ली का मानसून कितना भी सुंदर क्यों नहीं हो, पर उसमें वो ताजगी कहाँ, जिसमें सोंधी मिट्टी की गंध और अधपके फलों और फूलों की खुशबू लिपटी रहती है.

(जनसत्ता, दुनिया मेरे आगे, 13 अगस्त 2011 को प्रकाशित)

Saturday, July 09, 2011

मणि कौल: परदे पर कविता

पिछले साल मानसून में मैं पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट (एफटीआईआई) में फिल्म एप्रीसिएशन पाठयक्रम की पढ़ाई कर रहा था. इस संस्थान ने पिछले साल ही अपनी स्थापना के 50 वर्ष पूरे किए. एफटीआईआई की यात्रा और भारतीय सिनेमा में उसके योगदान को लेकर मैंने एक लेख लिखा था और इसी सिलसिले में मणि कौल को मैंने फोन किया था. उन्होंने कहा कि ‘मैं आ ही रहा हूँ वहीं बैठ कर बात कर लेंगे.’

पाठ्यक्रम के आखिरी दिन मणि कौल ने अपना व्याख्यान दिया था. मैं उनके हंसमुख व्यक्तित्व और मजाकिया लहजे से परिचित था. ‘ओसियान’ फिल्म समारोह के दौरान दिल्ली में उनसे गाहे-बगाहे मुलाकात हो जाती थी. बीते कुछ वर्षों से वे दिल्ली ही रह रहे थे और ओसियान से जुड़े थे.व्याख्यान के दौरान जब एप्रीसिएशन पाठयक्रम के संयोजक सुरेश छाबरिया ने उनका परिचय कराते हुए कहा कि ‘मणि हमारे समय के सबसे बेहतरीन फिल्म निर्देशक हैं’ तो कई सहपाठियों ने विस्मय से उनकी ओर देखा था. हमारी पीढ़ी जिसने नब्बे के दौरान होश संभाला, मणि कौल और उनकी फिल्मों को नहीं जानती. लेकिन मणि कौल एक निर्देशक के साथ-साथ सिनेमा के कुशल शिक्षक भी थे. व्याख्यान के दौरान उन्होंने बताया कि ‘सिनेमा ध्वनि और बिंब का कुशल संयोजन होता है और उसे उसी रूप में पढ़ना चाहिए.’ पढ़ाई के दौरान में हमें उनकी बहुचर्चित फिल्म ‘सिद्धेश्वरी’ दिखाई गई थी. फिल्म के प्रदर्शन से पहले फिल्म की भूमिका बांधते हुए उन्होंने अपने परिचित अंदाज में मुस्कुराते हुए कहा था कि ‘अगर कुछ चीजें समझ में नहीं आए तो ज्यादा दिमाग मत लगाइएगा यह बहुत महत्वपूर्ण नहीं है.’ लेकिन ‘सिद्देश्वरी’ देखते हुए ऐसे लगा कि हम एक लंबी कविता को परदे पर पढ़ रहे हैं.

दरअसल, मणि कौल खुद के बारे में बेहद मजाकिया लहजे में बात करते थे. दर्शकों के बीच अपनी फिल्म की पहुँच को लेकर उन्होंने हमें एक वाकया सुनाया था. चर्चित अभिनेता राज कुमार उनके चाचा थे. एक फिल्म पार्टी के दौरान उन्होंने आवाज देकर मणि कौल को बुलाया और कहा, ‘जानी, मैंने सुना है कि तुमने फिल्म बनाई है..उसकी रोटी. क्या है यह? रोटी के ऊपर फिल्म! और वह भी उसकी रोटी?तुम मेरे साथ आ जाओ हम मिल कर अपनी फिल्म बनाएँगे- अपना हलवा.” बातचीत के दौरान उन्होंने कहा था कि ‘मैं हिंदी में ही सोचता और लिखता हूँ.’ उसकी रोटी, आषाढ़ का एक दिन, दुविधा, सतह से उठता आदमी और नौकर की कमीज’ हिंदी की चर्चित कृतियाँ है. मणि कौल ने हिंदी साहित्य की इन कृतियों को आधार बना कर फिल्म रची और इन्हें एक नया आयाम दिया. मुंबइया फिल्मों के कितने फिल्मकार आज हिंदी में सोचते और रचते हैं? मणि कौल को संगीत की गहरी समझ थी. उन्होंने डागर बंधुओं से विधिवत संगीत सीखा था और जिसकी परिणति ‘ध्रुपद’ फिल्म में सामने आई. मणि कौल ने माना था कि उन्हें फिल्म बनाने में वित्तीय संकट से जूझना पड़ रहा हैं. पर सृजनात्मकता से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया. अंतिम दिनों में वे विनोद कुमार शुक्ल की कृति ‘खिलेगा तो देखेंगे’ को सिनेमाई भाषा में रच रहे थे.

वर्ष 1969 में महज 25 वर्ष की उम्र में मोहन राकेश की कहानी ‘उसकी रोटी’ पर इसी नाम से फिल्म बना कर उन्होंने हिंदी फिल्मों को ‘पापुलर सिनेमा’ से बाहर निकाल कर ‘समांतर सिनेमा’ का एक नया रास्ता दिखाया था. वर्ष 1964-65 में ऋत्विक घटक उप प्राचार्य के रूप में एफटीआईआई नियुक्त हुए थे और एक पूरी पीढ़ी को सिनेमा की नई भाषा से रू-ब-रू करवाया. मणि कौल ऋत्विक घटक के शिष्य थे. मलयालम फिल्मों के चर्चित निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन ने बताया कि मणि कौल घटक के सबसे ज्यादा करीब थे. अपने गुरु ऋत्विक घटक के प्रति मणि कौल बेहद कृतज्ञ थे. उनका कहना था “मैं ऋत्विक दा से बहुत कुछ सीखता हूँ. उन्होंने मुझे नवयथार्थवादी धारा से बाहर निकाला.” अक्सर ऋत्विक घटक की फिल्मों की आलोचना मेलोड्रामा कह कर की जाती है. मणि कौल का कहना था कि वे मेलोड्रामा का इस्तेमाल कर उससे आगे जा रहे थे. उस वक्त उन्हें लोग समझ नहीं पाए.

घटक की तरह ही हम उनके योग्य शिष्य मणि कौल की फिल्मों को उनके जीते जी समझ नहीं पाए.

समांतर सिनेमा को दुरूह और अबूझ कह कर खारिज करने की कोशिश की जाती रही है. हालांकि उन्होंने कहा था कि ‘वर्तमान में जब अनुराग कश्यप और इम्तियाज अली जैसे निर्देशक मुझे फोन कर के कहते हैं कि मेरी फिल्मों से उन्हें काफी सीख मिलती है तो काफी खुशी होती है.’ दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में हिंदी फिल्मों में संवेदनशील, प्रयोगधर्मी युवा फिल्मकारों की आवक बढ़ी है जो मणि कौल की फिल्मों से प्रेरणा ग्रहण कर भीड़ और लीक से हट कर हिंदी सिनेमा का एक नया संसार रच रहे हैं.

लेकिन आज जब कुछ लोग ‘डेल्ही बेली’ और उसमें प्रयुक्त भौंडेपन और गालियों को ही सिनेमा की भाषा मानने पर जोर दे रहे हैं, ऐसे में मणि कौल की फिल्मों की पहचान कैसे होगी?

(जनसत्ता, दुनिया मेरे आगे कॉलम में 9 जुलाई 2011 को प्रकाशित. चित्र में एफटीआईआई-एनएफएआई में फिल्म एप्रीसिएशन पाठयक्रम, 2010 के दौरान व्याख्यान देते मणि कौल)

Friday, June 10, 2011

किसका देश


पिछले दिनों 'भारत माता की जय' के नारे खूब सुनाई दिए. काले दाढ़ी वाले बाबा, गेरुआ वस्त्र में योगी और गांधी टोपी पहने समाज के अलंबरदार इस जयकारे के अगुआ थे. 
पता नहीं जीवन के आखिर दिनों में मकबूल फिदा हुसैन इन नारों को सुन रहे थे कि नहीं. यदि सुन रहे थे तो क्या सोच रहे होंगे वे?
 
हाल ही में उन्होंने एक पेंटिग बनाई थी जिसमें भारत माता भ्रष्टाचार के दानव का नाश कर रही है. 
हुसैन की बनाई भारत माता की एक अन्य तस्वीर से विश्व हिंदू परिषद और शिव सेना जैसे संगठनों के कठमुल्लों को आपत्ति थी और उन्हें इनका विरोध झेलना पड़ा.
बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने अहमदाबाद मे उनकी गैलरी में तोड़-फोड़ की, घर को निशाना बनाया. 90 के दशक मे जब राजनीति की लड़ाई संस्कृति के हथियारों से लड़ी जाने लगी तो हिंदुत्व की नई परिभाषा भी गढ़ी गई. हुसैन की पेंटिंग पर सवाल उठने शुरु हुए.
हिंदू देवी-देवताओं की नग्न तस्वीर बनाने को लेकर उन पर कई मुकदमें दर्ज किए गए. गौरतलब है कि ये तस्वीरें उन्होंने 70 के दशक में ही बनाई थी लेकिन उन्हें कटघरे में बीस-पच्चीस साल बाद खड़ा किया गया. यही आखिरकार हुसैन के जीवन के आखिर वक्त में निर्वासन में जीने की वजह भी बनी. 
हुसैन ने पेंटिंग की एक नई भाषा गढ़ी जिसमें आजाद भारत की खुशबू लिपटी है. भारत माता उनकी पेंटिंग में 'विशिष्ट स्वरलहरी' की तरह रही हैं. भारत माता और भारतीयता को वे एक कलाकार के नजरिए और प्रिज्म से देखते थे लेकिन 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' का माला जपने वालों को उनमें कलाकार कम और मुसलमान ज्यादा दिखता था.
वर्ष 2000 में बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, "इतिहास गवाह है कि अपने समय में लोगों की पहचान नहीं होती." हुसैन के बारे में शायद यह किसी भी भारतीय कलाकार से ज्यादा सच है. वे हमारे समय से सबसे ज्यादा चर्चित कलाकार रहे, लेकिन उन्हें पहचानने में ना सिर्फ राज्य और सत्ता बल्कि हमारा कला समाज भी नाकाम रहा.
भारत से उन्हें बेहद प्यार था और भारत की सामासिक संस्कृति उनके चित्रों में झलकती थी. जीवन के आखिरों दिनों में भी वे महाभारत को अपनी पेंटिग में उकेर रहे थे. रामायण पर बनाई उनकी पेंटिग सीरिज भारतीय कला की धरोहर है.
डेढ़ साल की उम्र में माँ की मौत से उपजे बिछोह को वे जिंदगी भर ढूंढ़ते रहे. वह 'भारत माता' हों या 'मदर टरेसा', वे एक माँ की छवि आंकते रहे. देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल फूंकने वाले, भारत माता की जयकार लगाने वाले इसे ‘आजादी की दूसरी लड़ाई’ बता रहे हैं. आजादी की इस लड़ाई में हुसैन जैसों की कितनी चिंता है उन्हें?
जीवन के आखिरी पड़ाव पर पहुँचे हुसैन को भारतीय राज्यसत्ता ने नकार दिया था. आत्म-निर्वासन के दौरान उन्हें कतर की नागरिकता पेश की गई जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया. बार बार देश लौटने की बात करने वाले हुसैन के लिए लंदन के अस्पताल में आखिरी सांसे लेना कितनी भारी रहा होगा, यह निर्वासन में जीने वाला ही समझ सकता है!
क्या यह हुसैन की नियति थी कि उन्हें अपने देश में दो गज़ ज़मीन भी नसीब नहीं हुई या हमारी बदकिस्मती? 
(जनसत्ता, समांतर कॉलम में 23 जून 2011 को प्रकाशित)

Tuesday, May 31, 2011

विश्व कवि आस-पास

पुराने घर में एक टीन का बक्सा था जिसमें कुछ किताबें भरी थी. उन किताबों को टटोलना, बक्से से बाहर-भीतर करना बचपन में हम भाई-बहनों के खेल का हिस्सा था. उनमें एक पतली सी किताब ‘गीतांजलि’ भी थी. हिंद पॉकेट बुक्स की हिंदी में. बक्से में विद्यापति, प्रेमचंद, नागार्जुन, हरिमोहन झा और शरतचंद्र की किताबें भी रखी थी.

मिथिला के एक अनाम गाँव में यह हमें बचपन में ही बता दिया गया था कि रवींद्रनाथ ठाकुर हिंदी के नहीं, बांग्ला के लेखक-कवि हैं. जबकि हमें यह बात बहुत बाद में समझ आई कि शरतचंद्र हिंदी के नहीं, बांग्ला के लेखक हैं!

बहरहाल, कुछ वर्ष पहले एक बातचीत के दौरान समाजशास्त्री आशीष नंदी ने यह जानने के बाद कि मैं दरभंगा-मधुबनी जिले से ताल्लुक रखता हूँ, कहा कि कभी बंगाल की संस्कृति दरभंगा के रास्ते ही फली-फूली. उन्होंने बताया था कि ‘दरभंगा असल में 'द्वार बंग' का ही परिष्कृत रूप है और मध्यकाल में मध्य एशिया से आने वाले व्यापारी दरभंगा के रास्ते ही बंगाल जाते थे.’

एक जमाने मे इस बात पर खूब बहस हुई थी कि विद्यापति मैथिली के नहीं बांग्ला के रचनाकार हैं. खुद रवींद्रनाथ की आरंभिक कविताओं में विद्यापति के कोमलकांत पदावली की छाप है. उनकी कविताओं में मनुष्य प्रेम और भक्ति की अनुगूँज जो एक साथ है उसका उत्प्रेरक कहीं ना कहीं विद्यापति की कविताएँ हैं. लेकिन इस बात की चर्चा शायद ही कहीं मिलती है कि मैथिली साहित्य या समाज पर रवींद्रनाथ का क्या प्रभाव रहा है.

नागार्जुन जैसे रचनाकार अपवाद हैं जिन्होंने ‘रविबाबू’ जैसी कविता ही नहीं लिखी बल्कि बांग्ला में भी कविताएँ रची.

पिछले कुछ दिनों से मेरे मन में यह बात बार बार उठ रही है कि रवींद्रनाथ ठाकुर मैथिली समाज के लिए क्यों बाहरी रहे. जबकि मैथिली और बांग्ला समाज के भद्रलोक और मध्य वर्ग के खान-पान, पहनावे, चित्रकारी, भाषा में काफी समानता है. बात मछली-भात खाने की हो, भाषा की मधुरता की, धोती-कुर्ता पहनावे की हो या मिथिला पेंटिंग या पट चित्रकारी की!

कुछ वर्ष पहले हिंदी के एक वरिष्ठ आलोचक ने भारतीय उपन्यासों को लेकर हो रही चर्चा के दौरान टैगोर रचित ''गोरा' को 20वीं सदी का सबसे बेहतरीन उपन्यास कहा तो मुझे आश्चर्य हुआ. संभव है कि इसमें अतिशोयक्ति हो लेकिन रवींद्रनाथ के साहित्य को लेकर हमारा हिंदी समाज एक तरह से उदासीन रहा है. बल्कि यों कहें कि उन्हें लेकर लेकर हिंदी के साहित्यक हलकों में एक तरह का दुचित्तापन रहा है. प्रश्न है कि क्या रवींद्रनाथ ठाकुर के साहित्य के बारे में विचार-विमर्श करने के लिए बांग्ला भाषा-भाषी होना जरूरी है?

रवींद्रनाथ विश्व कवि है. उन्हें इस बात का गौरव प्राप्त है कि भारत और बांग्लादेश का राष्ट्रगान उनके नाम है. उनके जन्म के डेढ़ सौ वर्ष पूरे होने पर दोनों देशों में रवींद्रनाथ के सम्मान में कई आयोजन एक साथ किए जा रहे हैं.

दक्षिण एशिया में राजनीतिक कटुता और द्वेष के माहौल के बीच रवींद्रनाथ के साहित्य, संगीत और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान को याद करने के लिए दो पड़ोसी देशों का एक मंच पर साथ आना सुखद और स्वागत योग्य है.

पर सवाल है कि बांग्ला समाज के बाहर रवींद्रनाथ के प्रति बेरुखी क्यो दिखाई देती है? क्यों रवींद्रनाथ अभी भी हिंदी प्रदेश के पाठकों के लिए एक बाहरी रचनाकार बने हुए हैं?

इस वर्ष जहाँ रवींद्रनाथ की डेढ़ सौंवीं जयंती मनाई जा रही है, वहीं हिंदी-मैथिली के कवि नागार्जुन की भी भी सौंवीं वर्षगांठ इसी साल चल रही है. साथ ही अज्ञेय, शमशेर, केदारनाथ अग्रवाल की भी जन्मशती हिंदी प्रदेश में मनाई जा रही है. इसका विश्लेषण करने की जरुरत है कि हिंदी के कवियों पर क्या रवींद्रनाथ का कोई प्रभाव रहा है.

दुर्भाग्यवश भारत के विश्वविद्यालयों में भाषा और साहित्य के केंद्रों में तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन और शोध पर कोई जोर नहीं है.

अगर विश्वविद्यालयों में तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन, अध्यापन, शोध को बढ़ावा दिया जाए तो विश्व कवि के साहित्य के दायरे का काफी विस्तार हो सकेगा. हम उनके कृतित्व और व्यक्तित्व के पहलूओं पर खुल कर विचार कर सकेंगे.

हाल ही में देश में दक्षिण एशिया विश्वविद्यालय समेत कई नए केंद्रीय विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई है. तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन-अध्यापन की दिशा में ये विश्वविद्यालय अगर कदम बढाएँ तो सही मायनों में रवींद्रनाथ के प्रति यह सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

(जनसत्ता, 'दुनिया मेरे आगे' कॉलम में 31 मई 2011 को प्रकाशित)

Thursday, April 21, 2011

बाबा नागार्जुन के गाँव में

बैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' उर्फ़ नागार्जुन यायावर थे. कभी कलकत्ता, तो कभी सहारनपुर, पटियाला, लाहौर, फ़िरोजपुर, अबोहर तो कभी सारनाथ, लंका या तिब्बत. उनकी यात्रा जीवन पर्यंत थमी नहीं.

अपनी इस यायावरी प्रवृत्ति के चलते वे अपने गाँव तरौनी में भी कभी जतन से टिके नहीं, पर तरौनी उनसे ताउम्र नहीं छूटा. साहित्य में भी नहीं, जीवन में भी नहीं.

उनके साहित्य संसार पर यदि हम गौर करें तो मिथिला का समाज प्रमुखता से चित्रित हुआ है.

पर साहित्य की भावभूमि भले मिथिला का गाँव-समाज हो, पर वह अपनी संवेदना में अखिल भारतीय है. इस तरह कविता में कबीर से और उपन्यासों में वे प्रेमचंद की परंपरा से जुड़ते हैं.

एक प्रवासी की पीड़ा व्यक्त करते हुए नागार्जुन ने अपनी एक कविता में लिखा है:

“याद आता मुझे अपना वह तरौनी ग्राम
याद आतीं लीचियां, वे आम
याद आते धान याद आते कमल, कुमुदनी और ताल मखान
याद आते शस्य श्यामल जनपदों के रूप-गुण अनुसार ही
रखे गए वे नाम”

मिथिला अपनी प्राकृतिक छटा के लिए विख्यात है. मैं आषाढ़ के महीने में दरभंगा ज़िले में स्थित उनके गाँव तरौनी गया. डबरे में मखान के पत्तों पर पानी की बूँदें अठखेलियाँ कर रही थीं. आम के बगीचों से ‘कलकतिया’ और ‘सरही’ आमों की खुशबू चारों ओर फैल रही थी.

खेतिहर किसान धान की रोपनी करते मिले. पगडंडियों के किनारे कीचड़ में गाय-भैंस-सूअर एक साथ लोटते दिखे.

एक ओर खपरैल और दूसरी ओर ईंट से बने घरों के बीचों-बीच नागार्जुन के आंगन में फूस से छाया हुआ मड़वा और घर की दीवारों पर मिथिला पेंटिंग की महक थी. आंगन में आम से लदे पेड़ की डाल लटक रही थी. घर के ठीक सामने पोखर के महार पर कनेल और मौलश्री के फूल अपनी सुगंधि बिखेर रहे थे.

बच्चों को हांकते ‘दुखरन मास्टर’, ‘तालाब की मछलियाँ’ रूपक में बंधी स्त्री और अपने हक की लड़ाई लड़ता ‘बलचनमा’. नागार्जुन के साहित्य का लोक अपनी संपूर्णता में मेरी आँखों के सामने था.

लोक के रचनाकार
नागार्जुन इस लोक से अपनी शक्ति ग्रहण करते हैं.

लोक जीवन, लोक संस्कृति और लोक चेतना उनके साहित्य की विशिष्टता है. क्या यह आश्चर्य नहीं कि कवि विद्यापति के क़रीब 500 वर्ष बाद मिथिला से कोई कवि अखिल भारतीय स्तर पर अपने स्वर को बुलंद करता है.

नागार्जुन हिंदी साहित्य की एक बिखरती परंपरा को फिर से जोड़ते हैं. उन्होंने मैथिली से अपने साहित्य जीवन की शुरूआत की और हिंदी के जनकवि के रूप में चर्चित हुए. मैथिली में रचित कविता संग्रह 'पत्रहीन नग्न गाछ' और उपन्यास ‘पारो’ आधुनिक मैथिली साहित्य की एक थाती है.

मिथिला में पंडितों की लंबी परंपरा रही है.

लेकिन वे ‘पोथी-पतरा-पाग’ में ही ज़्यादातर सिमटे रहे. अपनी विद्वता की बोझ से दबे रहे. लोक की परंपरा उनके लिए कोई मानी नहीं रखा. विद्यापति जैसे रचनाकर अपवाद हैं.

संस्कृत के पंडित होने के बावजूद नागार्जुन ने पंडिताई को बोझ नहीं बनने दिया. उन्होंने जन जीवन से जुड़कर साहित्य में और जीवन में सहजता पाई. उनका पूरा साहित्य जन के जीवट रस से सिक्त है.

उन्होंने अपनी एक कविता में लिखा है: कवि ! मैं रूपक हूँ दबी हुई दूब का...’ समाज के बहुसंख्यक जन के प्रति उनकी संवेदना, प्रतिबद्धता का स्रोत इस रूपक में निहित है.

(बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए, 6 मार्च 2011)

Wednesday, February 09, 2011

बीबीसी रेडियो का आखिरी प्रसारण

अगले महीने की इकतीस मार्च को शॉर्ट वेब पर बीबीसी की हिंदी रेडियो सेवा का आखिरी प्रसारण होगा!

पत्रकारिता की भाषा हमने बीबीसी हिंदी से सीखी. समंदर पार से लहराती हुई आती बीबीसी के रेडियो प्रजेंटर की खनकती आवाज़ में जादू था. उस जादू के सम्मोहन में हम छुटपन में ही बंध गए थे.

बड़े भाई साहब जो उम्र में मुझसे दस साल बड़े हैं, रोज़ बीबीसी सुना करते थे. घर में एक बड़ा रेडियो था. फिलिप्स का. सुना है कि पापा ने पहली कमाई से माँ के लिए वह रेडियो खरीदा था. वैसे जब कभी माँ को हम फिल्मी गाना गाते सुनते तो आश्चर्य करते...
बहरहाल, बात 80 के दशक के आखिरी वर्षों की है. बड़े भाई तन्मय होकर 'आजकल', 'खेल और खिलाड़ी' या 'हम से पूछिए' सुनते तो हम भी रेडियो को घेर कर बैठ जाते थे. बीबीसी की सहज भाषा हमें अपनी लगती थी.
खबर तब भले ही नहीं समझते थे, लेकिन साहित्यिक छौंक लिए हुए बीबीसी की भाषा के हम मुरीद बन गए थे. बड़े भाई ने समझाया था कि सहज होने का मतलब सपाट होना नहीं होता.
वर्ष 1991 में राजीव गाँधी की हत्या की खबर हमने सुबह-सवेरे बीबीसी से ही सुनी थी. बिहार के एक छोटे से गाँव में सूचना का हमारे पास वही एक स्रोत था. गोकि टेलीविजन घर आ गया था, लेकिन बिजली रहती कहाँ थी तब. आज भी नहीं रहती है!
आज भी बिहार के गाँवों में, नुक्कड़ों और चौक पर, खेत और खलिहानों में, प्राइमरी स्कूल के मास्टर साहब, भैस चराते हुए चरवाहे, आईएएस बनने का सपना संजोए छात्र-छात्राएँ बीबीसी के माध्यम से दुनिया जहान से रू ब रू होते हैं.
बिहार से बाहर निकलने पर बीबीसी सुनना छूट गया, पर बीबीसी की सीख साथ रह गई. खबरों की विश्वसनीयता, भाषा की संप्रेषणीयता की सीख जो हमें मिली थी वह बाद में काम आई.
कुछ वर्ष पहले मैं दिल्ली के 'इंडिया हैबिटैट सेंटर' में मिथिला पेंटिंग की एक प्रदर्शनी देखने गया था. चित्रों में कोहबर, मछली और अन्य पारंपरिक चित्रों के अलावे भ्रूण हत्या, अमरीका में हुए 9/11 के हमले का भी निरूपण था.
जब मैंने चित्रों में देखने को मिली इस विविधता के बारे में महिला कलाकारों से पूछा तो उनका जवाब था, 'हम पढ़-लिख नहीं पाते लेकिन बीबीसी सुनते हैं. उसी से हमें इन सबकी जानकारी मिलती है, जिसे हम अपनी चित्रों में उतारते हैं.'
'हमने बीबीसी पर सुनी है', यह जुमला आज भी उत्तर भारत में सुनने को मिलता है. जैसे बीबीसी का कहा अकाट्य हो!
बीबीसी के दक्षिण एशिया ब्यूरो के प्रमुख रहे मार्क टुली ने कहीं लिखा था कि 'बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद लोग बीबीसी का नाम लेकर अफवाह फैला रहे थे कि बीबीसी ने खबर दी है कि वहाँ दंगा फैल गया है...उस इलाके में लोगों को मार दिया गया...वगैरह वगैरह.'
इस बीच कहन के और भी साधन हमारे बीच आए. उदारीकरण के बाद सेटेलाइट चैनलों, खबरिया चैनलों की बाढ़ सी आ गई. बिहार के गाँवों में भी इन चैनलों की आवाज पहुँचती है, पर उनमें वो बात कहां!
दिल्ली जैसे महानगरों में हम बीबीसी रेडियो को भले ही मिस नहीं करते हो, लेकिन बिहार के गाँवों में बीबीसी रेडियो के बंद होने की खबर घर-परिवार के किसी आत्मीय के मौत से कम नहीं.
(जनसत्ता में समांतर कॉलम के तहत 11 फरवरी 2011 को प्रकाशित. बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ने 7 मार्च 2011 को हिंदी शॉर्टवेव और मीडियम वेव पर अपने चारों प्रसारणों में से एक, 'दिन भर' को अभी एक साल और (मार्च 2012 तक) जारी रखने का फ़ैसला किया है)

Friday, December 03, 2010

Wake up call from Niira?



Had Natha died in 'Peepali Live' would it have been a good copy for media?

Few months ago, while watching 'Peepali Live' this thought was coursing through my mind time and again.

Rakesh, a sensitive and ambitious vernacular journalist, breaks the story of a poor, debt-ridden farmer, Natha’s intended suicide to the 'national media'. All sudden Natha is a news maker. News channels, in various shape and size hurriedly reached Natha’s nondescript village, followed by 'Babus and Netas'.

Many of us might not have known about Natha, if there was no Rakesh. After the demise of Rakesh, who will report to us about Nathas?

Death of a vernacular journalist is no news!

For last few days all these thoughts have been coming to my mind again. Suddenly, India’s well known journalists are making news. They are making news because they are well known, perhaps!
In the beginning of this decade I was attending India’s premier media school. We would ask to journalists and teachers, 'what is news, Sir?' And the answer always used to be: good news is no news!

Obviously, there is something seriously wrong with Indian media when 'Icons' like Barkha Dutt and Vir Sanghvi and his ilks are in news. They are explaining to their audience what they did and what they didn’t do, rather than exposing and analyzing deeds of others.

In public perception most of Indian journalists are either 'power broker' or trying to be one. Because of this image vernacular journalists have been at the receiving end for long.

'Niira Radia tapes' and the news of national (?) journalists playing in the hands of corporate honchos and lobbyists and ministers no longer surprise them.

In the last decade Indian media have seen a phenomenal growth. But growth doesn’t always entail development.Indian media have redefined the news all along these years. Now news means, 'Paid news' or 'Good news (Khushkhabar)'.

Indian media is going through a 'legitimacy crisis'. Leading journalist P Sainath once commented, "The media have lost their compass and, with it, their compassion."

If journalism is 'literature in a hurry' and journalists are writers, then we must also remember that writers don’t have luxury to change their persona every now and then, like our leaders or lobbyists.
Perhaps, Niira’s call is last wake up call for Indian journalists…

(In the pic, Journalism students at Indian Institute of Mass Communication, Delhi)